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रविवार, 1 दिसंबर 2013

समय की मृत्‍यु

भी-कभी जब आज का समय भयंकर रूप से डसता है और इसका दर्द गहरे उतरता है तो जीवन के गुजर चुके समय की यादें भावुक कर देती हैं। तुलनात्‍मक रूप से पहले का समय ज्‍यादा सुखद प्रतीत होने लगता। ये सोच कर और भी टीस होती कि मेरे जैसों के जन्‍म से भी पूर्व का मनुष्‍य जीवन-समय जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं के स्‍तर पर तो अच्‍छा ही रहा होगा। जहां बैठ कर यह सब लिख रहा हूँ वही धरती बीस साल पहले कितनी सुहावनी थी। बच्‍चों से लेकर बुड्ढों का जीवन कितना सुखमय और स्‍वाभाविक था! खाने-पीने की वस्‍तुओं को लेकर आज की तरह की चिंताएं नहीं थीं। अब इतनी कल्‍पनाशक्ति भी नहीं बची, जिसके सहारे अपने जीवन के व्‍यतीत सुनहरे समय के साहित्य-संस्‍मरण की प्रभावी प्रस्‍तुति कर सकूं। इक्‍कीसवीं सदी का मानव-जीवन जैसे हवा पर सवार है। भागदौड़, अतिगतिमान होने के कारण मानव व्‍यवहार से जीवन की मूलगति गायब हो गई है। 
संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से 
सजा क्षितिज
  
आज दिनभर घर पर ही रहा। शाम को घर की छत पर टहलते हुए मार्गों, उपमार्गों पर दनदनाते हुए दौड़ते वाहनों का सामूहिक शोर सुनाई दे रहा है। तेजी से चलते भारी वाहनों की ध्‍वनि तो जैसे तूफान की आहट लगती। तेज बजते हॉर्न, दूर मसजिद के लाउडस्‍पीकर से आनेवाली लहराती आवाज और मनुष्‍यों के कोलाहल के प्रभाव में सुन्‍दर शाम से कुछ समय के लिए मोहभंग होता है। शान्ति शब्‍द जैसे शहर के शब्‍दकोश से समाप्‍त हो गया।
आज तीस तारीख। नवम्‍बर बीतने को है। गुलाबी ठंड पड़ रही है। सांझ ढलना देख रहा हूँ। धरती को स्‍पर्श करता आकाश का क्षितिज संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से सजा हुआ है। पक्षियों के झुण्ड पंखों को फड़फड़ाते हुए अपने गंतव्‍य की ओर बढ़ रहे हैं। धूल-धूसरित पेड़-पौधे बुझे सहमे जैसे वर्षा की बौझारों के इंतजार में खड़े हों। ऊपर दक्षिणी आसमान के कोने पर एकमात्र तारा चमक रहा है। मेरी भावनाएं मुझे प्रतिदिन चांद, तारे, सूरज, धूप, हरे-भरे पेड़ों, सुवासित-सुन्‍दर पौधों के लिए आकृष्‍ट करती रहती हैं। अगर ऐसा न हो तो मेरा जीवन अन्‍धकार की काल-कोठरी बन जाए। वैसे भी जहां मैं रहता हूँ वह देशस्‍थान कलिकाल के उत्‍तरकाण्‍ड में प्रवेश कर ही चुका है। सामाजिक रूप से जीवन परिस्थितियां हताशा और निराशा ही उत्‍पन्‍न कर रही हैं। ऐसे में प्रकृति के घटकों पर ध्‍यान न लगे तो समझ लेना चाहिए कि मनुष्‍य काठ का बन चुका है।
प्रकृति से संवाद करते हुए मालूम पड़ा कि वह बच्‍चों की खिलखिलाहट के लिए बेचैन है। उसे अपने कृत्रिम आंगन में बच्‍चों के खेलने-कूदने, दौड़ने-भागने, हंसने-रोने की गतिविधियां देखनी हैं, लेकिन फिर उदास होते हुए उसने खुद ही स्‍वीकार कर लिया कि इसमें बच्‍चों का क्‍या दोष। उन्‍हें जैसा वातावरण मिलेगा उनका बर्ताव वैसा ही होगा। उनके लिए मेरा असली रूप बचा ही नहीं तो वे बेचारे घर से बाहर आकर करेंगे भी क्‍या। कंक्रीट के जंगल में बन्‍द कर उन्‍हें दिए गए प्‍लास्टिक के खिलौने उनको संवेदन कैसे बना सकते हैं। प्रकृति की चिंता में शामिल मैंने इधर-उधर नजरें घुमाईं। वाकई बच्‍चे शाम के वक्‍त भी घर-आंगन, सड़क पार्क में मौजूद नहीं हैं।  
क्षितिज पर पसरे आकाश के कोनों ने रंग बदलना शुरु कर दिया है। अब वहां अकल्‍पनीय रंगों की रेखाएं, गुच्‍छे और छींटें फैल चुके हैं। नभ की दक्षिण दिशा में झिलमिलाता, झिलझिमाता सितारा अपनी विशेष चमक से बेचैन करता रहा। इस समय सच में ये लग रहा है कि मैंने अपनी जिन्‍दगी के खाते में कितनी खुशियां जमा कर दी हैं! धरती पर खड़े होकर आकाश को देखता मैं इन दोनों को सदैव के लिए अपने बांहपाश में बांध लेना चाहता हूँ। मैं समाज, देश के किसी नियम के प्रति इसके द्विअर्थी, निम्‍नअर्थी होने के कारण कभी ईमानदार नहीं रहा, लेकिन अभी बड़े जोर से ये अनुभव हो रहा है कि प्रकृति के नियमों के प्रति मैं भौतिक ही नहीं आत्मिक रूप से भी समर्पित हूँ।
मैं देखता हूँ हर नई सुबह में प्रकृति उदास है। भौतिकीय प्रयोगों ने उसे एक तरह से बर्बाद कर दिया। उसे अपना पुराना समय याद आता तो वो उसके प्रभाव में विलीन हो जाती और वर्तमान की अपनी हालत देख कर सिसकने लगती। मैं उसका मन मजबूत करूं तो कैसे क्‍योंकि प्रकृति प्रेम में जब तक प्रत्‍येक मनुष्‍य विचलित नहीं होगा तब तक इसका भला नहीं हो सकता। लगता है अब संसार-समय की आयु बीतने वाली है। समय का हृदय प्रकृति रुकती है, नष्‍ट होती है तो समय की मृत्‍यु निश्चित है। (30 नवम्‍बर 2013 की सांझ का अनुभव)

15 टिप्‍पणियां:

  1. यादें सुखद अतीत की, उज्जवल दिखे भविष्य |
    वर्त्तमान की क्या कहें, भटके चंचल *ऋष्य |

    भटके चंचल *ऋष्य, दृश्य दिखता है मारक |
    थामे विशिख कराल, खड़ा सम्मुख संहारक |

    यह रहस्य है गूढ़, तवज्जो इनपर ना दे |
    वर्त्तमान को बूझ, याद कर कर के यादें-
    *विशेष मृग

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  3. वर्त्तमान समय की सुन्दर व्याख्या एक वृद्धा से सुना कि कलियुग भी बीत चुका है . अब फटयुग चल रहा है मतलब पूछा तो उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे सब धरती में समा जाएगा.. तब समय बेचारा अकेला रह जाएगा .. मरेगा तो नहीं..

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  4. अब संसार-समय की आयु बीतने वाली है। समय का हृदय ‘प्रकृति’ रुकती है, नष्‍ट होती है तो समय की मृत्‍यु निश्चित है। सच है गहन भाव अभिव्यक्ति...

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  5. प्रकृति के रंगों में शान्ति है, विविधता के साथ भी। वही अपेक्षित है जीवन में।

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  6. सच में आज के समय जीवन एक व्यथा के सिवाय कुछ नहीं..आज कंप्यूटर और स्मार्ट फ़ोन के ज़माने में बच्चों में प्रकृति प्रेम रहा कहाँ है..मानवीय संबंधों की एक दुखद स्तिथि...दिल को छूता एक प्रभावी आलेख...

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  7. इस भागमदौड़ की जिंदगी... तेज रफ़्तार से दौड़ रही है... प्रकृति को लोग भूल रहें है कृत्रिमता को अपना रहें... लेकिन हमें अपनी ंप्रकृति को सहेजना होगा.....

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  8. आधुनिकता और कृत्रिमता से काफी हद तक जीवन का सच्चा आनंद छीन लिया है. ख़ास कर महानगरीय जीवन की सरंचना ही ऐसी है कि अनचाहे भी ये विलगाव हो जाता है. बहुत अच्छा लगा पढ़कर.

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  9. कलिकाल के लिए मन्त्र है -हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे ,हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे। फिलवक्त प्रकृति और पुरुष का परस्पर संपर्क टूटा हुआ है काम क्रोध लोभ मद की चलती है प्रकृति नटी पिसती सिसकती है। एक सूक्ष्म परिवरतन की टोह लेती चलती है आपकी यह पोस्ट।

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  10. ‘प्रकृति’ रुकती है, नष्‍ट होती है तो समय की मृत्‍यु निश्चित है... Sahmat...

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  11. संसार का तो पता नहीं पर हमारी आयु तो बीत ही रही है ... और जो है वो सब हम के होने से ही है ... प्रलय मिथ्या है या सच ... समय के गर्भ में है ये सब ...

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  12. kuchh samay pahle tak mujhe bhi bahut shouk tha shaam ko chhat par jaakar aasman ko, baadlon ko, mousam ko dekhna .. bahut achha lagta tha .. par ek toh ab itni unchi buildings ban gai hai ki sunset bhi nahi dikhta .. ab toh andhera hone k baad sadak pe akele ghoomne ka bhi zamanaa nahi raha.

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  13. परिवर्तन प्रकृति कके लिए भी आवश्यक है ..मानवीय अवांछित कारणों से जो परिवर्तन प्रकृति को झेलने पड़े उसका बदला वो लेती ही है ..हाँ,समय बूढ़ा होता है मगर मरता नहीं है.

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