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सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

हिन्‍दुस्‍तान में हिन्‍दू होने की सजा

चपन में पता नहीं था कि बड़े होने पर जिन्‍दगी को कई तरह से जीना पड़ेगा। छुटपन में छोटी-छोटी चीजों को पाकर खुश होने के अनुभव आज कितने मूल्‍यवान लगते हैं। बच्‍चों के जीवन में धर्म, जाति, वर्ग, समाज, देश, विदेश के विभेद नहीं होते। जब तक उनको बताया न जाए या परिवेश को देखते-देखते वे सीख न जाएं उन्‍हें पता ही नहीं होता कि परिवार, समाज, देश, विदेश के नाम पर मानव-जीवन का प्रत्‍यक्ष बंटवारा कितने ही आन्‍तरिक बंटवारों से भी जूझ रहा होता है। उन्‍हें अपने माता-पिता के साथ-साथ अन्‍य रिश्‍तेदारों के मतभेदों, ईर्ष्‍याओं का कोई भान नहीं होता। वे अपनी चंचल, मनसुख और बालसुलभ जिन्‍दगी में जिस-जिस को देखते हैं, जिसे भी मिलते हैं सबको एक कुटुम्‍ब समझते हैं। जहां भी जाते हैं उसे अपना घर समझते हैं। लेकिन धीरे-धीरे जहरीले समाज के कीटाणु बच्‍चों को पथभ्रष्‍ट करने लगते हैं। इसकी शुरुआत अमूमन घर से ही होती है।
      बचपन की बातें इसलिए कीं क्‍योंकि बड़ों का व्‍यक्तित्‍व बचपन की नींव पर ही तैयार होता है। आज इस देश में मुझे भी अपनी उपस्थिति बड़ी विचित्र लगने लगी है। हिन्‍दू होकर भी विश्‍वास नहीं होता कि मैं हिन्‍दू हूँ। साम्‍प्रदायिकता, कम्‍युनिस्‍ट, समाजवाद, कांग्रेसवाद, मिशनरीवाद और न जाने कितने ही दिशावादों से घिरे विश्‍व और इसके अन्‍दर भारत देश में अपना अस्तित्‍व बड़ा ही मिश्रित, कुण्ठित सा लगता है। बचपन से लेकर आज तक मेरे जैसों के राष्‍ट्रीय पथप्रदर्शक इतना भी तय नहीं कर पाए हैं कि उन्‍हें देश में सतत शान्ति चाहिए या शान्ति भंग करने की कवायद में जुटे मतांतरों का प्रसार करनेवाले राजनीतिक दल, संगठन चाहिए। इस सन्‍दर्भ में जो सबसे पहली बात आती है वो है देश के दो प्रमुख राष्‍ट्रीय राजनीतिक दलों का देशव्‍यापी समस्‍याओं को लेकर परस्‍पर आरोप-प्रत्‍यारोप। यहां किसी एक दल विशेष का पक्ष लिए बिना ये बात तो कही ही जा सकती है कि एक दल ने स्‍वतन्‍त्र भारत के समय से लेकर सन २००३ तक और एक दल ने छोटे-मोटे राष्‍ट्रीय क्षेत्रीय दलों के भरोसे राजग (राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्‍व में) बन कर केवल पांच वर्ष तक देश पर शासन किया। तब राष्‍ट्रीय उन्‍नति और अवनति के लिए इन दो दलों के बीच में तुलना करना अनुचित है। बाद में अवतरित होनेवाले दल यानि कि भाजपा को भी आनेवाले पैंसठ साल तक राष्‍ट्रीय व्‍यवस्‍था संभालने दें। तब कांग्रेस और भाजपा के कार्यों की तुलना की जानी चाहिए। दशकों से जिस राजनैतिक नेतृत्‍व में चारों ओर गन्‍दगी ही फैली, नए नेतृत्‍व को पहले तो ऐसी गंदगी को ही साफ करने के लिए कई दशक चाहिए। नए नेतृत्‍व के विकास और पुराने नेतृत्‍व के साथ उसकी तुलना की बातें तो बाद की हैं। 
      आज दुख इस बात का है कि हिन्‍दू होकर हिन्‍दू अवधारणा को संशकित नजर से देखता बुदि्धजीवी वर्ग अगर साम्‍प्रदायिकता के लिए किसी को दोषी ठहराता है तो वो है भाजपा, संघ और हर वह हिन्‍दू संगठन जो हिन्‍दुस्‍तान में रह कर मूल्‍यों की बात कर रहा है। कांग्रेसवाद में दशकों से देश में जिस अपसंस्‍कृति का प्रसार तेजी से हुआ और जिसे ईसाई मिशनरियों ने ईसाई-धर्म की आड़ में खूब पोषित किया, उस पर उंगली उठाने या उसे साम्‍प्रदायिक कहने की जुर्रत तथाकथित बुदि्धजीवी वर्ग नहीं उठा पाता। अगर उन्‍हें साम्‍प्रदायिकता गम्‍भीर समस्‍या नजर आती है और उसके लिए बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं द्वारा अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों के हनन की बात वे बारम्‍बार करते हैं तो जरुरत इस क्रिया-प्रतिक्रिया की जड़ में जाकर पड़ताल करने की है। गुजरात का जनसंहार हो या हाल ही में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे, इन पर राष्‍ट्रीय सुरक्षा के बीच बैठ कर शासकीय वक्‍तव्‍य देना तो बहुत आसान है और इसके लिए तुरत-फुरत परम्‍परागत हिन्‍दू-विरोधी बयान देना भी बेशक जरुरी समझा जाता है, लेकिन बयान देनेवाले नीति-निर्धारकों, बुदि्धजीवियों और समाचार पत्रों के सम्‍पादकीय आलेख लिखनेवाले लेखकों को दंगों की असल पृष्‍ठभूमि का अध्‍ययन करना बहुत जरुरी है। यकीन से कहा जा सकता है कि अगर ऐसे अध्‍ययन निष्‍पक्ष रुप से किए जाएं तो धार्मिक दंगों के बीजारोपण के काम में कहीं भी हिन्‍दू मतावलंबी का हाथ नहीं होगा। तब हर बार बार-बार ऐसी घटनाओं के लिए घटना के दौरान आत्‍मरक्षा, अपनी सुरक्षा में हाथ-पैर चलानेवालों को दोषी कह देना और इसे भाजपा, संघ, हिन्‍दू संगठनों का आंतक बताना कहां तक और कब तक कारगर होगा? क्‍या वाकई इससे देशहित सधेगा?
ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं जो धूर्तता की ओर तेजी से बढ़ती आधुनिक बौदि्धकता के बोध में अवश्‍य आने चाहिए। राजनीतिक, शासकीय, लेखकीय, बौदि्धक अभ्‍यास देश में फैली वास्‍तविक समस्‍याओं को हल करने के लिए होने चाहिए। देश और इसके लोगों की कीमत पर मात्र अपने अहम की पूर्ति के लिए किया जानेवाला ऐसा खटचिंतन, समाजांकन केवल गंदी राजनीति का ही पोषण करेगा। इससे धर्म, वर्ग, जाति संघर्षों की अंदरुनी समस्‍याओं का हल कभी नहीं निकल सकता। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर निरन्‍तर कठघरे में खड़े रह कर सफाई देने की ऐसी सजा हिन्‍दुस्‍तान में एक हिन्‍दू को कब तक भुगतनी पड़ेगी?

18 टिप्‍पणियां:

  1. vichaardhara koi bhi ho par deshhit sarvopari hona chahiye, baat hindu-muslim ki n hokar insaaniyat ki honi chahiye

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  2. सीधे जाना काम पर, घर आना चुपचाप |
    देरी होती है अगर, जाय कलेजा काँप |
    जाय कलेजा काँप, देवता सभी मनाऊँ |
    अति-चिंतित माँ बाप, लौट कर जब तक आऊँ |
    बचपन से दी सीख, कहीं काँटा जो बीधे |
    कर के उसे प्रणाम, लौट घर आना सीधे ||

    पैरो के नीचे कही, चीटी भी गर आय |
    उसे बचाकर निकलिए, पैर नहीं पड़ जाय |
    पैर नहीं पड़ जाय, जीव को नहीं सताओ |
    जो भूखे असहाय, उन्हें रोटियां खिलाओ |
    धर्म भीरु बन जाय, हिन्दु क्या छुरी भोंके |
    खुद को किन्तु बचाय, स्व्यं को चुप्पै रोके ||

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  4. आपकी चिंता जायज है..पर आज कोई एक मजहब का आदमी नहीं, बल्कि हर वो इंसान परेशान है व्यर्थ के मत-मतान्तरों व वाद के झांसे में.....

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  5. आपकी यह पोस्ट आज के (२८ अक्टूबर , २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - कौन निभाता किसका साथ - पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  6. आज के इस सामाजिक दौर में हर कोई इन समस्या से परेशान है बेहद गहन विचार प्रस्तुति....

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  7. बहुत ही महत्वपूर्ण और गंभीर विषय पर लिखा है.यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर हमारे अपने ही लोग बात करने से कतराते हैं.

    एक ही बात कहूंगी कि अगर आज भारत में आजादी के बाद वाले अल्पसंख्यकों की संख्या बड़ी है और अब वे अल्पसंख्यक नहीं रहे तो इसका कारण उस समय के बहुसंख्यक [जो जल्द ही अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे अगर समय रहते न चेते तो]हैं उनका संयम और सहनशीलता है जो सब को एक नज़र से देखती है.
    उनकी धर्मनिरपेक्षता के कारण ही आज भी हिंदुस्तान में सभी लोग मिल जुल कर सुकून से रह पा रहे हैं.

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  8. आपस में मिल-जुल खूब शान्ति से रहा जा सकता है जब तक ये राजनेता अपना रोटी सेंकने के लिए ना आ जाएँ.लेकिन दुखद यही है कि अपने यहाँ चुनाव में विकास से ज्यादा अहम यही धर्म और जाति का मुद्दा हो जाता है.

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  9. कई बार लगता है परिवर्तन को सहज ही लेने वाला सिद्धांत क्या ठीक रहा हिंदू समाज के लिए ... क्या हम दब्बू हो गए हैं ... अपने ही देश में पराये हो के रह गए हैं ...

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  10. ये तो वही बात हो गयी कि जख्म सहते भी रहे और उफ़ तक न करे .. यदि करेंगे तो वो मकोका , खोखा , टोका वगैरह कुछ भी लगाया जा सकता है..

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  11. राजनीति का कलुष हमारे दैनिक जीवन को मलिन करने में लगा है।

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  12. बहुत निष्पक्ष और गहन विवेचन...हिन्दू धर्म सदैव सभी धर्मों के प्रति सह्रदय रहा है, लेकिन आज राजनीतिज्ञों और तथाकथित बुद्धिवादियों ने क्षद्म धर्मनिरपेक्षता का जो वातावरण पैदा कर दिया है उसमें अपने आप को हिन्दू कहना भी साम्प्रदायिकता का पर्याय बन गया है...

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  13. विविधा भरे संसार में हिन्दू होना बड़ी तसल्ली का सौदा है। अपने को किसी सीमा में बांधने की ज़रूरत नहीं, पूर्ण मुक्ति - हिन्दू!

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  14. पता नहीं इस सब में किस का हाथ है या किस की गलती है इस विषय में सोचकर मुझे तो लगता है कि कहीं कहीं हमारे धर्म कि स्व्छंदाता ही इस सब का कारण है। विचारिणीय आलेख ...

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