Thursday, May 1, 2014

जीवन बना जंजाल

हां रहता हूं वहां रहते हुए आगामी जुलाई में पूरे पांच वर्ष हो जाएंगे। इन वर्षों में अपने रहने के स्‍थान से देश, दुनिया, राज, धर्म, मानवीय सम्‍बन्‍धों आदि विषयों के जो भी समाचार मिले या मिल रहे हैं, उनकी जानकारी से व्‍यक्तित्‍व केवल कुण्ठित ही हुआ। पिछले कुछ वर्षों में जीवन का ताना-बाना बड़ा विचित्र हो गया। जीवन के मूल स्‍वभाव के बारे में केन्द्रित होने की सोचो तो मन-मस्तिष्‍क पर आडम्‍बरपूर्ण शासकों द्वारा चलाई जा रही दुनिया के कंटीले हस्‍तक्षेप होने शुरू हो जाते हैं। चारों ओर जो मनुष्‍य दिखते हैं वे सभी मुझे प्रथम दृष्टि में मनुष्‍य प्रतीत ही नहीं होते। उनकी गतिविधियों पर गहरी निगरानी रखता हूं। ज्ञात होता है कि वे सभी संवेदना से सोचने की स्थिति में ही नहीं है। यदि उनमें से कोई संवेदनामयी तरीके से सोचता भी होगा तो उसकी सोच व्‍यावहारिक नहीं बन पाती। किसी की भी संवेदना परस्‍पर अभिवादन, प्रणाम, प्रेरणा, प्रोत्‍साहन करने जैसे मानवीय गुणों से भी वंचित रह जाए तो फिर ऐसी संवेदना का व्‍यक्तियों को परस्‍पर भान कैसे होगा! अधिकांश लोग असंवेदना, कठोर एकात्‍मकता में जकड़े हुए हैं। सुबह-सुबह देखता हूं पार्क में टहलते कुछ लोगों का टहलना केवल दूसरों को देखकर किया जानेवाला काम है। उन्‍होंने उड़ते-उड़ते सुना होगा कि सुबह टहलने से स्‍वस्‍थ होते हैं। इस बात के अतिरिक्‍त उन्‍हें सुबह टहलने का कोई अन्‍य दर्शन ज्ञात नहीं है। एक व्‍यक्ति को देखता हूं। वह पार्क में ऐसे घूमता है जैसे किसी ने उसे दण्‍ड देकर वहां भेजा हो। वह पार्क की पगडंडी को पत्‍थर दृष्टि से देखता हुआ किसी तरह कुछ चक्‍कर काटता है और फिर घर चला जाता है। वह पार्क के परिवेश में पेड़-पौधों, हवा, पक्षियों, पक्षियों की चहचहाहट, अन्‍य लोगों की उपस्थि‍ति से सीधे-सीधे अनजान रहता है। गर्दन नीचे किए हुए यंत्रवत पार्क में टहलता है। उसके जैसों की पार्क, पार्क के बाहर और यहां-वहां सब जगह भरमार है। आखिर ऐसे लोग मानव कैसे हो सकते हैं, यह सोचकर बड़ा आश्‍चर्य होता है।
आधुनिक जीवन के भीतर जैसे पुरातन जीवन अपने असंख्‍य दोषों के साथ बैठा हुआ है। लोग प्रगतिवाद की एक अन्‍धी लकीर को पार नहीं कर पा रहे हैं। उस पर आंख मूंदकर चल रहे हैं। उनमें इतनी विवेचना शक्ति नहीं कि वे सोच सकें कि उनके पास अपना एक मस्तिष्‍क है, जिसे अपने सुख और दुख के अनुसार सोचना चाहिए। लेकिन नहीं उनका मस्तिष्‍क संसार की व्‍यापारिक जरूरत के हिसाब से सोचता है। वे दुनियावी समाजवाद, प्रगतिवाद, आधुनिकवाद की आड़ में जड़ें जमाते धूर्ततावाद के अनुरूप विचार करते हैं। उनकी दृष्टि इतनी भी समझ नहीं रखती कि उनका जीवन-संघर्ष कुछ लोगों के ऐश्‍वर्य के लिए किया जानेवाला केवल एक ऐसा घर्षण है, जो कभी किसी आगामी समय में कहीं भी मूल्‍यांकित नहीं होगा।
ग्रामीण जीवन उजाड़ने के बाद जो बसेरा तैयार हुआ क्‍या उसमें सबके लिए यथोचित जीवन सुविधाएं हैं? शहर का निर्माण आखिर क्‍या सोच के किया गया? जब शहरीकरण के कारण जीवन के कुछ जरूरी संघटक जैसे जल, दूध, अनाज आदि लोगों को विशुद्ध रूप से प्राप्‍त नहीं हो पा रहे हैं तो इनकी भरपाई का कोई विनाशकारी विकल्‍प तैयार करना विज्ञान या समाज की दृष्टि से कैसे उचित हो सकता है! जो पदार्थ या सामग्री अपने मूल स्‍वरूप में उत्‍पादित नहीं होने की स्थि‍ति में विषसम बन जाए तो उसका व्‍यापारिक प्रसार करना क्‍या सही है? जो सही नहीं है, जो अनुचित है यह समयकाल उसी की स्‍थापना करने में लगा हुआ है। ऐसे में जीवन यदि जंजाल हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। और मानवीय जीवन को ऐसी जंजाली में फंसा देनेवाली सांसारिक व्‍यवस्‍था और इसके व्‍यवस्‍थापकों पर केवल खीझ और क्रोध ही आता है। बहुत लोगों को कहते सुनता हूं कि जमाना जितना आगे चला आया है वहां से वापस पीछे नहीं जा सकता। लेकिन बात पीछे जाने की नहीं बल्कि रुककर नई दृष्टि से सोचने की है। स्‍वार्थ को भूलकर, बच्‍चों के बारे में सोचकर प्रग‍तिवाद की अन्‍धी लकीर से अलग होने की है। क्‍या हम इतना भी नहीं कर सकते?

16 comments:

  1. आधुनिक जीवन के भीतर जैसे पुरातन जीवन अपने असंख्‍य दोषों के साथ बैठा हुआ है। लोग प्रगतिवाद की एक अन्‍धी लकीर को पार नहीं कर पा रहे हैं। उस पर आंख मूंदकर चल रहे हैं। उनमें इतनी विवेचना शक्ति नहीं कि वे सोच सकें कि उनके पास अपना एक मस्तिष्‍क है, जिसे अपने सुख और दुख के अनुसार सोचना चाहिए। लेकिन नहीं उनका मस्तिष्‍क संसार की व्‍यापारिक जरूरत के हिसाब से सोचता है। वे दुनियावी समाजवाद, प्रगतिवाद, आधुनिकवाद की आड़ में जड़ें जमाते धूर्ततावाद के अनुरूप विचार करते हैं...............
    aapki baat sahi hai... halat isse jyada kharab hai... aakhir hum kidhar jaa rahe hain ?

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (02.05.2014) को "क्यों गाती हो कोयल " (चर्चा अंक-1600)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  4. मानव-जीवन यांत्रिक हो चला है इसमें कोई दो राय ही नहीं है.इस दौड़ से बच पाना बहुत मुश्किल है कोई जानबूझकर कोई अनजाने कोई मजबूरी में हर कोई इस में शामिल ही है .कोई और रास्ता नज़र आता भी नहीं.

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  5. सब दौड़ रहे हैं उसी दौड़ में हर व्यक्ति सम्मिलित हो जाता है. गंतव्य क्या है सोचने की ज़रूरत नहीं सबके साथ होना है ,कहीं अलग-अकेले न छूट जाएँ !

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  6. सहमत हूँ आपके विचार से. पश्चिमी जीवन में जो अभी देख रहा हूँ उसके प्रभाव को रिस कर अपने यहाँ आने में अभी दस साल और लग जाए शायद. पर वह स्थिति और भयावह होगी. ये पैसा और आराम के पीछे की दौड़..बहुत कुछ छीनता जा रहा है मनुष्य से. कम से कम आपके जैसे चिंतनशील लोग है, यह जानकर सुकून मिलता है.

    बदलते समय में वैसे भी समाज की दरकार की नहीं नहीं होगी. खलवत को भरने के लिए इन्टरनेट आ चुका है. और लोग, समाज, बंधु....ये बहुत सवाल करते है. इसीलिए बस ओडियन..



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  7. प्रश्न कौंधते है जबाब कहां है.....

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  8. "आधुनिक जीवन के भीतर जैसे पुरातन जीवन अपने असंख्‍य दोषों के साथ बैठा हुआ है। लोग प्रगतिवाद की एक अन्‍धी लकीर को पार नहीं कर पा रहे हैं। उस पर आंख मूंदकर चल रहे हैं। उनमें इतनी विवेचना शक्ति नहीं कि वे सोच सकें कि उनके पास अपना एक मस्तिष्‍क है, जिसे अपने सुख और दुख के अनुसार सोचना चाहिए। लेकिन नहीं उनका मस्तिष्‍क संसार की व्‍यापारिक जरूरत के हिसाब से सोचता है।"

    आज के विश्व में "Survival of fittest" का सिद्धांत इ्न्हीं पंक्तियों से बयां होता है..सुंदर प्रस्तुति।

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  9. zindagi bahut mechanized ho gai hai .. kuchh der ruk kar sochein ya kudrat ki khoobsoorti ko nihaarein itna bhi samay ya resources nahi bai.

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  10. Shehri jeevan ka bandhan aur majboori to hume bhi khalti hai ... par vikalp kya hai ? roji roti ke chakkar mein shehar mein rehna hi hota hai ..

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  11. चलने के पहले सोचा न था कि जब वापस पहुँचेंगे, सब बदल चुका होगा।

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  12. दौड़ को तब तक संभाला जा सकता है जब तक शुरुआत हो ... पर जब वो दौड़ आंधी बन जाती है उसे रोकना मुश्किल हो जाता है ... आदुनिकरण की ये रफ़्तार सही न होने पर भी रोकना आसान न होगा ...

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  13. हमारा भी ठीक मकड़ी वाला हाल है निकलना चाहो पर उलझते जाओ..

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  14. बहुत सटीक प्रश्न उठाये गए हैं आलेख में..आधुनिकता की दौड़ में हम अपने आसपास के वातावरण के प्रति पूर्णतः असंवेदनशील हो गए हैं और भौतिक उपलब्धियों को ही सर्वस्व मान चुके हैं...बहुत दुखद है कि अगली पीढ़ी को भी हमारे पास इसके अतिरिक्त देने को कुछ नहीं है...

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  15. भीड में भी अकेलेपन को आपने बडी संवेदना के साथ चित्रित किया है । पार्क के जिक्र से याद आया बैंगलोर में पहले जहाँ हम रहते थे ,सुबह पार्क में जाते थे मेरा मन वहाँ अपने जैसी महिलाओं से बात करने का परिचय बढाने का होता क्योंकि वे भी हिन्दी समझ बोल लेतीं थीं । एक गैर हिन्दी-भाषी शहर में स्वभाषा भाषी का मिलना मुझे तो नियामत सा लगता है । लेकिन अफसोस कि मेरे प्रयास के बावजूद उन्होंने एक पीकी सी मुस्कराहट के अलावा कोई उत्सुकता नही दिखाई ।

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  16. Very nice article !

    इस बात में कोई संदेह नहीं है कि परिवर्त्तन समय क़ी माँग है पऱ पुरानी नैतिकताओं का गला घोंट कर आधुनिकता लाना , यह जीवन को जंजाल ही बनाएगा।

    एक और बात बहुत सही कही गयी है कि हर कोई एक दूसरे की देखा -देखी कर रहा है , भेड़ -चाल अपने चरम पर है , एक लड़के ने बॉडी -एब्स बना लिये है तो पूरी क्लास के लड़के ज़िम भाग जाऐंगे , एक लड़की इंगलिश लिटरेचर पढ़ रहीं है , तो दूसरी भले ही हिन्दी साहित्य को पसंद करती हो पर Show-off business में हिस्सा लेने के लिये इंग्लिश लिटरेचर शुरु कर देगी।

    अपना खुद का अस्तित्व लोग खो चुके है - खासकर सो कॉल्ड "METRO-CITIES" में।

    पर एक बात यह भी सच है की दौड़ मे जीत उसी क़ी होगी जो भीड़ का हिस्सा ना बनकर कुछ अलग करेगा !!!

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