Thursday, February 20, 2014

लेखन की कलंक कथा (मेरी भड़ास)

कुछ दिनों से पता नहीं क्‍या हो रहा है कि मैं लिखने के प्रति असहज हो गया हूं। लगता है जो भी लिखा जा रहा है, सब व्‍यर्थ और निरर्थ है। जब किसी के अच्‍छे-से-अच्‍छे लिखे से भी कोई प्रभावित नहीं हो रहा है, कोई बदल नहीं रहा है, तो क्‍या फायदा लिखने पर सिर खपाने से। लेकिन कहीं न कहीं लिख कर खुद को संतुष्‍ट करने का जो एक कीड़ा है वो हरेक लेखक को काट रहा है। और जब तक यह कीड़ा काटने का काम करेगा, अक्षर, शब्‍द, वाक्‍य से होते हुए लेखन-यात्रा पुस्‍तकों, पत्रों और अब ब्‍लॉग पत्रों के रूप में जारी रहेगी।   
     आज-कल दिल्‍ली में पुस्‍तक मेला लगा हुआ है। लाखों लोग वहां घूम रहे हैं। प्रकाशकों और लेखकों की बाढ़ आई हुई है। लेकिन पाठक की बात पर सब को मायूस हो जाना पड़ता है। आज एक अच्‍छा और सच्‍चा पाठक ढूंढे से भी नहीं मिल पा रहा है। अरे भई प्रकाशक लोग अपने स्‍टॉल पर अगर किसी नई पुस्‍तक का विमोचन या प्रदर्शन कर रहे हैं तो वे हमेशा विमोचनकर्ता के रूप में बड़े नेता या लेखक को ही क्‍यूं चुनते हैं? क्‍या विमोचन का कार्य अच्‍छे पाठक के हाथों नहीं होना चाहिए? क्‍या उसे इस कार्य के लिए थोड़ा सा पत्रम-पुष्‍पम नहीं दिया जाना चाहिए? जो बेचारा अपने जीवन के अनुभव मार कर दूसरों के अनुभवों और लिखे हुए को ही पढ़ता रहा, क्‍या उसका कोई मोल नहीं है। आखिर इतने प्रकाशक या लेखक होने का उद्देश्‍य तभी तो सार्थक होगा, जब इनसे कई गुणा ज्‍यादा सच्‍चे पाठकगण हों, इनको पढ़नेवाले हों।
     आज हर कोई अपनी पुस्‍तक छपवाने के लिए मरा जा रहा है। नए लेखकों ने जो कुछ लिखा है, उससे वे खुद भी अप्रभावित रहते हैं। इतनी आत्‍महीनता के बावजूद भी उनकी पुस्‍तक छपने की महत्‍वाकांक्षाएं कुलांचे मार रही हैं। मैं ऐसे लेखकों से ही सवाल करता हूँ कि वे जिस किसी की लिखी गई कोई किताब पढ़ते हैं तो उसे कितनी तन्‍मयता से पढ़ते हैं या पढ़ने के बाद उसमें से कौन सा ज्ञानसूत्र सीख कर वे याद रखते हैं? शायद ज्‍यादार लेखक इस बारे में निरुत्‍तर और अनभिज्ञ ही होंगे। और जब ऐसा है तो क्‍यों वे अपनी किताबें छपवाने और उनके ढेर लगाने को विवश हैं?
प्रकाशक अगर अपने जुगाड़ से किताबों के सरकारी, गैर-सरकारी विक्रय अनुबन्‍ध कर भी लेता है तो ध्‍यान रहना चाहिए कि उनके द्वारा बेची गईं ये किताबें अपनी अप्रभाविता के चलते सही पाठकों तक पहुंचने के बजाय मात्र सजावटी शोकेसों तक ही पहुंच पाती हैं। तो ऐसे में पुस्‍तक प्रकाशित करवाने के पीछे की महत्‍वाकांक्षा लोगों की खत्‍म क्‍यों नहीं हो रही? बड़े अचम्‍भे की बात ये भी है कि शानो-शौकत, ऐशो-आराम का जीवनयापन करनेवाले लोग अगर लेखक बन रहे हैं तो वे ऐसा क्‍या रच पाएंगे, जिससे एक बड़ा पाठक वर्ग चाव से पढ़े!
नाश्‍ता, लंच और डिनर समय पर लेते हुए होनेवाला लेखन मात्र लेखनकर्म की भीड़भाड़ ही सिद्ध होगा। जब तक लेखन या रचना की बात से लेखक का व्‍यावहारिक तादात्‍म्‍य नहीं होगा, उसका लेखन भाड़ में जाने के अलावा कुछ नहीं हो सकता। और आज कल तो हर काम की तरह लेखन उद्योग में भी जुगाड़बाजी, शिविरबद्धता जैसी कलंक-कथाएं घट रही हैं। ऐसे में लेखन, उसके मनन और उससे ज्ञानार्जन की बात बहुत बचकानी ही रहेगी। क्‍या करें लेखन के कीड़े का, जो काट तो रहा है पर कटने से बहने वाला खून यानि लेखन कोई क्रान्ति ही नहीं कर पा रहा है।

13 comments:

  1. कटु लेकिन अक्षरशः सत्य ।

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  2. सटीक बात कहता सार्थक एवं सारगर्भित आलेख।

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  3. एक दम खरी बात कही .

    एक समय था जब यात्रा में/या खाली समय काटने के लिए किताबें खरीदी जाती थीं लेकिन अब वो भी नहीं है.सच तो यह है कि आज के समय 'समय काटने' के लिए ढेरों विकल्प हमारे पास हैं और सिर्फ जो पढने के सच्चे शौक़ीन हैं वही किताबें खरीदते हैं.

    किताबें छपवाना एक शौक बन गया है और प्रकाशकों की भी चांदी है क्योंकि खुद पैसे दे कर छपवाने वाले ढेरों यहीं मिल जायेंगे !
    जबकि आज गंभीर पाठक मिलना मुश्किल है और हिंदी का पाठक बेहद मुश्किल!

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  4. पुस्तक छपवाने के भेड़ चाल से बचना चाहिए... बाजार में सही पुस्तक आये ये कोशिश होनी चाहिए...

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  5. कुछ दिनों पहले कानपुर के एक मित्र को मैंने अपनी पसंद की एक किताब लाने को कहा था. उस पुस्तक के लेखक के बारे में किताबवाले ने कहा कि इनकी किताबें तो कभी कभार ही बिकती है लेकिन बच्चन की किताबें अभी भी खूब बिकती है. तो बात वहीँ आती है कि मन में दीर्घकालिक स्थान उसी का होता है जिसमे गुणवत्ता हो. आजकल तो किताब लिखने से ज्यादा चिंतन किताब की मार्केटिंग के बारे में होने लगा है. सुन्दर आलेख.

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  6. विकेशजी बात तो आपकी अक्षरशः सत्य है..किंतु लोगों की इस लेखन की तड़प को रोकना सही भी नहीं है..माना कि अत्यधिक अभिव्यक्ति के चलते बहुत कचरा बाहर आ रहा है किंतु उसी कचरे में कुछ विचारों के सुंदर कमल भी यदा-कदा प्रस्फुटित होते देखे जाते हैं..और रही बात पाठकों द्वारा उस लिखे हुए के अनुकरण की तो बात ऐसी है कि यदि आपके पास विचार है तो समर्थकों की चिंता न करें..कहीं न कहीं कोई न कोई आपके लिखे हुए से प्रभावित होंगे ही...

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  7. आज तो महज एक शौक भर है किताब का प्रकाशन कराना...आपने बहुत सही लिखा...

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  8. वडोला जी एकदम सटीक बात, प्रकाशित और विमोचित पुस्तकों केए स्तर देखिये टीओ वस्तुस्थित साफ हो जाएगी

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  9. बाजार तो अपनी चाल के अनुसार ही चलता है पर जो आत्म-क्षुधा से विवश है अपना भोजन खोज ही लेते हैं कचरा के बीच भी . रही बात लेखन की तो कुचले जाते नामों में एक नाम और सही..

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  10. कटु लेकन सटीक कथन..

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  11. सत्य उजागर किया है |
    आशा

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  12. लेखन अच्छा हो तो पाठक मिलता है जरूर ... फिर कई बार लेखन अपने विचार रखने के लिए भी तो होता है ...
    अगर आपने कुछ लिखा है तो उसको पुस्तक के रूप में सुरक्षित रखने में मुझे कोई बुराई तो नज़र नहीं आती ...

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