महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

प्रकृति के साथ


श्चिमी छोर की खिड़की से अचानक बाहर देखा। मन्‍द हवा चल रही थी। दुनियाभर की घटनाओं को सोच-सोच कर तपा हुआ दिमाग और शरीर नहाने के बाद थोड़ी ठण्‍डक तो महसूस करते हैं लेकिन ज्‍यादातर भारीपन ही लिए हुए होते हैं, पर बाहर से आती हवा ने जैसे दिमाग और पूरे शरीर के ताप को अमृत शीतलता प्रदान कर दी। सूरज के जलाभिषेक के लिए पानी से भरा लोटा एक किनारे रख दिया और योग की मुद्रा में बैठकर बाहर चलती हवा को बारी-बारी दोनों नथुनों से अन्‍दर खींचने लगा। इसके बाद आंखें बन्‍द कर बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा। बाहर मन्‍द‍ लहराते पेड़ों की हरियाली और आसमानी आकर्षण को बीच-बीच में आंखें खोलकर देखता रहा। धरती पर होते हुए भी परालौकिक गमन का ऐसा अनुभव मुझे अपनी नजरों में ऊंचा उठा गया। बन्‍द आंखों में सतत् शान्ति की प्रतीति और आंखें खोलकर सम्‍मुख विहंसती प्रकृति….आह, इससे बेहतर जिन्‍दगी और क्‍या हो सकती थी मेरे लिए!
कई बार और अनेक अवसरों पर अपनी ही दृष्टि में बोझिल लगनेवाला अपना जीवन आज की इस मधुधार में कितना स्‍वच्‍छन्‍द लगने लगा था। एकदम से अनुभव हुआ कि मेरे साथ पहले भी ऐसे ही कुछ पल घटित हो चुके हैं। लगा कि आज का यह नया संजीवन स्‍पर्श अपने पूर्व के अभ्‍यास को दोहरा रहा है। दिल-दिमाग को सोच-विचार से एकदम खाली रखकर तनावमुक्‍त करने के लिए ऐसी विशिष्‍ट परिस्थिति का अभ्‍यास बहुत फलदायी है। कुछ देर के लिए मुझे ऐसे लगा जैसे मैं कहीं हूँ ही नहीं। जैसे मैं स्‍वयं को हवा के स्‍पन्‍दन से पुलकित हुआ शीतलता का भान ही समझता रहा। 




अपने विवेक से और खुली आंखों के सहारे जिस भौतिक दुनिया को मैं देखता हूँ उसमें आम आदमी बुरी तरह त्रस्‍त है। खास लोग भी अनावश्‍यक व्‍यस्‍तता के कारण जीवन का वैसा सुख-चैन कहां प्राप्‍त कर पा रहे हैं, जिसका अनुभव मुझे आज योगमुद्रा में बैठकर प्रकृति को देखकर हुआ। सामग्री केन्द्रित हो चुके मनुष्‍यलोक में भागमभाग और लालची गुणा-भाग ही तो दिखाई देता है। संतोष इस बात का है कि ऐसे विनाशी समय में मेरा मनलोक संवेदना को मजबूती से पकड़े हुए है। शायद इसी का यह असर होगा कि मैं जब-तब मौसम के प्रभाव में आत्मिक हो जाया करता हूँ। सच कहता हूँ ये स्थिति बड़ी मूल्‍यवान होती है। आखिर हम सब जीवन में मूल्‍यवान होने के लिए ही तो हाथ-पैर मार रहे हैं। जीवन का सर्वोच्‍च सुख पाने के लिए ही तो अपना मूल्‍य बढ़ाने का प्रयास निरन्‍तर कर रहे हैं। फिर इसके लिए हम क्‍यों नहीं रोज थोड़े समय के लिए प्रकृति के साथ रहें। प्रकृतिस्‍थ रहकर अपना एकांत अवलोकन करें। देखें कि हमें इसमें कितनी शान्ति मिलती है! शान्ति की जिज्ञासा कितनी फलेगी इसकी चिन्‍ता छोड़कर जीवन की सुखद गति के लिए प्रतिदिन कुछ समय आंखें बन्‍द कर शान्‍त व स्थि‍र बैठें। आंखें बन्‍द कर आत्‍मावलोकन हो और थोड़े-थोड़े अन्‍तराल में प्रकृति को निहारने के लिए आंखें खोलते रहें। यह क्रम तोड़े बगैर जीवन चलेगा तो व्‍यक्तित्‍व अभिसार के दर्शन होंगे। तब जीवन में सुख, शान्ति व समृद्धि बढ़ने लगेगी। मैं चाहता हूँ कि कई जटिल समस्‍याओं से जकड़ी हुई दुनिया के डरे सहमे लोग इस नई लगन से अपना जीवनमार्ग आलोकित करें।
महत्‍वपूर्ण जीवन पर कई परतों में चढ़े हुए बेकार आवरण हटाकर इसके अन्‍दर देखने की बुद्धि हमें क्‍या कभी आ पाएगी? क्‍या हम प्रकृत अनुभूतियों की शान्‍त जीवन झन्‍कार सुनने योग्‍य बन सकेंगे? जितनी जल्‍दी हो सके सभी लोगों को इन प्रश्‍नों के उत्‍तर हां में दे देने चाहिए।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (02-11-2013) "दीवाली के दीप जले" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1417” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  2. बोझिल यह जीवन दिखे, अलस पसरता गेह |
    खोटी दिनचर्या हुई, मोटी होती देह |
    मोटी होती देह, मेह से भीगे धरती |
    प्राणदायिनी वायु, देख ले दृश्य कुदरती |
    करले रविकर ध्यान, मोक्ष ही अंतिम मंजिल |
    बढ़िया यह आख्यान, लेख बिलकुल नहिं बोझिल ||

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  4. बहुत सुंदर !! दीपावली कि हार्दिक शुभकामना.....

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  5. भौतिक सुख में डूबे आदमी का सबसे पहला विलगाव प्रकृति से ही होता है. प्रकृति को छोड़कर उसके कृत्रिम उपायों से जी बहलाता है और व्याधियां पाता है. पर उसे पता नहीं चल पाता है. कभी कभी सोचता हूँ आज के "यो यो" पीढ़ी के बारे में तो बस सोचता रह जाता हूँ. जो सुख प्रकृति की बांहों में है वो शायद कहीं नहीं. इसलिए मुझे गाँव बहुत प्यारा लगता है. अच्छा लगा आपका प्रकृति स्नेह जानकर.

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  6. दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं
    नई पोस्ट हम-तुम अकेले

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  7. parkarti ki god me baithne ka jo maja ha vah kahni nahi, mousam ka aapne achha varana kiya hai

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    स्वस्थ रहो।
    प्रसन्न रहो हमेशा।

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  9. सच्चा सुख प्रकृति के सान्निध्य में ही है । उस सुख का अनुभव कर पाना भी एक उपहार है जीवन का । आप प्रकृति से इतने जुडे हैं और आपका परिवेश भी इतना खूबसूरत है विकेश आप खुशकिस्मत हैं । आपको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

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  10. बहुत सुन्दर लिखा है आपने .... दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं ...

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  11. प्रकृति से जुड़ना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव होता है और जीवन का सर्वोच्च सुख पाने के लिए आजकल की भागदौड़ में ऐसे ठहराव की हर किसी को बहुत आवश्यकता है.भाग्यशाली हैं वे लोग जो प्रकृति के साथ रह पाते हैं उस से जुड़ने का अवसर पाते हैं.

    भागती-दौड़ती दुनिया के लिए इस ज़रूरी विषय पर आपने अच्छा लिखा है.

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  12. दरअसल भौतिक सुख इतने ज्यादा हो गए हैं आज की इन्सान उनका गुलाम बन के रह गया है ... फिर समय की गति इतनी तेज है की उसका साथ छूटने का डर बना रहता है हमेशा ... इनसब से इतर प्राकृति की गोद का सुख अनुभव करने वाले जीवन को सदा जीती हैं ...
    भावमय पोस्ट ... दीपावली के पावन पर्व की बधाई ओर शुभकामनायें ...

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  13. रोजमररा की भागदौड़ भरी ज़िंदगी लोगों को कुछ और सूचने समझने का समय दे तब न,चाहते तो सब यही है। मगर समय नहीं है किसी के पास। यूं भी आजकल समय किसी के पास होता ही कहाँ है। उसे तो निकालना पड़ता है। जो लोग चाहकर भी या तो निकाल नहीं पाते या फिर निकालना ही नहीं चाहते। क्यूंकि आज की तारीक में ज़िंदगी सिर्फ स्मार्ट फोन और टीवी लैपटाप में ही सिमटकर रह गयी है।

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  14. कितने दूर हो गए हैं हम प्रकृति से...एक मशीन की तरह जी रहे हैं महानगरों में...बहुत सारगर्भित आलेख...

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  15. वाह!!! बहुत सुंदर !!!!!
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई--

    उजाले पर्व की उजली शुभकामनाएं-----
    आंगन में सुखों के अनन्त दीपक जगमगाते रहें------

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  16. आत्मावलोकन आंतरिक शांति के लिए बहुत जरुरी है
    बहुत ही सुन्दर आलेख !

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  17. अंधा होने का नाटक करने के बावजूद कुछ सत्य दिखाई दे ही जाता है... आत्मावलोकन के क्रम में.. सुन्दर विचार..

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