Thursday, July 10, 2014

धरतीपुत्र खड़ा चौराहे पर

हवा तेरा स्‍पर्श तो हरेक पाता है
मतभेदों से तपते शरीरों तक भी
तो तेरा रास्‍ता जाता है
इनके मस्तिष्‍कों तक भी
अपनी शीतलता पहुंचा
आज धरतीपुत्र 
खड़ा चौराहे पर
भ्रमित और संशकित
अंतर्दृष्टि उसकी अज्ञात 
देखे वही जो बाहर अंकित
वह राष्‍ट्रीय अस्मिता की 
चुनौतियों से लड़े या
क्रिकेट, कोला, बॉलीवुड
शासकीय तंत्रों से भिड़े
या पाश्‍चात्‍य जीवन
के चक्‍कर में पड़े
अज्ञानी वह सोच न पाए
धर्मप्राण उसके सूखते जाएं
धर्मभाइयों को 
हताश, निराश और
विरोध में मातृभूमि के 
अलग-थलग खड़े देख
राष्‍ट्रीय एकता रो रही है
ऐसे ही चलता रहा
तो धूर्तता जीत जाएगी
पुनीत भारतीय पृथ्‍वी 
रसातल हो रहस्‍यलोक 
बन जाएगी

10 comments:

  1. ये चेतावनी है या आह्वान है धतिपुत्र को ... अग्रसर होने पुनः उठने का ... या गम हो जाने का इस चकाचौंध में ...
    अर्थ-पूर्ण रचना है ...

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  2. सुन्दर -
    आभार आदरणीय-

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  3. धरतीपुत्र का यह अंतर्द्वंद सदैव रहा है और आशा नहीं दिखाई देती की आगे भी उसमें कोई बदलाव होगा...फिर भी आशा बनी रहे...बहुत सारगर्भित रचना...

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  4. यही तो विडंबना है ..... सारगर्भित और समसामयिक है ये रचना

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  5. बहुत सारगर्भित कविता....बेहतरीन!!!

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  6. एक अजीब विडंबना में फंसे से हैं सब , अपना-अपना रहस्यलोक काँधे पर उठाये हुए . फिर भी उम्मीद तो हरी है ही.. चलते जीवन के साथ..

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  7. यही तो विडंबना है हमारी कि हमें खुद मंजिल का पता नहीं है कि हमें जाना किस ओर है।

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  8. भारतभूमि है आखिर...ऐसा होने ना देगी.

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  9. बहुत सारगर्भित कविता....बेहतरीन!!!

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