Sunday, August 3, 2014

सुयोग्‍य एवं अनुशासित व्‍यक्ति तो समय की जरूरत है ही

च्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीश एआर दवे ने वैश्‍वीकरण के समय में सम-सामयिक विषय तथा मानवाधिकारों की चुनौतियां विषय पर आयोजित एक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन को सम्‍बोधित करते हुए विचारणीय बात कही। उन्‍होंने कहा कि भारत को अपनी प्राचीन परम्‍पराओं की ओर अग्रसर होना चाहिए तथा महाभारत एवं भगवद्गीता जैसे शास्‍त्र बच्‍चों को बचपन से पढ़ाए जाने चाहिए। उनके अनुसार यदि गुरु-शिष्‍य जैसी हमारी प्राचीन परम्‍पराएं अभी तक चल रही होतीं तो देश में हिंसा, आतंकवाद जैसी समस्‍याएं नहीं होतीं। उन्‍होंने आत्‍मबल से स्‍वीकार किया कि यदि वे भारत के तानाशाह होते तो पहली कक्षा से ही गीता एवं महाभारत को शुरु करवा देते।
चूंकि यह बात उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीश ने कही है, इसलिए कोई धर्मनिरपेक्षी नेता अभी तक इसके विरोध में अपनी धर्मनिरपेक्ष टिप्‍पणी नहीं कर सका है। यही बात हिन्‍दू मान्‍यताओं के पक्षधर किसी नेता ने कही होती तो अभी तक निराधार, बचकानी, मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रियाओं का अम्‍बार लग गया होता।
 वैसे इसमें कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश ने हिन्‍दू धर्म ग्रन्‍थों को बचपन से पढ़ाने की बात करी। न्‍याय की शासकीय व्‍यवस्‍था से जुड़ा व्‍यक्ति धर्म ज्ञान से संचित पुस्‍तकों के महत्‍व को जानता है। समाज की गति-दुर्गति से भलीभांति परिचित एक न्‍यायाधीश यदि प्राथमिक कक्षाओं में धार्मिक शिक्षा देने की बात करता है तो इसके पीछे कई कारण रहे हैं। अपने जीवन में अधिवक्‍ता से लेकर न्‍यायाधीश का कार्य करते हुए न्‍यायालयों में उन्‍होंने अपराध, आतंक, भ्रष्‍टाचार के जितने भी वादों पर न्‍यायिक निर्णय किया होगा, उससे कहीं न कहीं उनके अन्‍तर्मन को ऐसी समस्‍याओं के जड़मूल तक पहुंचने में वास्‍तविक दृष्टिकोण प्राप्‍त हुआ होगा। इसी भावना के चलते उन्‍होंने गीता, महाभारत जैसे ग्रन्‍थों के शिक्षण पर बल देने की बात कही।
और दवे अकेले व्‍यक्ति नहीं हैं, जिन्‍होंने मानव जीवन को श्रेष्‍ठता प्रदान करने का यह उपाय सुझाया हो। विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, अभियान्त्रिकी आदि क्षेत्रों के कई पुरुषों ने जीवन में सकारात्‍मकता लाने के लिए हिन्‍दू धर्म ग्रन्‍थों के पठन-पाठन की बात कही है। इन लोगों ने अपने काम के प्रति सच्‍चे व्‍यक्तित्‍व के सहारे लगने व कार्यों के जनकल्‍याण भाव में हमेशा स्थिर रहने के लिए धर्म ग्रन्‍थों के अध्‍ययन को बहुत उपयोगी माना है।
उदाहरण के लिए मेट्रो रेल के सेवानिवृत्‍त अध्‍यक्ष मेट्रोमैन ई. श्रीधरन अपने कार्यकाल के दौरान नवनियुक्‍त प्रत्‍येक कर्मचारी को गीता ग्रन्‍थ भेंट करते थे। वे तो पूरी तरह से तकनीकी कार्य करते थे। आम सामाजिक समझ के अनुसार उन्‍हें धर्म से क्‍या लेना-देना। लेकिन अनुभवी श्रीधरन को पता है कि जीवन में ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी उन्‍नति के लिए मनुष्‍य को सर्वप्रथम मनुष्‍यता के गुणों से युक्‍त होना होगा। इसी उद्देश्‍य से उन्‍होंने अपनी धार्मिक भावना का अपने कर्मीदल में प्रसार किया। इसके लिए उन्‍होंने किसी कर्मचारी पर दबाव नहीं बनाया। उन्‍होंने धार्मिक ग्रन्‍थ गीता के महत्‍व से सबको परिचित कराने के लिए मात्र एक पदाधिकारिक आहवान किया।
दवे यदि यह कहते हैं कि गीता व महाभारत पढ़ने के लिए तानाशाही नियम होना चाहिए तो यह उनकी विवशता है। उन्‍हें न्‍यायालयी अनुभव से ज्ञात है कि लोकतान्त्रिक और शासकीय लाड़-पुचकार से अपराधियों को मानवता के पथ पर अग्रसर नहीं किया जा सकता। जिस तरह बच्‍चे के अच्‍छे-बुरे के लिए अभिभावकों की डांट-फटकार जरूरी है और इसमें राष्‍ट्र-नियम-कानून कुछ नहीं कर सकते, उसी प्रकार आज विश्‍वव्‍यापी आतंक व भ्रष्‍टाचार के जड़मूल नाश के लिए वैश्विक अभिभावक के रूप में एक सुयोग्‍य एवं अनुशासित व्‍यक्ति तो समय की बहुत बड़ी जरूरत है ही। इस तथ्‍य को किसी भी कुतर्क से असत्‍य नहीं ठहराया जा सकता।
--विकेश कुमार बडोला

13 comments:

  1. धर्म का व्यापक लक्ष्य तो हमेशा से ही मानवकल्याण रहा है. उसकी बातों का अनुसरण निस्संदेह जीवन में शान्ति ला सकता है, ऐसा मेरा मानना है.लेकिन मुझे नहीं लगता कि स्कूली बच्चों की इतनी मानसिक परिपक्वता होती है कि गीता या महाभारत का असली ज्ञान वो आत्मसात कर लें या उसके बारे विवेचना करें.

    यह भी सोचना होगा कि एक तरफ प्राचीन ग्रंथों से ये सन्देश आये कि युद्ध बुरा है लेकिन अगर युद्ध की परिस्थति हो जाए तो वही एक मार्ग है शान्ति का.... और वहीँ दूसरी आधुनिक इतिहास आते आते गांधी की अहिंसा की नीतियों का गुणगान किया जाए तो एक छात्र के मानसिक विकास में कितनी विरोधाभास की बातें आ जायेंगी.

    एक और बात है कि महाभारत या गीता की किस किस बातों को सम्मिलित किया जाय. क्या युधिष्ठिर द्वारा पत्नी का जुआ लगाने की जोर से भर्त्सना की जाए या नहीं...क्या वंशवृद्धि के लिए नियोग की स्वीकार्यता की भर्त्सना की जाए की नहीं... यह कैसे तय होगा कि महाभारत से क्या पढाया जाए और क्या नहीं. कौन कौन सी बातें प्रासंगिक हैं आज के लिए?

    मेरा स्वयं का मानना है कि धर्म के प्रति आस्था, अनास्था, अध्ययन, अनुसरण एक निजी बात है और इसके बारे एक वयस्क हो जाने पर ही चिंतन और अमल करना चाहिए. अगर शिशुमन में धर्म की गलत व्याख्या भरी जाए तो उसका क्या परिणाम होता है यह आज का वैश्विक स्तर पर पसरा आतंकवाद बता रहा है. सदाचार,सद्गुण, मानव कल्याण आदि की बातें बहुत सरल कहानियों के द्वारा भी बच्चों की स्कूलों में आसानी समझाई जा सकती है. इस बात से पूर्ण सहमति है कि सुयोग्य एवं अनुशासित व्यक्ति समय की जरूरत है. धर्म, जमीन और तेल के लिए बहुत रक्तपात हो चुका है....

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  2. बिलकुल ठीक सही तो कहा उन्होंने क्यूंकि आज की शिक्षा हमारे यहाँ के बच्चों को केवल शिक्षित बना रही है सभ्य नहीं।

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  4. इस मुद्दे पर जस्टिस मारकंडेय काटजू की प्रतिक्रिया आयी है जो कुछ और ही विडंबना अवधारित करती है।

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  5. हमारे धर्म की कई पुस्तकें दरअसल धार्मिक न हो कर समाज में फैली विषमताएं और उनके अच्छे, बुरे प्रभाव से समाज को अवगत कराने वाली रही हैं ... इस क्रम में गीता, महाभारत, रामायण और एनी भी कई पुस्तकें हैं ... आज समय उनके विवेचन और उनसे शिक्षा लेने का है न की उसको धार्मिक मान कर सर्वोतम गूढ़ शिक्षा से आने वाली पीड़ी को वंचित रखने का ...
    बहुत ही छुद्र स्वार्थ के लिए पाता नहीं क्यों आज अपना समाज ये नहीं समझ पा रहा है और थोड़े से नेताओं/समाज के ठेकेदारों के बहकावे में आ रहा है ...

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  6. सबसे बड़ी समस्या यही है , गंभीरता से विचार करने के बजाय ऐसे तर्क कुतर्क किये जाते हैं | सधा विवेचन

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  7. बेहद सशक्त पोस्ट... हमें ये सोचना होगा कि कोई भी अच्छी पहल कुतर्क में न फंस जाए... आज यही हो रहा है कि कोई दवे की बात को इसीलिए खारिज कर रहा है कि मुझे तो खारिज ही करना चाहिए.............

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  8. बहुत सुंदर पोस्ट है दोस्त। प्रतिक्रिया स्वरूप एक समस्या का उल्लेख करना चाहूँगा। आजकल के बच्चों के सन्दर्भ में। आज इलेक्ट्रनि खिलौनों /गैजेट्स से बच्चे इस कदर विमोहित हैं की वे अपने आसपास अपने परिवेश से भी जुड़ नहीं पा रहे हैं। गड़बड़ गैजेट्स में नहीं हैं उनकी हूकिंग अतिशय गैजेट्स प्रेम में है।

    What pacifier is to an infant so is an electronic gadget to a child today .You ask any child today when will you take your breakfast ,the reply would be I don't know .He is right he really don't know when is the ongoing program will conclude on his gadget to which he is bound like the moon is bound to the earth .

    वह क्या खा रहा है उसे नहीं पता। खाने का रंग वह देखता ही नहीं है उसके सामने स्क्रीन है कुछ छवियाँ हैं कुछ खेल हैं।

    समाधान उपनिषद सुझाते हैं इस समस्या का : ज़ो भी कुछ है जिस भी चीज़ वस्तु व्यक्ति ,जड़ या निर्जीव का अस्तित्व है वह ईश्वर ही है। रचना और रचता में अभेद है। गैजेट भी ईश्वर हैं। उनसे प्रेमकरना भी ईश्वर से ही प्रेम करना है देखना यह है कहीं हमारा प्रेम किसी व्यवस्था नियम का तो उललंघन नहीं कर रहा वरना ऐसा सम्मोहन होने पर हम उस ईशवर को ही कष्ट पहुंचा रहे होंगें जिसे हम प्रेम कर रहे हैं। ये प्रेम नहीं है व्यायामोह है ,इनफेचुएशन है। प्रेम तो मुक्त करता है व्यवस्थित करता है।व्यायामोह हमारे विनाश का कारण बनता है धीरे धोरे। हमेंखबर भी नहीं होती।

    उपनिषदों का सार "गीता "एक सार्वकालिक ग्रन्थ है शाश्वतधर्म की व्याख्या लिए है। जो भी करो ईश्वर के निमित्त करो। उसके केंद्र में ईश्वर हो फिर जो भी करो।

    जो भी चीज़ है जिसका अस्तित्व है वह सुन्दर है आकर्षित करती है उसका एक नाम है एक रूप है। यह सिस्टम ही ईश्वर है। गैजेट इसका अपवाद नहीं हैं अपवाद हमारा रूख है रवैया है।

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  9. गीता जीवन का विज्ञान है जो कर्म की ओर व्यक्ति को प्रवृत्त भी करती है और कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। वही कर्म जो व्यक्ति को जन्ममरण से बांधता है वही मन की स्थिति बदल जाने पर स्टेट आफ माइंड बदल जाने पर कर्म बंधन से कार्मिक रिएक्शन से मुक्ति दिलवा देता है। बस कर्म का रूख जनकल्याण ,कृष्णाभावनामृत कृष्णा कांशषनेस की ओर मोड़ देना है। मन को कृष्ण में स्थापित कर लेना है कर्म को कृष्ण की ख़ुशी के लिए करना है। गीता जीवन का विज्ञान है साइंस आफ लिविंग है। कर्म पर ही मेरा अधिकार है फल पर नहीं। मैं कर्म का नियोक्ता हूँ फल का नहीं। कर्म में पूरी लग्न से समर्पण भावना से करूँ।

    स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार है मिलन हैगीता ज्ञान। मूल प्रश्न यही है यह आई (I),SELF है क्या ?

    तीन चीज़ें हैं :आत्मा -माया -परमात्मा।

    आत्मा और माया ईश्वर की ऊर्जा हैं। आत्मा आध्यात्मिक ऊर्जा ,डिवाइन एनर्जी है नान -मेट्रीरिअल एनर्जी और माया ईश्वर की मटीरियल एनर्जी है। ये शरीर मैं नहीं है। शरीर को मैं देख सकता हूँ ,जैसे संसार की अन्य वस्तुओ को मैं (सेल्फ ,अवेयरनेस )देख सकता हूँ। ओब्जेक्टीफाई कर सकता हूँ कह सकता हूँ ये मेरा शरीर है इससे सिद्ध होता है जैसे मैं संसार की और चीज़ों से अलग हूँ ऐसे ही शरीर से भी अलग हूँ।

    Mind -Body -senses Complex से अलग हूँ मैं। मैं अवेयरनेस हूँ। ज्ञान हूँ आनंद हूँ। अमऱता मेरा स्वभाव है। मैं आत्मा वस्त्र बदलता हूँ.मैं आत्मा शरीर रुपी शहर में रहता हूँ। शरीर मेरा कार्य क्षेत्र है इसीलिए शरीर को क्षेत्र भी कहा गया है मैं आत्मा क्षेत्रज्ञ हूँ। गीता हमें हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करना सिखाती है। जब बच्चा अंग्रेजी सीख सकता है तो गीता ज्ञान क्यों नहीं जान सीख सकता।

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  10. बहुत सुन्दर हैं पंक्तियाँ आभार आपकी टिप्पणियों का। खुशरहो ब्रितानी धरती पर। तुम फलो ब्रितानी धरती पर।

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  11. शुक्रिया दोस्त सामयिक लेखन से बा खबर रखवाते हो।

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  12. बहुत अच्छे विचार हैं आपके। हाल ही में मैंने एक ब्लॉग लिखना शुरू किया है। कृपया पढ़ कर अपने कमेंट्स या सुझाव दे। मेरे ब्लॉग का नाम दैनिक ब्लॉगर है। (http://dainikblogger.blogspot.in/)

    धन्यवाद
    अयान

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