Thursday, May 22, 2014

मोदी लहर का असर

सोलहवीं लोकसभा का चुनाव अद्वितीय था। भाजपा के प्रधानमन्‍त्री पद के प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र मोदी की चुनावी रैलियां, सभाएं, भाषण भारतीय जनमानस को एक नई दिशा दे गए। उनके भाषणों में विरोधी दलों या उनके नेताओं के बारे में जो कुछ कहा गया, प्रत्‍यक्ष रूप से वह सही नहीं लगता। पर ध्‍यान देनेवाली बात ये है कि उन्‍होंने जो कुछ भी विरोधी नेताओं के बारे में कहा है, वह उनकी करनी के हिसाब से सही था। आम भारतीय जनता पिछले दस साल से साधारण जीवन जीने के लिए भी जिस तरह के कठिन हालातों से जूझ रही है, वह सब संयुक्‍त प्रगतिशील गठबन्‍धन सरकार की नीतियों के कारण ही हुआ।


दस साल एक आदमी की जिन्‍दगी को बहुत ज्‍यादा बदल देते हैं। और अगर ये साल सरकार, समाज के भ्रष्‍टाचार में ही व्‍यतीत हुए हों तो आम जनता की विचारशक्ति भी भ्रष्‍टाचार के इस दुष्‍चक्र में फंसे बिना कैसे रह सकती थी। क्‍योंकि विचारधाराएं चाहे वो अच्‍छी हों या बुरीं शासन के स्‍तर से ही पूरे समाज में प्रसारित होती हैं। इस बीच हमारे शासक लोकतान्त्रिक सत्‍ता के नाम पर अनुचित काम करने लगे। राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या के एक बड़े प्रतिशत को अपने अनुचित कामों के प्रति मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसे बेढंगी व्‍यवस्‍था से राजी करने लगे। ऐसे में राष्‍ट्रीय राजस्‍व में विभिन्‍न करों के रूप में अपना योगदान देता हुआ आ रहा भारतीय मध्‍यमवर्ग सत्‍तारूढ़ दल की नजर में अनदेखा हो गया। क्‍या सत्‍तारूढ़ दल के रूप में कांग्रेस की इस वर्ग के प्रति कोई जिम्‍मेदारी नहीं थी। पिछले दस वर्षीय राजकाज में जीवन के मूल अधिकारों के साथ-साथ इस वर्ग से कई सौतेले राजनीतिक निर्णयों के माध्‍यम से हिन्‍दुत्‍व की इसकी वैदिक, पै‍त्रक संकल्‍पना छीनने की गोपनीय कोशिशें भी हुईं। महंगाई, भ्रष्‍टाचार, बेरोजगारी से तो यह वर्ग जैसे-तैसे सामन्‍जस्‍य स्‍थापित करता हुआ आया ही है, लेकिन उसके पारम्‍परिक जीवन को भी उससे छीनकर उसे कहीं का न छोड़ने की जो राजनीतिक नौटंकी हुई, उसने भारतवर्ष में एक नई लहर पैदा की। इसकी परिणति आज हम नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने के रूप में देख रहे हैं।
नरेन्‍द्र मोदी किनारे पर पटक दिए गए ऐसे बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं के लिए एक राजनीतिक व्‍यक्ति बनकर ही नहीं आए, बल्कि वे समाज के सभी वर्गों के जीवन के लिए जरूरी उपक्रम विकास के महापुरुष के रूप में भी उभरकर आए हैं। उनके पास गुजरात राज्‍य में मुख्‍यमन्‍त्री के रूप में कार्य करने का दस-बारह वर्षों का प्रशासनिक अनुभव है। उनके पास राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर किए जानेवाले कार्यों, व्‍यापारिक सौदों का एक सर्वथा नया दृष्टिकोण है। भारत देश के अन्‍दर गुजरात राज्‍य में बनाई गईं उनकी वैकासिक नीतियां केन्‍द्र की संप्रग की नीतियों से कहीं गुणा अधिक समुचित और कल्‍याणकारी थीं। इसके परिणामस्‍वरूप गुजरात में हुए अनेक विकास कार्य, विदेशी धननिवेश अभूतपूर्व हैं। और सबसे बढ़कर है उनका वह दृष्टिकोण जो विकास के दुष्‍प्रभावों पर केन्द्रित है। वे विकास के कारण होनेवाली प्रकृति की हानि पर भी दूरदृष्टि टिकाए हुए हैं। इस बारे में उनकी योजना शायद पश्चिमी नीति-नियन्‍ताओं से भी कारगर हो, ऐसी आशा की जानी चाहिए।
इन परिस्थितियों में कई लोग आप पार्टी की देशव्‍यापी हार के लिए संवेदनाएं बटोरने से बाज नहीं आ रहे। वाराणसी संसदीय क्षेत्र से नरेन्‍द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे केजरीवाल को हार का सामना करना पड़ा। पंजाब को छोड़कर आप को कहीं भी विजय नहीं मिली। यहां तक कि जिस दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में उसे 28 सीटें मिली थीं, इस बार वहां भी उसका मैदान साफ रहा।
मोदी विरोधियों का कहना है कि यदि केजरीवाल दिल्‍ली के मुख्‍यमन्‍त्री पद से त्‍यागपत्र नहीं देते तो दिल्‍ली, राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कई लोकसभा सीटें जीत जाते। जबकि सच्‍चाई ये है कि मोदी की लहर में वे दिल्‍ली में मुख्‍यमन्‍त्री रहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते थे। दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिलने पर केजरीवाल ने कांग्रेस से समर्थन नहीं लेने का बड़ा वचन दिया था। कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाकर उन्‍होंने वह वचन तोड़ दिया। विधानसभा चुनाव में कई सीटें जीतने से पहले केजरीवाल के निशाने पर कांग्रेस पार्टी और इसका भ्रष्‍टाचार था। उससे समर्थन लेकर सरकार बनाने के बाद उनके निशाने पर मोदी आ गए। भ्रष्‍टाचार के लिए कांग्रेस और भाजपा की तुलना करने से पहले वे इतना भी नहीं सोच पाए कि दशकों से देश में जिस पार्टी का शासन रहा है, भ्रष्‍टाचार तो उसी की देन है। भाजपा को भ्रष्‍टाचार में कांग्रेस के समकक्ष लाने के लिए उन्‍हें कम से कम भाजपा के साठ सालों के शासन का इंतजार तो करना ही पड़ेगा। तब ही वे दोनों राष्‍ट्रीय दलों के भ्रष्‍टाचार या विकास को लेकर तथ्‍यपरक तुलना कर सकेंगे। और पूर्ण विश्‍वास के साथ कह सकते हैं कि यदि भाजपा को नरेन्‍द्र मोदी जैसे व्‍यक्ति साठ साल तक देश सेवा के लिए मिलते रहे तो भ्रष्‍टाचार शब्‍द भारत ही नहीं संसार के शब्‍दकोश से भी मिट जाएगा।
     छोटे राजनीतिक दल, क्षेत्रीय क्षत्रप अभी भी भारतीय जनमानस को नहीं समझ पा रहे हैं। आनेवाले राज्‍य विधानसभा चुनावों में भी मोदी लहर का असर रहेगा। हो सकता है आनेवाले समय में भाजपा के दम पर लोकतान्त्रिक प्रणाली ही बदल जाए। मतलब विकास के रथ पर सवार सत्‍तारूढ़ दल हमेशा के लिए भारतीय लोकतन्‍त्र  पर स्‍थापित हो जाए। ऐसे में आनेवाले समय में आप, सपा, बसपा, लोद, जदयू जैसे छोटे दलों का अस्तित्‍वहीन होना तय है। पश्चिम बंगाल में भाजपा चौदह लोकसभा सीटों पर रनर अप रही है। इससे ममता बनर्जी के माथे पर अभी से बल पड़ने शुरू हो गए हैं। केरल, तमिलनाडु, आन्‍ध्र प्रदेश, जम्‍मू एवं कश्‍मीर, असम जैसे राज्‍यों में भाजपा का  संसदीय उदय नए भारत की कहानी की प्रस्‍तावना है। आनेवाले समय में नरेन्‍द्र मोदी  के सुचारू संचालन से भाजपा लोकसभा के साथ-साथ सभी राज्‍यों की विधानसभा सीटों पर भी विजय प्राप्‍त करेगी।

13 comments:

  1. आशाएं तो बहुत हैं । विश्वास है कि निराश नही होना पडेगा ।

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  2. पूरे देश के लिए सकारात्मक और उम्मीदों भरा बदलाव है .....सधा हुआ विवेचन

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  3. भविष्य के हाथ में बहुत कुछ है. उम्मीद है जो भी है, वह आम जनता के लिए कल्याणकारी हो. छः दशक से ज्यादा के स्वतंत्र भारत में अब तक की पार्टियों ने जिस तरह सामान्य आदमी को अपनी आत्मा में रखकर जिया और बेचा है, आज के भारतीय उससे मुक्ति चाहते है. घूसरहित सरकारी तंत्र चाहते है,विकास-किरणों को देखना चाहते हैं. इस बहुमत के बाद आस यही है कि अपने देश को शीघ्र उस रूप में देखें.

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  4. सच मोदी विकाश पुरुष के रूप में उभरकर आये देखना है देश की दिशा और दशा में कितना बदलाव होता है। विश्वास है कि निराश नहीं होंगे....

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  5. vikesh ji,
    modi ji ke prime minister banne ki aap ko bhaut bahut badhaiya. asha kartey hain modi ji hum logo ko nirash nain hone dengey.

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  6. बहुत सार्थक विश्लेषण...आशा है भारत के एक सुखद भविष्य की...

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  7. बहुत सार्थक विश्लेषण...आशा है भारत के एक सुखद भविष्य की...

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  8. 'किनारे पर पटक दिए गए ऐसे बहुसंख्‍यक हिन्‍दु 'बहुत सही कहा आपने ..अपने ही देश में पराये गए हैं हिन्दू!
    बहुत ही अच्छा लेख है और आप के विचारों से सहमत हूँ...यह समय सभी को धैर्य के साथ सहयोग देने का है..और विरोधियों को भी राष्ट्रधर्म निभाते हुए सरकार का सहयोग देश के विकास हेतु देना चाहिये.

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  9. आशा की एक किरण तो नज़र आई ही है अपने सांकृतिक समाज को ... खुद से खुद को शर्म सी आने लगी थी ... गंगा आरती को में एतिहासिक प्रसंग मानता हूँ ...

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  10. जीवन को यदि हँसता , मुस्कुराता और चमचमाता हुआ कल दिखने लगे तो निसंदेह दिखाने वाले को श्रेय अवश्य देना चाहिए और साथ भी . इस उम्मीद के साथ कि हम भी विकास कर सकते हैं..

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  11. मुझे तो इस पोस्ट में एक चित्र के अलावा कुछ नहीं दिख रहा है।

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  12. हमारे नव निर्वाचित प्रधानमंत्री से देश को बहुत आशाएं हैं
    सरकार के खिलाफ आक्रोश और जनमानस के सोच में आए परिवर्तन का सूचक रहा यह निर्वाचन

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