महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, December 6, 2013

१६ दिसम्‍बर क्रान्ति


किसी भी व्‍यक्ति, प्रकृत दृश्‍य, घटना-दुर्घटना से हमारी प्रभावित होने की क्षमता का प्रश्‍न है। ये विचार इसलिए कौंधा क्‍योंकि अचानक जीवन का अर्थ मेरी दृष्टि में चारों ओर से सिमटकर एक सघन व्‍यर्थता में बदल गया है। जैसे-जैसे समय का विस्‍तार हो रहा है, मेरी वैचारिकता में खोखलाहट घर करती जा रही है। लगने लगा है कि मुझ सहित सम्‍पूर्ण मानु‍षिक परिवेश क्‍यों और किसलिए है?
जब हमें अपनी तुष्टि और स्‍वार्थी प्रवृत्ति के अतिरिक्‍त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता तो मनुष्‍यरुपेण हमारी मान्‍यता किसलिए? इसका क्‍या औचित्‍य? ईश्‍वर, सन्‍त, महात्‍मा, महानुभवों, बुदि्धजीवियों से हम, आप, सब लोग मात्र अध्‍ययन शिक्षण के लिए प्रभावित होते हैं। उन जैसा बन जाने की संकल्‍पशक्ति हममें आ ही नहीं पाती।
प्राकृतिक व्‍यवस्‍था और प्रकृति हमारी कहानी, कविता, चित्रकारी, अनुसन्‍धान और वैज्ञानिक जिज्ञासाओं की तुष्टि हेतु उपस्थित हो पाती है। हम प्रकृति से प्रकृति जैसा बनने की प्रभाविता को जीवनपर्यन्‍त स्थिर नहीं रख पाते। बल्कि वास्‍तविक जीवन में हमने प्रकृति को नष्‍ट करने के अतिरिक्‍त कोई अन्‍य कार्य नहीं किया।
इसी प्रकार सामाजिक घटनाएं-दुर्घटनाएं तथा दैवीय और प्राकृतिक आपदाएं भी हमें तब तक ही संवेदना के केन्‍द्र में रख पाती हैं, जब तक इनका आत्‍मप्रभाव विद्यमान रहता है। आत्‍मप्रभाव हमारे जीवन का सुचारु विचार नहीं बन पाता। हमारी चेतना और इन्द्रियां अधिक समय तक सभ्‍यता, सादगी, सदाचार, सद्बुदि्ध, सद्भावना से रहने में बेचैनी महसूस करने लगती हैं। हमारा परोपकारी भाव और सदाशयता का विचार स्‍वयं के संकल्‍प से नहीं अपितु भीड़ के प्रवाह से उद्वेलित होता आया है। तभी तो किसी अच्‍छे-बुरे अनुभव और घटना से प्रभावित होने की हमारी क्षमता एक सार्थक सामाजिक लक्ष्‍य तक पहुंचे बिना ही मरणासन्‍न हो जाती है। अन्‍त में हम पुन: दैनंदिन की उलझनों में फंस जाते हैं।
पिछले साल सोलह दिसम्‍बर को हुई दुष्‍कर्म की घटना के सन्‍दर्भ में उपर्युक्‍त भाव जागृत हुआ है। सोलह दिसम्‍बर २०१३ को इस लोमहर्षक घटना को एक साल पूरा हो जाएगा। मौत के साथ एक साल गुजार चुकी पीड़िता को इस दिन श्रृद्धांजलि अर्पित होगी। दुष्‍कर्म के परिणामस्‍वरूप मौत की शिकार हुई लड़की के बहाने समाज में अपराधों के विरुद्ध संगठित आक्रोश जताने की जो प्रवृत्ति उजागर हुई है आज उसे स्‍थायित्‍व प्रदान करने की सख्‍त जरूरत है। अपराधों के प्रति युवाओं का गुस्‍सा मात्र फैशन या भेड़चाल के कारण न हो। गुस्‍सा जताने, संगठित होकर अपराधी को सजा दिलवाने के लिए वे स्‍वैच्छिक रूप से आगे आएं।
सोलह दिसम्‍बर २०१२ वाक्‍य के साथ अब क्रान्ति शब्‍द जुड़ गया है। कुछ दिन पहले कार्यालय आते समय सड़क किनारे खड़े एक लड़के ने मुझे एक पर्चा थमाया। इस पर १६ से २९ दिसम्‍बर २०१३ तक दामिनी के माध्‍यम से उस जैसे अत्‍याचार झेल रही दामिनियों के लिए एकजुट होने का अनुरोध किया गया है। पर्चे में युवा संगठन की ओर से बलात्‍कार, यौन-शोषण को रोकने के लिए नौ महत्‍वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इन्‍हीं के लिए आवाज बुलन्‍द करने के उद्देश्‍य से १६ दिसम्‍बर से बारह दिन का प्रदर्शन रखा गया है।
ये अच्‍छा है कि युवावर्ग सामाजिक भ्रष्‍टाचार, यौन-शोषण, महिला बलात्‍कार के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज उठाने जैसी पहल कर रहे हैं, लेकिन उन्‍हें इन बुराइयों के आधारभूत कारणों की पड़ताल भी अवश्‍य करनी चाहिए, जिसमें पाश्‍चात्‍य जीवन-शैली के प्रति बढ़ते उनके रुझान और इनके ओछे प्रयोग भी सहायक हैं। आज युवाओं को अपने अन्‍दर भारतीयता की अन्‍तर्दृष्टि उत्‍पन्‍न करने की जरूरत है। कोई भी आन्‍दोलन, सामाजिक उद्देश्‍य इसके बिना संचालित नहीं हो सकता। हालांकि विदेश में बस चुके या विदेशी जीवन-शैली को अपने जीवन में रचा-बसा चुके लोग एक सीमा के बाद इस जीवन से बुरी तरह ऊब जाते हैं। उन्‍हें कहीं न कहीं ये बात सालती रहती है कि उनके जीवन की सार्थकता अंतत: अपनी ही संस्‍कृति के साथ चलकर है, लेकिन इस विचार-स्थिति तक आते-आते जीवन के महत्‍वपूर्ण युवा-वर्ष निकल चुके होते हैं। आज के युवाओं को इस बात को जल्‍दी ही ग्रहण करना होगा और सार्थक जीवन उद्देश्‍यों को युवा रहते-रहते ही प्राप्‍त करना होगा।

24 comments:

  1. कौंधे तीखे प्रश्न क्यूँ, क्यूँ कहते हो व्यर्थ |
    जीवन के अपने रहे, सदा रहेंगे अर्थ |

    सदा रहेंगे अर्थ, रहेगी मनुज मान्यता |
    बने अन्यथा देव, यही है मित्र सत्यता |

    सदाचार है शेष, अन्यथा गिरते औन्धे |
    वह छब्बिस की रात, आज भी अक्सर कौंधे ||

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  3. उस दिन अर्थात 16 दिसंबर को बहुत कुछ होगा प्रचार प्रसार, लोगों को जागरूक बनाने के लिए भी बहुत कुछ कहा जाएगा किया भी जाएगा। मगर उस सब से होने जाने वाला कुछ नहीं है। एक दिन लोग जोश दिखाकर अगले दिन फिर ठंडे पड़ जायेंगे। यही होता आया और यही होगा। बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो वास्तविकता में इस समस्या के समाधान हेतु कुछ करना चाहते हैं। बाकी सब सिर्फ भेड़ चाल वाली जनता ही है। और रही बात इस समस्या के पीछे होने वाले कारण की तो सबको पता है कि कहीं न कहीं पश्चमी सभ्यता की नकल और फूहड़ चलचित्र इसका अहम कारण है। मगर मानेगा कोई नहीं इन टोटल यह तो रेगिस्तान में से एक मुट्ठी रेत वाली बात है। अर्थात भारत की पूरी आबादी में सिर्फ कुछ मिट्ठी भर लोग हैं या होंगे जो वास्तव में इस तरह के अपराधों को ख़त्म करना चाहते है।

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  4. बहुत ही सही और सार्थक सवाल उठाए हैं विकेश जी । दुर्घटनाएं ,संवेदनाएं ,मानव की पीडा ..कुछ भी हमें उद्वेलित नही कर पाते या कि देर तक नही मन में टिक पाते । क्यों । क्योंकि हम व्यक्तिवादी होगए हैं । खाओ पियो मौज करो की पास्चात्य जीवनशैली के आदी होते जारहे हैं ।जब तक कि घटना सीधे हमसे जुडी नही होती । इसमें तमाम चैनलों का बहुत बडा हाथ है जिन पर सिर्फ मनोरंजन है । स्विच आन करो और सारी चिन्ताएं विस्मृत । भागदौड की जिन्दगी भी जिसमें दो पल ठहर कर सोचने की फुरसत नही है ,इसका कारण है ।

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. १६ दिसंबर की घटना से देश के युवा के सोच में भी बहुत परिवर्तन हुआ है जो सही सन्देश है सारगर्भित रचना .....

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  7. बुराइयों की और आकृष्ट होना हमेशा ही सहज रहा है. इसीलिए पाश्चात्य जीवन से लोग बुरी चीजों को झट से नक़ल कर मिथ्या-हर्ष का अनुभव करने लगते हैं. पाश्चात्य जीवन की कई सारी अच्छाइयां भी है जिन्हें कोई सीखना नहीं चाहता. उदाहरण के तौर पर- इनकी कर्तव्यनिष्ठा, पारदर्शिता और नियमपालन. अपने यहाँ कई स्तरों पर परिवर्तन की ज़रुरत है. तभी पूर्ण सामाजिक परिवर्तन संभव होगा. अच्छी बात है कि हम बदलाव की ओर अग्रसर हैं.

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  8. सार्थक, गंभीर प्रश्न उठाया है आपने ... दरअसल आज समाज में इतनी घटनाएं प्रतिपल हो रही हैं की ज्यादा देर तक सोचने का समय ही नहीं रहा किसी के पास ... फिर अर्थ की दौड़ जो नई नई हमारे समाज में आई है कई अन्य बातों के साथ वो भी सोचने नहीं देती ज्यादा देर तक ... सच है मूल्यों की लगातार गिरावट और अपने जीवन दर्शन को न समझने की वजह भी एक बड़ा कारण है ...

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  9. सदाचार है शेष, अन्यथा गिरते औन्धे |
    वह सोलह की रात, आज भी अक्सर कौंधे ||

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  10. ये एक विकट यक्ष प्रश्न है कि हम आखिर किस संस्कृति को सही व निर्दोष कहें... हर बार इस तरह के हादसे होने पर पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण व यूरोप-अमेरिका की सभ्यता पर लानत भेजते रहते हैं, पर अपने अंदर नहीं देखते....
    बहुत बेहतरीन व मौजू लिखा है आपने...

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  11. आज युवाओं को अपने अन्‍दर भारतीयता की अन्‍तर्दृष्टि उत्‍पन्‍न करने की जरूरत है। कोई भी आन्‍दोलन, सामाजिक उद्देश्‍य इसके बिना संचालित नहीं हो सकता। हालांकि विदेश में बस चुके या विदेशी जीवन-शैली को अपने जीवन में रचा-बसा चुके लोग एक सीमा के बाद इस जीवन से बुरी तरह ऊब जाते हैं। उन्‍हें कहीं न कहीं ये बात सालती रहती है कि उनके जीवन की सार्थकता अंतत: अपनी ही संस्‍कृति के साथ चलकर है, लेकिन इस विचार-स्थिति तक आते-आते जीवन के महत्‍वपूर्ण युवा-वर्ष निकल चुके होते हैं।

    बहुत गहरी बात कह दी आपने..जहाँ तक क्रांति की बात है तो लोग सिर्फ बाहरी तौर पे दुनिया में ही क्रांति चाहते हैं अपने अंतर्तम में नवक्रांति का संचार करना कोई नहीं चाहता।

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  12. ‘सोलह दिसम्‍बर २०१२’ वाक्‍य के साथ अब ‘क्रान्ति’ शब्‍द जुड़ गया है। कुछ दिन पहले कार्यालय आते समय सड़क किनारे खड़े एक लड़के ने मुझे एक पर्चा थमाया। इस पर १६ से २९ दिसम्‍बर २०१३ तक दामिनी के माध्‍यम से उस जैसे अत्‍याचार झेल रही दामिनियों के लिए एकजुट होने का अनुरोध किया गया है। पर्चे में युवा संगठन की ओर से बलात्‍कार, यौन-शोषण को रोकने के लिए नौ महत्‍वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इन्‍हीं के लिए आवाज बुलन्‍द करने के उद्देश्‍य से १६ दिसम्‍बर से बारह दिन का प्रदर्शन रखा गया है।

    समाज सापेक्ष सार्थक मंथन।

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  13. समाज सापेक्ष सार्थक मंथन। बहुत मौज़ू विषय उठाया है आपने हमारे वक्त का जला हुआ सवाल लिए -

    ‘सोलह दिसम्‍बर २०१२’ वाक्‍य के साथ अब ‘क्रान्ति’ शब्‍द जुड़ गया है। कुछ दिन पहले कार्यालय आते समय सड़क किनारे खड़े एक लड़के ने मुझे एक पर्चा थमाया। इस पर १६ से २९ दिसम्‍बर २०१३ तक दामिनी के माध्‍यम से उस जैसे अत्‍याचार झेल रही दामिनियों के लिए एकजुट होने का अनुरोध किया गया है। पर्चे में युवा संगठन की ओर से बलात्‍कार, यौन-शोषण को रोकने के लिए नौ महत्‍वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इन्‍हीं के लिए आवाज बुलन्‍द करने के उद्देश्‍य से १६ दिसम्‍बर से बारह दिन का प्रदर्शन रखा गया है।

    समाज सापेक्ष सार्थक मंथन।

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  14. इस एक साल में इस तरह की बड़ी-बड़ी सुर्खियां तो कुछ और संकेत भी दे रही है.. वैसे क्या नीचता की भी नक़ल होती है या फिर कुकृत्य करने वाले ऐसे ही होते हैं ..

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  15. जिसमें पाश्‍चात्‍य जीवन-शैली के प्रति बढ़ते उनके रुझान और इनके ओछे प्रयोग भी सहायक हैं। आज युवाओं को अपने अन्‍दर भारतीयता की अन्‍तर्दृष्टि उत्‍पन्‍न करने की जरूरत है। कोई भी आन्‍दोलन, सामाजिक उद्देश्‍य इसके बिना संचालित नहीं हो सकता। हालांकि विदेश में बस चुके या विदेशी जीवन-शैली को अपने जीवन में रचा-बसा चुके लोग एक सीमा के बाद इस जीवन से बुरी तरह ऊब जाते हैं। उन्‍हें कहीं न कहीं ये बात सालती रहती है कि उनके जीवन की सार्थकता अंतत: अपनी ही संस्‍कृति के साथ चलकर है, लेकिन इस विचार-स्थिति तक आते-आते जीवन के महत्‍वपूर्ण युवा-वर्ष निकल चुके होते हैं।

    आपकी इन बातों पर कुछ कहना चाहूंगी।
    संस्कृति क्या है ?
    संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है, जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु, पहनावा आदि में परिलक्षित होती है। संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है।
    प्रत्येक देश की अपनी संस्कृति होती है और वह उनके लिए होती है और उनके लिए सही होती है । सबसे पहली बात भारतीय उसे क्यों अपना रहे हैं जब उसको वो पचा नहीं पा रहे हैं ??? दूसरी बात वही संस्कृति यहाँ तो कोई बवाल नहीं कर रही है, फिर वहाँ कैसे कर रही है ??? इसलिए ये कहना कि पाश्चात्य संस्कृति के प्रति भारतीयों का रुझान ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है गलत होगा। ऐसी घटनाएँ हमारे समाज में अनादिकाल से व्याप्त रही हैं और होती ही रही हैं फर्क सिर्फ इतना है कि अब लडकियां बोल रही हैं और आधुनिक तनिकी उनको सामने लाने में सक्षम हो रहीं हैं । इसलिए ये सोचना कि आज लोग अंग्रेजियत ज्यादा अपना रहे हैं इसलिए ये सब हो रहा है, सरासर गलत होगा । बल्कि हमारे बुजुर्ग यही कहते हैं कि जब अंग्रेज थे तो समाज में अंग्रेजियत ज्यादा थी लेकिन लोगों में ज्यादा अनुशासन भी था क्योंकि कानून कठोर थे और अब इसके चश्दीद गवाह हम भी हैं, यहाँ विदेशों में बहुत ही अनुशासित समाज है.।

    फिल्में समाज का आईना होतीं है आप कोई भी पुरानी फ़िल्म उठा कर देख लें आपको उसमें एक रेप सीन ज़रूर मिलेगा, महिलाओं के साथ अति करते हुए जमींदार भी मिलेंगे और ये सारे सीन मनोरंजन के नाम पर डाले जाते हैं । किस संस्कृति की बात कर रहे हैं आप ?

    सभ्यता की बात करें तो पश्चिम में न तो खाप पंचायत है न ही ऑनर किलिंग होती है, इसलिए ये भी वहाँ से नहीं आयी है.। कानून इतना सख्त है कि आपको सभ्य रहना ही होगा। हो-हँगामा, धमा-चौकड़ी यहाँ उस तरह नहीं होती जैसे भारत में होती है.। भारत में अनुशासन की कमी है और कानून व्यवस्था लचर है, जब दोनों ही चीज़ें नदारत हों तो भगवान् ही मालिक होगा

    रही बात विदेशों में रहने वालों के ऊब जाने की तो इसका कारण है, अनुशासित जीवन। जीवन के हर कदम पर इतना अनुशासन है कि उनसे लोग ऊब जाते हैं । एक्साइटमेंट के लिए यहाँ के लोग तरह-तरह के स्पोर्ट्स खेलते हैं, जैसे बंजी जम्पिंग, अब इस उम्र में हम तो वो नहीं कर सकते, हालांकि हमारे बच्चे करते हैं.। जबकि वहाँ मनोरंजन की भरपाई या तो राजनैतिक गतिविधियों, घोटालों के बवालों से होती है या फिर ऐसी किसी दुखद घटना से.। भारत में लोगों के पास वक्त बहुत है और यहाँ वक्त की कमी है.। ईमानदारी से अपनी नौकरी करने में ही लोगों का समय निकल जाता है इसलिए अधिकतर लोगों के पास वक्त नहीं होता। राजनीति यहाँ एक नौकरी है और राजनेता नौकर, जो अपना काम तरीके से करते हैं इसलिए कोई न्यूज़ भी नहीं आती जो लोगों का मनोरंजन हो.। भारत में संस्कृति के नाम पर कर्म-काण्डों का रेला लगा रहता है, बाकि कसर दिखावा और कॉम्पिटिशन में पूरा हो जाता है, इन्हीं बातों को विदेशी भारतीय मिस करते हैं.। एक वाक्य में अगर मैं कहूं तो हम विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए 'प्रॉब्लम ये है कि कोई प्रॉब्लम नहीं है'

    बाकी आपने ज्वलंत विषय पर लिखा है, इस दुखद घटना पर जितना भी लिखा जाए कम ही होगा। ये एक ऐसी घटना है जो खुल कर सामने आयी और सड़े हुए समाज का कच्चा चिटठा खोल गयी वर्ना ऐसी घटनाएं पहले भी हुईं हैं और उसके बाद भी हो ही रही हैं.। कानून जब तक सख्त नहीं होगा तब तक अनुशासन नहीं आएगा और तब तक ये सब होता ही रहेगा :(

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  16. मेरा तो ऐसा मानना है भाई कि अब सिर्फ युवा वर्ग को यी नहीं बल्कि सभी हिन्दुस्तानियों को ऐसे कुकृत्यों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के लिए एक जुट हो जाना चाहियें और ऐसे काम करने वाले भेड़ियों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहियें | मैं आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमति रखता हूँ |

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  17. जिसमें पाश्‍चात्‍य जीवन-शैली के प्रति बढ़ते उनके रुझान और इनके ओछे प्रयोग भी सहायक हैं

    सत्य !

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  18. शुक्रिया विकेश भाई। प्रासंगिक विचार मंथन।

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  19. सटीक, सामयिक प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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  20. आध्यात्मिकता हल है। कुछ अवकाश सर्वेश्वर के लिए भी हो जीवन में। सिर्फ अति -इन्द्रिय सुख बोध सब दोषों का महादोष है। शुक्रिया भाई साहब आपकी टिपण्णी का।

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  21. बहुत सारगर्भित चिंतन...आवश्यकता है इस क्रांति की भावना को जाग्रत रखने की...

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  22. कुछ घटनायें अन्दर तक झकझोर जाती हैं।

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  23. युवा वर्ग सदैव परिवर्तन का वाहक रहा है। विदेश के बारे में स्वप्न मंजूषा जी की बात को मेरा अनुमोदन है।

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