Monday, February 3, 2014

हृदय में वसंत

ये बात कई बार पहले भी कही गई होगी, पर मैंने अब अनुभव की। पहले भी अनुभव हुई होगी पर अब मुझे अपने स्‍तर पर इसका वर्णन करना है। मनुष्‍य का जीवन प्रतिदिन एक प्रकार से नवजीवन ग्रहण करता है। शायद ज्‍यादातर लोगों को यह आभास होता होगा। लेकिन उनके द्वारा इसका मौखिक और लिखित वर्णन करना किसी न किसी कारण टल रहा होता है। मेरे साथ भी यही होता है।
रातभर नींद में हम स्‍वयं से अनभिज्ञ होते हैं। सपने अगर आते हैं तो हमारी नजर में हमारी जीवन-उपस्थिति बनी रहती है। सपने नहीं हैं, नींद गहरी है तो सुबह जागने पर समझा जा सकता है कि हमारा जीवन नींद के अन्‍धेरों से निकल कर जो एक नई सुबह, प्रकाश देखता है, वह कितना मूल्‍यवान है! यह अहसास हमें प्रतिदिन होना चाहिए। ऐसा होते रहने से यह विचार भी हममें घनीभूत होता है कि जीवन में कुछ बड़े कार्य करने के लिए नियति ने हमें फिर एक अवसर दिया है। इसलिए जीवित रहते हुए हमारा उद्देश्‍य क्‍या हो, इस पर अवश्‍य ही गहन विचार किया जाना चाहिए।
ईश्‍वर में हम कैसे आस्‍था रखें अगर हम विचारवान नहीं हैं। विचार करते रहना और विचारी गईं जीवन अनुभूतियों के बाद स्‍वयं से बात करना कितना प्रभावित करता है! ईश्‍वर तो हममें से किसी ने नहीं देखा, पर उसी का वास्‍तविक पयार्य प्राकृतिक स्थितियां विचारशील, सृजनशील होने में हमारी सबसे अच्‍छी मित्र सिद्ध हो सकती हैं। हम प्रकृति को देख, उसको संस्‍पर्श कर, उसके ध्‍वनि-संकेतों को भांप कर एक ऐसी आत्‍मविवेचना करने योग्‍य हो जाते हैं, जिसमें हमें सुख-शान्ति के लिए प्रकृति और अपने बीच कुछ भी नहीं चाहिए होता।
प्रकृति-विस्‍तार पर अन्‍तर्दृष्टि फैलते ही मनुष्‍य जीवन के निर्धारित भौतिक-मानक एकाएक बेमानी लगने लगते हैं। इस दौरान हमारा हृदय विश्‍लेषण करने की ऐसी शक्ति प्राप्‍त करता है, जिसमें कोई पूर्व विचार-विभेद आड़े नहीं आता। यह ज्ञान की स्‍वाभाविक अवस्‍था होती है, जो हमें उस समय मिलती है जब हम सब भूल कर पूरी तरह से प्राकृतिक हो जाते हैं।
हरे-भरे पेड़ों की ओट से नीला आसमान देखने का दिव्‍यावसर हमें सदा कहां प्राप्‍त होता है। यह संयोग जब भी बनता है तो इस तरह की समयावधि बहुत कम होती है। लेकिन इस छोटे से समय में भी जैसी हरियाली-नीलिमा आंखों से दिखती है वह कितनी अद्भुत रंगावली होती है, इसकी कल्‍पना इसे देख कर ही की जा सकती है।
इसके इतर भी दैनंदिन की जलवायु में कितना कुछ दिखता है, जो आत्‍मा को तर कर देता है। पक्षी चुपचाप नभ विचरण कर रहे होते हैं। हवा शान्‍त-प्रशान्‍त बहती है। मिट्टी में नए पेड़-पौधों का अंकुरण होता है। रात को गिरी हुई ओंस धरती के उन ओटों में देर-दोपहर तक रहती है, जहां सूर्य किरणों को पहुंचने में समय लगता है। फूलों के खेत में इस वसंत में खड़े होकर चहुंओर देखना आंखों में प्रकृति रत्‍न भरने जैसा लगता है। राह चलते हुए दाएं-बाएं रास्‍तों को देखिए। उनके किनारे खड़े पेड़ों की छायाएं रास्‍तों पर पसर कर वसंत-वसंत गा रही होती हैं। शहरों के आसमान में आमतौर पर गिद्ध कहां होते हैं भला। लेकिन वासंती आभास उन्‍हें भी आकाश में घूमने को विवश कर ही देता है। आज दोपहर उन्‍हें आकाश में मंडराते देख आश्‍चर्य हुआ। 
वसंत पंचमी के बाद पहाड़ी गांवों में 'पैंया' नामक वृक्ष की एक मजबूत टहनी को काट कर होलिका के रूप में स्‍थापित किया जाता है। इसके बाद होलिका दहन तक इस तने को सजाया-संवारा जाता है। चांदनी रातों में युवकमण्‍डल गांव-गांव जाकर होली गीत गाते हैं। वसंत पंचमी से लेकर होली के दिन तक पूरा पहाड़ संजीवित हो उठता है। अकल्‍पनीय रंग-सुगन्‍ध के फूल और वनस्‍पतियों से वहां का सारा जीवन नवोमंगित रहता है। अब शहर में रहते हुए यह प्रतीति स्‍वप्‍न लगती है। 
जग के रोगाणु भी जब पीत वासंती प्रकाश में जल जाते हैं तो मनुष्‍यास्तित्‍व क्‍यों रोग-शोक में रहे। यह भी पुराना बाना छोड़े और नए का धारण करे। नववर्ष अब आ रहा है। नई चेतना अब जागी है। अगले वर्ष इस समय तक पुन: लौटने के लिए जीवन सम्‍पूर्ण ऊर्जा प्राप्‍त कर ले। वसंत की उमंग, ऊष्‍मा फैले हृदय से हृदय तक। सब मंगल हो सबका मंगल हो इस कामना के साथ वसंत ॠतु की बधाई।

17 comments:

  1. विचार करते रहना और विचारी गईं जीवन अनुभूतियों के बाद स्‍वयं से बात करना कितना प्रभावित करता है!
    वाकई यदि यह विचार न हो तो जीवन कितना अर्थ हीन हो जाये जैसे प्राण बिना शरीर। ठीक वैसे ही जैसे वो कहते हैं ना "मन के हारे हार है और मन के जीते जीत" अर्थात मन जो विचारों से भरा होता है यदि वो खुश हो तो सब अच्छा लगता है और वो दुखी हो तो सब बेकार। लेकिन हर नए मौसम की प्राकृतिक छटा मन को एक नयी ऊर्जा से भर ही देती है। खासकर यदि वो वसंत बहार हो तो फिर कहना ही क्या... लाजवाब संस्मरण
    आपको भी बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें।

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  2. आपको भी बसंत की बहुत बहुत बधाई....!!

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  3. आपको भी बसंत की बहुत बहुत बधाई....!!

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  4. बसंत का सुंदर आगमन--
    बहुत मनभावन
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई -----

    आग्रह है--
    वाह !! बसंत--------

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  5. सचमुच वसन्त का सौन्दर्य हमारी अनुभूतियों से जुडा होता है । प्रकृति अपना वैभव हमें मुक्तहस्त देती है उसे देखने वाली आँखें और महसूस करने वाला हृदय हो । वसन्त-पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  6. बसंत का सुंदर आगमन--
    आग्रह है-- हमारे ब्लॉग पर भी पधारे
    शब्दों की मुस्कुराहट पर ....दिल को छूते शब्द छाप छोड़ती गजलें ऐसी ही एक शख्सियत है

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  7. प्रकृति को निहारें काम में हेड फोन न फिट हों तो प्रकृति संवाद करती है अच्छा विवरण।

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  8. प्रकृति को निहारें काम में हेड फोन न फिट हों तो प्रकृति संवाद करती है अच्छा विवरण।

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  9. सर्वप्रिये चारूतरम वसंते'
    बहुत ही उत्तम प्रस्तुति...बसंत को इन्ही वजहों से ऋतुराज कहा जाता है...बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई।।।

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  10. बसंत के आगमन और जीवन ओर प्राकृति के मिलन से उपजे वातावरण को बाखूबी शब्दों से संवारा है ... बहुत बहुत बधाई बसंत की ...

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  11. जब सब सहज मिलता है तो उसका मोल कहाँ समझते हैं लोग, प्रकृति माँ की तरह चाहती है, और हम ऐंठे रहते है।

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  12. बड़ा ही सुन्दर और बेहतरीन चित्रण बसंत आगमन का
    बसंत हर दिल में खुशियां भरे !
    बसंत की बधाई !

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  13. लाजवाब है ये पोस्ट..

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  14. नए मौसम और नयी ऋतु के आगम का एक नशा है इस पोस्ट में...वाकई अब शहर में रहते हुए यह सब स्‍वप्‍न जैसा ही लगती है।

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  15. यहाँ तो शीत का ताप अभी भी जारी है लेकिन आपके पोस्ट ने मन में बासंती बयार लाकर सुखद अनुभूति दी.

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  16. नव उमंग संचारित करने के लिए आपको भी बधाई...

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  17. हर व्यक्ति के जीवन में हर सुबह के साथ एक नयी शुरुआत होती है लेकिन दिखने या न दिखने वाले परिवर्तनों को कहीं दर्ज करना भी सबके बस में नहीं होता बस आगे बढ़ते रहने या भागते रहने में जीवन कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. ऋतु परिवर्तन विशेषकर इस समय लगता है जैसे प्रकृति ने खूबसूरत परिधान पहने हुए हों..हाँ,पहाड़ी गाँव देहात के लोग प्रकृति के नज़दीक ,अभी भी जीवन पूरी तरह जीना जानते हैं .
    अच्छी पोस्ट है.

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