Tuesday, May 28, 2013

जनहित विधेयकों का सृजन करे सरकार




हाल ही में केन्‍द्र सरकार द्वारा किराए की एक निश्चित राशि से अधिक पर किराया समझौता (रेंट एग्रीमेंट) का पंजीकरण अनि‍वार्य करने की तैयारी का समाचार पढ़ा। प्रस्‍तावित पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2013 के अनुसार एक वर्ष से कम अवधि के लिए होनेवाले किराया समझौते का भी पंजीकरण कराना होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय के प्रस्‍तावित पंजीकरण अधिनियम के अनुसार एक निश्चित किराया के बाद किराया समझौते का पंजीकरण अवश्‍य करना होगा। किराया प्रति माह तय किया जाएगा। पंजीकरण (संशोधन) विधेयक में अनिवार्य पंजीकरण के लिए न्‍यूनतम किराया निर्धारित करने का उत्‍तरदायित्‍व राज्‍यों पर छोड़ दिया गया है। अर्थात् अलग-अलग शहरों में यह न्‍यूनतम किराया राशि विभिन्‍न हो सकती है।
     सेवा कर के लिए भी केन्‍द्र सरकार के नए प्रावधान के अन्‍तर्गत यदि कोई व्‍यक्ति निर्धारित सेवा कर का समय-सीमा में भुगतान नहीं करता है तो उसे दस वर्ष तक का कारावास हो सकता है। परिश्रमी मध्‍यम उद्योगों, वेतनभोगियों, घरेलू इकाइयों के लिए इस सरकार ने बहुत ही कठिन स्थितियां उत्‍पन्‍न कर दी हैं।
सर्वप्रथम किराया पंजीकरण की बात करते हैं। इसमें कोई राज्‍य सरकार अनिवार्य पंजीकरण के लिए यदि न्‍यूनतम किराया दस हजार रुपए प्रति माह निर्धारित करती है तो किराएदार को 2400 रुपए स्‍टांप ड्यूटी व 1100 रुपए न्‍यायालय शुल्‍क का देना होगा। अर्थात् स्‍टांप ड्यूटी के रुप में वार्षिक किराए का दो प्रतिशत देना होगा। इस तरह के विधेयक की अनुशंसा करने से पूर्व सरकार को यह विचार भी करना चाहिए कि निजी क्षेत्र के वेतनभोगियों को कंपनियों की ओर से मिलनेवाला एचआरए भत्‍ता उनके द्वारा वास्‍तविक रुप से दिए जानेवाले किराए का एक चौथाई भी नहीं होता। क्‍या इस बात को किराया समझौता पंजीकरण विधेयक की रुपरेखा बनाते समय ध्‍यान में नहीं रखा जाना चाहिए था? क्‍या कंपनी कार्य मंत्रालय के साथ मिल कर कंपनी अधिनियम के प्रावधानों को कर्मचारियों के पक्ष में लचीला नहीं किया जाना चाहिए था? क्‍या राज्‍यों द्वारा पंजीकरण के लिए निर्धारित किए जानेवाले न्‍यूनतम किराया के अनुसार कंपनियों द्वारा कर्मचारियों को दिया जानेवाला एचआरए भत्‍ता उसी अनुपात में नहीं बढ़ाया जाना चाहिए? क्‍या अब सारे कायदे कानूनों का सृजन चंद बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों, उनके खुशहाल कर्मचारियों की स्थितियों को ध्‍यान में रख कर किया जाना चाहिए? या इन्‍हें बनाते समय उन अधिकांश भारतीय कंपनियों पर भी विचार करना होगा, जो या तो कर, पूंजी इत्‍यादि क्षेत्रों में पूर्ण सरकारी अनदेखी झेल रही हैं अथवा अपने प्रति राजकीय उदासीनता के कारण कर्मचारियों के वेतन और निरन्‍तर बढ़ती महंगाई में साम्‍य स्‍थापित करने में भी स्‍वयं को असमर्थ पाती हैं।
अब बात आती है सेवा कर समय-सीमा के अन्‍दर जमा नहीं करने पर दोषियों को दस वर्षों के कारावास के विधेयक की। छोटे व्‍यापारियों, मझौले उद्यमियों की व्‍यावसायिक जरुरतों के अनुरुप सरकार आज तक उन्‍हें कोई कारगर सुविधा तो उपलब्‍ध नहीं करा पाई है। हां परन्‍तु इतना जरुर है कि वे जैसे-तैसे जो कुछ भी कमाते हैं, उस पर भी सरकार की लोलुप दृष्टि बराबर लगी हुई है। शायद यही कारण है कि सेवा कर के नाम पर छोटे व्‍यापारियों, मध्‍यम उद्योगों के स्‍वामियों से सेवा कर की तत्‍काल वसूली के लिए सरकार ने अपने मन मुताबिक निर्धारित समय में कर जमा नहीं करने के लिए फटाफट सजा का विधेयक पारित करवा दिया।

     आवश्‍यक वस्‍तुओं के मूल्‍य में प्रत्‍येक तिमाही में होनेवाली वृद्धि, आम जनता से और निजी वेतनभोगी कर्मचारियों से निरन्‍तर किसी न किसी रुप में कोई न कोई प्रभार वसूलने के लिए बननेवाले विधेयकों का संसद में बिना किसी उलझन के पारित होना, विपक्षी राजनीतिक पार्टियों का इस पर चुप्‍पी साधे रहना, ऐसी बातें हैं जिन पर जनता को नए कोण से विचार करना होगा। इसके विपरीत जनता ने जिन विधेयकों को पारित करवाने के लिए संसद पर दबाव बनाया, जिनके लिए आंदोलन-धरने-प्रदर्शन किए, उनके पारित होने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं हैं। देखा जाए तो जरुरत ऐसे विधेयकों को पारित करने की थी, जो आम जनता के जीवन की मूल आवश्‍यकताओं से जुड़े हुए हैं। जैसे केन्‍द्र सरकार के नेतृत्‍व में प्रत्‍येक राज्‍य में खाद्य, स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, जल, जीवन-सुरक्षा प्राधिकरणों का गठन किया जाना चाहिए, ताकि ये सम्‍बन्धित राज्‍य की व्‍यवस्‍था को प्रत्‍यक्ष रुप से अपनी निगरानी में संभाल सकें और उसके समुचित क्रियान्‍वयन के लिए बिना किसी शासकीय लम्‍बी प्रक्रियाओं के तत्‍काल निर्णय ले सकें।

Saturday, May 25, 2013

आज की जरुरत बुद्धमार्ग का अनुसरण


र्तमान कालगति को बुद्धवाद की सबसे अधिक आवश्‍यकता है। पूंजी कुचक्र के लिए विश्‍वग्राम में परिवर्तित दुनिया जिस गति से जीवन की स्‍वाभाविकता खो रही है, उससे भविष्‍य अन्‍धकारमय दिख रहा है। मुद्रा पोषित संसार वास्‍तविक श्रम की भी अनदेखी कर रहा है। तन-मन-धन से कार्य के प्रति समर्पित व्‍यक्ति आज संघर्षों तले पिस रहा है। संवेदनशील विचारों को सच्‍चे मन से कोई भी प्रोत्‍साहित नहीं कर रहा है। संवेदनशीलता भी एक प्रकार के बनावटी पूर्वाग्रह से लिपटी हुई है। स्थिति ये है कि अच्‍छाई के लिए स्‍पन्दित मनुष्‍य को अपनी जीवन डोर पकड़े रखने के लिए कुण्ठित हो बुरे आचार, व्‍यवहार का संगी होना पड़ रहा है। मन से सच्‍चा, सज्‍जन आदमी जब विवश हो बुरी दिशाओं में अग्रसर होगा तो निश्चित ही विनाशकारी कुण्‍ठा पनपेगी। ऐसे में बुद्धवाद ही वह रास्‍ता नजर आता है, जिस पर चल कर मनुष्‍यगति को समुचित बनाया जा सकता है।
बुद्धत्‍व को जानने के लिए इसके अस्तित्‍व कालखण्‍ड से लेकर अब तक के समय की तुलना करें तो ज्‍यादा प्रभावी निष्‍कर्ष निकल कर आएंगे। महात्‍मा बुद्ध एक राजा के पुत्र होकर, सभी जीवन सुविधाओं और राग-रंगों से परिपूर्ण होते हुए भी जीवन के भ्रम को पहचान गए। उन्‍हें अधिशासी अनुभव नहीं भाया। वे अधिकार निर्माता, आदेश देनेवाले राजा की तुच्‍छ स्थिति को निष्‍प्रभावी करते हुए नए जीवन संकेत फैला गए। आज के सन्‍दर्भ में देखें तो अधिकार प्राप्‍त मन्‍त्रीगण, अफसर या कर्मचारी खुद को, जीवन को उस दृष्टि से देखने की अंशमात्र कोशिश भी नहीं करते, जो बुद्ध ने आत्‍मसात की। आज अगर चारों ओर मानवता को मुंह चिढ़ाती परिस्थितियां हाहाकार मचाए हुए हैं तो कितने लोग उनसे या उनको पैदा करनेवालों से उस प्रकार निपट रहे हैं, जिस प्रकार बुद्ध ने अंगुलिमाल जैसे निर्मम हत्‍यारे से सम्‍वाद कर उसे वापस मानवधारा में शामिल करने का महान कार्य किया। यह साधारण बात नहीं है। एक हत्‍यारा जो कई लोगों को मारकर उनकी अंगुलियों की माला पहनने की विकृति से पीड़ित था, उसकी विकृति को एक नवदिशा प्रदानकर बुद्ध ने संसार को सर्वोत्‍कृष्‍ट संदेश दिया। उन्‍होंने उन पूर्वाभासों का दमन किया, जो एक मूढ़ के साथ सही सम्‍वाद स्‍थापित करने में आड़े आ रहे थे। उनकी रचनात्‍मक विचार जागृति, नव आत्‍मोत्‍पत्ति ने अंगुलिमाल को सर्वप्रथम उसके नजरिए से देखा। इस तरह वे थोड़े समय के लिए उसके आचार-व्‍यवहार में उसके साथ हो लिए। इसी से अंगुलिमाल को बुद्ध की हत्‍या करने से पूर्व उन्‍हें रुककर देखना, सुनना और समझना पड़ा। असंख्‍य लोगों को मौत दे चुका व्‍यक्ति अपने नए आखेट के लिए उसकी बात क्‍यूं सुनता, लेकिन उसे जब यह लगा कि सम्‍मुख खड़ा महात्‍मा मृत्‍यु से भयभीत होने के बजाय उसकी ओर देख मुस्‍कुरा रहा है, उसकी भावी क्रिया को एक प्रकार से उचित ठहरा रहा है तो उसे हिंसा से विलग हो स्थिर होना पड़ा। यहीं इसी बिन्‍दु पर वह अपनी हिंसात्‍मक प्रतिक्रिया के बजाय सम्‍मुख खड़े बुद्ध को देखने लगा। बुद्ध को इतना ही समय चाहिए था उसके परिवर्तन के लिए।
हम सबको अपने आसपास फैले विषैले माहौल और उनके पालकों के प्रति यही भाव जगाना होगा। विकृत मानसिकता, अपराधियों की अनदेखी करने से वे अपने पाप कर्मों के लिए दुगुने दुस्‍साहस के साथ आगे बढ़ेंगे, जबकि हमें चाहिए कि हम उन्‍हें भी उसी सम्‍यक मानव दृष्टि से टटोलें जो हम अपनों के लिए रखते हैं। अपराधियों के प्रति उपजी सज्‍जन मनुष्‍यों की इस अप्रत्‍यक्ष सद्भावना को निश्चित रुप से सकारात्‍मक प्रतिक्रिया मिलेगी। और जब ऐसा होगा तो नवजागरण के तन्‍तु अपराध-दुष्‍प्रेरणा को जड़मूल नष्‍ट कर देंगे। मनुष्‍यों के अच्‍छे-बुरे सिद्धांतों की निरन्‍तर लड़ाई से जीवन-शांति के हल नहीं निकल सकते। अच्‍छे पक्ष को उदारता अपनानी होगी। इतना सर्वग्राही बनना होगा कि वह बुराई से सीधे ईर्ष्‍या करने के बजाय उसके घटना-तत्‍वों की गहरी पड़ताल करे। बुराई के घटना-तत्‍वों की जड़ों में मट्ठा डाले और बुरे कार्य करनेवालों को अपने में मिला ले। ऐसा घटित होगा तो निश्चित रुप से नकारात्‍मक वातावरण में उल्‍लेखनीय कमी दिखेगी।
महात्‍मा बुद्ध का जीवन, दर्शन आज की प्रचण्‍ड बुराइयों के सामने मजबूती से खड़े होने का समर्थन करता है। बुद्धवाद विध्‍वंस, वैमनस्‍य, विद्रूप के मूल घटकों से थोड़े समय तक इसलिए तारतम्‍य स्‍थापित करने का आहवान करता है, ताकि उनको चिन्हितकर उनके निराकरण का मार्ग प्रशस्‍त हो सके। यदि अवरुद्ध को इस उक्ति से मुक्‍त किया जाए तो क्‍या बुरा है! जीवन के प्रति जो दृष्टि सर्व प्रकार से सम्‍पन्‍न महात्‍मा बुद्ध ने अपनाई, उसे आज की मानवता-विरोधी स्थितियों में स्‍वीकार करने और उस पर कुछ दूर तक चलने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। ना सही बुद्ध की तरह घरबार छोड़ने तक का निर्णय हो, पर गृहस्‍थ बने रहकर कम से कम वह आध्‍यात्मिक विचार तो अपनाया जाए, जिससे अन्‍धेरे में प्रकाश की आशा हो। हम कब तक अव्‍यावहारिक मानवीय पहलुओं और कल्‍याण तक सिमटे रहेंगे। परोपकार, सहयोग और बन्‍धुत्‍व के आधार पर निर्मित हो सकनेवाला जीवन सदैव दिवास्‍वप्‍न ही क्‍यों बना रहे! यह जितनी जल्‍दी साकार हो उतना बढ़िया है।
विकेश कुमार बडोला

Sunday, May 19, 2013

जरुरत असली फिक्‍सचर्स की पहचान की


क्‍या राजकीय अवैध मुद्रा लेनदेन से ध्‍यान हटाने के लिए ही क्रिकेट की फिक्सिंग पर आकर जनसंचार माध्‍यम की दृष्टि टिक गई है? क्‍या अब खेल देश की चिंता और देश की वास्‍तविक चिंताएं खेल बन चुकी हैं, जो जनसरोकार विषयक समस्‍याओं से जनतन्‍त्र का ध्‍यान भटक कर खेल की नैतिकता और अवैधता पर आ कर सिमट गया है? यदि तीन खिलाड़ियों ने अवैध मुद्रा व्‍यापार-प्रसार करनेवालों के साथ मिल कर आईपीएल श्रृंखला के अपने किसी खेल में बड़ी मुद्रा प्राप्ति के लिए अपने व्‍यक्तिगत प्रदर्शन गिराए तो इसे क्रिकेट कलंक, खेल में अनैतिकता, अपराध कह कर इतना हल्‍ला क्‍यों मचाया जा रहा है। खिलाड़ियों को लालची, उद्दण्‍ड, भ्रष्‍ट कहनेवाले सबसे पहले उस लीग की वैधता पर प्रश्‍न क्‍यों नहीं खड़े करते, जिसमें ये खिलाड़ी खेल रहे हैं। इससे भी बढ़ कर शिकायतकर्ताओं को लीग के आयोजक, इसके सर्वोच्‍च संचालक भारत सरकार से प्रश्‍न करने चाहिए कि पांच छह वर्ष पूर्व अचानक उसे क्‍या सूझी कि उसने आईपीएल कराने का निर्णय किया। जो देश अपने वास्‍तविक और मूल नागरिकों को दाना-पानी तक की जरुरी जीवन सुविधाएं उपलब्‍ध नहीं करा पा रहा है, वहां यूरोप के समृद्ध देशों की तरह खेल लीगों की स्‍थापना का उद्देश्‍य खेल विकास, समृद्धि तो कम से कम हो ही नहीं सकता।
     पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, नेपाल जैसे देशों की सीमाओं से भारत में अवैध घुसपैठ नई बात नहीं है। पिछले छह दशकों से यह काम निरंतर हो रहा है। घुसपैठिए अकेले नहीं आते। अपने साथ करोड़ों-अरबों नकली भारतीय मुद्रा भी लाते हैं। एक अरब में से लाखों की नकली भारतीय मुद्रा पकड़े जाने के समाचार हम पढ़ते रहते हैं। लेकिन बाकी मुद्रा का निवेश कहां होता है। वो किस के पास जाती है। वर्षों से करोड़ों-अरबों की संख्‍या में ऐसी नकली मुद्रा का प्रचलन भारत में होता रहा है। नकली मुद्रा के मुख्‍य प्रसारकों के सामने यह चुनौती सदैव से रही है कि वे किस तरह इस मुद्रा को असली मुद्रा में निवेश करें। इसके अतिरिक्‍त उनका प्रमुख उद्देश्‍य अवैध भारतीय मुद्रा को आधिकारिक तरीके से भारत में प्रचलित मुद्रा के साथ मिलाने का होता है ताकि वे बदले में बड़ी भारतीय मुद्रा प्राप्‍त कर सकें। दाऊद जैसे लोग इसी काम में संलिप्‍त रहे हैं। इस तरह से उन्‍होंने अपने लिए विशाल अवैध मुद्रा अर्जित की है। भारत, पाकिस्‍तान, अरब देशों के ढीले कानूनों का लाभ ले कर ऐसे लोगों ने इस प्रकार अर्जित की गई मुद्रा का कुछ हिस्‍सा जनकल्‍याणकारी और सामाजिक संगठनों, न्‍यासों के माध्‍यम से वापस इन्‍हीं देशों में लगाया है। फलस्‍वरुप विभिन्‍न राष्‍ट्रों (भारत सहित) के सम्‍मुख ऐसे मुद्रा विनियामकों को उनकी अवैध कारगुजारियों के लिए उन्‍हें दण्‍ड दे कर लोगों के सम्‍मुख लाने के बजाय उनसे एक अत्‍यन्‍त गोपनीय गठजोड़ करने का रास्‍ता भी हमेशा खुला रहा। दुर्भाग्‍य से अनेक देशों की सरकारें ऐसे सुगम रास्‍ते का ही चुनाव करती हैं। इसी का परिणाम है जो आज हमारे सामने आईपीएल जैसी अनुत्‍पादक गतिविधियां हो रही हैं।
     आईपीएल में नकली मुद्रा के कारो‍बारियों की असली मुद्रा का ही निवेश नहीं हुआ है। इसमें राष्‍ट्रीय घोटालों, अवैध मुद्रा लेनदेनों का पैसा भी लगा है। गिनती को हरा देनेवाली संख्‍या तक पहुंच चुके रुपयों के घोटालों का पता चलता है, घोटालेबाजों के नाम सामने आते हैं, दुर्भाग्‍य से यह सभी लोकतन्‍त्र की सर्वोच्‍च संस्‍था से जुड़े होते हैं। पर क्‍या कभी कोई ऐसा समाचार सुनाई दिया कि किए गए घोटाले के रुपए प्राप्‍त हुए हैं? जब गिनती से बाहर जा चुके घोटालों के रुपयों की वसूली नहीं हो पाती तो स्‍वाभाविक है घोटालेबाज इनका निवेश करने के लिए एक ऐसा माध्‍यम ढूंढते हैं, जो आम लोगों को ऊपर से तो आईपीएल सरीखा दिखता है पर अन्‍दर खाने यह अवैध ही होता है।
     ऐसे में श्रीसंत जैसे नौसिखियों, ईयर फोन-मोबाइल-जींस-टी शर्ट के शौकीनों को मैच फिक्सिंग  के लिए दोषी कह देना पानी को गन्‍दा करनेवाली मछलियों के बजाय पानी को दोष देने जैसा ही है।

Saturday, May 18, 2013

मार्गदर्शन के खोखले आधार


यात्रा, समारोह की कार्यव्‍यस्‍तता के चलते दिनचर्या बदल गई। शारीरिक थकान यदि कष्‍ट ना भी देती पर नित नए प्रकार से विदूषित होते सामाजिक और पारिवारिक वातावरण ने मानसिक स्थिति को विक्षिप्‍त कर दिया है। स्‍वयं के अस्थिर व्‍यक्तित्‍व, क्षण में परिवर्तित होते मनोभावों से व्‍यावहारिक जीवन क्रम में बाधा उत्‍पन्‍न हो रही है। मन नहीं-नहीं कहता रह जाता है और मैं वे कार्य कर देता हूँ, जिनके अपराध-बोध से दिनों तक छुटकारा नहीं मिलता।
मुझे पता है कि प्राइवेट स्‍कूल पढ़ाई के नाम पर व्‍याव‍सायिक उपक्रम हैं। ये भी जानता हूँ कि किसी बच्‍चे को आदर्श व्‍यक्ति, सज्‍जन नागरिक बनाना इनके वश में नहीं। बालपन को समुचित प्रकार से ढालने में ये असक्षम हैं। तब भी पत्‍नी की महत्‍वाकांक्षा के अनुकूल साढ़े चार वर्षीय पुत्री के स्‍कूली प्रदर्शन में बढ़ोतरी नहीं होने पर मैं उसे डांट-डपट देता हूँ। यहां तक कि थप्‍पड़ भी मार देता हूँ और आंखों में परिवेश से मिली हुई असभ्‍यता, हिंसा उतार कर उसे उस सीमा तक डरा देता हूँ कि वह मासूम आंखें साधे, पलकों को तीव्रता से झपकाते हुए साक्षात पत्‍थर बने पिता को विचित्र अनुभव से देखती रहती है। पर उस बेचारी को क्‍या पता कि उसे डपटने के बाद पिता के अन्‍दर दया का ऐसा जलजला फूट पड़ा है कि वह उसमें बह ही जाए। ऐसे में उसके अत्‍यन्‍त मृदुलभावी मुख को अधिक समय तक देखने का साहस नहीं हो पाता। मैं ही अपनी दृष्टि इधर-उधर घुमा देता हूँ। और इस दौरान यदि वो क्षमा याचना करती है तो मैं और दूर हो जाता हूँ उसकी दृष्टि से। क्‍योंकि इसके बाद मुझे अपनी कठोरता पर विश्‍वास नहीं रहता। इसके उपरान्‍त मेरे टूट कर रोने की संभावनाएं अधिक होती हैं। हालांकि अभी तक ऐसे रोया तो नहीं हूँ और शायद तब ही मुझे बात-बात पर क्रोध भी आता है। क्‍योंकि खुली हंसी और खुल कर रोना हमेशा दबा ही रहा मेरा।
कई बार पत्‍नी को समझाया कि बच्‍ची पर इस आधुनिक खोखली पढ़ाई-लिखाई का दबाव मत डालो। उसे जो ग्राह्य होगा अपना लेगी। ध्‍यान इतना रखना है कि वह सांस्‍कारिक, सामाजिक और नैतिकता के पाठ से वंचित न रहे। आजकल के विद्यालय ये ज्ञान नहीं दे सकते। इस ज्ञान का संचार तो केवल बच्‍चे के अभिभावक ही कर सकते हैं। इसलिए उसके विसंगतियों में उलझने से पूर्व ही उसे सामाजिक व्‍यावहारिकता का पाठ, जितना शीघ्र हो सके पढ़ा दिया जाना चाहिए। इन सब परिस्थितियों में मेरे मस्तिष्‍क में बोर्डिंग विद्यालयों के चित्र भी उभरने लगते हैं। विचार उत्‍पन्न होता है कि पुत्री को वहां भेज दिया जाए। लेकिन तभी अन्‍य विचार उभरता है कि समाज और राष्‍ट्र के लिए क्‍या किया है इन आधुनिक शिक्षा प्राप्‍त, सत्‍ता प्रतिष्‍ठान में बैठे तथाकथितों ने। बड़े और कान्‍वेंट विद्यालयों से पढ़ लिख कर सर्वोच्‍च लोकतान्त्रिक संस्‍था एवं विभिन्‍न राजकीय संस्‍थाओं में शीर्षस्‍थ पदों पर विराजमान व्‍यक्तियों ने समाज को कौन सी दिशा दी है। आधुनिकता के पैरवी इन स्‍वार्थी तत्‍वों ने स्‍वाभाविक मनुष्‍य जीवन को इतना विकृत कर दिया है कि सज्‍जन व्‍यक्ति जीवन से छुटकारा पाने की मौन स्‍वीकृति दे चुके हैं। क्‍या मैं, मेरी पत्‍नी ऐसे आधुनिक परिवेश में वृद्धि करने के लिए ही अपनी पुत्री को विद्यालयी अध्‍ययन सही से करने के लिए डांटे-डपटें? क्‍या इसी ऊपरी चमक और भीतरी खोखलाहट के लिए हम उसे ए बी सी और क ख ग रटाएं? या उसे वह समझने व विचार करने योग्‍य बनाएं, जिस मिथ्‍या और विश्‍वासघात के आधार पर इस सदी की बुनावट की जा रही है।
प्रतिदिन हो रही आत्‍महत्‍याएं, हत्‍याएं, राह चलते होनेवाली लूट की घटनाएं, छोटी-बड़ी चोरियां, राजकीय स्‍तर पर होनेवाले अवैध मुद्रा लेनेदेन-ये सब क्‍या है। क्‍या ऐसे होने का सबसे बड़ा कारण सत्‍ताधारी और उनकी नीतियां नहीं हैं। जब लोकतन्‍त्र का आहवान करते हुए वे केवल बोलने के लिए एक-एक व्‍यक्ति को राष्‍ट्र का महत्‍वपूर्ण सदस्‍य बताते हैं तो मर रहे, मारे जा रहे, जीते जी मृत्‍यु का अभ्‍यास कर रहे लोग क्‍या उनके ऐसे बताने से ही महत्‍वपूर्ण हो जाएंगे। या उनके लिए कुछ किया भी जाएगा। जब एक व्‍यक्ति दुखी होता है, अकारण मारा जाता है तो ऐसे में सत्‍ताधारियों को यह सोचना चाहिए कि एक सामान्‍य व्‍यक्ति के रुप में उस व्‍यक्ति के स्‍थान पर वे भी हो सकते थे। वे इसलिए सुरक्षित हैं क्‍योंकि वे सुरक्षा चक्र में हैं। एक दिन अपना भेष बदल कर वे आम जनता के बीच घूमें। आम जन बन कर सरकारी सुविधाओं का आकलन करें। उन्‍हें पता चल जाएगा कि सुरक्षा घेरे में बनाई गईं उनकी नीतियां धरातल पर कैसे काम कर रही हैं।
     ऐसे सत्‍ता-प्रतिष्‍ठानों के अधीन रह कर हमारे सामने जीवन जीने, बच्‍चों का भविष्‍य बनाने जैसे जितने काम हैं सब के सब दोहरे सरकारी, सामाजिक मानदण्‍ड से प्रचालित हैं। इन परिस्थितियों में हम बच्‍चों के सम्‍मुख कौन से शासकीय, समाजार्थिक उदाहरण प्रस्‍तुत करें, जिनका गुणगान करते समय हमें लग सके कि ये ठीक हैं और इनके बारे में बच्‍चों को बताया जाना चाहिए। लेकिन वास्‍तव में जब हमारी दृष्टि में अधिकांश मानवीय गतिविधियां चाहे वह सरकारी हों या व्‍यक्तिगत, अनैतिक और अमानवीय बन चुकी हों तो हम अपनी भावी पीढ़ी का सही मार्गदर्शन किस आधार पर करें। उनके लिए समय की अग्रराहें चुनौतियों से भरी हुईं हैं। उन्‍हें कहां-कहां अमानवीय समझौते करने पड़ेंगे, ये सोच कर दुखपूर्ण विस्‍मय होता है।

Sunday, May 12, 2013

दो कविताएं



अपना दर्द मां को बताएंगे



पना दर्द मां को बताएंगे
लोग तो उस पर नमक ही लगाएंगे
मिट्टी से महक रहा होगा
मां का आंचल
वहीं पर नींद में
परियों को निहारेंगे
अपना दर्द……….
माता के खुरदुरे हाथों से
परिश्रम का आभास होगा
उन्‍हीं के स्‍पर्श से
मन में स्‍नेह का आवास होगा
मां की ही सांसों में
उबल रहा होगा परार्थ निर्मल
उन्‍हीं में लीन होने को
नेत्र बिछाएंगे
अपना दर्द……….
                                                                  
                                                                   
स्‍वप्‍न प्रेम


प्रेरणा कहूं उसे शांति की
इस जीवन में
जो स्‍वप्‍न में
मुझ से एकसार हो गई
मेरी जैसी चेतनावाली
मेरा संसार हो गई
वे स्‍वप्‍न-घड़ियां मैं बारम्‍बार
जाग कर भी पुनर्जीवित कर रहा हूँ
वहीं पर अपने जीवन की
हारी हुई सांसों को विजय करा रहा हूँ
स्‍वप्‍न में
मेरे एक हाथ में एक निरपराध बालक
दूसरे हाथ में उसका स्‍वप्निल व्‍यक्तित्‍व है
उन दोनों को बाहों में थामे
हृदय से लगाए हुए
मैं भीड़ को चीरता हुआ
आगे बढ़ रहा हूँ
प्रेम-पथ पर दौड़ रहा हूँ
सभी के साथ मैं जैसा था
उससे अलग उस के साथ हूँ
सभी के साथ वह जैसे थी
उससे विलग वह मेरे साथ है
हम आकर्षित होने को
दो शरीर हैं, विपरीत लिंग हैं
पर प्रेम-चेतना महसूस करने के लिए
हम एक जीव हैं, संजीव हैं, प्राण हैं
अब मैं निडर
हरेक स्‍थान पर उसका साथ
विचित्र ये संयोग
हृदय की उसांसों पर मेरा हाथ
वह बन रही संत सी
मेरे अनुकूल
वह सुन्‍दर उसकी छवि बसंत सी
मैं इस मौसम का ही एक फूल
कष्‍टप्रद जीवन अनुभूति
अब सुदूर
नयनों के रास्‍ते व्‍योम पर मूर्छा
मैं प्रसन्‍नचित मदन चहुं ओर
मैं मद में चूर

Thursday, May 9, 2013

जीवन हो बेलवृक्ष की तरह



रात के अन्‍धेरे में जब तीसरी बार पेट की खराबी ने विचलित किया तो शरीर की शक्ति चींटी के बराबर भी न रही। मेरी भावनाएं आशंका में स्थिर हो गईं। उदर रोग से पीड़ित मुझे गर्मी का भी अधिक आभास हो रहा था। लगता जैसे मेरे चारों ओर आग की भट्टी जल रही है। विचार कौंधा कि कहां यहां रेगिस्‍तान में राजधानी बना दी गई भारत की! अंग्रेज कितने समझदार थे। गर्मियों में शिमला और सर्दियों में दिल्‍ली को राजधानी बनाते थे। एकाध घंटे तक बिजली गुल रही। सोचा गर्मी से आए पसीने पर बाहर चलती हवा लगेगी और शीतलता, शांतत्‍व का अहसास होगा। लेकिन मुझे तो अब पसीना भी नहीं आता। केवल गर्मी लगती है बस। असहनीय, बेदम करनेवाली तपन महसूस होती है। इतनी रात हो गई थी। ज्‍यादा खटर-पटर करुंगा तो पत्‍नी और बच्‍ची की नींद खराब होगी, ये सोच कर बिस्‍तर पर पड़ा रहा। नींद की प्रतीक्षा में स्‍वाभाविक है विचार ब्रह्माण्‍ड का चक्‍कर लगना था।
कुछ दिन पूर्व कार्यालय के साथी के हाथ में दवाइयों का पैकेट देखा था। अपनी ओर स्थिर देख कर उसने मेरे पूछे बिना ही बताया कि पिता जी के लिए घर भिजवानी हैं। इस भेंट के बाद हमारा पुन: मिलना एकाध दिन पहले ही हुआ। उसने बताया कि दवाइयां भिजवाने के दो दिन बाद वह भी घर चला गया था। उसके गंजे सिर को देख पूछा कि ये क्‍या। उसने बताया कि पिता जी नहीं रहे। या‍द आया कि विरेन्‍द्र कुमार शर्मा जी राम-राम भाई ब्‍लॉग वाले आजकल योगाधारित आलेखों की श्रृंखला प्रस्‍तुत कर रहे हैं। आलेखों में व्‍यक्‍त उनके वाक्‍य बरबस दिमाग में उछल-कूद मचाने लगे। अरे दो चैक आए हुए हैं दो महीने पहले से अभी तक उनको नकदीकरण के लिए बैंक में नहीं डाला। क्‍या भाग्‍य है सारे काम खुद ही करो। पैदल, रिक्‍शे, बस या मेट्रो में सफर करने के नाम पर विचित्र आलस्‍य का बोध होता है। क्‍यों नहीं कोई एक आदमी मेरे ये सारे काम कर देता। एक तरह से मेरे लिए ये कार्य व्‍यर्थ हैं। पैसे का हिसाब-किताब रखो। बैंक से लेनदेन करो। किसी संस्‍था से जुड़े रह कर वहां की विसंगतियों को ढोते-ढोते नौकरी करो। क्‍या मजबूरी है यार। बस मन होता है कि आंख बन्‍द कर पड़े रहो। योगलीन रहो। बिना आलती-पालती मारे कैसे भी बैठे या लेटे-लेटे आंख बंद कर भाव-विचारों को स्थिर करने का मन होता है। पर इस बेढंगी दुनिया और इसके व्‍यवहार में कहां इन सब की अनुमति है। पिता जी की राजकीय सेवानिवृत्ति में गांव गया था। आधुनिकता के प्रशंसक मेरे पिता की अनावश्‍यक खर्च की प्रवृत्ति से मुझे चिढ़ है। इस बात पर हमारे बीच वाद-विवाद होते रहे हैं। एक तरह से वे नेहरु का और मैं गांधी का प्रतिनिधित्‍व करता हूँ। गांधी का प्रतिनिधित्‍व मैं ग्राम स्‍वराज की अवधारणा पर करता हूँ बस। इसके अलावा मैं गांधी के अन्‍य किसी सिद्धांत के पक्ष में नहीं हूँ। गांव में जैसे-तैसे डेढ़ दिन काटा। घर की बैठक मदिरालय बनी हुई थी। खण्‍ड शिक्षा अधिकारी से लेकर गांव के अधिकांश पुरुष मदिरा में मग्‍न थे। मुझे दुख हुआ कि मैं मदिरा क्‍यों नहीं पीता। मैं धूम्रपान क्‍यों नहीं करता। घर में एकत्रित तुच्‍छता के भोगी बने लोगों की भीड़भाड़ से दूर चीड़ के जंगल में पहुंच गया। चीड़ की हवा ने परिस्थिति से उपजे सिरदर्द को समाप्‍त कर दिया। मैं नासिका से लंबी-गहरी सांसें ले कर तन मन को उन्‍मुक्‍त करने लगा। मुझ जैसे लोगों का शहर से लेकर गांव तक अब केवल एक ही विश्‍वसनीय और समुचित सान्निध्‍य बचा है और यह है प्रकृति। मैं इसी के आंचल में पसर कर जीवन जी रहा हूँ।
यह सब सोचते-विचारते नींद आ गई। कमरे की पश्चिम छोरवाली खिड़की से आती ठंडी हवा पैरों के तलवों को लगी तो आंखें खुलीं। बैसाख का तप्‍त सूर्य सुबह-सुबह ही अग्नि बरसा रहा है। धन्‍य है यह बेल का पेड़ जो मेरे घर के सामने लगा हुआ है। लगता है यदि यह यहां नहीं होता तो शायद मैं चार वर्ष का समय इस कमरे में नहीं काट सकता था। इसके पुराने पत्‍तों के गिरने का क्रम अभी बन्‍द भी नहीं हुआ कि खाली टहनियों में सुकोमल हरे पत्‍ते आने लगे हैं। श्‍वेत तितलियां इसके मृदुल पत्‍तों से पराग कण ग्रहण कर रही हैं। नवपातों की हरीतिमा और तितलियों का स्‍थान परिवर्तन करता श्‍वेतास्तित्‍व.....बारम्‍बार ध्‍यान अपनी ओर आकृष्‍ट करता है। अभी पके हुए बेल पेड़ पर ही लटके हुए हैं और अधिक गर्मी पड़ने से अच्छे से पक रहे हैं। पेड़ के जड़भाग में अभी भी इसके पुराने पत्‍ते विद्यमान हैं। काश अपना जीवन, शरीर भी ऐसा ही होता! कि यह रोग व्‍याधि से पस्‍त, समाप्‍त होते-होते पुन: नया रुप ग्रहण कर लेता! ठीक बेलवृक्ष की तरह। 

Thursday, May 2, 2013

यह यात्रा!



अप्रैल का दूसरा दिन है। चैत्र मास का यह मंगलवार नोएडा से कोटद्वार की बस यात्रा में सुफल हुआ। सामान्‍य दिनों की यात्रा में परिवहन अव्‍यवस्‍था, लोक-समाज की अव्‍यावहारिकताओं, ध्‍वनि प्रदूषण जैसी समस्‍याओं से पीड़ित मैं और मेरा मन किसी तरह सफर पूरा हो और लक्ष्‍य तक पहुंचेंवाली विचारधारा का अनुसरण करता है। लेकिन यह यात्रा! शायद मेरे पास उचित शब्‍दों का अभाव है इसका वर्णन करने के लिए। सुबह साढ़े सात बजे नोएडा से चली उत्‍तर प्रदेश रोडवेज की बस दोपहर होते-होते और कोटद्वार पहुंचते-पहुंचते मुझे मौसम के प्रभाव में सतयुगी पुष्‍पक विमान प्रतीत हो रही थी। सात घण्‍टे का सफर उन अल्‍प हर्षित क्षणों के समान बन गया, जिनमें चांद देखने, टूटे गिरते तारा देख प्रार्थना करना सम्‍भव हो पाता है।
   फाल्‍गुन यदि मौसम का सर्वोत्‍तम आकर्षण है तो चैत्र इस आकर्षण की गम्‍भीर परिणति। बासंती प्रभाव, होली रंगायन के तरुण जीवन अनुभव के बाद यह प्रकृति छटा सुन्‍दरता की प्रौढ़ अनुभूति होती है। इसमें जग-जीवन, वन-उपवन, प्रकृति-पवन के अद्वितीय आकर्षण को अनुभूत करनेवाला केवल स्‍वानन्‍द में ही नहीं होता। उसकी दृष्टि विसंगतियों, विकृतियों, कष्‍टकारी विडम्‍बनाओं और विपरीत परिस्थितियों को भी सहर्ष स्‍वीकार करने लगती है। ये दृष्टि प्रत्‍येक मानव को प्राप्‍त हो तो जीवन कितना सहज, सुगम और समुचित बन जाए!
     तेज चलती बस की खिड़की से लगी मेरी आंखें राष्‍ट्रीय राजमार्ग 119 के प्रकृति और ग्राम जीवन पर अपलक टिकी हुईं थीं। होली के बाद हुई बारिश ने जैसे समूचे पर्यावरण को जीवंत कर दिया था। सम्‍पूर्ण उत्‍तर भारत स्‍वप्निल आभा बिखेर रहा था। सूर्य की किरणों का प्रताप हरित वसुन्‍धरा और नीलांबर से मिल कर जीवन ध्‍येय पूर्ण होने की अनुभूति कराता लगा। झक नीले आसमान से प्रस्फुटित प्रचण्‍ड दिनकर रश्मियों से कौन जूझ सकता है यदि ठण्‍डी शीतल हवा न चल रही हो। गेंहूं की बालियों पर सूर्य प्रकाश फैला हुआ था। हवा उन्‍हें हरी भूरी सरसराहटों से झुमा रही थी। गन्‍ने की कटाई, छंटाई, लदाई करते किसान सच्‍चे मनुष्‍य लग रहे थे। जुते हुए खेतों पर पसरी हुईं आम, जमौया, पापुलर की छायाएं देव वरदान लगती थीं। पगड़ीधारी धोती कुर्ता पहने किसान के रुप में अपना मनभावन निरुपण करने से पूर्व बस के अन्‍दर एक नजर घुमाई। अधिकांश यात्री ऊंघ रहे थे। बाहर स्‍वर्ग बरस रहा है और यात्रीगण सो रहे हैं, धत है इन पर। सोच कर मैं वापस खिड़की से बाहर के प्रकृति रत्‍न को अंत:स्‍थल में एकत्रित करने लगा।
          गेंहूं और गन्‍नों से लदे खेतों के किनारों पर पंक्तिबद्ध पापुलर की गोलाकार पत्तियों को प्‍यार से हिलाती हवा जैसे साक्षात दिखने लगी थी। हरियाली से घनीभूत शीशम, जमौया और तरह-तरह के पेड़ अपने में विलीन होने का आमंत्रण दे रहे थे। सात दिन पहले की वर्षा से खेत, खलिहान, घरों के निकट बने छोटे-छोटे तालाब, पोखरों में एकत्रित पानी अपने आसपास की हरिभूमि के लिए दिव्‍य दर्पण बना हुआ था।
 भोजन करने के लिए चालक ने मीरापुर के एक ढाबे पर बस रोकी। इस यात्रा से पहले की यात्राओं पर कभी यदि बस कहीं रुकती थी और देर तक रुकी रहती थी तो चालक-परिचालक पर झुंझलाहट और क्रोध उभरता था। लगता था बस चले और शीघ्र अपने गन्‍तव्‍य पहुंचे। पर आज तो मन कह रहा था कि एक दो घण्‍टे बस यहीं रुकी रहती तो मैं गेंहूं और गन्‍ने के खेतों का एक चक्‍कर लगा के आ जाता। मैंने कुछ नहीं खाया। मेरी भूख को तो जैसे मौसमीय प्रभाव ने हर लिया था। मन की मानी और गेंहूं के खेत में घुस कर तन-मन को विशुद्ध किया।
शहरों महानगरों की हीन भागदौड़, निर्जीव वातावरण से दूर राष्‍ट्रीय राजमार्ग के किनारों पर बसे गांव और इनका परिवेश कितनी सार्थक स्थिरता लिए हुए है। खेती-किसानी के सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य को करते हुए ग्रामीण सचमुच ईश्‍वर का दूसरा रुप हैं। गेंहूं कटने से पहले मन्दिरों में इसको प्रसाद स्‍वरुप चढ़ाने की परंपरा रही है। भारतीय ग्रामीण जगत में हिन्‍दू नववर्ष के साथ-साथ गेंहूं कटाई के उपलक्ष में मेलों का आयोजन होता है। मैंने देखा जहां बस रुकी हुई थी वहीं से कुछ दूर किसी सिद्ध मन्दिर में मेला लगा हुआ था। सादगी से सजे-धजे लोग मेले में जा रहे थे, वहां से आ रहे थे। कोई ट्रैक्‍टर ट्राले तो कोई भैंसाबुग्‍गी, साइकिल पर परिवार सहित बैठा हुआ था। साइकल सवार व्‍यक्ति, पीछे बैठी उसकी पत्‍नी, पत्‍नी की गोद में बैठा बच्‍चा मेले से आ रहे थे। उन्‍हें देख कर कोई भी संवेदनशील व्‍यक्ति आदर्श परिवार की सीख ले सकता था। विशालकाय ट्रक, ट्रेलर, बस, कारें जिस राजमार्ग को रौंदते हुए दौड़ रहीं थीं, उस के किनारे-किनारे परिवार के साथ साइकिल पर बैठ यात्रा कर रहे व्‍यक्ति के लिए सुरक्षित घर पहुंचने की प्रार्थना के अतिरिक्‍त मैं क्‍या कर सकता था।
आज भी गांव के लोगों के पास राजदूत और यज्‍दी जैसी मोटरसाइकिलें हैं, यह देख कर आश्‍चर्यमिश्रित खुशी हुई। इन्‍हें देख याद आया कि कुछ दिनों पहले आई अक्षय कुमार की स्‍पेशल 26 फिल्म  में तोतिया रंग की मैटाडोर दिखाई दी थी। ये अनुभव इतिहास के सुनहरे दिनों में जाने का रास्‍ता बनते हैं।
बिजनौर से 11 किलोमीटर पहले मध्‍य गंगा बैराज का जेसोप कंपनी द्वारा 1984 में अभिकल्पित और निर्मित तीन सौ मीटर लंबा सेतु है। इस तक पहुंचने से पूर्व राजमार्ग के बांई ओर आधा किलोमीटर लंबा ऊसर है, जिसमें दो पहाड़नुमा कटानों के बीचोंबीच बरसाती नाला है। उसी के बांई तरफ पानी से लबालब नदी है। सूखे बरसाती नाले के किनारे गडरिया गाय-भैंसों को चरा रहा था। दोपहर का दूत यह व्‍यक्ति एकांत में बैठ कर जानवरों को चरते हुए देख रहा था। सर पर पगड़ी हाथ में डंडा लिए हुए उसने ऊपर मार्ग में दौड़ते वाहनों पर दृष्टि डाली तो मैंने उसका अभिवादन किया। उसने भी दोपहरी सूखी हंसी और खाली हाथ हवा में लहरा कर मेरा स्‍वागत किया। बस से गांव के गांव पीछे भागते हुए दिखे। उपलों के टीले, घरों के दालान, चारपाई पर बैठ हुक्‍का गुड़गुड़ाते वृद्धजन दोपहर का विचित्र श्रृंगार करते लगे। नीम, आम और शीशम की घनी छांव सदाशयता से बुला रही थी। मन तो मेरा इनमें प्रवेश कर चुका था। लेकिन मैं था कि इन्‍हें देख सुषुप्‍त, स्थिर पड़ा हुआ था। जैसे आश्‍चर्य से शरीरविहीन।
प्राथमिक विद्यालयों के बच्‍चे छुट्टी पा कर कितने प्रसन्‍न हो घरों को लौट रहे थे! आसमानी रंग की कमीज गहरे नीले रंग की पतलून पहने कन्‍धों पर थैले टांग बच्‍चे राजमार्ग के किनारे चल रहे थे। बड़ी बहन के साथ छोटा भाई सुरक्षा के घेरे में चल रहा था। मित्र लड़कियां और लड़के एक-दूसरे के कन्‍धे पर हाथ रखे हुए हंसी-खुशी चल रहे थे। तो कोई बच्‍चा अत्‍यन्‍त संवेदनशील होने के कारण वातावरण का दृष्‍टांकन करता हुआ एकांत में सबसे पीछे धीमे-धीमे पग बढ़ा रहा था। ईंट भट्टों के कामगार, खेतों के किसान दिन के एक बजे पेड़ों की छाया तले बैठ खाना खा रहे थे। शहर की गांव से और अपनी ग्रामीणों से तुलना करने पर महसूस हुआ कि मैं नर्कवासी हूँ। नर्क से आ रहा हूँ और स्‍वर्ग में विचरण कर रहा हूँ।
दूर क्षितिज पर फैले, लम्‍बे, हरयाते, चमकते, हवा से मटकते एकसमान वृक्ष मेरी आत्‍मा को इस दोपहर से रंगने पर तुले हुए थे। इस यात्रा अनुभूति के गहनतम वर्णन के लिए शब्‍द हमेशा अधूरे रहेंगे, वर्णनकर्ता असक्षम रहेगा। यदि यात्रा के मेरे ये अनुभव व्‍यवहार बन सकते तो मैं मित्रों, अभावग्रस्‍त लोगों, सज्‍जनों को वही आभास उपहार में देता!