Sunday, January 27, 2013

छब्‍बीस जनवरी

देशभक्‍तों की दृष्टि से एकाकार होतीं हमारी दृष्टियों में गणतान्त्रिक भाव गहरे बस जाता है। राष्‍ट्र के शहरों-ग्रामों में तिरंगे ध्‍वज को फहराने से लेकर दिल्‍ली स्थित राजपथ पर सशस्‍त्र सेना परेड के रुप में गणतन्‍त्र मनाना देशप्रेम के स्‍थान पर महाऔपचारिकता का विचित्र निबाह ही रह गया है। पन्‍द्रह अगस्‍त, छब्‍बीस जनवरी दिवसों के प्राकृतिक दृश्‍यों को देख ज्ञात होता है कि हमारे राष्‍ट्र के ये दो अतिमहत्‍वपूर्ण दिवस प्रकृति के लिए कितने अहम हैं। इन दो दिनों की प्रकृतिप्रदत्‍त शोभा सामान्‍य दिनों की अपेक्षा अधिक प्रभावी होती है। शीतल पवन सरसराहट के साथ शुरु हुआ दिन प्रहर-दर-प्रहर अपने नैसर्गिक रंग बिखेरता रहा। पूर्व दिशा में बेलपत्र का पच्‍चीस फुट लम्‍बा वृक्ष अपने हरे-चमकते पत्‍तों के झुरमुट से सूर्य की स्‍वर्ण किरणों को घर में प्रवेश करा रहा था। नीलानभ जैसे दिन विशेष के लिए ही स्‍वच्‍छ, उज्‍ज्‍वल हो विद्यमान था। बेदाग आकाश का नील रंगायन मेरी पथरीली आंखों और पतित आत्‍मा को जीवन्‍त कर गया। बेलपत्र के हरे-पत्‍तों के झरोखों से आसमान के नील-विस्‍तार पर विचरित मेरे चक्षु धन्‍य हो गए।
      अपने शरीर देश के लिए बलिदान कर चुके वीरों की आत्‍मध्‍वनि इस प्राकृतिक आभामण्‍डल में गूंज रही थी। सुन्‍दर वातावरण जैसी ही सुन्‍दर उनकी परमात्‍माओं से लगकर मेरी आत्‍मा भी सिहर उठी। वीरों की अन्तिम प्राणगति के अनुभव से ह्रदय टूटकर बिखर गया। लगा जैसे कोई अपने प्रियतम की विरह पीड़ा से छटपटाने लगा हो। अत:स्‍थल की नीरवता में भावों का भंवर उठा। नयनों से जलधार फूट ही जाती यदि चहुंओर की भौतिकता में भाव-पग न धरा होता तो।
     वीर-भाव अनुरागी समय मेरे लिए स्‍थायी नहीं है। घर-गृहस्‍थी की परीक्षाओं और कार्यालयी दीक्षाओं के लिए भी मेरा समय नियत है। उनमें विचरण करते ही मेरा आज का महानुभव पीछे छूट गया। मैं पुन: इक्‍कीसवीं सदी के घर्षण में लिप्‍त हो गया। एक ऐसा संघर्षण जिसमें सुधी मन्‍तव्‍यों की बलि देनी होती है और रखना होता है प्रज्‍वलित निरर्थक खपने का विचार, जिसका सदियों के पृष्‍ठांकन में कोई सार्थक अंकन नहीं है। इस कुसमय में सार्थकता की कोई पूछ नहीं है। मन-मानुष की दशा-दिशा दिग्‍भ्रमित है। कालान्‍तर के पृष्‍ठ हमारे लिए क्‍या पशुवत् जीवन गुजारते मानव की परिभाषा गढ़ रहे हैं। निश्चित ही ऐसा कुछ होने जा रहा है। देशी-विदेशी सत्‍ता प्रतिष्‍ठान अहंभावी ज्‍वालामुखी बन चुके हैं। उनके सम्‍मुख सत्‍कार, सज्‍जन, सत्‍य बुरी तरह हांफ रहे हैं और ज्‍वाला में भस्‍म होने के लिए विवश हैं।
मध्‍यरात्रि को चन्‍द्रमा का दूधिया प्रकाश बेलवृक्ष और इसके पत्‍तों, घर, आंगन, यहां-वहां हर ओर व्‍याप्‍त है। रात्रि के अपने इस नए स्‍वरुप की सुबह के समय में दुखद विलीनांजलि से पूर्व ह्रदय इस दुग्‍धरंगीता चन्‍द्र बरसात में खूब भीग जाना चाहता है। यह अभौतिक रात्रि सुन्‍दरता एक स्‍थूल शरीर के व्‍यक्ति को कितना दुख देती है! आंखों और पलकों के बीच के समय भाव सुदूर तक चन्‍द्रमयी आकर्षण में बन्‍ध गए हैं। दिनभर बलिदानी वीरों की लगन में जो मानवीय भाव जागृत हुए, जीवन-पुंज इन्‍दु और इसके प्रकाश में उनका सम्मिश्रण मेरे लिए आघात बन गया है। नवप्रभात की बेला में रात्रि के ये दिग्‍अनुभव सच्‍चे भ्रम बन जाएंगे। इसीलिए इस रात्रि में ही इनको जीने और इनसे बिछड़ने का जीवन जी रहा हूं।

Wednesday, January 23, 2013

अन्‍धेरों उजालों के बीच

अन्‍धेरों उजालों के बीच

आधी रात के बाद मैं नींद के साथ कबड्डी खेल रहा हूं। बिटिया के मुखमण्‍डल को देखकर जीवन के विविध रंग दिल, दिमाग, आत्‍मा और आंखों में उमड़-घुमड़ आए हैं। इस समय वह अपनी साढ़े चार वर्षीय चंचलता और नटखटपन से कोसों दूर निद्रालीन है।

देशकाल, संसार-समय की यथास्थिति पर कविता लिखने की सोचते-सोचते घंटे व्‍यतीत हो गए। कोई अनुभव मेरे विचार से सामंजस्‍य नहीं कर पाया। अधूरे शब्‍दों और रिक्‍त भावों से सजाकर एकाध बार कुछ लिखा, कुछ सोचा-विचारा पर सब कुछ जैसे सांसारिक यथास्थितिवाद से पीड़ित प्रतीत हो रहा है। कुछ भी ऐसा पृष्‍ठांकन नहीं हो पाया, जो स्‍वयं को संतुष्‍ट करता हो। 

आज की आत्‍मछिद्रित मानवीय हलचल में मैं तड़प कर मात्र भावशून्‍य ही हो पाया हूं। मेरी आत्‍मशक्ति का क्षरण ही तो हुआ है, इसीलिए मेरी स्थितियों-परिस्थितियों की समीक्षा दृष्टि को काठ मार गया है। लेखनी का जैसे दम घुट गया है। समाज की विद्रूप रुपरेखा पर लिखने के लिए किनारा नहीं मिल पा रहा है। सामाजिक दशा की तरह ही मैं भी स्‍वयं में गड्डमड्ड हो गया हूं। मेरा भी सुधारवाला छोर इस समय की मानुषिक राज की विचित्रता में उलझ गया है। 

अभी दोदम याद आया कि रेडियो पर बजनेवाला कोई गाना मेरी इस ऊटपटांग लेखन चाल में व्‍यवधान बन गया है। गीत के बोल से अधिक संगीत स्‍वर-लहरियों में मन उड़ान भरने लगा। अपनी सज्‍जनता पर अंशमात्र गर्व उभर आता है, क्‍योंकि मनहर संगीत स्‍वर-भावों में उड़ते-उड़ते मैंने संगीतकार के सृजन श्रम को भी याद कर लिया। बाहर आसमान हवाई जहाज की गड़गड़ाहट से थर्रा उठा है। हवाई जहाज की ध्‍वनि कम होते-होते शून्‍यविलीन हो गई है। अब मन लेकर पुंछ की भारत-पाकिस्‍तान सीमा पर पहुंच गया हूं। आपस में गुड़ी-मुड़ी छह फुट तारबाड़ और उसके आर गश्‍त कर रहे सैनिकों की तसवीर देखी थी कहीं। इस परिदृश्‍य पर ध्‍यान गूढ़ाया तो इसका उद्देश्‍य समझ न आया। वापस दिल्‍ली आया। दिल्‍ली की घटना पर सोचने से पूर्व मैंने एक चक्‍कर गांव में रह रहे अपने मां-पिता, बहनों, गांववालों से होते हुए देश-दुनिया के शहरों-गांवों के प्रत्‍येक मनुष्‍य की गति पर विचार करने पर लगाया। सबकी जिन्‍दगी पर दयाभाव बिखेर कर मैंने उनके स्‍वार्थ को प्रणाम किया। उनकी निरर्थक जीवनचर्या पर झुंझलाया।

यदि इन लोगों का स्‍वार्थ नहीं होता तो प्रतिक्रियावश....ब्रह्मांड, संसार, देश, विदेश, क्षेत्र, राज्‍य, भाषाएं, बोलियां, तेरा, मेरा, इसका, उसका, अच्‍छा, बुरा, गन्‍दा, सही, ऊंचा, नीचा, अमीर, गरीब, छोटा, बड़ा, इतिहास, वर्तमान, भविष्‍य, समय, असमय, जीवन, मृत्‍यु, इत्‍यादि....कुछ नहीं होता। जब स्वार्थ विद्यमान हुआ तब ही तो यह समग्र भाविक लाग-डाट संसार में प्रचलित हुई। इस समय भी इसी की महिमा से सम्‍पूर्ण जग की गति है। किसी की हत्‍या हो या कोई देश के लिए बलिदान देकर मृत्‍युप्राप्‍त हुआ हो, अन्‍तर क्‍या है कुछ नहीं। दोनों के दुनियावी भाव-विचार समाप्‍त। इनके स्‍वप्‍नों, आंकाक्षाओं, इच्‍छाओं पर विराम। इनके आधार पर पोषित स्‍वार्थ के चलते कुछ दिन तक इनकी मृत्‍यु पर दु:, पीड़ा, त्रास, संवेदना प्रकट होगी और पुन: इनके दुखी-समर्थक उलझ जाएंगे जीवनलोक की मारीचिका में। 

कहीं पढ़ा या सुना था कि किसी की मौत पर उसके सम्‍बन्‍धी इसलिए नहीं रोते कि उनका अपना नहीं रहा। बल्कि उनका अश्रु-अनुराग व्‍यतीत के उपस्थित रहते-रहते प्राप्‍त हो सकनेवाली वस्‍तुओं-सुविधाओं के स्‍थायी अभाव के लिए होता है। यह उक्ति मुझे हमेशा याद रहती है और इसलिए नहीं भुलाई जा सकती क्‍योंकि मैंने कई लोगों को देखा, जो अपने सगे की मौत पर दुख भूलने की स्थिति में कभी नहीं लगते थे। पर जीनेवाला समय के थपेड़ों में ऐसे फंसता है, इस प्रकार व्‍यस्‍त होता है कि जानेवाले का नाम और संकेत तक क्षण-क्षणांश के भी मोहताज हो जाते हैं। मैं भारतीय सेना के दो सैनिकों की मृत्‍यु और सफदरजंग से सिंगापुर तक साहस-मनीषा की ज्‍योत लहरानेवाली युवती की मौत से सामाजिक प्रभाव की पड़ताल कर रहा हूं। ये मौतें जनसंचार साधनों के श्रम से विशेष बनीं। लेकिन अनेक ऐसे हैं, जो गुमनामी में जिए भी मरे भी। बहुत ऐसे हैं जो जीते हुए तो गुमनाम हैं ही, मरकर भी (भूले) हुए हैं। तब भी अपने-अपने हिस्‍से की जिन्‍दगी सब गुजारते हैं और दिल से दुनिया बनानेवाले को पुकारते हैं कि तूने यह क्‍या चक्रव्‍यूह रच डाला

रात गहरा रही है। आसमान धवल-उज्‍ज्‍वल है। खिड़की से चन्‍द्रमा की फांक और टिमटिमाते तारे दिखाई दिए तो हृदयपटल प्रफुल्लित हो गया। अकाल मृतकों के अनुभवों के बीच अपना जीवनांश जागृत करता है। अपना जीवन जीते हुए आत्‍ममुग्‍धता हावी हो रही है। लगता है कि यदि भौतिकता सम्‍पन्‍न नहीं हूं तो क्‍या हुआ, जीवित तो हूं। क्‍योंकि राष्‍ट्र और इसके बाहर कहीं भी किसी भी पल मनुष्‍य का जीवन अपने निर्धारित समय के लिए भी सुरक्षित नहीं रहा। कोई धन और भौतिक सम्‍पन्‍न है तब भी, कोई निर्धन है तो भी। सबके लिए समय ने कलयुग रचा हुआ है। विद्वान या शैतान कोई कुछ नहीं है। भौतिकी से दुनिया चमकाने के स्‍वप्‍नपालक अपने ही मुंह पर विनाश की कालिख पोत रहे हैं। परम्‍परा से संजीवित होता आया दुनिया-जहां का लोकजीवन इनकी महत्‍वाकांक्षाओं से ध्‍वस्‍ताधूत होने के मुहाने पर है। 

बच्‍चों के निश्‍छल और निष्‍कपट प्‍यारे मुख देखकर मन सशंकित है। हमारे नहीं रहने पर ये क्‍या करेंगे? कैसे रहेंगे? क्‍या इनके लिए सोचकर हमारे कदम सही दिशा में बढ़ सकेंगे? हम प्रौढ़ अपनी जीवनोचित परिपक्‍वता पर काहे का दम्‍भ भरें, यदि पुष्‍प समान शिशु मानव को हमने समय रहते सुसंगत जीवन उद्यान उपलब्‍ध न कराया तो। बस यही विचार है, जो मुझे मथ रहा है बार-बार बराबर। अब मैं सुबह होने तक, धूप की पीली आभा व्‍याप्ति से पूर्व तक रात के निर्विकार अन्‍धेरे में समा रहा हूं। 


Sunday, January 20, 2013

तब क्‍या होगा?

हमें अपने पैरों को देखकर
ोचना चाहिए
कि कल जब ये हमें
जवाब दे देंगे
तब क्‍या होगा?


जब आंखें कहेंगी
उन्‍हें मत खोलो
रहने दो बन्‍द
कान भी मौन तक का आभास
न पा सकेंगे
तब क्‍या होगा?

यदि हम भाग्‍यवान रहे
कोई देवस्‍वरुप हमारा साथी
हमारे निकट बैठा हो उस समय
कझोर रहा हो वो हमें
हमारी एक ध्‍वनि के लिए
पर जिहवा जैसे
अनगिन रेगिस्‍तान में 
भटकते-भटकते    
प्‍यास के मारे 
ठते-उठते बैठ जाए 
 तब क्‍या होगा?     

Wednesday, January 16, 2013

न जीने पर न मरने पर




सांस लेने से पूर्व
मृत्‍यु के नाम पर
प्रसन्‍न हो मेरा मन नाचता

खुली आंखों से संसार देखता
मैं और मेरा भाव
सच्‍चा भ्रम बन जाता   

एक शक्तिवान व्‍यक्तित्‍व, राजा, प्रसिद्ध प्राणी
मृत्‍यु के बाद अदृश्‍य हो जाता

तब भी दुनिया इधर से उधर, उधर से इधर
जीवन कार्यों के लिए भागती रहती
और अदृश्‍यात्‍मा को विस्‍मृत कर देती    

एक कमजोर व्‍यक्ति, बेघर, निर्धन
जीते जी मृत्‍यु का पूर्वाभ्‍यास करता
और मृत्‍य के बाद शायद जीवन जीता

वह तो भागती दुनिया को 
न जीते जी नजर आता
और न मरने पर

कुछ भी तो नहीं ठहरता 
कभी किसी के लिए
न जीने पर न मरने पर

सब चलता रहता है
सब चलते रहते हैं    
नामालूम किसलिए किसके लिए?      

Sunday, January 13, 2013

पत्रिका समीक्षा




पत्रिका समीक्षा
आधारशिला अंक जून-अगस्‍त, २०१२   मूल्‍य : रु. ५०
संपादक-दिवाकर भट्ट
संपादकीय कार्यालय
बड़ी मुखानी, हल्‍द्वानी-२६३१३९, नैनीताल (उत्‍तराखण्‍ड)
फोन : ०९४१०५५२८२८

आधारशिला पत्रिका जून-अगस्‍त २०१२ अंक समर्पित है बल्‍लभ डोभाल को। लेखक के बारे में लिखने, उसे समझने और उसके कृतित्‍व के सकारात्‍मक सामाजिक भावों को प्रसारित करने के लिए लेखक के साहित्‍य के सम्‍पूर्ण वाड.मय से परिचित होने की आवश्‍यकता है। चूंकि उपन्‍यास, कहानी, कविता, संस्‍मरण, रिपोर्ताज, एकांकी, बाल कहानियों और गम्‍भीर धर्म-चिंतन के रुप में बल्‍लभ डोभाल का साहित्‍य सृजन विपुल है, अतएव इन सबके समग्र प्रकटीकरण में आधारशिला का यह प्रयास उतना स्‍तरीय नहीं है, जितना हो सकता था। फिर भी इस संकलन में लेखक के प्रतिष्ठित समर्थकों के विचारों से एकाकार होने का अवसर तो प्राप्‍त होता ही है। इन विचार दृष्टियों में बल्‍लभ डोभाल की लेखकीय प्रतिष्‍ठा निश्चित ही अत्‍यन्‍त ऊंची अनुभव होती है। कह सकते हैं कि डोभाल को पढ़नेवालों का दृष्टिकोण बदलने में उनका साहित्‍य-सृजन बहुत सहायक रहा है।
     किसी अच्‍छे साहित्‍यकार को समुचित शासकीय सम्‍मान न मिलना, यह व्‍यवस्‍थागत दोष हो सकता है। तथापि इसके विपरीत बड़ी बात यह है कि आम जनता का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला शासन-तन्‍त्र भले ही ऐसे लेखकीय कौशल की अनदेखी करे परन्‍तु आम जनता अर्थात् जनता-जनार्दन ही वह पाठक-वर्ग भी है, जो लेखक के रचनाकर्म से स्‍वयं के व्‍यक्तित्‍व में एक जीवनात्‍मक परिवर्तन लाती है। सच्‍चे लेखक के लिए वास्‍तविक सम्‍मान, उसके सृजन का प्रतिलाभ यही है। बल्‍लभ डोभाल का रचना-संसार कालखण्‍ड विशेष तक ही सीमित नहीं है। उनकी चिंतन की नई दिशाएं नामक पुस्‍तक हिन्‍द-विस्‍तार की मौलिकता और नैतिकता के सन्‍दर्भ में एक कालजयी चिंतन कोष है। इसके अध्‍ययन से एक सच्‍चा हिन्‍दुस्‍थानी अपनी विस्‍मृत जड़ों की ओर आत्मिक रुप से अग्रसर होता है। आधारशिला पत्रिका में इसका उल्‍लेख निश्चित ही प्रशंसनीय है। लेखक के रचना-कर्म के एक-एक संग्रह का उल्‍लेख करना उतना आवश्‍यक नहीं जान पड़ता, जितना कि उनको उस लक्ष्‍य के साहित्‍य-रत्‍न के रुप में सीधे परिभाषित करना, जिसके सान्निध्‍य में आकर हरेक व्‍यक्ति सज्‍जनतापूर्वक सोचने-‍विचारने लगता है। लेखक होने का तात्‍पर्य सर्वप्रथम सज्‍जनता को प्राप्‍त होने से है और इसमें डोभाल अग्रणी हैं। किसी भी लेखक और उसके लेखन की सामाजिक महत्‍ता तब ही आकार लेती है अर्थात् अपना प्रभाव छोड़ती है, जब लिखनेवाला ईमानदार हो तथा उसके द्वारा सृजित साहित्‍य लोक-भावना के अनुरुप हो। आशा है कि बल्‍लभ डोभाल के विस्‍तृत साहित्यिक-संसार को कभी न कभी एक ऐसा माध्‍यम अवश्‍य प्राप्‍त होगा, जो उसे समग्रता से प्रस्‍तुत कर सके। इस कार्य हेतु आधारशिला पत्रिका का योगदान एक महत्‍वपूर्ण शुरुआत भर है।

Saturday, January 12, 2013

हथेली में तिनका छूटने का अहसास

मैं बिखर गया
मेरा ओर-छोर बिखर गया।
मेरी हथेली में
तिनका छूटने का,
सास रह गया।।

कुन्‍द पड़ गए सब रंग
बेरंग संवेदना हो गई
मेरा जीवन उड़ती धूल का,
आकाश रह गया 
मेरी हथेली में
तिनका छूटने का,
सास रह गया।।

सच्‍चा साथ नहीं है
दुखता गहराता यह आभास।
अंत:स्‍थल पीड़ा परिपूर्ण
व्‍याप्‍त पीड़ाओं का कारावास।।
मृतप्राय: मानवों से अपने...
...प्राणों का अभिनन्‍दन करवाता,
निष्‍प्राण मेरा 
सारांश रह गया।
मेरी हथेली में
तिनका छूटने का,
सास रह गया।।

चक्षु खोलने पर
हाहाकार दुनिया का,
मुझे जंचता नहीं।
ध्‍यानस्‍थ रहकर
ाक्षात्‍कार ईश्‍वर का,
कभी होता नहीं।।    

रंग थे मेरे भीतर
तितलियों की चंचलता थी
मानव मैं
मशीनी सहवास हो गया।
मेरी हथेली में
तिनका छूटने का,
सास रह गया।।


 

  

Wednesday, January 9, 2013

प्‍यार होगा, संसार होगा

आजकल दो मनुष्‍यों का मिलाप
कितना बड़ा है अभिशाप

किसी से औपचारिकतावश मिले
दो पग आगे बढ़े विदा हुए

मिलनेवाले को भूल गए
उसके बाद ज्ञात नहीं दोनों की...
....क्‍या स्थितियां हैं

आत्‍मसात् उनके जाने....
....कौन सी परिस्थितियां हैं   

बस एक रात के लिए हम अपनी
अलग दुनिया बसाते हैं
अगली सुबह अपने लिए पुन:
एक नई दुनिया पाते हैं

वहां दोबारा दो मनुष्‍य मिलते हैं
विवशता से, औपचारिकता से...
...व्‍यवसाय से और एक-दूजे से
दूर होने के लिए

किसी को मिलकर क्‍या होगा
मैं क्‍या हूं....यह पहले जानना होगा
अपनी गति देखनी है
अपना विवरण जानना है
आत्‍मसात् बुराईयों को त्‍याग
अच्‍छाईयों का साथी होना है

तब ही हम किसी से
कोई हम से 
औपचारिकता से नहीं मिलेगा
स्‍वाभाविक आकर्षण का पुष्‍प खिलेगा

कोसों दूर रहकर भी 
यादों में मन जलेगा
भागकर दो प्राणी 
परस्‍पर मिलेंगे
तब प्‍यार होगा
संसार होगा                

Sunday, January 6, 2013

प्रभाव-क्षमता की सीमा



किसी भी व्‍यक्ति, प्रकृत दृश्‍य, घटना-दुर्घटना से हमारी प्रभावित होने की क्षमता का प्रश्‍न है। ये विचार इसलिए कौंधा क्‍योंकि अचानक जीवन का अर्थ मेरी दृष्टि में चारों ओर से सिमटकर एक सघन व्‍यर्थता में बदल गया है। जैसे-जैसे समय का विस्‍तार हो रहा है, मेरी वैचारिकता में खोखलाहट घर करती जा रही है। लगने लगा है कि मुझ सहित सम्‍पूर्ण मानु‍षिक परिवेश क्‍यों और किसलिए है? जब हमें अपनी तुष्टि और स्‍वार्थी प्रवृत्ति के अतिरिक्‍त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता तो मनुष्‍यरुपेण हमारी मान्‍यता किसलिए? इसका क्‍या औचित्‍य? ईश्‍वर, सन्‍त, महात्‍मा, महानुभवों, बुदि्धजीवियों से हम आप सब लोग मात्र अध्‍ययन शिक्षण के लिए प्रभावित होते हैं। उन जैसा बन जाने की संकल्‍पशक्ति हममें आ ही नहीं पाती। प्राकृतिक व्‍यवस्‍था और प्रकृति हमारी कहानी, कविता, चित्रकारी, अनुसन्‍धान और वैज्ञानिक जिज्ञासाओं की तुष्टि हेतु उपस्थित हो पाती है। हम प्रकृति से प्रकृति जैसा बनने की प्रभाविता को जीवनपर्यन्‍त स्थिर नहीं रख पाते। बल्कि वास्‍तविक जीवन में हमने प्रकृति को नष्‍ट करने के अतिरिक्‍त कोई अन्‍य कार्य नहीं किया। इसी प्रकार सामाजिक घटनाएं-दुर्घटनाएं तथा दैवीय और प्राकृतिक आपदाएं भी हमें तब तक ही संवेदना के केन्‍द्र में रख पाती हैं, जब तक इनका आत्‍मप्रभाव विद्यमान रहता है। आत्‍मप्रभाव हमारे जीवन का सुचारु विचार नहीं बन पाता। हमारी चेतना और इन्द्रियां अधिक समय तक सभ्‍यता, सादगी, सदाचार, सद्बुदि्ध, सद्भावना से रहने में बेचैनी महसूस करने लगती हैं। हमारा परोपकारी भाव और सदाशयता का विचार स्‍वयं के संकल्‍प से नहीं अपितु भीड़ के प्रवाह से उद्वेलित होता आया है। तभी तो किसी अच्‍छे-बुरे अनुभव और घटना से प्रभावित होने की हमारी क्षमता एक सार्थक सामाजिक लक्ष्‍य तक पहुंचे बिना ही मरणासन्‍न हो जाती है। अन्‍त में हम पुन: दैनंदिन की उलझनों में फंस जाते हैं।

      दिल्‍ली में दुष्‍कर्म के बाद अधमरी और बाद में राजनीतिक निर्णयों के कारण मृत्‍युप्राप्‍त युवती ने सोई हुई सामूहिक चेतना को जगाया तो एक पखवाड़े तक पूंजीवाद के राजकाज की संभावनाओं पर एक बड़ा कुठाराघात हुआ। युवती के लिए न्‍याय और समाज के लिए सुधार की मांग करते लोगों की आवाज में अब ठहराव आ गया है। उत्‍पीड़ित युवती के मित्र ने दुर्घटनावाली रात का जो रोंगटे उघाड़नेवाला वर्णन किया, उससे हमारी लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था और लोक सभ्‍यता की सच्‍चाई दु:खद रुप से सामने आती है। इस बीच १६ दिसंबर, १२ से अब तक बलात्‍कार पीड़ित महिलाओं के समाचारों का लगभग प्रतिदिन विस्‍फोट हो रहा है। राष्‍ट्र को सुसंगत व्‍यवस्‍था देने के लिए अधिकृत महानुभावों की निश्‍चेष्‍टा में प्रतिपल वृदि्धी हो रही है। उन्‍होंने क्रान्ति का कारण बनी दिल्‍ली बलात्‍कार की दुर्घटना को भी उसी कानूनी प्रक्रिया से निपटाने की जुगत लगाई है, जिससे वह साधारण कहासुनी के मामल निपटाती है। तब इस घटना से सत्‍ताधारियों पर क्‍या प्रभाव पड़ा? शायद कुछ नहीं। जनशक्ति भी प्रभावित करनेवाली अपनी क्षमता से चूकती प्रतीत हो रही है।

      ऐसे में कुछ व्‍यक्ति आप और हमसे निकलकर स्‍वयं को मानवता का पर्याय तो बना ही चुके हैं। कम से कम इनसे तो कुछ सीख ली जा सकती है। बलात्‍कारियों को शीघ्रातिशीघ्र मृत्‍युदण्‍ड देने के लिए कानूनी समीक्षा और संशोधन को लेकर पिछले १४ दिनों से अनशन कर रहे बरेली के राजेश गंगवार, पिछले ८ दिन से अनशन कर रहे बाबू सिंह जैसी भावनाएं हरेक भारतीय की क्‍यूं नहीं हैं? हो सकता है कि राजनेताओं, शिविरबद्ध प्रबुद्ध वर्ग के साथ-साथ कई लोगों के लिए यह मूर्खता हो! लेकिन मानवीयता का उद्भाव इन्‍हीं व्‍यक्तियों ने दर्शाया है। शीत प्रकोप से इनके स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है और प्रतिदिन शीत वृदि्धी हो रही है। कुछ प्रदर्शनकारी अनशनस्‍थल पर मोमबत्तियां जलाकर जरुर इनका मान बढ़ा रहे हैं, परन्‍तु सरकारी चिंता में ये स्थिति कहीं नहीं है।

पानी की बौछारें झेलनेवाला और पुलिस की लाठियां खानेवाला जनसमुदाय क्‍या मात्र भीड़ बढ़ाने के लिए जुटा था? क्‍या उस भीड़ की भावनाएं पन्‍द्रह दिनों में ही मर गईं हैं? या यह भीड़ सत्‍ता के पालकों ने घोटालों से ध्‍यान हटाने के लिए सुनियोजित तरीके से जुटाई थी? या हर क्रान्ति का लक्ष्‍यविहीन रह जाने का कारण हम सब की प्रभाव-क्षमता की सीमा है।

अकाल मृत्‍यु पीड़ितों की याद में

जीवन से पहले
जो लोग अवसान हो गए
और मृत्‍यु के बाद
जो भुला दिए गए व्‍यवधान समझकर
हे ईश्‍वर! कुछ निर्णय धरती के
उनके हाथ के लिए भी छोड़ना
उनको भी कुछ समय का 
भगवान कहना
ताकि अपने दुख-दर्द, जो मरने से पहले 
ेलते रहे,नको वे फिर किसी के लिए
शेष न छोड़ पाएं
और ना ही किसी को अपनी तरह
भरपूर जिए बिना
मरने के लिए मोड़ पाएं
बस वरदान दें जो 
धरती पर्रेम के विद्यमान रहने का
और तलवार की अस्तित्‍वविहीनता का
बस जो खुशी दें
खुश रहकर जीने के लिए     
     

सर्द रातें जब पहरा देने लगेंगी

सर्द रातें जब पहरा देने लगेंगी
तभी लम्‍बी नींद से पहले....
क्‍या हम अनुभव करेंगे?
बेघर लोगों के ठिठुरते मनोभावों को,
और नींद में.....
फिर स्‍वप्‍न में.....देख सकेंगे
उनकी आंखों में....
उनके  मनुष्‍य होने का सन्‍देह?
ऐसे बेघर लोगों  के लिए
धनवान तो भगवान हैं
और भगवान......
न जाने उनके लिए क्‍या हों!
पर कभी धनवान जान सकेंगे?
कि ये बेघर आत्‍माएं उनके लिए क्‍या हैं?

Friday, January 4, 2013

कानून के मायने



भारत और दुनिया के सभी चिंतकों, विचारकों, विश्‍लेषणकर्ताओं ने बलात्‍कार के कारणों की सघन पड़ताल कर ली है। उन्‍होंने अपने मस्तिष्‍कीय प्राचलों को सघनता से मथते हुए निर्णय लिया है कि बलात्‍कार करने की प्रवृत्ति एक बीमारी, कुंठा है। उनके निरन्‍तर आते विचार प्रवाह में मीडिया भी सम्मिलित है। इसने भी दुष्‍कर्मियों को आपराधिक वृत्तिवाला बताने के समाचार प्रकाशित कर दिए हैं। बहुत से विचार, प्रवचन, उपाय, विधियां अनेक चिंतकों के मस्तिष्‍क से निकलकर शोधकार्य हेतु प्रयोग हो रही हैं। बलात्‍सहवासियों को जानने के लिए राष्‍ट्रीय अंतर्राष्‍ट्रीय विमर्श हो रहे हैं, होंगे और अन्‍त में किसी नई दुर्घटना के अस्तित्‍व में आने के बाद दुष्‍कर्मियों को कड़ी सजावाला कानून और इसे हेतु होनेवाले समस्‍त अभ्‍यास, नीतियां, कार्यक्रलाप और इनका क्रियान्‍वयन ठप हो जाएगा। धीरे-धीरे दुष्‍कर्म पीड़ितों का दु:, जनाक्रोश की हवा, सरकारी नीति, अंतर्राष्‍ट्रीय ह‍स्‍तक्षेप समय की असीम गहराई में समकार इतिहास बन जाएंगे और हम सब समस्‍याओं के निराकरण में मिली असफलताओं से दुखित होकर वापस कुंठाओं में जीने लगेंगे।
    यह आकलन कोरी कल्‍पना के आधार पर नहीं है। यह अनुभव मैंने रामलीला मैदान में जनलोकपाल की मांग की क्रान्ति से लेकर अब तक किया है। पिछले वर्ष अण्‍णा नेतृ‍त्‍व में रामलीला मैदान से जनलोकपाल के लिए देश-दुनिया में जो एक-दो महीने का क्रान्तिकारी उबाल आया था वह शनै:-शनै: समय की मार सहता हुआ बैठ गया। क्‍यों‍कर हम हर बार उस शासन-सत्‍ता से आशा करते हैं, जो हर बार दुर्घटना की दिलाशा के नाम पर कई विश्‍वासघात कर चुकने का दोषी रह चुका है।
    सरकार कानून बना रही है। द्रुत कार्यकारण न्‍यायालय बनेंगे। धारा, साक्ष्‍य, रिपोर्ट, जांच, सुनवाई, निर्णय.....और इनमें लगनेवाला समय इतना व्‍यतीत हो चुका होगा कि लोग गुलाबी क्रान्ति की लाल आग को भूल चुके होंगे। कई लोगों को मारनेवाले और कई लोगों द्वारा मारते हुए प्रत्‍यक्ष देखे जाने के बाद भी धारा, साक्ष्‍य, रिपोर्ट, जांच, सुनवाई, निर्णय...होते-होते आतंकी को मृत्‍युदण्‍ड मिलने में चार वर्ष व्‍यतीत हो गए। कब समझेंगे कानूनची कि जीवन कितना है! साठ वर्ष की औसत आयुवाला मानुषिक जीवन यदि ४,, १६ वर्ष न्‍याय मिलने की प्रतीक्षा में व्‍यतीत होगा, तो न्‍यायिक प्रक्रियाओं से कुढ़न होना स्‍वा‍भाविक है। कानून...इस शब्‍द के व्‍याख्‍याता और पालनकर्ता यदि आम आदमी बनकर जीवन व्‍यतीत करें तो ज्ञात होगा कि इसकी उपयोगिता, प्रासंगिकता कितनी छिछली और निरर्थक हो चुकी है। एकांत में, राह चलते मनुष्‍य के लिए कानून कहां होता है। किसी के साथ दुर्घटना, लूट, अनहोनी होने के बाद कानूनी प्रक्रियाओं का क्‍या औचित्‍य? यह तब सार्थक होता जब इससे सुरक्षा होती, जब इससे रक्षाबोध होता। अंग्रेजी राज से मुक्‍त हुए हमें आज ६७ वर्ष व्‍यतीत हो चुके हैं। यदि कर्ताधर्ताओं को आम आदमी की इतनी चिंता होती तो क्‍या हर दुर्घटना, देशद्रोह के बाद त्‍वरित कानूनी समीक्षा नहीं होती। बलात्‍कार आज ही नहीं हुआ। यदि देश चलानेवाले पहला बलात्‍कार होते ही आज जैसी चिंतनीय अवस्‍था में होते तो स्थिति कुछ और ही होती! क्‍या जनक्रान्ति के स्‍वर से डरकर ही सरकार कानूनों की परिस्थितिजन्‍य समीक्षा करेगी? क्‍या यह उसका स्‍वयं का कर्तव्‍य नहीं है कि वह हर सामाजिक बुराई के उन्‍मूलन के लिए स्‍वयं ही तत्‍काल डट जाए? यदि सरकार को छोटे बच्‍चे की तरह हांककर ये कर वो कर बताने की स्थिति हमेशा बनी रहेगी, तो तब वे हैं ही क्‍यों?
        एक मनुष्‍य को यदि मनुष्‍यता का अनुभव हो, उसे समाज, सरकार का अहसास हो तो इसका कोई तो सुरक्षित आधार होना चाहिए। किसी को राह चलते यदि अपनी संरक्षा पर हमेशा सन्‍देह बना रहे तो उसके मौलिक अधिकारों की किस नैतिकता के बूते रक्षा हो रही है। ऐसे में मनुष्‍य अपना पारिवारिक, सामाजिक, राष्‍ट्रीय कर्तव्‍य पूरा करे या डर और संशय में जीवन गुजारे...?  ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं, जो राष्‍ट्रीय नेताओं के मस्तिष्‍क में स्‍वयं आने चाहिए। कोई निर्दोष बेचारा/बेचारी कभी हत्‍या, कभी बलात्‍कार तो कभी किसी अन्‍य आपराधिक आक्रमण से जान गवां दे तो उसका तो सर्वस्‍व समाप्‍त। तब समाज में कानून रहे या जंगलीपना उसे इसका दोबारा आभास कभी नहीं होगा। ऐसे में समाज के कानून के मायने क्‍या हों!
शापित-शोषित हो चला प्रकृति का हर कण / एक विचित्र राह पर जीवन का विचरण / तनिक ठहर कर सोचें वे] जो हैं सत्‍तासीन / क्षणभंगुर जीवन स्थिति क्‍यों है दीनहीन?

Thursday, January 3, 2013

विश्‍वास करनेवाली बात




अपने रहने के स्‍थान के लिए / जहां मैं एकांतवास हूं / पग बढ़ते
पीछे छूटती कुछ दृष्टियां लोगों की / जिनसे होकर गुजरने पर
/ कभी मैं स्‍वयं को सुन्‍दर समझता और कभी मरणासन्‍न / पीछे छूटा सुन्‍दरतम् गगन / रात्रि में चन्‍द्रमा और भव्‍य सितारों का साथ / मैं स्‍मृतियों के सहार/ अन्‍धेरी चाहरदीवारी की ओर बढ़ता / ह्रदय पर बोझ कि बाहरी वातावरण, आकाश, चन्‍द्रमा और सितारों को मत छोड़ / पर इनको देखते रहने से मन अचेत हो जाएगा / यह सोचकर दिल को पत्‍थर बनाया / आंख बन्‍द करके निद्रालीन हो गया / एक रात्रि के लिए पुन: स्‍मृतिविहीन हो गय/  आशा हुई कि स्‍वप्‍न में संसार की निस्‍सारता का हल मिलेगा /  पर यहां भी मैं भाग्‍यविहीन हू/ एक बात से संतुष्टि होती है / कि अंत:स्‍थल में गुजर चुके लोगों की स्‍मृति से एक हलचल होती है
/ इसका रंग चन्‍द्रमा और तारों की तरह है और ह्रदय आकाश जैसा / यह विश्‍वास करनेवाली बात है।
गद्य स्‍वरुप में कविता