Saturday, February 1, 2014

 नरेन्‍द्र, स्‍वराज, समर्थक
गभग तीन महीने से ज्‍यादा हो गया इस पेपर कटिंग को मेरे पास। इससे पहले कि इसका कागज गल जाए और इसमें लिखे गए उद्देश्‍य की प्राप्ति हो जाए मैं इसके बारे में बता देता हूं। रविवार 20 अक्‍टूबर, 2013 के हिन्‍दुस्‍तान हिन्‍दी दैनिक समाचार-पत्र के दिल्‍ली-एनसीआर संस्‍करण की पृष्‍ठ संख्‍या चौदह। इस पृष्‍ठ पर एक सज्‍जन
लज्‍जा राम द्वारा दिया गया विज्ञापन

श्री लज्‍जा राम आईआरएस (सी ऐंड सीई) रिटायर्ड 40/159, सी.आर. पार्क, नई दिल्‍ली-110019 ने आगे आओ देश बचाओ देश बचाओ मोदी लाओ शीर्षक से राष्‍ट्रकवि मैथिली शरण गुप्‍त की दो कविताएं विज्ञापन स्‍वरूप में छपवाईं हैं। अखबार में इस विज्ञापन को छपवाने के लिए अनुमानित एक लाख रुपए तक की लागत तो आई ही होगी। एक व्‍यक्ति देश हित में, लोक हित में अपनी जेब से खर्चा कर रहा है। ये किसी कम्‍पनी के उत्‍पाद का विज्ञापन नहीं था कि इसे धनार्जन के लिए छपवाया गया हो।
      इसी अखबार में शनिवार 16 नवम्‍बर 2013 को पृष्‍ठ संख्‍या 2 पर आधे पृष्‍ठ का एक और विज्ञापन छपा। वन्‍दे मातरम् जालिम हाथ का खूनी पंजा एक सत्‍यता नामक शीर्षक एवं उप-शीर्षक से प्रकाशित इस विज्ञापन में भी नरेन्‍द्र की सराहना की गई है। इसमें नरेन्‍द्र द्वारा कांग्रेस के हाथ के निशान को खूनी पंजा कहने को कुछ पुराने उद्धरण प्रस्‍तुत कर उचित ठहराया गया है। इस विज्ञापन को देनेवाले हैं
मुकेश परमार द्वारा दिया गया विज्ञापन
डा. मुकेश कुमार परमार, एमबीबीएस, एमएस, एलएल.बी, मेरठ उत्‍तर प्रदेश, ई-मेल-parmaar@hotmail.com, एसएमएस हेतु मोबाइल 09412784555। इसी अखबार में एक बार पहले भी इन महाशय का आधे पृष्‍ठ का विज्ञापन छप चुका है। करोड़ों की प्रसार संख्‍यावाले इस अखबार में आधे पृष्‍ठ का विज्ञापन कम से कम लाखों रुपए देकर छपवाया गया होगा।
      इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है कि नरेन्‍द्र को प्रधानमन्‍त्री पद पर बिठाने के लिए लोग अपने-अपने स्‍तर पर अपनी पूंजी खर्च कर कितना प्रयास कर रहे हैं। भारतीय राजनीतिक इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ होगा। ऐसे में समाचारपत्रवालों को भी कुछ शर्म जरूर आई होगी। उन्‍हें लगा होगा कि वे तो उलटे-साधे विज्ञापन छाप कर मुद्रा कमा रहे हैं। सेक्‍स पॉवर बढ़ाने, मुंह चमकाने, कोल्‍ड ड्रिंक पीने आदि का आहवान करते अखबारी विज्ञापनों से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से जनमानस पर कितना दुष्‍प्रभाव पड़ता है, इस ओर सोचने के लिए न लोग तैयार हैं और ना ही पत्रकार बिरादरी। इस विषय में सरकार की मतिगति क्‍या है, उसकी तो बात ही छोड़ दीजिए। उसका तंत्रात्‍मक संचालन हवा में लाठियां भांजना ही सिद्ध हो रहा है। जनसंचार में तो बस सामाजिक और राष्‍ट्रीय चरित्र की जड़ों में मट्ठा डालनेवाले विज्ञापनों के द्वारा पैसा कमाने की होड़ मची हुई है। विज्ञापनदाता कम्‍पनियों ने समाज, संस्‍कृति को बिगाड़ने के लिए विज्ञापन के रूप में इतने हथकंडे अपना लिए हैं कि अब इनके बगैर समाज की कल्‍पना अवास्‍तविक लगने लगी है। स्‍वयं सामाजिक गति एक प्रकार से तंत्र-उदयोगपतियों और विज्ञापनमूलक मीडिया के द्वारा प्रचलित किए जानेवाले जीवन मानकों से तय हो रही है। ऐसे में संवेदन मन में यह प्रश्‍न उठना स्‍वाभाविक है कि कहां तो समाज को लोकतान्त्रिक जीवन मानकों के हिसाब से चलना चाहिए था और कहां सामाजिक व्‍यवस्‍था सरकारों को पालनेवाले पूजीपतियों के हिसाब से चलती हुई आ रही है और न जाने कब तक ऐसा ही चलता रहेगा।
इस दुर्व्‍यवस्‍था से छुटकारा पाने के लिए आज देश के प्रबुद्ध लोग नरेन्‍द्र की ओर बड़ी आशाभरी दृष्टि से देख रहे हैं। लोग बदलाव की इस बयार को केवल देख ही नहीं रहे हैं बल्कि वे अपने-अपने स्‍तर पर इस बयार को आंधी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी क्रम में कोई अपने पैसे खर्च कर अखबारों में नरेन्‍द्र मोदी के पक्ष में विज्ञापन छपवा रहा है तो कोई सभा-सम्‍मेलनों का आयोजन कर रहा है। कोई प्रत्‍येक भारतीय से अपने मत का प्रयोग करने की अपील कर रहा है तो कोई लोगों को अपने मत का सही प्रयोग करने की सलाह दे रहा है।
पूंजीपतियों और व्‍यावसायिकों को समर्थन देने की बात पर यहां यह प्रश्‍न उठना भी जरूरी समझा जा सकता है कि नरेन्‍द्र भी तो गुजरात में बहुत हद तक यही योजनाएं चला रहे हैं। कि वे भी तो कॉरपोरेट केन्द्रित समाजार्थिक विकास का ही समर्थन करते हैं। समर्थन क्‍या करते हैं वे गुजरात प्रदेश के हर क्षेत्र के लिए जो भी कार्य कर रहे हैं उन कार्यों का वैकासिक रास्‍ता पूंजीपतियों के हित और उस आधार पर होनेवाली प्राकृतिक ह्रास की अवधारणा से ही होकर गुजरता है। लेकिन इस विषय में आम आदमी को अभी बहुत अध्‍ययन की जरुरत है। वह तब ही मनमोहनी विकास और गुजराती विकास की तुलनात्‍मक व्‍याख्‍या को आसानी से समझ सकता है। गुजरात के विकास कार्यक्रमों को देश-दुनिया से इतर तो डिजाइन और क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। यहां भी वही योजनाएं, नीतियां, मशीनरी और अवधारणा काम करेगी जो दुनिया में चल रही है। इसलिए यह कहना कि नरेन्‍द्र शासित गुजरात कॉर्पोरेट के हाथों की कठपुतली के सिवाय कुछ और नहीं है एकदम बचकानी बात है।
 स्‍वराज की अवधारणा को क्रान्तिकारी तरीके से लागू करने के लिए जनमानस को अपनी आवश्‍यकताएं रोटी, कपड़ा, मकान और बहुत जरूरत होने पर स्‍वास्‍थ्‍य तक सीमित करनी पड़ेंगी। और जिस दुनिया या देश की युवा पीढ़ी जीवन के उक्‍त चार आधारों को युवकत्‍व के जोश में तिलांजलि देकर मशीनरी संकल्‍पनाओं को ही जीवन का मूलाधार मान कर चल रही हो, वहां कोई शासक या लोकतान्त्रिक नेतृत्‍व मशीनों की परिकल्‍पना, निर्माण, प्रयोग, उपभोग को सांगठनिक स्‍तर पर चलाने वाले पूंजीपतियों, कॉर्पोरेट की अवहेलना, उनकी उनकी अनदेखी कैसे कर सकता है। क्‍या मार्क्‍स-समाज-बहुजनसमाज-अन्‍यान्‍य वादियों को आज पूंजीपतियों या कॉर्पोरेट घरानों को बुरा कहने से पहले यह नहीं सोचना चाहिए कि उनकी सांगठनिक या लो‍क‍तान्त्रिक उत्‍पत्ति और अस्तित्‍व को इन्‍होंने ही सहारा दिया है।
केवल जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने के सिद्धान्‍त को दुनिया में बहुत पहले से चुनौती मिलती रही है। यह केवल कुछ हजार वर्ष पहले की बात नहीं है। लाखों वर्ष पूर्व से साधन सम्‍पन्‍न बुद्धिजीवी चैन से बैठने की बजाय ज्ञान-विज्ञान की दिशा में अग्रसर होते हुए आए हैं। वे खा कर सोने और जीवन काटने की चिंता से उठ कर जीवन-विषयक गहरी पड़ताल करने के चक्‍कर में जो एक बार फंसे और इसके परिणामस्‍वरूप मान्‍यताओं के जो दो वैज्ञानिक एवं आध्‍यात्मिक ध्रुव बने उनका सामाजिक अनुसरण आज तक हो रहा है। लेकिन इन दो वैचारिक ध्रुवों का आरम्‍भ में अपने-अपने विचार, प्रयोग, अनुसन्‍धान और आविष्‍कार से कोई सामूहिक नकारात्‍मक प्रभाव संसार पर नहीं पड़ा। इनकी अपनी-अपनी वैचारिक दशा-दिशा एक प्रकार से मानव कल्‍याण पर टिकी थी। परन्‍तु शनै:-शनै: इन दो ध्रुवीय विचारों के प्रचार-प्रसार से दुनिया के तरह-तरह के लोग जुड़ते चले गए और यह दुनिया का दुर्भाग्‍य ही रहा कि विज्ञान-आध्‍यात्‍म के आरम्भिक काल की विचारधारा में कालान्‍तर में मानव-कल्‍याण के स्‍थान पर व्‍यक्तिगत अहं, स्‍वार्थ, लोभ, लालच जैसे अमानवीय विषैले विचारतत्‍व प्रवेश करने लगे। यही विषैली मानवीय प्रवृत्ति आज तक चली आ रही है। विज्ञान-आध्‍यात्‍म आज भी इस दुष्‍प्रवृत्ति से पीड़ित है। और इसी का प्रभाव दुनिया और भारत के राज, समाज पर भी पड़ रहा है।
नरेन्‍द्र जैसे व्‍यक्तित्‍व यदि स्‍वराज सिद्धान्‍त को व्‍यावहारिक बनाने का प्रयास करेंगे भी तो यह चुटकी बजा कर स्‍वराज प्राप्‍त होने जैसा व्‍यवहार नहीं होगा। इसके लिए सर्वप्रथम उन्‍हें लोकतान्त्रिक बहुमत से राज व्‍यवस्‍था में आना होगा। स्‍वराज अनुकूल योजनाओं, नीतियों को साकार करने की सरकारी, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सबसे बढ़कर आध्‍यात्मिक व्‍यवस्‍था बनानी होगी। दो हजार चौदह से अगले पांच साल यानि 2019 तक यह सब कुछ पूरे भारत में सम्‍पन्‍न नहीं हो जाएगा, जनमानस को यह भी समझाना होगा। लाखों-हजारों वर्षों की विचारधारा की लड़ाई को कोई नेतृत्‍व इक्‍कीसवीं शताब्‍दी में मात्र पांच या दस वर्ष में समाप्‍त करके विकास के सारे लक्ष्‍य प्राप्‍त कर लेगा, इतनी जनापेक्षा भी सपने जैसी ही होगी। नरेन्‍द्र के सत्‍तासीन होने पर यह जनापेक्षा ज्‍यादा सही होगी कि उनके आने के बाद रामराज स्‍थापित हो या ना हो पर चरमासीन रावणराज कम से कम घुटनों के बल तो आ सके।

7 comments:

  1. बहुत सार्थक चिंतन...इतने वर्षों से पैदा हुई अव्यवस्थाएं कुछ महीनों या सालों में हल नहीं की जा सकतीं, लेकिन आवश्यकता है एक प्रयास की और यह बदलाव संभव दिखाई दे रहा है...

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  2. बहुत सुंदर, आपने बिलकुल सही लिखा है। बहुत अच्छा लगा।

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  3. देश की क्षमतायें यदि वंचित रहें तो कसमसाहट गहरी होती है।

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  4. प्रयास का स्वागत और पूरी सपोर्ट होनी चाहिए ... बाकी समय बताएगा क्या होना है ...

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  5. दोनों का टिकिट पक्का है। तोता का भी मैना का भी।

    मोदी के समर्थकों का ज़वाब नहीं।

    नरेन्‍द्र जैसे व्‍यक्तित्‍व यदि स्‍वराज सिद्धान्‍त को व्‍यावहारिक बनाने का प्रयास करेंगे भी तो यह चुटकी बजा कर स्‍वराज प्राप्‍त होने जैसा व्‍यवहार नहीं होगा। इसके लिए सर्वप्रथम उन्‍हें लोकतान्त्रिक बहुमत से राज व्‍यवस्‍था में आना होगा। स्‍वराज अनुकूल योजनाओं,नीतियों को साकार करने की सरकारी, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सबसे बढ़कर आध्‍यात्मिक व्‍यवस्‍था बनानी होगी। दो हजार चौदह से अगले पांच साल यानि 2019 तक यह सब कुछ पूरे भारत में सम्‍पन्‍न नहीं हो जाएगा, जनमानस को यह भी समझाना होगा। लाखों-हजारों वर्षों की विचारधारा की लड़ाई को कोई नेतृत्‍व इक्‍कीसवीं शताब्‍दी में मात्र पांच या दस वर्ष में समाप्‍त करके विकास के सारे लक्ष्‍य प्राप्‍त कर लेगा, इतनी जनापेक्षा भी सपने जैसी ही होगी। नरेन्‍द्र के सत्‍तासीन होने पर यह जनापेक्षा ज्‍यादा सही होगी कि उनके आने के बाद रामराज स्‍थापित हो या ना हो पर चरमासीन रावणराज कम से कम घुटनों के बल तो आ सके।

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  6. बात तो बहुत सही लिखी है आपने, लेकिन अब हमारे देश की जनता खुद के शोषण से इतनी तंग आचुकी है कि अब हर कोई यही चाहता है कि बदलाव हो और मोदी जी की सरकार बने और वो एक जादू की छड़ी घुमाएं और सब ठीक हो जाये। लेकिन उन्हें भी इतने सालों की गडमद परिस्थितियों को सुचारु रूप से क्रयान्वित करने में समय तो लगेगा ही बस यही समझने को कोई तैयार नहीं है।आगे -आगे देखिये होता है क्या ....

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  7. अच्छी बात है कि दशकों से जनता का शोषण करनेवाले वाले वहां जा रहे हैं जहाँ से वो फिर उठ कर आ ना सकें. उम्मीद है कि जो भी बदलाव हो, सब देश में एक से बढ़कर एक मापदंड स्थापित करे.

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