महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

सालों पुराना एक प्रेमगीत


चलती जाती जिन्‍दगी में तेरा याद आना
हाय जान जाती है
तू क्‍यों मुझे दिल से
नहीं बुलाती है
कहां छुपी है तेरी मुहब्‍बत
कहां मैं तेरे दिल को जान लूंगा
कब कैसे तेरी जिन्‍दगी को अपना मान लूंगा
कब तू सामने हो औ कब मैं तेरा नाम लूंगा
तेरे लिए होनेवाली बन्‍दगी में हाय खुदा का आ जाना
और आके दुआ देना कि तुम दोनों को मैं मिलाऊंगा
बेवफा की बेवफाई को मिटाकर प्‍यार करना सिखाऊंगा
कब ये दो प्राण आमने-सामने हों
और कब मैं फूल बरसाऊंगा

दिल के करीब आके
तुमने क्‍यों धोखा दिया
मंजिलें जो मुहब्‍बत की बनीं
उनको क्‍यों दरका दिया
क्‍या मेरे चेहरे ने तुम्‍हें प्‍यार करना न सिखाया
क्‍यों मेरी किसमत ने तुम्‍हें अपना न बनाया
मजबूर होके तुम्‍हें छोड़ना पड़ा है मुझको
मंजूर शायद है ये आसमां और धरती को
ये मेरे आंसू मेरे सच्‍चे प्‍यार का इजहार करते हैं
दुनिया में हम जैसे क्‍यों मिलके बिछड़ जाते हैं
कैसे मैं देखूं तुमको कैसे महसूस कर लूं
बुरी जो तेरी सच्‍चाई उससे कैसे किनारा कर लूं
यादों के अम्‍बार लगा के उनको क्‍यों बिखरा दिया
मैं तो धोखेबाज न था मुझको क्‍यों धोखा दिया
हरेक सांस जो तेरे साथ रहकर चली
कसम से उसमें एक अपनापन था
बुरे दौर में आदमी लाख बुराइयां सोचता
पर मैं इन सबसे मीलों तक अनजान था
दिल के जर्रे में एक खयाल उठा कि हम एक सांस बन जाएं
क्‍यों न एक साथ एक पल के लिए जिएं फिर साथ मर जाएं
जालिम जमाना पग-पग पर सितम ढाएगा
हम एक कदम साथ आगे बढ़ाएंगे
तो उस पर अनगिन रोड़े अटकाएगा
काश तेरा वो चुप हो जाना
गुम होके किसी डर से सिमट जाना
मेरे चेहरे की भलाई से असर खाके हो
मैं क्‍या मेरा हर हाल इस दुनिया में
तेरे प्‍यार भरे अहसास से बल खाके हो
तू सोचना अपने को कयामत मेरी नजर के सहारे
मैं पागल, दीवाना और मस्‍ताना हुआ जाता हूं
जब तू जीभर जी ले दुनिया को
और हो तब कहीं चलने को तैयार
उस पल तक तेरा ही बस तेरा रहेगा इंतजार
तू बन सकती थी कोई मंजिल किसी के लिए
किसी भोलेपन के सहारे
डुबोने का काम हरेक ने किया तुझे
सपनों में ही भटकते रहे तेरे किनारे
तू उदाहरण हो सकती थी दुनिया के होने का
पर तू रुलाई गई सताई गई बुरी तरह
तेरे अन्‍दर के मन को चैन पाने का कोई विचार न हुआ
तूने फिर जैसे अच्‍छाई और सच्‍चाई से कर लिया विरह
पर मैं तेरे मुखड़े को देखके कोई जीवन सा पा गया
तुझे राह में लाने के लिए मैं प्रार्थनाओं में समा गया
मेरी अच्‍छाइयों के सहारे मेरी जितनी भी प्रार्थना सफल हो
वो आपके जीवन का हंसता-मुस्‍कुराता-चमचमाता कल हो

16 टिप्‍पणियां:

  1. अरे गज़ब...क्या बात है आज तो रंग ही कुछ और है आपकी पोस्ट का विकेश जी आपके अंदाज़े ब्यान ने दिल जीत लिया हमारा...:)सच बहुत अच्छा लिखा है आपने...कब तू सामने हो औ’ कब मैं तेरा नाम लूंगा तेरे लिए होनेवाली बन्‍दगी में हाय खुदा का आ जाना...दिल छू गयी यह पंक्तियाँ।

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  2. ....तो आज आपने वही गलती दुहरा दी... जिसे न करने की शपथ लोग न जाने कितनी बार लेते हैं...वैसे भी पहाड़ के लोग काफी मासूम व भोले होते हैं, कुछ नहीं छिपाते...पुराने पन्नों से निकली मदहोश हवाएं .....

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  3. आज तो अंदाज़-ए-बयाँ कुछ और है और बढ़िया है

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. बहुत सुंदर प्रेमगीत से सराबोर पोस्ट.... बहुत सुंदर गीत ....

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  6. सादगी, सहजता और सरलता से कही है आपने अपनी बात ... सालों पुरानी पर आज भी ताज़ा दुआ की तरह ..

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  7. प्रार्थनाओं में समा कर ही अविरल भाव को बहाया जाता है जिसमें बह रहा है सबकुछ.. सबकुछ..

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  8. बहुत स्पष्ट ढंग से आपने बात रखी है. प्रवाह भी उतना ही अच्छा.

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  9. हथेली से तिनका छूटने का एहसास प्रेम का विरह पक्ष ही कराता है। विरह में जो रोया न हो किसी के कौन कहता है उसने प्यार किया है भगवान की याद में जब तक भक्त रोये न भगवान् न मिले।

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  10. अक्सर गम्भीर लेखन करने वाली कलम का यह रंग एकदम अलग है..अच्छा लगा.
    कहते हैं प्रेम और दुःख साथ चलते हैं.
    वेदना के स्वर हैं मगर अच्छी लगी अभिव्यक्ति.
    'मेरी अच्‍छाइयों के सहारे मेरी जितनी भी प्रार्थना सफल हो वो आपके जीवन का हंसता-मुस्‍कुराता-चमचमाता कल हो' ..अब इससे बेहतर दुआ क्या होगी?

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  11. पर मैं मेरे मुखड़े को देखके कोई जीवन सा पा गया
    तुझे राह में लाने के लिए मैं प्रार्थनाओं में समा गया
    मेरी अच्‍छाइयों के सहारे मेरी जितनी भी प्रार्थना सफल हो
    वो आपके जीवन का हंसता-मुस्‍कुराता-चमचमाता कल हो

    हर समय का एक सच होता है उस समय का भी एक सच था -

    तुम भी प्यार किया करतीं थीं ,

    ख़्वाब दिया करतीं थीं जागती आँखों को ,

    सीढ़ी बनाके चढ़ गईं ,

    अपनी ही महत्वकांक्षाओं में बिखर गईं ,
    पर मैं आज भी वहीँ हूँ ,

    उसी तरह करता हूँ ,

    प्यार।

    शुक्रिया आपकी टिपण्णी के लिए।

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-12-13) को "वो एक नाम (चर्चा मंच : अंक-1461)" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!!

    - ई॰ राहुल मिश्रा

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  13. प्रार्थना के साथ प्रेम अभिव्यक्ति की अनूठा प्रयास -बहुत सुन्दर
    नई पोस्ट विरोध
    new post हाइगा -जानवर

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  14. सुन्दर अहसास लिए बहुत ही सुन्दर प्रेमपगी रचना...

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