Wednesday, January 1, 2014

वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली – पुण्‍य स्‍मरण


लियांवाला बाग में अंग्रेज सैन्‍य अधिकारी ने जब स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन के लिए एकत्रित हजारों लोगों को मारने का आदेश गोरखा रेजिमेन्‍ट के सिपाहियों को दिया होगा तो वे अपनी उंगली को बन्‍दूक के घोड़े पर ये सोच कर बार-बार मोड़ रहे होंगे कि वे ब्रिटिश शासन की फौज की ओर से निर्धारित सिपाही के कर्तव्‍य का निर्वाह कर रहे हैं। बालक भगत सिंह ने अपनी जागती आंखों से यह खूनी चलचित्र देखा था। यहीं से देश के लिए कुछ करने का भाव उनके अवचेतन में तब तक बैठा रहा जब तक उन्‍होंने पूरे भारत की हवाओं में क्रान्तिकारी रंग नहीं घोल दिए। इसलिए जलियांवाला बाग हत्‍याकाण्‍ड आज तक भारतवासियों की स्‍मृतियों में पछतावा और प्रेरणा दोनों रूप में विद्यमान है।
लेकिन सन् 1930 में पेशावर में असहयोग अहिंसा शास्‍त्र में शामिल लोगों पर अपने अफसर के आदेश पर गोली चलाने से मना करनेवाले गढ़वाल रायफल्‍स के हवलदार वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली भारतीय जनमानस की स्‍मृति-पटल पर अंकित होने के लिए हमेशा संघर्ष करते रहे। देखा जाए तो यह घटना जलियांवाला बाग की घटना की तुलना में ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण थी। क्‍यों‍कि यहां पर निर्दोष आन्‍दोलनकारियों की जिन्‍दगियां चन्‍द्र सिंह गढ़वाली और उनकी बटालियन की वजह से बच गईं। जब पेशावर छावनी में तैनात सेकंड रायल गढ़वाल रायफल्‍स के हवलदार वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली को ये खबर हुई कि अंग्रेज उन्‍हें और उनकी बटालियन के सिपाहियों को अपने ही लोगों को मारने के लिए खड़े करनेवाले हैं तो उन्‍होंने अपने फौजी जोश और विवेक का इस्‍तेमाल राष्‍ट्रभक्ति की नई सोच को व्‍यावहारिक बनाने के लिए किया।
 वे पेशावर छावनी से शहर आते-जाते जनता के हाव-भाव पढ़ते। असहयोग आन्‍दोलन के कारण शहर में जो हलचल हो रही थी उसकी छोटी-सी-छोटी जानकारी वे अपनी बटालियन के सिपाहियों को देते। शहर में असहयोग आन्‍दोलन के लिए एकत्रित होनेवाले स्‍थानीय पठान जनसमूह पर ब्रिटिश फौज की हिंसात्‍मक कार्रवाई की योजना से चन्‍द्र सिंह अवगत हुए। उन्‍होंने अहिंसात्‍मक रूप से असहयोग आन्‍दोलन करनेवाले निहत्‍थे लोगों पर गोली चलाने की कार्रवाई में शामिल होने से मना करने के 60 सिपाहियों व छोटे अफसरों के इस्‍तीफे बड़े साहब के पास भिजवाए दिए। बड़े अफसर सकते में आ गए। अदना सा हवलदार उनके आदेश को चुनौती दे रहा है। मामला विचाराधीन हुआ। लेकिन 22 अप्रैल सन् 1930 को सेकंड बटालियन को फालिन किया गया। उनको पेशावर शहर में जाने का हुक्‍म हुआ। सिपाही सशस्‍त्र खड़े रहे। अपनी जगह से हिले तक नहीं। गढ़वाली अफसर बंगले झांकने पर विवश हो गए। बड़े अंग्रेज अफसरों को वस्‍तुस्थिति पता चली तो बवाल हो गया। ब्रिगेडियर पहुंचे। सेकण्‍ड रायल गढ़वाल रायफल्‍स की दो प्‍लाटूनों के साठ सिपाहियों को लारियों में बैठाकर शहर के लिए रवाना होने का आदेश हुआ। हवलदार चन्‍द्र सिंह ने 17 सिपाहियों के इस्‍तीफे का कागज पेश कर दिया। बाकी सैनिकों के दस्‍तखत वाला कागज पेश नहीं होने पाया। ब्रिगेडियर समझ गया कि गढ़वाली सिपाही अब हमारे लिए नहीं लड़ेंगे। उनको हथियार छोड़ने को कहा गया। उन्‍होंने पहले इनकार किया। फिर विवश होकर क्‍वार्टर गार्ड में हथियार रख दिए। कुछ सिपाहियों ने तो ब्रिगेडियर की ओर संगीन भी कर दी थी, लेकिन गोली नहीं छोड़ी। परिणामस्‍वरूप 60 गढ़वालियों पर म्‍यूटिनी (विद्रोह, बगावत) का अभियोग लगाया गया। पूरी सेकंड बटालियन काकुल (एबटाबाद) में नजरबन्‍द कर दी गई।
पेशावर-कांड का नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजों की समझ बदल गई। वे गहराई से अनुभव करने लगे कि भारतीय सेना में विद्रोह का विचार गढ़वाली सिपाहियों के आह्वान  पर ही पनपा है। आजाद हिन्‍द फौज का बीजारोपण एक प्रकार से इसी घटना की परिणति थी। सन् 1930 में पेशावर में बोया गया यह बीज सन् 1942 में सिंगापुर में अंकुरित हुआ। जब 3000 गढ़वाली सिपाही और अच्‍छेअच्‍छे गढ़वाली अफसरों ने देशभक्‍त सुभाषचन्‍द्र बोस के नेतृत्‍व में आजाद हिन्‍द फौज में भर्ती होने का नि‍श्‍चय किया। बीस हजार भारतीय सिपाही जापानियों के कैदी बने। इनमें से तीन सौ गढ़वाली सिपाही थे। इन्‍होंने हिन्‍दुस्‍तान को आजाद करने का बीड़ा उठाया था। महापण्डित राहुल सांकृत्‍यायन ने वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली नामक अपने उपन्‍यास में बड़े दुख से लिखा है कि गढ़वालियों का दुर्भाग्‍य ही है कि पेशावर-काण्‍ड के सूत्रधार चन्‍द्र सिंह गढ़वाली की अनदेखी गढ़वाली लोगों ने ही नहीं आजाद भारत के नेताओं ने भी की।  
‘‘हम नहीं आएंगे, चाहे तोप से हमें उड़ा दो’’, ‘‘हम बूढ़ों-बच्‍चों को मारने के लिए तैयार नहीं इन वाक्‍यों की गूंज ने पेशावर में एक बड़े जनसंहार को रोक दिया था। इतिहास की यह घटना कितनी प्रेरणादायी है। युवाओं और नौजवानों को ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम से सीख लेनी चाहिए। आज जब हमारे सामने राष्‍ट्रसेवा के वर्षों पुराने उद्धरणों का वर्णन होता है तो एक क्षण के लिए लगने लगता है कि हमें अपने गौरवशाली इतिहास की जितनी जानकारी होनी चाहिए उतनी है नहीं। वर्तमान का सामूहिक जीवन पूर्वजों द्वारा स्‍थापित व्‍यावहारिक व सांकेतिक श्रेष्‍ठ जीवन मानकों के कारण संचालित है। इस युग की पीढ़ी को इसका आभारी तो होना ही चाहिए।
वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली का जन्‍म सन् 1869 के पौष (जनवरी) माह में एक साधारण परिवार में हुआ था। उन्‍होंने अपने बारे में लिखा है कि उनके पूर्वजों का निवास संभल, मुरादाबाद था। वे चौहान थे। पूर्वज गढ़वाल की चांदपुरी गढ़ में आकर बस गए। हमारा परिवार चौदह पुश्‍तों से गढ़वाल में रह रहा है, लेकिन मुझे अपने से पहले छह पुश्‍तों का ही ज्ञान है। उनके पिता का नाम जाथली सिंह था। उनके दो भाई और एक बहन थी।
पेशावर काण्‍ड की वजह से उस वक्‍त उन्‍हें पूरे देश में मान-सम्‍मान प्राप्‍त हुआ। उस समय के कई बड़े नेताओं ने उन्‍हें यथासम्‍भव सहायता भी देनी चाहिए, लेकिन स्‍वतन्‍त्रता के बाद तो जैसे उन्‍हें उनके अभूतपूर्व योगदान की सजा मिली। उनको एकदम से विस्‍मृत कर दिया गया। मुकदमा फारिग होने के बाद उन्‍हें अपने गुजारा लायक पेंशन तक के लिए विकट संघर्ष करना पड़ा। बाद के दिनों में वे मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की तरफ से चुनाव भी लड़े। लोगों के लिए हमेशा कुछ करने की इच्‍छा रखनेवाले चन्‍द्र सिंह गढ़वाली अपने ही गढ़वाल में इतने उपेक्षित हो गए कि जीवन के आखिरी वर्ष उन्‍होंने गुमनामी में गुजारे। पारिवारिक दायित्‍वों का निर्वाह करते हुए उन्‍हें चूल्‍हा-चौका तक की छोटी-छोटी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इतिहास के ऐसे वीर पुरुष के प्रति उसके अपने समाज के मूलनिवासी व देशवाले ही जब घोर उदासीन बन जाएंगे तो देश का अपनी भावी पीढ़ियों से अच्‍छे संस्‍कार की उम्‍मीद करना अपने आप ही बेमानी हो जाएगा। एक समय था जब अंग्रेज सरकार को हिला कर रख देनेवाले इस वीर के साथ जेल में अपनी ड्यूटी देने के लिए अंग्रेज सिपाही अपने से बड़े अफसरों के पास सिफारिशें लिख कर भेजते थे। वे चन्‍द्र सिंह के साथ पहरेदारी करने में गर्व महसूस करते। पेशावर के पठान-समुदाय को जब पता चला कि उनके प्राणों की रक्षा के लिए चन्‍द्र सिंह ने अंग्रेजों का उन पर गोली चलाने का हुक्‍म ठुकरा दिया तो उनकी दृष्टि में चन्‍द्र सिंह भगवान बन ग। वे जेल में उनके लिए तरह-तरह के पकवान ले जाया करते। एक तरह से वे उनके लिए पूजनीय बन गए थे।
ऐसे महान पुरुष के लिए कोई भी श्रद्धांजलि हमेशा कम ही रहेगी। उनका जन्‍म माह पौष ही उनके स्‍मरण का एकमात्र कारक नहीं बन सकता। उन्‍हें स्‍मृति में बसाना और उनके जीवन से प्रेरणा लेना युवाओं के लिए हमेशा अनिवार्य होना चाहिए। 

15 comments:

  1. सादर नमन--

    हो जग का कल्याण, पूर्ण हो जन-गण आसा |
    हों हर्षित तन-प्राण, वर्ष हो अच्छा-खासा ||

    नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें --

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  2. शतश : नमन ऐसे वीरों को।

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  3. जालियोंवाले बाग कांड के विषय में तो जानकारी थी मगर आज आपकी इस ब्लॉग पोस्ट से एक जानकारी प्राप्त हुई आभार...ऐसा कुछ पढ़ती हूँ तो हमेशा यही लगता है कि स्वतन्त्रता की लड़ाई में ऐसे ना जाने कितने वीरों का योगदान रहा है जिनके विषय में हमें आज तक कोई जानकारी ही नहीं है। हम याद रखते हैं केवल उन्हें जिनका नाम मशहूर हुआ है। सच ही कहा आपने आज ऐसे महान वीरों को केवल याद करने से कुछ नहीं होगा जरूरत हैं न सिर्फ इनके जीवन से प्रेरणा लेने की बल्कि इनके इतिहास को इनकी जीवनी को पाठयक्रम में शामिल करने की भी, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास को और भी करीब से जानसके और उस पर गर्व कर सके। वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली को मेरा सादर नमन...

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  4. नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनायें !

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  5. वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली जी के बारे में पहली बार पढ़ा.
    गुमनामी में उन्होंने अपना अंतिम समय गुज़ारा जानकार दुःख हुआ .
    हम भारतीयों को अपने इतिहास के बारे में अधूरा ज्ञान है.
    वीर चन्द्र सिंह जैसे महान वीरों को भुला देना देश के लिए दुर्भायपूर्ण है.
    मेरी तरफ से उन्हें नमन और श्रद्धांजलि.आप का भी धन्यवाद कि उनके बारे में हमें बताया.

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  6. पहली बार इनके बारे में जानकारी हुई... उन्हें बहुत बहुत नमन और श्रद्धांजलि..!!! आपको नए साल के लिए बहुत बहुतबधाई और शुभकामनाएँ....

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  7. नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें मित्र :)

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  8. पहली बार पढ़ा वीर चन्द्र गढवाली जी के बारे में और माथा गर्व से ऊंचा हो गया ... ये आज़ादी असे ही नहीं मिली है और आज का भारत ऐसे वीरों को भुलाए बैठा है ... दुर्भाग्य है देश का की उसे ऐसे कर्धार मिले हैं आज़ादी के बाद से जो बस स्वार्थ को ही प्रेरित करते रहे हैं ...
    वन वर्ष मंगल मय हो ...

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  9. आस्मां के सितारों की चमक कभी भी कम नहीं होती है ये अलग बात है कि हमारी आँखों ने अपनी ही रौशनी खो दिया है..

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  10. history student rahi hun isliye aadhunik bharat ke itihas ki is ghatna ke baare mein jaankaari toh thi par maan na hoga ki is gumnam shaheed ke baare mein aaj hi itni jaankaari mili. bahut badiya lekh iske liye aapko dhanywaad.

    hamaare desh mein fashion hai bhoolne ka, iska koi ilaaj abhi tak nahi mila hai.

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  11. आपकी निरंतर उत्प्रेरक टिप्प्णियों के लिए आभार आपका दिल से।

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  12. बहुत सुंदर----
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    नववर्ष की हार्दिक अनंत शुभकामनाऐं----

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  13. हृदय से आपका आभार। ऐसा उत्प्रेरण लेखन की आंच बना रहता है।

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  14. चन्द्र सिंह के बारे में शायद कभी पहले पढ़ा था लेकिन वह विस्मृत हो चला था. उनके बारे में जानकारी के लिए धन्यवाद.

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