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शुक्रवार, 28 मार्च 2014

आजकल मेरे साथ

जीवन में कितना कुछ है! कितना कुछ प्राकृतिक और कितना आधुनिक है, इसकी सही गणना करने के लिए हमारा जीवन बहुत छोटा है। प्रकृति से प्रभावित रहूं या भौतिक जगत की तेज गति में शामिल होऊं? इसका उत्‍तर मुझे स्‍वयं से ही मिल जाता है। मैं तो प्रकृति प्रेमी हूं। इससे कैसे विमुख हो सकता हूं! भौतिक जीवन की कठोरता जब कभी बहुत ज्‍यादा विचलित करती है तो अपनी अन्‍तर्चेतना में स्थिर हो जाता हूं। तब धूमिल विचार और भावनाएं स्‍पष्‍ट दिखने लगती हैं। मैं इनको पकड़कर इन्‍हें नहीं छोड़ने के संकल्‍प लेता हूं। लेकिन यह सब समय की एक छोटी अवधि में ही घटित होता है। जैसे ही यह समयकाल व्‍यतीत होता है मेरी वैचारिक चंचलता मुझ पर हावी हो जाती है। अंतत: मैं विचारों की निरर्थक यात्रा करता हूं। इससे मेरी झोली में कोई विशेष व्‍यक्तित्‍व उपलब्धि नहीं गिरती। मैं निराशा के पथ पर अन्‍धयात्रा करता रहता हूं।
     आजकल मेरे साथ यही हो रहा है। चैत्र माह में भी वर्षा की बूंदें आसमान से गिर रही हैं। स्‍वास्‍थ्‍य के मामले में उत्‍तर भारत बुरी तरह खांस रहा है। लोगों की सर्दी-जुखाम, कफ-बलगम खत्‍म नहीं हो रहे। तरह-बेतरह की बीमारियां बहुतायत में फैल रही हैं। अपनी बुद्धि और विवेक को किसी की मजबूत पकड़ में पाता हूं। कुछ भी नवविचार नहीं कर पाता हूं। बस लगता है अपना रूपान्‍तरण एक मशीन में हो गया है, जिसका रिमोट किसी राक्षसी शक्ति के हाथ में है। यहां-वहां जाते हुए सिर्फ अपने शरीर के दर्द याद रहते हैं। कहीं आराम से बैठने पर भी अपने बेहोश होकर गिरने का ही अहसास होता है। मृत्‍यु की बांहों में लगभग समाते-समाते कोई ऊर्जांश रोक देता है। एक जीवन-दीवाल बाहों और मेरे बीच में बना देता है और मैं दबा-कुचला-पिटा-कुटा किसी तरह हारी हुई सांसों के साथ खड़ा रहता हूं। बहुत कुछ करने का विचार बार-बार दीए की तरह बुझने से पहले तेजी से जलता है और दपsss से बुझ जाता है……एक निराश-हताश-उदास भाव का धुंआ छोड़ते हुए।
            मैं बहुत आशावान भी हूं। विशेषकर प्रकृति को देखकर मैं विशेष ऊर्जा से भर जाता हूं। लेकिन भौतिक-आधुनिक-धात्विक उपक्रमों से प्रायोजित सांसारिक भावनाएं जबरन ठेलकर मुझे भी अपने में घसीट लाती हैं। इस घटने के दौरान याद आता है कि कुछ दिन पहले यात्रियों से भरा एक विमान आसमान से गायब हो गया था। मनुष्‍यों को यात्रियों कहना मानवीयता का कितना बड़ा अपमान है! कम से कम दिवंगतों की अन्तिम भावनाओं का ध्‍यान तो रखा होता संसार के शेष बचे हुए जीवन ने। संसार की उन्‍नत प्रौद्योगिकी के सहारे गायब विमान को कई दिनों तक ढूंढा गया। लेकिन उसका पता अब चला, जब विमान और उसमें सवार लोगों के जीवाश्म ढूंढना भी चुनौती बना हुआ है। विज्ञान अभिशाप है। यह धारणा इस दुर्घटना से अभिपुष्‍ट हो चुकी है।
समाचारपत्र के एक कोने पर खबर थी कि गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री नन्‍दा
एक थी बुलबुल
नहीं रहीं। नन्‍दा जी क्षमा चाहता हूं। जब सुबह उठकर आलस्‍य में अखबार उठाया तो आपके निधन की खबर को पहले-पहल उड़ते-उड़ते ही पढ़ा। आराम से चाय पी और आपको राजनीति की खबरों को देखने की लालसा के चलते भुला बैठा। जब
जब-जब फूल खिले का ये समां, समां है ये प्‍यार का किसी के इंतजार का गाना याद आया, आप पर चलचित्रित यह गाना और आप की युवावस्‍था की मासूम तसवीर याद आई तो वापस आप के निधन के समाचार पर आकर रुक गया। पिचहत्‍तर साल आपने जीवन में बिताए। कम्‍बख्‍त किसी समाचार चैनल या पत्र-पत्रिका ने आप के युवावस्‍था के बाद के जीवन की कोई झलकी दिखाई ही नहीं कभी। कि आप कहां हैं, क्‍या कर रहे हैं, आराम से हैं या कष्‍ट में हैं? कैसी मतलबी दुनिया है! एक था गुल और एक थी बुलबुल गाने में आप घोड़े की सवारी करते हुए कश्‍मीर की वादियों में कितनी मासूम सुन्‍दरता से घूम रही थीं! आप के चाहनेवाले आपके साथ-साथ चल रहे थे। लेकिन आपकी वो दुनिया और आज का यह मोबाइल संसार कहीं से भी एकसमान नहीं बचा। विशेषकर मानवीय भावनाओं के मामले में। इस समय आप जैसी सादगी और सद्भावी व्‍यक्तित्‍ववाले जन्‍म लेते ही वापस अन्‍धेरे की राह पकड़ लेते हैं। वे जीवन के इस काल में पग ही नहीं रखना चाहते। उन्‍हें यह कलिकालिक समय दमघोंटू लगता है। जो लोग आपको आपके जीवन के उत्‍कर्ष सहित याद कर रहे होंगे वे बहुत धन्‍य होंगे! और जो आपको, आपके दुखों को अनुभव करते हुए याद करते होंगे तो आप कितनी धन्‍य हुईं! भगवान आपकी आत्‍मा को शान्‍तप्रशान्‍त करें। इस प्रार्थना के साथ मैं आपकी यादों से अलग हो रहा हूं।

19 टिप्‍पणियां:

  1. हम सब मानवी मशीन ही हो गए हैं और ये दर्द ही हमें याद दिलाते हैं कि एक जिस्म को साथ लिए फिरते हैं.वर्ना अपनी सुध आज किसे रही है.
    दिमाग में जीते हैं लगभग सभी .
    अक्सर अभिनेता अभिनेत्रियाँ उम्र के ढलान पर किसी को अपनी तस्वीर जनता के बीच में नहीं जाने नहीं देना चाहते बहुत कम ही हैं जो उम्र के हर पड़ाव को ग्रेस के साथ लिए सबके सामने आते हैं .सुचित्रा सेन ने भी कभी अपनी ढलती उम्र की तस्वीर जन साधारण में नहीं आने दी.

    नंदा की ''हम दोनों '' फिल्म भी एक यादगार फिल्म थी.श्रद्धांजलि !

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  2. कुछ हद तक सच है कि हम मशीन होते जारहे हैं । लेकिन अगर यह पूरा सच होता तो आप इतनी संवेदना के साथ यह सब नही लिख रहे होते ।

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  3. हमने जबसे मशीन बनाना शुरू किया ,हमने भी मनना शुरू कर दिया कि हम इंसान नहीं मसीन है। ये तो मानने वाले कि गलती है। ह्रदय का कार्य बस इतना ही है कि वो उमंग कि तरगों का उत्सर्जन करता रहे और वो करता भी है और मन से तरंग टकराकर कर हमें आनंद का अनुभव देता है। बात बस इतनी है कि समुद्र किनारे बैठे हम उससे उठते लहर का रसास्वादन न कर उसके आगे छाता खिचे बैठे है। अनवरत आनंद कि प्रतिध्वनि हर पल मन में आलोड़ित होता है ,सामंजस्य भरे माहौल में हम अनुभव करते नहीं तो समय माहौल बनाने में निकल जाता और दृष्टि आनंद को ढूढ़ती रह जाती। ह्रदय में संवेदनाओ से संचित असीम आनंद के उत्सर्जन को अगर अनुभव करना है तो बस ध्यान उस पर ही केंद्रित करे ,कोशिश करे बिलकुल कठिन नहीं है और सदा आनंदित रहे । सुन्दर आलेख

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सब 'ओके' है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागते भागते आज हम मानवीय संवेदनाओं से शून्य होते जा रहे हैं..यह मशीनी जीवन हमें कहाँ ले जायेगा यह सोच कर ही दुःख होने लगता है, लेकिन इन संवेदनाओं को जाग्रत रखने का प्रयास तो करना ही होगा..बहुत ही प्रभावी आलेख...

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  6. प्रभाव डालता बेहतरीन लेख !!

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  7. आपके शब्दों में हम भी शामिल हैं।

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  8. आपको जो भी उत्तर मिलता है मन को अवश्य ही बहुत सुकून देने वाला है..

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  9. हम जीते नही हैं अब ... ढोते हाँ अपने आप को .. अपने जिस्म को एक दिन से दुसरे दिन तक ... फिर भी कभी कभी कोई घटना संवेदनाएं वापस ले आती हैं चाहे कुछ पल के लिए ..
    नन्दा जी को मेरी विनम्र श्रधांजलि ..

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  10. बहुत कुछ है बदलने वाला । प्रकृति भी कहाँ ठहर पा रही है ।

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  11. मैं बहुत आशावान भी हूं। विशेषकर प्रकृति को देखकर मैं विशेष ऊर्जा से भर जाता हूं। लेकिन भौतिक-आधुनिक-धात्विक उपक्रमों से प्रायोजित सांसारिक भावनाएं जबरन ठेलकर मुझे भी अपने में घसीट लाती हैं।

    ये वाली पंक्तियां तो ऐसी लगी जैसे आपने मेरे रूह से चुरा ली हों..बेहद शानदार।।

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  12. वाकई , हम ऎसी ही दुनिया में जी रहे हैं ! मंगलकामनाएं संवेदनाओं और सद्भावनाओं के लिए !!

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  13. अपनी और बाद के पीढ़ी के लोगों की नित दिन बदलती जीवन से अपेक्षाओं और बदलते ढंग को देखकर अक्सर यही सवाल आता है कि कहाँ जा रहे हैं हम.समय के पैमाने में क्षण भर का यह जीवन और उसमे क्लेशदायी कितने तत्व. कभी कभी यह भी सोचता हूँ की आज से बस कुछ सौ साल पहले तक साम्राज्य विस्तार के चक्र में पड़ कर ना जाने कितने लोग अकारण जान गंवाते होंगे और असहाय महसूस करते होंगे. आज की दुनिया उस हिसाब से कितनी अच्छी है.लेकिन थोड़ी शांति बढ़ी है तो नयी व्याधियाँ आ गयी हैं. इस रूप में भी कम से आप के जैसे चिंतनशील लोग हैं तो आशाएं कायम हैं. पोस्ट पढ़कर बहुत अच्छा लगा. हाँ बस एक बात.... विज्ञान जनित जो भी मुश्किलें आईं हों जीवन में, विज्ञान ने हमें बहुत कुछ दिया भी हैं.

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  14. सरल जीवन को जटिल कर लिया गया है। रोबोट को जब तक अपने अस्तित्व का एहसास है, उसमें मानव जीवंत है।

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  15. उत्कर्ष पर ही साथ देती दुनिया।

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  16. नयी पोस्ट की प्रतीक्षा है.

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  17. nanda aur vaheeda rahmaan meri favourite actress rahi hain .. unki filmein aaj bhi bahut shouk se dekhti hun .. par thoda dukh hota hai ye soch k kabhi bhi akhbaar channle wale unki filmi career k baad k jeevan ya unki public appearnces k baare mein kabhi bhi kuchh nhi dikhaat.

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  18. मैं तो प्रकृति प्रेमी हूं। इससे कैसे विमुख हो सकता हूं! भौतिक जीवन की कठोरता जब कभी बहुत ज्‍यादा विचलित करती है तो अपनी अन्‍तर्चेतना में स्थिर हो जाता हूं। तब धूमिल विचार और भावनाएं स्‍पष्‍ट दिखने लगती हैं। मैं इनको पकड़कर इन्‍हें नहीं छोड़ने के संकल्‍प लेता हूं। लेकिन यह सब समय की एक छोटी अवधि में ही घटित होता है। जैसे ही यह समयकाल व्‍यतीत होता है मेरी वैचारिक चंचलता मुझ पर हावी हो जाती है। अंतत: मैं विचारों की निरर्थक यात्रा करता हूं। इससे मेरी झोली में कोई विशेष व्‍यक्तित्‍व उपलब्धि नहीं गिरती। मैं निराशा के पथ पर अन्‍धयात्रा करता रहता हूं।

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