Tuesday, May 6, 2014

राजनीतिक नवदृष्टि

स आलेख के माध्‍यम से अपनी व्‍यक्तिगत दृष्टि बदलने की कोशिश की है। अपने सिद्धान्‍त एक किनारे रख दिए हैं। दिल-दिमाग मेरा है, पर सोच-समझ व विचार मेरे नहीं हैं। मैं अपनी नजर में जहां तक जो कुछ भी देख पा रहा हूं वह सब देखकर केवल तटस्‍थ बना हुआ हूं। तटस्‍थ बनने में बड़ी राहत है। किसी विशेष विचारधारा या उसके राजनीतिक दल के पक्ष में बने रहने का भाव कचोटता है। व्‍यक्ति या राजनीति या इनसे संचालित समाज सब की अपनी-अपनी विचारधाराएं थीं। विचारधाराओं का जन्‍म अच्‍छाई व भलाई के लिए ही हुआ होगा, पर कालान्‍तर में विचारधाराएं अगर मानवीयता से अलग हुईं और खुद में उलझ कर अनसुलझी हो गईं तो यह मानवीय रिश्‍तों की अपरिपक्‍वता के कारण ही हुआ।
     श्रेष्‍ठ पारिवारिक जीवन जब सम्‍बन्‍धों की कमजोरी के कारण दरकने लगे तो पंचायत-समाज का निर्माण हुआ। पंचायत-समाज ने पारिवारिक सम्‍बन्‍धों की कमजोरी को सुधारने की जिम्‍मेदारी तो ले ली, लेकिन वह भी अपने निर्धारित मानकों के उल्‍लंघन में फंसता चला गया। फलस्‍वरूप लोकोपचार की नीति राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बनाने की कोशिश हुई, जिसके लिए लोकतन्‍त्र नामक शब्‍द आया। और इस लोकतन्‍त्र को संभालने के लिए सरकार बनी। यह पूरी प्रक्रिया केवल पिछले साठ-पैंसठ सालों से ही नहीं है। यह मनुष्‍यों के बीच परस्‍पर व्‍यापारिक लेन-देन होने के समय से ही शुरू हो गई होगी, ऐसा विश्‍वास के साथ कहा जा सकता है। क्‍योंकि परिवार को छोड़कर पंचायत से लेकर संसदीय लोकतन्‍त्र तक जो भी सामाजिक गठन हुआ है वह केवल पारिवारिक, मानवीय सम्‍बन्‍धों की चिन्‍ता के कारण नहीं हुआ। यह व्‍यापारिक गतिविधियों को सुगमता से चलाने के लिए किया गया।
     आज परिवार, पारिवारिक सदस्‍य और पारिवारिक सम्‍बन्‍ध लोकतन्‍त्र के नाम पर चल रही व्‍यापारशाला के अन्‍दर घुटने के लिए बन्‍द हो गए। परिवार अब केवल जीवन सम्‍बन्‍धी परस्‍पर जरूरतों के अड्डों में बदल गए हैं। पारिवारिक मूल्‍यों में व्‍यापार से पनपी सोच घुस गई है, जो दीमक की तरह सम्‍बन्‍धों को खाए जा रही है।
     इन स्थितियों में धर्म, जाति, राजनीतिक दल के रूप में अनेक विचारधाराओं की बात अत्‍यन्‍त बेमानी है। वास्‍तव में आज पारिवारिक मूल्‍यों, संस्‍कृति के बिना पलने-बढ़नेवाला मानव मात्र मानवीय उत्‍पाद में बदल रहा है। यह उत्‍पाद समूह रूप में एक दल विशेष की विचारधारा की बात कैसे कर सकता है, क्‍योंकि विचारधाराओं को पोषित करनेवाली परिवार इकाई संस्‍कृत, मूल्‍य विहीन जो हो गई है। जब हम परिवार में एक होकर नहीं रह पा रहे हैं तो समाजगत, राजनीतिक दलगत एकता कैसे संभव हो सकती है! और जब यह संभव नहीं तो देश का विकास और लोगों का कल्‍याण जैसे मानक कैसे तय होंगे?
     लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत बंटी अनेक विचारधाराओं को देखने के लिए जो तटस्‍थ दृष्टि मैंने अपनाई है सबको वही दृष्टि अपनानी होगी। इससे हममें यह विवेक जागेगा कि हम मानवीय मूल्‍यों के पतनकाल में सबसे कम पतित लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के पैरोकार को चुन सकें। परस्‍पर सम्‍मान और भरोसा जब पिता-पुत्र, माता-पुत्री, भाई-बहन या पति-पत्‍नी में ही नहीं रहा तो यह हमें लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था संभालनेवाले राजनैतिक दलों में कैसे परिलक्षित होगा!
     यहीं इसी बिन्‍दु पर हमें किसी दल या वर्ग विशेष के प्रति निरपेक्षता का भाव उत्‍पन्‍न करना होगा। अपनी अन्‍तर्दृष्टि जागृत करके भारतीय राजनीति को सालों पुरानी सोच के बजाय एकसूत्र में एक नई नजर से देखना होगा।

9 comments:

  1. स्वतंत्रता के शुरुआती १५ सालों ने अपने लोकतंत्र की जो परिभाषा लिख दी, उसी का असर ऐसा हुआ है कि दिनानुदिन भ्रष्ट से भ्रष्टतर लोग आकर्षित होते गए राजनीति में. लोकतंत्र बस किताबी शब्द बन कर रहा गया है. समय बदलाव का है और हमारी जिम्मेदारी उसमे अपना योगदान देने की है. अगर हम बस उतना भर कर दें तो नयी लीक खींचीं जा सकती है. आतंरिक अन्वेषण से उपजा आपका यह चिंतन और आलेख बहुत ही अच्छा है.

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  2. महत्वपूर्ण विषय पर विचारणीय आलेख...निहार राजन जी की बात से सहमत हूँ ...

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  3. जब हम परिवार में एक होकर नहीं रह पा रहे हैं तो समाजगत, राजनीतिक दलगत एकता कैसे संभव हो सकती है! और जब यह संभव नहीं तो देश का विकास और लोगों का कल्‍याण जैसे मानक कैसे तय होंगे?........ विचारणीय प्रश्न ?????

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  4. पारिवारिक बिखराव का असर राजनीति पर है या राजनैतिक मूल्यहीनता ने परिवारों को बिखराया है यह कहना मुश्किल है फिर भी यह सच है कि कठिन होते हुए भी शुरुआत व्यक्तिगत् तौर पर ही करनी होगी ।

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  5. परिवार और मूल्यों का बिखराव जितना पिछले २५ सालों में हुआ है उतना पिछले १००-२०० वर्षों में भी नहीं हुआ होगा ... और पिछले २५ वर्षों में ही दुनिया तेज़ी से सिमटी है ... ये नहीं है की दूसरी पद्धति खराब थी ... हाँ वो अलग थी ... आज हम समझ नही पा रहे क्या ठीक है ... कन्फ्यूज़ हैं सभी ...

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  6. इस नई दृष्टि के अतिरिक्त मुझे नहीं लगता कि अन्य कोई विकल्प भी है ..

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  7. बदलता समाज बदलते मूल्य,नैतिकता का गिरता स्तर ,संबंधों का बिखराव सब का असर समाज के उस ढाँचे पर भी पड़ता है जिसे हम शासन हेतु बनाते हैं ..देखें आने वाले दिन बताएँगे कि बदले हुए इस समाज का नया रुख किस और है..

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  8. आज परिवार, पारिवारिक सदस्‍य और पारिवारिक सम्‍बन्‍ध लोकतन्‍त्र के नाम पर चल रही व्‍यापारशाला के अन्‍दर घुटने के लिए बन्‍द हो गए। परिवार अब केवल जीवन सम्‍बन्‍धी परस्‍पर जरूरतों के अड्डों में बदल गए हैं। पारिवारिक मूल्‍यों में व्‍यापार से पनपी सोच घुस गई है, जो दीमक की तरह सम्‍बन्‍धों को खाए जा रही है।

    बहुत ही यथार्थपरक हालातों को इन पंक्तियों के जरिये बयां किया है आपने...निश्चित ही चिंतनीय है मौजूदा परिदृश्य।।।

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  9. नवदृष्टि जरुरी है
    नतीजा सामने हैं

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