Saturday, November 9, 2013

प्रलय की परिभाषा


न 2012 में प्रलय की भविष्‍यवाणी करनेवाले ने ये न सोचा होगा कि उसके प्रलय का तात्‍पर्य लोग धरती के सम्‍पूर्ण विनाश से लगाएंगे। वैसे भी अगर कहीं से या किसी से लोग जो कुछ भी सुनते हैं या सीखते हैं, वे उसमें अपने अनुसार अपना मनोविज्ञान जरुर लगाते हैं। एक तरह से वे निश्चित घटनाओं या बातों को अपनी कपोल कल्‍पनाओं से अपने अनुकूल साधने की कोशिश करते हैं। प्रलय के रुप में आए दिन होनेवाली घटनाओं-दुर्घटनाओं को वे प्रलय नहीं मानेंगे। उनकी नजर में प्रलय तब सार्थक होगी जब इसके बाद इसका मंथन करने के लिए कोई मानवजीवन ही कहीं अस्तित्‍व में नहीं होगा। उन्‍हें केदारनाथ मन्दिर की घटना कहीं से, किसी दृष्टिकोण से प्रलय जैसी नहीं लगी। वे वर्ष-दर-वर्ष मौसम के दुष्‍प्रभावों से होनेवाले खतरनाक परिवर्तनों को कुछ दिन मौसम ठीक रहने के कारण शीघ्र ही भूल जाते हैं। दुनियाभर में लगभग शान्‍त महीनों में भी आनेवाले तूफान, आन्‍धी, चक्रवात, अतिवृष्टि की घटनाएं इतनी जल्‍दी सामूहिक विस्‍मृतियों में कैद हो जाती हैं कि लगता है कुछ हुआ ही नहीं।
सुनता था कि सन्‍त जनता के विवेक को जगाने का काम करते हैं। वे जीवन की क्षणभन्‍गुरता का प्रवचन कर लोगों को पारिवारिक, सामाजिक दायित्‍व अच्‍छे से निभाने के लिए प्रेरित करते हैं। भौतिक जद्दोजहद में गहरे उतरे, दिनचर्या के लिए विवश लोगों को आत्‍मविश्‍वास की खुराक देकर उन्‍हें संकल्‍पशील, धर्मभीरु और सज्‍जन बनाते हैं लेकिन आज अधिकांश सन्‍त खुद उस स्थिति के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं, जिसमें एक जनसाधारण बुरी तरह संलिप्‍त है। क्‍या ये बातें, ऐसी घटनाएं प्रलय के उदाहरण नहीं हैं? क्‍या प्रलय की ये परिस्थितियां जनमानस में तब स्‍थायी रुप से अंकित हो सकेंगी जब इनका भी आडम्‍बरपूर्ण विज्ञापन दिया जाएगा या इनका पूंजीगत प्रचार किया जाएगा? क्‍या इतना उलट-पुलट होने के बाद भी हम में संचेतना नहीं जागेगी कि अब हमें अन्‍धदौड़ बन्‍द कर देनी चाहिए? अब हमें वापस अपने ग्राम्‍य जीवन की ओर मुड़ जाना चाहिए। एक पीढ़ी को थोड़ा ज्‍यादा त्‍याग करना पड़ेगा। कुछ अधिक श्रम करना होगा। इससे निश्चित रुप से आगे की पीढ़ियों का जीवन सुधर जाएगा। क्‍या हममें इतना साहस और संकल्‍प है कि हम विवशता में अपनाई गई आज की जिन्‍दगी को बदल सकें? 
     आज यहां-वहां जहां देखो देशी-विदेशी सैनिक और सुरक्षाकर्मी अपने हाथों में अपनी ऊंचाई से बड़े हथियार लिए जैसे आक्रमण करने के लिए तत्‍पर हैं। आतन्‍क, अवसाद से दिग्‍भ्रमित समाज कितना असुरक्षित और असहाय बना बैठा है! हड्डियों पर खड़ा मांस का लोथड़ा है ही क्‍या लेकिन इसे मारने के लिए, इस पर आक्रमण करके इसे खत्‍म करने के लिए दुनियाभर की प्रयोगशालाओं में एक-से-एक रासायनिक सूत्र, हथियार तैयार हो रहे हैं। मानव जीवन के लिए जो जरुरी सामग्री आसानी से उपलब्‍ध हो सकती है वह शासकों के परस्‍पर अहम टकराव से दुर्लभ हो गई है। मिलावटी भोजन, रोगों, असुविधाओं से त्रस्‍त मनुष्‍य का जीवन आज एक अबूझ पहेली बन गया है, जिसका हल होते हुए भी उसका हल नहीं किया जा रहा है। इस काल-समय में रहते हुए प्रलय शब्‍द को हम क्‍या किसी और रुप में प्रस्‍तुत कर सकते हैं? अगर नहीं तो अब यह मान लिया जाना चाहिए कि संसार का यह समय प्रलयंकारी समय है। 
प्रलय के इतने जटिल और प्रत्‍यक्ष रुप देख कर भी जनसाधारण 2012 में प्रलय की भविष्‍यवाणी करनेवाले को बेवकूफ समझता है। प्राकृतिक आपदाओं, विपदाओं में असमय मर चुके लोगों की आत्‍माओं से अगर संवाद किया जाए तो वे हमें चीख-चीख कर बताएंगी कि हां प्रलय की भविष्‍यवाणी करनेवाला सही है। जीवित संवेदनशील लोगों को भी यही लगता है, पर ऐसे लोग कम ही हैं। ज्‍यादातर व्‍यक्ति स्‍वार्थ की गुत्‍थी में इतने उलझ चुके हैं कि वे जीते जी श्‍मशान स्‍थल को भी स्‍वप्‍न ही समझते हैं। जिन लोगों का अपने जीवनकाल में जन्‍म-मृत्‍यु के दार्शनिक विचार से कभी पाला नहीं पड़ा, जो मनुष्‍य जिन्‍दगी की इन दो सबसे बड़ी घटनाओं को भी सामान्‍य घटनाओं की तरह ही मानते रहे, उनके सामने अगर उन जैसे हजारों व्‍यक्ति प्राकृतिक आपदा में मर जाते हैं या उनकी धार्मिक मान्‍यताओं के गुरु अगर बुरे कर्मों में संलिप्‍त पाए जाते हैं तो भी वे इन घटनाओं को नितान्‍त सामान्‍य घटनाएं समझ कर भूल जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए प्रलय के मायने उनके अपने अनुसार होते हैं। यदि उनके करीबी या वे खुद मरते हैं तो प्रलय हो गई नहीं तो कुछ भी नहीं है, सब ठीक है।
     डर, आतन्‍क और विनाश के तले चल रही दुनिया और इसके लिए दोषी व्‍यक्तियों के लिए मन से निकली कुछ पंक्तियां--

तेरी क्‍या पहचान है?
आतन्‍की जरा कुछ पल रुक
जगा विवेक अब न बहक
ध्‍यान से सुन इंसानियत चुन
नश्‍वर को मारना कहां है बड़ी बात
करवा तो जानें अमर मानव जात
हो भी जाए कभी आतंकी राज तो क्‍या
होके राजा तू भी जीता कहां रहेगा सदा
ये हथियारों की होड़
वर्ग-धर्म का जोड़तोड़
क्‍या कोई मायने रखता है
जब तू मारता या मरता है
क्‍या इससे कभी बाद का शून्‍य भरता है
हथियारों के सौदागर
अपने रोजगार से तुझे बर्बाद करते
अपना आबाद करके तेरा घर फूंकते
कसम ले अपनी प्रिय पसंद की
खूनी खेल बन्‍द करने की
किसी रोज उठ उगता सूरज देख
पिछला भूलकर कुछ नया रेख
सोच जीवन कितना मूल्‍यवान है
ढूंढ इसमें तेरी क्‍या पहचान है?

12 comments:

  1. aapne sahi point out kiya hai ki aaj jo hamaare aas paas ho rahaa hai wo sab bhi kisi pralay se kam nahi hai. par ham us samjhenge jis din sachmuch bhavushwaani wali ya hollywood ki films jaisi pralay aayegi.

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  2. प्रलय के विषय में शायद सबकी अपनी एक अलग परिभाषा हो सकती है या अपना एक अलग नज़रिया हो सकता है। मैंने अपनी माँ से हमेशा यह सुना है कि जब भी प्रलय आएगी यह सारी धरती जलमग्न हो जाएगी। ऐसा पुराणो में लिखा है। अब पता नहीं, यह कितना सच है कितना झूठ, लेकिन यदि उस नज़रिये से देखा जाये तो ग्लोबल वार्मिंग को ही प्रलय कहा जा सकता है। वैसे मुझे तो ऐसा भी लगता है कि प्रलय का अर्थ है विनाश जो आज हर तरफ हो रहा है। फिर चाहे वो आतंकवाद के रूप में हो रहा हो। या फिर ग्लोबल वार्मिंग के रूप में अर्थात प्रकृतिक आपदा के रूप में यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे किस नज़रिये से देखते हैं या महसूस करते हैं। लेकिन इन समस्याओं से निपटने के लिए एक जागृति की जरूरत है। खुद के अंदर देखने की जरूरत है कि आखिर हम चाहते क्या हैं। जिस दिन हम सब अपने अंदर देखकर बिना बेईमानी किए सही और गलत का फर्क समझने लगेंगे उस दिन ही इस सब से बचा जा सकता है।

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  3. बहुत सुंदर चिंतन और उतनी ही अच्छी कविता. लोग इतने अंधे हो चुके हैं की कुछ दिखता ही नहीं. वैसे मैं पुराण में दिए गए अधिकतर बातों से सहमत नहीं हूँ लेकिन ब्रम्ह्वैवर्त्पुराण में कलियुग में होने वाले प्रलय की बातें है. लगता है ऐसे ही समय के बारे में सोच कर वो कल्पनाएँ की गयी होंगी (और ये तो उसकी शुरुआत भी नहीं है.

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  4. स्वार्थ और लोभ के अंधों को कुछ और नहीं दिखता...

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  5. एक जाना हुआ डर आकृति लेने लगता है ये सब सोचकर..वैसे अब पीछे लौटना तो सम्भव नहीं लगता है पर आपके कहे अनुसार जरा रुक कर हर प्रलय के तीव्र पदचाप को सुनकर यथासम्भव समाधान खोजना ही श्रेयस्कर है .

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  6. इस दौर के बुनियादी सवाल उठाती रोचक पोस्ट। हाँ सम्पूर्ण विनाश कभी नहीं होता है। ईश्वर की माया ईश्वर में समा जाती है। आतंक वाद एक वैचारिक विभ्रम है हेलुसिनेशन है थाट का जहां युव जनों को भरमाया जाता जन्नत के खाब दिखा के -जो इस्लाम को नहीं मानता वह काफिर है वह जहां भी दिखे गरदन कलम कर दो। बहिश्त में तुम्हें अप्सराएं मिलेंगी जो एवर सैटिसफाइंग वोमन होंगी।

    दर्शन के स्तर पर कृष्णा चेतना कृष्णा कांशसनेस के स्तर पर ही इससे निपटा जा सकता है। इस्लाम में गोलोक ,कृष्ण लोक में कृष्ण के साथ सदा के लिए रहने का विचार ही नहीं है मटीरियलिज़म (बहिश्त )ही उसका आखिरी हासिल है मंज़जिले मक़सूद है।

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  7. किसी रोज उठ उगता सूरज देख
    पिछला भूलकर कुछ नया रेख
    सोच जीवन कितना मूल्‍यवान है
    ढूंढ इसमें तेरी क्‍या पहचान है?..
    क्योंकि एक चित्र बना रखा है जैसा पढ़ा है .. प्रलय के बदले हुए मायने/तरीके नज़र नहीं आते अक्सर ... पर देखा जाए तो ये भी एक प्रकार की प्रलय ही है जो लील लेगी दुनिया को ...
    सार्थक चिंतन ... जो बहुत जरूरी है उन सब के लिए जो आज भी बचे हुए हैं इस प्रलय की मार से ...

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  8. सार्थक चिंतन.प्रलय का सीधा सा अर्थ तो यही लगाया जा सकता है कि पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व समाप्त हो जाना.हालांकि,तमाम वैज्ञानिक अनुसंधानों से इस बात की पुष्टि नहीं होती.आजकल की प्राकृतिक आपदा,प्रलय से कम नहीं.

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  9. सही कहा अपने प्रलय से मतलब इन्ही सब समस्याओं से है......
    बहुत अच्छी आलेख और कविता...

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  10. ये हथियारों की होड़
    वर्ग-धर्म का जोड़तोड़
    क्‍या कोई मायने रखता है
    जब तू मारता या मरता है
    क्‍या इससे कभी बाद का शून्‍य भरता है

    ...बहुत विचारोत्तेजक आलेख और कविता..आजकल जो कुछ हो रहा है वह प्रलय से क्या कम है...

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  11. यकीनन असल में प्रलय की यही परिभाषा है..धरती के विलुप्त होने न होने का तो पता नहीं पर मानव के अंदर से मानवीयता का मरण हो जाना किसी प्रलय स कम नहीं...प्रशंसनीय प्रस्तुति।।।

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