Thursday, July 17, 2014

मन ही मन २

 पनी हालत अस्थिर है। सब कुछ अव्‍यवस्थित है। इसी कारण लेखन भी नहीं हो पा रहा। कल ज्‍यादा कुछ सोचे-विचारे बिना दो पंक्तियां ब्‍लॉग में डाल दीं। अब लग रहा है कि केवल इन पंक्तियों को डालने का कारण स्‍पष्‍ट करूं। 
वास्‍तव में पिछले दो महीने बहुत कष्‍टकारी रहे। दो पारिवारिक समारोह हुए। उनमें शामिल होने के बाद से लेकर अब तक लेखन पर जैसे मोटी जंग लग गई है और जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं, लेखकीय क्षमता भी खत्‍म हो रही है। विचारों को प्रकट करने की शक्ति कम हो रही है। घर-परिवार, समाज-सम्‍बन्‍ध, नौकरी-पेशे और नितान्‍त व्‍यक्तिगत जीवन की समस्‍याओं में उलझा हुआ हूँ। 
भारतीय राजनीति, अर्थनीति, कूटनीति और वैश्विक नीति से आजकल उसी तरह अनजान हूँ जैसे कोई पांच-छह साल का बच्‍चा रहता है। इससे मानसिक शान्ति मिल रही है। जीवन की एक सीधी राह पर चलनेवाला जीवन की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से अनजान रहता है। वैचारिक प्रदूषण से भरी इन पग‍डंडियों से एक दिन सीधे इंसान को भी गुजरना पड़ता है। तब मालूम होता है कि लोगों की सोच कितनी टेढ़ी है! आसान दिखनेवाले जीवन के ये छोटे रास्‍ते मंजिल तक जल्‍दी पहुंचने के लिए चुने जाते हैं, पर इनमें मौजूद दुर्भावनाओं का जहर आदमी को मंजिल आने से पहले ही अचेत कर देता है। इन राहों को चुनकर मंजिल का मतलब भी क्‍या रह जाता है, कुछ नहीं। तब भी लोगों के विचार नासमझी के पूर्वाग्रह से जकड़े रहते हैं। देखादेखी वे सीधे रस्‍ते के बजाय आसान पर सब कुछ बर्बाद करनेवाले रस्‍तों को ही आगे बढ़ने (बर्बाद होने के लिए) के लिए स्‍वीकार करते हैं। 
      कभी जीवन के हिस्‍से में निराशा, घोर उदासीनता भी आती है। तब आशा, विश्‍वास, संकल्‍प, आत्‍मविश्‍वास के व्‍यक्तिगत सिद्धान्‍त चाहकर भी साथ नहीं रहते। कालकोठरी, अन्‍धेरा, एकान्‍त, और मानवीय अनुपस्थिति ही मन को भाती है। एक प्रकार से यह परिवार, सरकार और प्रकृति के कारण जन्‍मी उस दुखकारी क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, जिसे चाहकर भी रोकना सम्‍भव नहीं होता। 
इस सदी में कुछ भी अच्‍छा करो, वह राजनीति की सन्‍देहभरी दृष्टि से देखा जाता है। इस सम्‍बन्‍ध में बाहर के लोगों से इतनी शिकायत नहीं होती, लेकिन जब अपने घर के पढ़े-लिखे व स्‍थापित समझदार मेरे अच्‍छे कदम को कूटनीति, उपहास की नजर से देखने लगते हैं तो फिर खुद पर कोई नियन्‍त्रण नहीं हो पाता और अपने लिए आत्‍मपरीक्षण का एक क्षण जुटाना भी कठिन हो जाता है। ऐसी किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ़ स्थिति में गम्‍भीर स्‍वभाव अगर गुस्‍से में बदलता है तो अपने-पराए सभी मेरे पक्ष में नहीं रहते। वे तुरन्‍त बेगाने हो जाते हैं। गुस्‍सैल स्‍वभाव के पीछे छिपी व्‍यक्ति की नैतिकता की इच्‍छा से अनभिज्ञ होते हैं।
अपनों को आदर्श स्थिति में जीवन गुजारने की सलाह देना उलटा असर दिखा रहा है। मिलकर रहने की बात पर वे इस सन्‍देह से भर उठते हैं कि कहीं इसकी नजर हमारे आर्थिक हितों पर तो नहीं। अच्‍छी जिन्‍दगी के लिए की जानेवाली मेरी अच्‍छी पहल से कोई भी सहमत नहीं होता। घरवालों की सोच के अनुसार कुछ नया मत करो। बस नौकरी करो। सम्‍बन्‍धों को स्‍नेह से रिक्‍त रहने दो। स्‍वार्थ की भावना को बढ़ाओ। समस्‍याओं के दलदल से बाहर मत निकलो। इसमें फंसे रहो। यथास्थिति बनाए रखो।
उनके मन का यह हाल उनके चेहरों व व्‍यवहार से आसानी से समझा जा सकता है। और इस जीव को इस वातावरण में घुट-घुट के रह जाने के अलावा फिलहाल कोई रास्‍ता नहीं नजर आता। निराशा की संकरी गली में मन ही मन बुदबुदा रहा हूँ..................        
................वफा का चलन हमेशावाला मैंने नहीं अपनाया
खामोशी से मन ही मन में मैंने तुमको चाहा....................

8 comments:

  1. ये अनुभव कितना कुछ सिखाते हैं. कदम बढ़ाने का मन होता है, कदम ठिठक से जाते हैं.

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, गाँधी + बोस = मंडेला - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. क्यों नहीं अपनी ही अंतर्वाणी को सुना जाए ? आत्मिक शांति की पहचान करके बस उसी और बढ़ा जाए . संभवत: इन उलझनों से थोड़ी राहत तो जरूर मिलेगी .

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  4. निकेश जी, सामान्यत: हर इंसान की यही कहानी है. घर-परिवार मे सामजस्य बिठाकर आगे बढ़ना सही मे बहुत टेढ़ी खीर है.फिर भी अपने से जितना अच्छा होता है करते रहना चाहिए. कम से कम हमे खुद को तो समाधान रहता है की हमने ग़लत नही किया.यही समाधान हमे आशावान बनने मे मदद करता है.

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  5. अनुभव कितना कुछ सिखाते हैं

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  6. "यह इश्क़ नहीं आसान बस इतना समझ लीजिये
    एक आग का दरिया है और डूब के जाना है"

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  7. "यह इश्क़ नहीं आसान बस इतना समझ लीजिये
    एक आग का दरिया है और डूब के जाना है"

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  8. "यह इश्क़ नहीं आसान बस इतना समझ लीजिये
    एक आग का दरिया है और डूब के जाना है"

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