Thursday, January 23, 2014

पैंसठवां गणतन्‍त्र

26 जनवरी, 1950 को संविधान-सभा में जो प्रस्‍ताव रखे गए और भारत सरकार अधिनियम, 1935 से इनका मिलान, विश्‍लेषण, अध्‍ययन करने के बाद जो निर्णय लिए गए, वे भारतीय संविधान के शासन प्रलेख के रुप में दर्ज हो गए। छब्‍बीस जनवरी को सन् 1930 की स्‍वतन्‍त्रता की घोषणा के सम्‍मान में चुना गया था। तब से लेकर गणतन्‍त्र की आधिकारिक घोषणा को प्रत्‍येक वर्ष 26 जनवरी के रुप में मनाया, याद किया जाता है। एक तरह से गणतान्त्रिक भारतीय व्‍यवस्‍था का यह दूसरा सबसे बड़ा पर्व है। स्‍वतन्‍त्रता दिवस और गांधी जयन्‍ती दो अन्‍य राष्‍ट्रीय पर्व हैं, जिससे 26 जनवरी अर्थात् गणतन्‍त्र दिवस का पर्व सोद्देश्‍य संलग्‍न है।
 गणतन्‍त्र का उत्‍साह हमेशा ऐसा क्‍यों नहीं होता हर क्षेत्र में
इस दिन राजधानी दिल्‍ली में देश के प्रथम नागरिक राष्‍ट्रपति भारतीयता के प्रतीक तिरंगे ध्‍वज को फहराते हैं। इसके बाद वे थल, जल, नभ तीनों सेना प्रमुखों का अभिवादन स्‍वीकार करते हैं। राजपथ पर देशभर के राज्‍यों के रहन-सहन, भाषा-बोली, वेशभूषा, सांस्‍कृतिक विरासत और नई उपलब्धियों को दर्शाती झांकियों का रेला निकलता है। तीनों सेनाएं अपने रण-कौशल, सुरक्षा ज्ञान-विज्ञान को प्रस्‍तुत करती हैं। अनेक सैन्‍य टुकड़ियां सैन्‍य बेड़े में शामिल किए गए अपने नवीनतम अस्‍त्र-शस्‍त्रों के गुणों और दक्षताओं की चल प्रदर्शनी करती हैं। केन्‍द्र, राज्‍य सरकार के महत्‍वपूर्ण विभाग, निगम अपनी नवोन्‍नत कार्यप्रणालियों तथा नवीन अनुसन्‍धान से आम और खास को परिचित कराते हैं। हमारा देश अनेक धर्मों, जातियों, भाषाओं का देश है। गणतान्त्रिक ताने-बाने में इन विशिष्‍टताओं का सुसंगत समावेश करने के उद्देश्‍य से भी संविधान की भूमिका अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है। इसका ध्‍यान रखते हुए भी इस देश के गणतान्त्रिक संविधान में आवश्‍यक प्रावधान किया गया है, और इसके बने रहने के संकल्‍प के साथ प्रतिवर्ष राजपथ पर सामु‍दायिक एकता दर्शातीं झांकियों के प्रदर्शन का उद्देश्‍य भी इसी में निहित है। इसी प्रकार देश के प्रमुख विद्यालयों के विद्यार्थी पठन-पाठन, जानवर्धन, शारीरिक-मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी जागरुकता की झांकियां प्रस्‍तुत करते हैं। इन सम्‍पूर्ण गतिविधियों का तात्‍पर्य यह दर्शाना होता है कि भारत के संविधान प्रदत्‍त गणतन्‍त्र के वैशिष्‍ट्य को कालखण्‍ड के अनुरुप सशक्‍त बनकर आगे ही आगे बढ़ते जाना है।
लेकिन आज गणतन्‍त्र दिवस की 65वीं वर्षगांठ मनाते हुए क्‍या हम भारतीय गणतान्त्रिक परिभाषा के व्‍यावहारिक पक्ष को किसी भी क्षेत्र में घटित होते हुए देख पा रहे हैं? ज्‍यादातर लोगों को इस प्रश्‍न पर मौन रह जाने को विवश होना पड़ेगा। यदि पिछले 64 वर्षों के गणतान्त्रिक ताने-बाने पर सरसरी नजर डाली जाए तो यही पाएंगे कि अमीरी-गरीबी की खाई में वृद्धि होती जा रही है और जल, अन्‍न, स्‍वास्‍थ्‍य, न्‍याय के मोर्चे पर अधिसंख्‍य लोगों को आज तक धक्‍के खाने पड़ रहे हैं। देश-दुनिया में विज्ञान ने यदि पिछले 5-6 दशकों में अभूतपूर्व उपलब्धि दर्ज की है तो इस वैज्ञानिक चमत्‍कार का हासिल आम जनता को खुद की अनदेखी के रुप में ही मिला है।
बाल स्‍वास्‍थ्‍य, महिला सुरक्षा, भ्रष्‍टाचार, घोटाले, कृषि योजनाओं की विफलता, एफडीआई, महंगाई, विद्यालयों और महाविद्यालयों में वृत्तिक पढ़ाई के साथ-साथ नैतिकता के पाठ्यक्रमों को लागू करने में पूर्ण विफलता, विचित्र किस्‍म की अराजकता, बढ़े-बुजुर्गों के प्रति सौतेला व्‍यवहार, सामाजिक संस्‍कारों का ह्रास, आदि विषयों पर न तो कोई सुदृढ़ नीति बनाई जा रही है और ना ही इस ओर किसी राजनीतिक पार्टी का ध्‍यान जाता है। विकास करने और आगे बढ़ने के नाम पर एक प्रकार की औपचारिकता का चोला सम्‍पूर्ण समाज ने ओढ़ रखा है, जिसके अन्‍दर झांकने पर न तो विकास दिखाई देता है और ना ही विकास के लिए सुनियोजित, समुचित कार्यनीतियां।
इसके अलावा सामरिक दृष्टि से भी हमारी समस्‍याओं को हमारे कर्ताधर्ताओं ने बयानबाजी करने में ही उलझा कर रख दिया है। विश्‍वासघात करनेवाले देश के दुश्‍मनों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करने की सूरत न "मुंह की खाने" के दौरान बनी और ना ही "पीठ पर छुरा घुंप जाने" पर।
ऐसे में भारतीय गणतान्त्रिक विशिष्‍टता और सम्‍पूर्णता का राजपथ पर होनेवाला प्रतिवर्ष का प्रदर्शन इस बार भी मात्र अपनी दैनिक उपस्थिति दर्ज कराएगा या राष्‍ट्रीय चेतना के रुप में लोगों के मन में सदैव बसने की दिशा में आगे बढ़ेगा, ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं, जिनके हल हुए बिना एक राष्‍ट्र के रुप में हमारे विकसित होने और आगे बढ़ने का सपना हमेशा सन्‍देहास्‍पद ही रहेगा।

15 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24 .01.2014) को "बचपन" (चर्चा मंच-1502) पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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  2. यदि इस पूरे आलेख को "क्या खोया क्या पाया" के तहत देखा जाये तो हमने शायद विज्ञान का दास बनकर अपनी जड़ों को खो दिया है। और जब तक किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति की जड़ ही मजबूत नहीं होंगी तब तक विज्ञान के आधार पर बने देश की प्रगति का वृक्ष भला कब तक हरा भरा रह पाएगा।

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  3. गणतन्त्र के इन चौंसठ वर्षों में विकास तो हुआ है लेकिन जो गंभीर ह्रास हआ है वह है हमारे आत्मगौरव का , देश-भक्ति और दायित्त्वबोध का । यह भी कि जो कुछ भी निन्दनीय है उसका प्रचार न कि आलोचना । बुराई का केवल प्रचार सिर्फ बुराई फैलाता है । यही होरहा है । युवा पीढी देश के बारे में सोचने की बजाय विदेश की चकाचौंध से खिंची जारही है । शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री पाना रह गया है । उसमें भी नैतिक मूल्य गायब हैं । जन मन निराशा व अविश्वास से भर गया है । हमारे नेता मंत्री व अधिकारी इसके बहुत बडे जिम्मेदार हैं । खैर
    गणतन्त्रदिवस की आपको बधाई । इन बातों से भी ऊपर हैं हम सबके लिये चन्द्रसेन विराट जी की ये पंक्तियाँ--
    वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश
    पूजन अर्चन आराधन अभिनंदन मेरे देश
    तुझसे पाई माँ की ममता
    और पिता का प्यार
    तेरे अन्न हवा पानी से
    देह हुई तैयार
    तेरी मिट्टी-मिट्टी कब है चंदन मेरे देश
    वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश.....।

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  4. गणतन्त्र के इन चौंसठ वर्षों में विकास तो हुआ है लेकिन जो गंभीर ह्रास हआ है वह है हमारे आत्मगौरव का , देश-भक्ति और दायित्त्वबोध का । यह भी कि जो कुछ भी निन्दनीय है उसका प्रचार न कि आलोचना । बुराई का केवल प्रचार सिर्फ बुराई फैलाता है । यही होरहा है । युवा पीढी देश के बारे में सोचने की बजाय विदेश की चकाचौंध से खिंची जारही है । शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री पाना रह गया है । उसमें भी नैतिक मूल्य गायब हैं । जन मन निराशा व अविश्वास से भर गया है । हमारे नेता मंत्री व अधिकारी इसके बहुत बडे जिम्मेदार हैं । खैर
    गणतन्त्रदिवस की आपको बधाई । इन बातों से भी ऊपर हैं हम सबके लिये चन्द्रसेन विराट जी की ये पंक्तियाँ--
    वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश
    पूजन अर्चन आराधन अभिनंदन मेरे देश
    तुझसे पाई माँ की ममता
    और पिता का प्यार
    तेरे अन्न हवा पानी से
    देह हुई तैयार
    तेरी मिट्टी-मिट्टी कब है चंदन मेरे देश
    वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश.....।

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  5. विकास हुआ लेकिन एक सीमित वर्ग का, आम जन अब भी तंत्र के जाल में फंसा हुआ है..आशा यही है कि आने वाला समय आम जन को भी विकास में हिस्सेदार महसूस होने का मौका दे..गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

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  6. बहुत बढ़िया आलेख....!! आजादी तो मिली लेकिन आजादी की किरणें जो निकली उसे बड़े बड़े अट्टालिकाओं ने रोक लिया... समुचित विकाश नहीं हो पाया..... गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई ..!!

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  7. यह सच है कि आजादी के बाद भारत में विकास हुआ परन्तु यह विकास का लाभ किसको मिला ? ८०% लाभ केवल 20 % खास लोग ले गए और ८०% लोगो को २0% का झुनझुना पकड़ा दिया गया !
    आज़ादी इन्ही 20% लोगों का है !गणतंत्र दिवस का आनंद भी यही उठाते हैं ,बाकी तो नज़र भर उनके शान शौकत को देख लेते हैं !
    नई पोस्ट मेरी प्रियतमा आ !
    नई पोस्ट मौसम (शीत काल )

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  8. बहुत बढ़िया आलेख

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  9. अत्यंत संवेदनशील अवलोकन जनित विमर्श....

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  10. उम्दा लेख |सारगर्भित |
    आशा

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  11. अमीरी-गरीबी की खाई में वृद्धि होती जा रही है ..यह एक बड़ा सत्य है.
    यह भी एक कटु सच है कि भारतियों में भारतीयता की कमी हुई है.ये 'दिवस मनाना भी अब महज एक छुट्टी के रूप में अधिक देखा जाने लगा है.
    ------
    गणतन्त्र दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ.

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  12. जब शुरुआती दिनों में ही 'हाईकमान' जैसे शब्द आ गए तो सच में असल गणतंत्र आज तक अपने देश में एक अर्थहीन शब्द सा बन का रह गया है. वही परंपरा है कि आजतक ज्यादातर नेताओं ने जनतंत्र को सही अर्थ में परिभाषित नहीं होने दिया है.उन शुरूआती दिनों में ही जो अनुचित निर्णय या काम हुए उसकी जिम्मेदारी आजतक तय नहीं हो सकी हैं.कुछ नए नए नियम लाने होंगे ताकि पूरा तंत्र पारदर्शी हो सके और सबके उनके काम के लिए जिम्मेदार ठराया जा सके. सुन्दर समीक्षा.

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  13. ६५ साल से मरे हुए ज़मीर को जगाना इतना आसान भी नहीं, फिर भी हर साल की तरह इस साल भी कोशिश तो होगी ही :(

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  14. सार्थक चिंतन किया है इस पोस्ट के द्वारा .... पर आज इन राष्ट्रीय पर्वों का मतलब एक और छुट्टी से ज्यादा नहीं रह गया ... हां कभी कभी जिसमें देश भक्ति के गानों पे थिरकते लोग भी मिल जाएंगे ... विकास कागजों में हुआ ... कुछ तबके का हुआ ... बस इससे ज्यादा कुछ नहीं ...

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