Saturday, June 14, 2014

विनाश की बरसी


न् २०१३ का आषाड़। यानि १६, १७, १८ जून। इन तारीखों में घटे विनाश को कुछ ऐसे (मृतकों की बेकद्री) लिखा था मैंने। आगामी १६,१७,१८ जून को विनाश की बरसी है। केदारनाथ मन्दिर सोलह तारीख को लोगों से क्‍या कह गया, अब तक यह समझने का प्रयास ही नहीं किया गया। सरकार सब भूलकर मन्दिर के कपाट खोल चुकी है। नए तीर्थयात्री एक साल को यूं ही भूल गए हैं। उन्‍हें अपने पूर्ववर्ती तीर्थयात्रियों की मौतें एक साल बाद बहुत सामान्‍य बात लगती है। उनके दिमाग में विकास का सूत्रवाक्‍य गूंज रहा है कि जीवन में पीछे नहीं आगे की ओर ताकना है। आगे ही आगे बढ़ना है। यह आगे बढ़ने का मन्‍त्र पता नहीं कब शक्तिविहीन होगा! इसकी परिधि में ना चाहते हुए भी लोग घुस ही जाते हैं, जिसमें उन्‍हें अपने हठ के अलावा कुछ नहीं सूझता।
केदारनाथ ने जो जलप्रलय मचाई उसका संकेत साफ था कि मुझे खोखली भक्ति नहीं चाहिए। मुझे मेरे सिद्धान्‍तों के विरुद्ध जाकर पूजने की जरूरत नहीं है। मेरी चौखट पर आस्‍था का जो नाटक हो रहा है, जैसा प्रदर्शन हो रहा है उससे मैं बिलकुल भी प्रसन्‍न नहीं हूं। बड़े पूंजीपति अपने कारखानों में श्रमिकों का खून चूसकर अर्जित धनदान करने मेरे परिसर में आ रहे हैं। क्‍या मैं ऐसे खूनी दान को स्‍वीकार कर सकता हूं? सरकार अपने मूल कर्तव्‍यों का निर्वाह न करते हुए मुझ तक पहुंचने के लिए प्रकृति को बिगाड़ने पर तुली हुई है। प्रकृति को बिगाड़कर बनाए गए कृत्रिम मार्गों के रास्‍ते मुझ तक पहुंचनेवाले अगर इतने ही प्रभुप्रेमी हैं तो अपने आसपास फैली सामाजिक गन्‍दगी को साफ क्‍यों नहीं करते? मेरा सिद्धान्‍त तो सब मानवों का कल्‍याण है और धनवान मानव अगर निर्धनों को सताकर पापभाव का अनुभव करे और उससे मुक्ति के लिए मेरे पास आए तो मैं क्‍या मूर्ख हूं, जो उसे क्षमा कर दूंगा। मेरे पास आने के लिए मानव के मन में कोई पाप-पुण्‍य की इच्‍छा नहीं होनी चाहिए। कोई मनुष्‍य यदि इस अभाव में मेरे पास आए तो मैं उसका ध्‍यान करूंगा। मेरे बनाए गए मानवीय सिद्धान्‍तों का उल्‍लंघन करने के बाद मुझे प्रणाम करके और मेरी चरण वन्‍दना करके कोई भी धूर्त मनुष्‍य मेरे दण्‍ड से बच नहीं सकता।
इस बात को तीर्थयात्री, सरकार, तीर्थस्‍थल के व्‍यवसायी बिलकुल नहीं समझ पा रहे हैं। सब को अपने नितान्‍त हित की चिन्‍ता है। इस स्‍वार्थ लिप्‍सा में वे धर्म का अपमान कर रहे हैं। नकली धार्मिकता अंगीकार कर रहे हैं। झूठा प्रभु चिन्‍तन और स्‍मरण करके क्‍या वे प्रभु को मूर्ख बना सकते हैं? शायद उन्‍हें लगता है कि वे ऐसा कर पा रहे हैं। तभी तो उनकी धृष्‍टता उनकी धार्मिकता पर हावी है। वे जानते हैं, समझते हैं कि उनके हाथों समाज, परिवार, सम्‍बन्‍धों सबका तिरस्‍कार हो रहा है। वे लोगों को भी अपने पापमार्गों पर चलने को दुष्‍प्रेरित कर रहे हैं। लोग भी विवशता से उन मार्गों पर चले रहे हैं।
केदारनाथ की इस वर्ष की यात्रा पूरी कर चुके लोग इस बात को एक भ्रान्ति मान सकते हैं कि नाथ वास्‍तव में क्‍या चाहते हैं। वे यह सलाह भी विद्वेष भावना से भुला देंगे कि उनका वहां न जाना ही धार्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक दृष्टि से श्रेष्‍ठ होगा। मन्दिर के पुजारी, सरकार, पर्यटन व्‍यवसायी और लोग केदारनाथ की सलाह को तब तक अनसुनी करते रहेंगे जब तक पिछले वर्ष की प्रलय की पुनरावृत्ति नहीं होती। विनाश की बरसी मनाने के बजाय लोग विनाश के मूर्ख व धूर्त कारक न बनने की शपथ लें तो ठीक होगा।

14 comments:

  1. सचमुच मे बदला कुछ भी नहीं है। जब तक प्रकृति मेहरबान है, सब ठीक है, जिस दिन करवट लेटी है, फिर वही होता है क्योंकि स्वार्थ और लापरवाही के साथ प्रशासन व्यवस्था का अभाव हमारी पहचान सी बन चुके हैं।

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  2. मनुष्य का अनुचित व अति हस्तक्षेप प्रकृति सहन नही करती इसे पता नही लोग कब समझेंगे अमरनाथ में शिवलिंग का लोप होजाना भी प्रकृति के असन्तोष और रोष का एक ज्वलन्त उदाहरण है।इस दिशा में शासन और जनता दोनों की समझ और सहयोग की आवश्यकता है ।
    बहुत ही सार्थक पोस्ट है ।

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  3. मनुष्य का अनुचित व अति हस्तक्षेप प्रकृति सहन नही करती इसे पता नही लोग कब समझेंगे अमरनाथ में शिवलिंग का लोप होजाना भी प्रकृति के असन्तोष और रोष का एक ज्वलन्त उदाहरण है।इस दिशा में शासन और जनता दोनों की समझ और सहयोग की आवश्यकता है ।
    बहुत ही सार्थक पोस्ट है ।

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  4. मनुष्य का अनुचित व अति हस्तक्षेप प्रकृति सहन नही करती इसे पता नही लोग कब समझेंगे अमरनाथ में शिवलिंग का लोप होजाना भी प्रकृति के असन्तोष और रोष का एक ज्वलन्त उदाहरण है।इस दिशा में शासन और जनता दोनों की समझ और सहयोग की आवश्यकता है ।
    बहुत ही सार्थक पोस्ट है ।

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  5. मनुष्य का अनुचित व अति हस्तक्षेप प्रकृति सहन नही करती इसे पता नही लोग कब समझेंगे अमरनाथ में शिवलिंग का लोप होजाना भी प्रकृति के असन्तोष और रोष का एक ज्वलन्त उदाहरण है।इस दिशा में शासन और जनता दोनों की समझ और सहयोग की आवश्यकता है ।
    बहुत ही सार्थक पोस्ट है ।

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  6. सन्देश साफ़ है आपका. उम्मीद करता हूँ यह सन्देश उनलोगों तक पहुच कर आत्ममंथन के लिए प्रेरित करे.

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  7. बढ़िया सन्देश ! मंगलकामनाएं आपको !

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  8. अरे यही तो विडम्बना है कि इंसान प्रकृति को ईश्वर न मानकर पत्थर को पूजता है और प्रकृति के संकेत देने पर एवं अपनों खो देने पर भी, लोगों के दिमाग की बत्ती नहीं जलती है। 'रात गयी बात गयी' कि तर्ज पर चलते लोग ना जाने आगे कहाँ और कौन सी दिशा में आगे बढ़ जाना चाहते है।

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  9. शायद अतीत से कोई सीख ना लेकर केवल उसे भूल जाना हमारी राष्ट्रीय सोच बन गयी है. तीर्थ स्थान केवल मनोरंजन स्थल बन गए हैं. विचारों को आंदोलित करता बहुत सारगर्भित आलेख...

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  10. इन दिनों न्यूज़ चैनल्स के विशेष कार्यक्रमों में भी इस घटना को फिर से देख रहे हैं..और पुराने ज़ख़्म फिर ताजे हो रहे हैं..आपकी ये पोस्ट भी हमें अपने पिछले दौर में झांकने का मौका देती है और अपनी गलतियों से सबक लेने को प्रेरित करती है।।।

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  11. यथार्थ और विचारणीय आलेख....

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  12. केदारनाथ की त्रासदी प्रकृति का सीधा सन्देश और हमसब के लिए सबक है, लेकिन हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सब अपनी लालसा में लिप्त हैं..... सच कहा जाए तो इस पर आत्ममंथन कौन कर रहा है ? सुन्दर पोस्ट लिखा आपने..

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  13. उस घटना को याद कर आज भी ह्रदय काँप जाता है पर ह्रदय से उठती प्रार्थना को सही स्वर दिया है आपने .

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  14. न ही कुछ बदला है और न ही बदलेगा .. इंसान(सच कहूं तो कुछ हद तक भारतवासी) सीखता कहाँ है ... किसी की पुकार उसके कानों तक नहीं पहुच पाती ... अतीत से सीखना हमने सीखा ही नहीं अन्यथा आज भी गुलामों की तरह रहते ...

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