महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, January 5, 2014

आगे बढ़ने में पीछे छूटा जीवन

मैं जीवन में बहुत सारी घटनाओं, अनुभवों को उनके होने के दौरान वैसा भावमान नहीं देता जैसा उनके घटने के कई दिनों के बाद उनके बारे में महसूस होता है। तब घटनाओं में शामिल जीवित पात्र, मौसम, परिवेश की क्रिया-प्रतिक्रिया क्रमवार फिर से दिमाग में घूमने लगते हैं। मैं चाहता हूँ कि यह सब कुछ दोबारा घटे। जो मानवीय कार्य मैं इस घटने के दौरान नहीं कर पाया था वो कर सकूं। लेकिन ये तो केवल एक दिमागी भ्रम है। एक निरर्थक दर्शन, फीका सा सिद्धांत। वास्‍तव में इसके कोई मायने नहीं हैं। अचानक फिर याद आता है कि जो करना है अब करो। अभी क्‍या बिगड़ा है। कौन सा सामाजिक परिवर्तन हो गया है। सब कुछ ठीक थोड़े ही हुआ है जो मुझे अतीत में कुछ नहीं करने का पछतावा है। यह भी लगता है कि जहां नौकरी हो रही है वहां तो अपनी जिम्‍मेदारी ठीक से निभा रहा हूँ तो काहे का संताप है, जो खाए जा रहा है घुन की तरह कि नहीं कुछ न कुछ तो अधूरा है। कुछ तो ऐसा है जिसके पार जाए बिना किसी किस्‍म का संतोष नहीं मिल सकता दिल को।

क्‍या-क्‍या पीछे छूटा आगे बढ़ते रहने में
     चाहे पारिवारिक समस्‍या हो या फिर नौकरी की दिक्‍कतें या समाज और सरकार के बुरे प्रभाव इन सभी से समझौता करते-करते आखिर में कहां जाना है! इस एक बिन्‍दु पर अगर कभी रुक कर सोचता हूँ तो शरीर में जमा रक्‍त पानी बनने में देर नहीं लगाता। अपनी अकेली जिन्‍दगी में तो दुनिया, देश, राज्‍य, नौकरी, परिवार भी प्रवेश नहीं कर पाते। इस जीवन के दुख-सुख परिवार, सम्‍बन्‍ध, जाति, धर्म, देश, दुनिया के पूर्वाग्रहों और पूर्वसंकेतों के बिना उत्‍पन्‍न होते हैं। लेकिन असल में ये कोई दुनिया होती नहीं है। यह सोच कर वापस मुड़ जाता हूँ और उसी धरातल पर खुद को पाता हूँ, जहां सबका हाड़-मांस का मानुषिक जीवन एक अजीब भ्रम में बंधा हुआ सा लगता है। एक ऐसा भ्रम जो हमें मनुष्‍य होने से हटा रहा है। 
जो लोग पेट के लिए दो रोटी, तन ढकने को कपड़ा, सिर पर मौसम की मार से बचने के लिए एक छत और बीमार होने पर दवा के अलावा जीवन में और कोई आकांक्षा नहीं रखते उनके हिसाब से दुनिया चलती, उनसे प्रेरणा लेकर राजकाज होता तो पक्‍का था कि सब कुछ एकदम शांत बहते जल की तरह रहता। सौ बरस की जिन्‍दगी में हजारों-लाखों की संख्‍या में सामान इकट्ठा करने, करवाने की होड़ आखिर किस उल्‍लू के पट्ठे ने लगवाई। वह तो न जाने कौन से जीवाश्‍म में बदल कर कहीं निर्जीव पड़ा होगा, लेकिन उसने मानव जीवन का, उसके निर्धारित समय का स्‍वाभाविक आनन्‍द भी छीन लिया। आगे बढ़ना जैसे दो शब्‍द अभी न जाने कितने इतिहास बनाएंगे और इनको पूरा पढ़ने के लिए न जाने कब मानव जीवन अमर होगा। आगे बढ़ने की हर नई परिभाषा इतनी उलझी हुई है कि इसमें नया और परिवर्तनकारी सार्थक विचार, कार्य ढूंढना कठिन है।
कम्‍प्‍यूटर के एचटीएमएल प्रोसेस पर नाचती आज की दुनिया शायद वह सब कुछ बनाए बिना नहीं रुकना चाहती, जो आनेवाले सालों में मनुष्‍यों को करना पड़े। तो फिर उस समय के मनुष्‍य क्‍या करेंगे? इतना भी क्‍या आगे बढ़ना कि हमारा आस-पास ही खत्‍म हो जाए, हमारा वर्तमान ही हम से कट जाए। इस आगे बढ़ने में जीवन न जाने कितना पीछे छूट गया है!

21 comments:

  1. Sahi kha bhai bahut kuch peeche chhot gya hai. Bahut se pachtave reh gaye dil mein, bahut se kaam adhoore reh gaye jinka malal jeevan bhar rehta hai. Bahut achhi soch ke sath likha gaya lekh. Jai ho.

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  2. जहां सबका हाड़-मांस का मानुषिक जीवन एक अजीब भ्रम में बंधा हुआ सा लगता है। एक ऐसा भ्रम जो हमें मनुष्‍य होने से हटा रहा है। बहुत कुछ सोचने पर विवश करता गहन भाव लिए सार्थक आलेख...

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन एक छोटा सा संवाद - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. ‘आगे बढ़ना’ जैसे दो शब्‍द अभी न जाने कितने इतिहास बनाएंगे और इनको पूरा पढ़ने के लिए न जाने कब मानव जीवन अमर होगा।
    बेहतरीन आलेख....

    अनु

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  5. सच है मगर यही वर्तमान के हालात हैं .प्रतिस्पर्धा के इस युग में आगे बढ़ना और भागते रहने में हम खुद को भी कहीं छोड़ आये हैं.

    चित्र अगर आपने खींचा है तो वाकई बहुत अच्छा चित्र लिया है .
    पोस्ट से सही तालमेल भी बैठ रहा है.

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  6. बहुत अच्छा लिखा है आपने. इस अंधी दौड़ में आदमी सबसे पहले अपने आप को ही खोता है लेकिन इसका भान उसे हो नहीं पाता.

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  7. 'आगे बढ़ना 'यह एक शास्वत् विचार है ,जिनका अर्थ काल-क्रम में बदलता है..... सुन्दर आलेख

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  8. जीवन है तो कर्म है और उस की अपनी -अपनी व्याख्याएँ हैं जिसे आगे बढ़ना कह दिया जाता है पर स्वयं के केंद्र में स्थित होने पर स्पष्ट हो जाता है कि हम वहीं होते हैं बाकी सब बदलता रहता है। अब सोचने वाली बात यह है कि हम कितने भ्रमित होते हैं भ्रमों के बीच....

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  9. प्राथमिक आवश्यकताओं में ही हम इतना उलझ जाते हैं कि आगे बढ़ने का विचार त्याग ही बैठते हैं, पहले तो वही विजित हों।

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  10. बहुत सार्थक पोस्ट है, हम व्यर्थ की चिंता में वर्तमान निरर्थक कर रहे हैं।

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  11. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार भाई जी-

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  12. कभी न कभी तो हमारी अन्तरआत्मा ऐसे सवाल करती है ...तो ऐसी कसक को सार्थक बना लेना चाहिए ...यानि कुछ ऐसा कर पाएं जो औरों के लिए भी शुभ हो ...मगर सवाल ये उठता है कि क्या ? करना कुछ नहीं है ...बस ये भाव ही बना रहे बाकी प्रकृति आपसे करवा लेगी ...आपने बहुत अच्छे शब्द दिए हैं मन की उथल-पुथल को ...

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  13. अपने-अपने आयाम हैं... भ्रम को जीने या फिर भ्रम में जीने का ....

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  14. सिर्फ रोटी कपड़ा मकान से दुनिया चलती तो अवश्य खुशहाल होती.... लेकिन ईकठ्ठा करने की होड़ ने स्वाभाविक जीवन को तहस नहस कर दिया है .... बहुत सुंदर आलेख !!

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  15. हम आगे बढ़ने की होड़ में अपने वर्तमान का भी पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते और खुशियाँ केवल एक स्वप्न बन कर रह जाती हैं. पीछे मुड़ने पर देखते हैं कि कितना कुछ पीछे छूट गया..बहुत विचारणीय और सारगर्भित आलेख...

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  16. सही बात...बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो

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  17. संचय की प्रवृत्ति , भागदौड ,प्रतिस्पर्द्धा ,भौतिक सुखों का आकर्षण ,दिखावा, बाहरी चमक-दमक आदि कुछ बातें हैं जिन्होंने जीवन को अशान्त और असन्तुष्ट बना दिया है । कितनी ही छोटी-छोटी खुशियाँ हमारे बगल से निकल जातीं हैं हमें अहसास ही नही होता । बहुत ही विचारशील आलेख विकेश जी ।

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  18. आगे बढ़ने के क्रम में कितना कुछ पीछे छूट जाता है
    ना जाने कैसी अंधी दौड़ लगी है

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  19. बेहतरीन भावमंथन शानदार पोस्ट अपना अलग अंदाज़ लिए

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  20. आगे बड़ते हुए पीछा तो जरूर छूटता ही है ... फिर किस रफ़्तार से आगे बढ़ें इसी पर निर्भर करता ही की पीछे कुछ छूटा या अभी भी जुड़ा हुआ है ...

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  21. शुक्रिया दोस्त आपकी प्रेरक टिप्पणियों के लिए। विशिष्ठ लेखन के लिए।

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