Wednesday, January 15, 2014

मेरा आजकल

कार्यालय के बड़े परिसर में रखे पंक्तिबद्ध गमलों में उगे लाल-पीले फूलों को देखता हुआ जब घर की तरफ आ रहा था तो मन्‍द, मीठी सर्द हवा का अनोखा अनुभव हुआ। लगा कि हवा वस्‍तु रूप में मेरे शरीर से लिपट गई। कुछ देर मंत्रमुग्‍ध हो अपने मन-शरीर को हवाओं की अदृश्‍य लहरों में झूलने के लिए छोड़ दिया। हवाई आकर्षण और मुग्‍धता से छूट कर लगा कदाचित् निर्मल भावनाओं और संवेदनाओं का यही प्रतिफल होता होगा व्‍यक्ति के लिए। कार्यालय में रात को साढ़े दस बजे पूष का माघ में बदलने का यह पहला मौसमीय आभास था। एक प्रकार से यह प्रारम्‍भ फाल्‍गुन-चैत्र के सुमधुर मौसम-समय को पुष्पित-पल्‍लवित करने का बीजारोपण है।



मेरी तरह पता नहीं कितनों ने चांद
के पास से सरकते बादल देखे होंगे

घर पहुंचने पर देखता हूं कि लोग अपने-अपने घरों में सो चुके हैं। कंक्रीट के बीच जो हरियाली दीखती है, जो पेड़ नजर आते हैं वे मन्‍द-मन्‍द हिलमिला, खि‍लखिला रहे हैं। तीसरी मंजिल पर स्थित घर के गलियारे में खड़ा मैं मध्‍य नभ में विद्यमान चन्‍द्रमा के दाएं-बाएं तेजी से गुजरते, बिखरते और सरसराते बादलों को देखने रुक जाता हूं। पूष को उड़ा कर दूर बहा ले जानेवाला समय जैसे इन्‍हीं क्षणों में आकाश में चलचित्रित हो रहा है। मौसम की लगन देख के प्रतीत हुआ कि माघ, पूष की इस अन्तिम चन्‍द्ररात को विदा करने आ गया है।
मेरे लिए औरों ने जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और कानूनी जीवन बना रखा है दिनभर उसमें पिसने के बाद रात को मैं अपने आत्मिक जीवन में पग धरता हूं। यहां मेरी बाहरी दुनिया के नियम-कानून और इनको बनानेवाले व इनसे संचालित होनेवाले लोग एकदम से विस्‍मृत हो जाते हैं। मेरे बाह्य जीवन में जो लोग मुझे जैसे होंगे, आत्मिक अवस्‍था में मैं उन्‍हीं को ढूंढता हूं। उनके बाह्य जगत पर मेरा कोई अधिकार नहीं हो सकता पर उनके भीतरी संसार पर मेरी दृष्टि बराबर लगी रहती है। मैं सोचता हूं कि मेरे और उनके भीतर का संसार जब एक है तो हम अपने बाहरी संसार को भी ऐसा ही क्‍यों नहीं बना सकते। हम थोपे गए बाहरी जीवन का बोझ कब तक उठाएंगे। जब इससे मन बुरी तरह खट्टा हो गया है तो इसको ढोने से क्‍या लाभ?

ये भी तो पूष का माघ में बदलना देख रहे हैं


एकान्‍त, प्रशान्‍त व्‍यक्तियों के लिए दुनिया की द्विअर्थी नीतियों-रीतियों की क्‍या आवश्‍यकता! समाज-सरकार के नियम अपराधियों को दण्डित और नियन्त्रित करने तक ही क्‍यों होते हैं? जीवनपर्यन्‍त अच्‍छे-सच्‍चे बने रहनेवालों को कोई नियम-कानून सम्‍मानित और विभूषित क्‍यों नहीं करता? अच्‍छाई और सच्‍चाई को चुन-चुन कर पुरस्‍कृत करने से बुराई रोकने का एक नया रास्‍ता जब स्‍वत: ही बन सकता है तो क्‍यों नहीं इस दिशा में क्रान्ति होती?
आधी रात के बाद जब नींद आने और न आने के बीच करवट बदलता हूं तो माघ का चन्‍द्रमा पश्चिम दिशा में दीख पड़ता है। कक्ष के अन्‍दर अन्‍धेरे की कालिख में लिपटा हुआ मेरा शरीर बहुत भीतर अंत:स्‍थल में धवल-उज्‍ज्‍वल बना हुआ है। रात को इसलिए प्रेम करता हूं क्‍योंकि इसमें मेरे स्‍मृतिपट पर न जाने कितने आत्मिक अनुभव अंकित होते हैं और वे मुझे सुबह अपने बाह्य जग में विचरण करने के लिए एक नए भ्रमातीत व्‍यक्तित्‍व में परिवर्तित करते हैं, जिससे मैं बाहर से लड़ने योग्‍य बन पाता हूं।
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इतिहास वर्तमान भविष्‍य, सोचते हुए मैंने रात बिताई
समय की मृदा में मिल, जीवाश्‍म बनीं जीवनियां याद आईं
स्‍वयं को भूल दुखियों की दृष्टि से, दुखानुभवों को जीवन में उतारा
एकांत में जन्‍मे और मरे हुओं को, अन्‍तर्वेदनाओं का मिला सहारा
इस आधुनिक कारागार में, गांव-बचपन कितना याद आता है
शरीर को अकेले यहां छोड़, आकाश में मन नहीं उड़ पाता है
भोला बालपन सुगन्धित यौवन, अब लौट कर नहीं आनेवाला
कलिकाल के इस बियाबान में, आजकल मेरा है खोनेवाला

15 comments:

  1. अच्‍छाई और सच्‍चाई को चुन-चुन कर पुरस्‍कृत करने से बुराई रोकने का एक नया रास्‍ता जब स्‍वत: ही बन सकता है तो क्‍यों नहीं इस दिशा में क्रान्ति होती?

    पुरातन समय में समाज इतना शक्तिवान था की वो ऐसे मसलों पे सोचता था और उचित कार्य करता था ... पर आज जबकि सामाजिक संरचना छिन्न भिन्न है या दिशा भ्रमित है तो कौन इस विषय की महत्ता को समझेगा ... सामाजिक नियम बदल रहे हैं ... उन्ही के साथ जीना होगा ...

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  2. आज आपकी पोस्ट को देखते पढ़ते और उस पर विचार करते जब वर्तमान हालातों के विषय में सोचा तो बस यही दिल में आया कि...हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िंदगी छाँव है कभी, कभी है धूप ज़िंदगी हर पल यहाँ जी भर जियो जो है समा कल हो न हो ...

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  3. ये पुरातन और आधुनिकता का द्वन्द है .....

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  4. इन द्वंदों की बदौलत ही जिंदा होने का अहसास बना रहता है...सुंदर प्रस्तुति।।।

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  5. सुंदर प्रस्तुति।।।

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  6. मन के आकाश में जब विचारों के अनगिनत तारे चमकते हैं तो सोच में खलबली मचती ही है, लेकिन मन के आँगन में खिली रातरानी की भीनी सी खुश्बू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

    बहुत ही अच्छा लिखा है.। लिखते रहिये।

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  7. स्मृति की रचना ही ऐसी होती है कि वह गहरी हो ही नहीं सकती और विचार केवल विचार ही होता है। मन जब स्व-विच्छेपित बातों से व्याप्त हो जाता है तो वह विचार के उस पार नहीं जा पाता है बल्कि एक नया चेहरा धारण कर लेता है। विभिन्न स्तरों पर प्रस्थापित करता आलेख।

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  8. अक्सर दो जीवन जीते हैं हम जानते बुझते हुए भी की नियति को बदला नहीं जा सकता ..बाहरी दुनिया से कटकर जब खुद से रूबरू होते हैं तो सुखद स्मृतियों में खोकर मनचाही जगहों पर पहुँच जाने की चाह रखते हैं. शायद यह खुद से जुड़ना ही अगले दिन बाहरी दुनिया से जूझने के लिए उर्जा देने का काम करता है .

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  9. पद्म पुरस्कारों को देख कर तो यही लगता है कि सत्तारूढ़ दल उसका मज़ाक बनाते हैं. वहां तो वाकई चुन-चुन के कुछ ही सच्चे-अच्छे लोग आ पाते हैं. बांकी एक लम्बी फेहरिस्त होती है हुजूर-ऐ-आला की इनायत पाए लोगों की. लेकिन वही है कि समय की परीक्षा तो बस गुणवत्ता वाली चीजें ही पास कर पाती है ना कि पुरस्कृत चीजें.

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  10. कंक्रीट के ज़ंगल में प्रकृति और आत्मिक सौन्दर्य की तलाश कितनी कठिन है...बहुत प्रभावी प्रस्तुति..

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  11. कंक्रीट के ज़ंगल में प्रकृति और आत्मिक सौन्दर्य की तलाश कितनी कठिन है...बहुत प्रभावी प्रस्तुति..

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  12. कुछ पल अपने,
    दिन तो बीता आपाधापी,
    यथारूप हर चिंता व्यापी,
    अब निद्रा हो, अपने सपने,
    कुछ पल अपने।

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  13. कुछ न कुछ तो अंतर, भेद व चुनौतियां रहेगी हर वक़्त... बहुत बढ़िया लिखा है आपने..

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  14. बहुत सुंदर गीत ....

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