Tuesday, October 15, 2013

धर्म और विज्ञान की विसंगति में उलझा विश्‍व (सौवीं पोस्‍ट)


स काल में प्राकृतिक रोशनी हमें वह नहीं रहने देती जो हम घर के अन्‍दर अपने लिए वास्‍तव में होते हैं। बाहर की हवा लगते ही व्‍यक्तिगत भाव, विवेक, वेदना, समझ, आचार-विचार, चेतना सब बदल जाते हैं। ऐसा क्‍यूँ होता है और यदि होता है तो यह बदलाव धनात्‍मक क्‍यों नहीं होता? कल्‍याणकारी क्‍यों नहीं होता? ऐसे व्‍यक्तित्‍व परिवर्तन से समाज-कल्‍याण और परार्थता का कार्य क्‍यूं नहीं होता? ये परिवर्तन व्‍यक्ति को नकारात्‍मक क्‍यों करते हैं? वह असंवेदनशील होकर अनावश्‍यक अभिनय क्‍यों करता है? क्‍यों वह अपने ही जैसे किसी व्‍यक्ति से वैर रखता है? क्‍यों अपनी ही जाति के प्राणी की उपस्थिति से हम असहज होकर दम्‍भी और स्‍वार्थी हो जाते हैं? यह वैज्ञानिक प्रयोगों के नकारात्‍मक परिवर्तन के कारण है। भावनाओं को कुचल कर आधुनिक बनने का जो भूत लोगों के सर पर सवार है, ध्‍यान से सोचो तो उसका कोई सार्थक लक्ष्‍य नजर ही नहीं आता। उलटे इससे अनेक सामाजिक क्रियाकलापों और धार्मिक सत्‍संगों की आड़ में संगठित तरीके से अवैध गतिविधियां चलाई जा रही हैं।

विज्ञान की चकाचौंध में नाच रही दुनिया में अगर ढोंगी साधुओं और इनके अनुयायियों की संख्‍या बढ़ रही है तो भगवान, भगवत भाव के लिए सच्‍चे मन से समर्पित लोगों को अन्‍धविश्‍वासी नहीं कहा जा सकता। ढोंगी साधुओं और इनके अनुयायियों को तो भला-बुरा कहना ठीक है लेकिन अपने घर अपने मन में ईश्‍वरत्‍व रखनेवालों को अवैज्ञानिक, पाखण्‍डी कहना उचित नहीं है। अच्‍छा व्‍यक्ति यदि धार्मिक विचारधारा का है तो उससे बढ़ कर शायद इस पृथ्‍वी पर कोई नहीं हो सकता।
कितने ही जीवन रहस्‍य खुल कर विज्ञान के द्वारा हमारे सामने आ जाएं लेकिन जीवनोत्‍पत्ति वो भी खासकर मानव-जीवन और भावों की उत्‍पत्ति कहां से प्रारम्‍भ हुई, इस तक कोई एक वैज्ञानिक, एक मनुष्‍य-दुनिया कभी नहीं पहुंच सकती। कितने ही आविष्‍कारक, वैज्ञानिक भौतिक चमत्‍कार कर इस दुनिया से चले गए। जिस दिन विज्ञान और वैज्ञानिक मनुष्‍य को अमर बना देंगे उस दिन मान लिया जाना चाहिए कि ईश्‍वर नाम की कोई सर्वशक्ति कहीं नहीं है। ढोंगी, पाखण्‍डी सन्‍तों और इनके अनुयायियों द्वारा स्‍वयं के ऐश्‍वर्य, वैभव के लिए निर्मित सिद्धान्‍तों के दुष्‍प्रभावों से दुष्‍प्रेरित होकर नास्तिक लोगों के प्रतिनिधित्‍व में ईश्‍वर को चुनौती नहीं दी जा सकती।
परस्‍पर मानवीय संवेदनाओं के अभाव में यदि कोई सज्‍जन निराकार शक्ति का अपने संबल के लिए स्‍मरण, पूजन करे और पूजा-पद्वतियां, सात्विक कर्मकाण्‍ड इसका माध्‍यम बनें और ये सब पुरातन समय से होता हुआ आ रहा हो तो इस कालखण्‍ड में जन्‍म लेकर, कुछ पुस्‍तकें पढ़ कर, कुछ विज्ञान आविष्‍कारों से प्रभावित होकर विज्ञान का ध्‍वज थामे लोग इसे पाखण्‍ड, अन्‍धविश्‍वास कैसे कह सकते हैं! जीवन के कई क्षेत्रों में विभिन्‍न उतार-चढ़ाव होते आए हैं। अब भी हो रहे हैं। मनुष्‍य के लिए कुछ का प्रभाव अनुकूल तो कुछ का प्रतिकूल होता है। प्रतिकूल परिस्थिति में हम ईश धर्म, आस्‍था, विश्‍वास को अवैज्ञानिक क्‍यों कहें! विज्ञान के पक्षधर, ईशोपासना के विरोधियों को यह याद रखना चाहिए कि उनके पूर्वजों, अभिभावकों ने धार्मिक आस्‍था के सहारे ही अपने कठिन जीवन को आसान बनाया। उनमें अगर धर्म-भाव की प्रबलता न होती, वे यदि आस्‍थागत रह कर कांटों भरी जीवन यात्रा न कर सके होते तो आज के विज्ञान-विधाता पता नहीं होते भी या नहीं।
आज जो लोग धर्म और आस्‍था को ढोंग, पाखण्‍ड का दुष्‍चक्र कह रहे हैं उन्‍हें समझना चाहिए कि धर्म की हिन्‍दू प्रणालियां स्‍वाभाविक थीं। उनमें छिपा आशय आदर्श व्‍यावहारिक जीवन का पर्याय था। कई हजारों वर्ष पूर्व सृजित पौराणिक धर्मग्रन्‍थों में उल्लिखित कथाओं के पात्रों द्वारा उन्‍नत शस्‍त्रों, उपकरणों का प्रयोग किया जाता था। पात्रों के रहन-सहन, जीवनयापन, वस्‍त्राभूषण के बारे में जो कुछ भी ग्रन्‍थों में वर्णित है क्‍या वह आज के रहन-सहन, जीवनयापन, वस्‍त्राभूषणों से किसी प्रकार से कम था? बल्कि तब के कालखण्‍ड में वैज्ञानिक सूत्र आज से कहीं अधिक विकसित थे। साथ ही उनका प्रयोग भी यथोचित था। निश्चित रुप से तब का जीवन आदर्शवाद के दायरे में सिमटा हुआ था। इसीलिए उस समय के विज्ञान के चमत्‍कार और भौतिकी के आविष्‍कार विध्‍वंशक न होकर कल्‍याणकारी ही सिद्ध हुए। आज इस सदी के विज्ञानवेक्‍त्‍ताओं के पास यदि धर्म-अध्‍यात्‍म को निराधार बताने का विशाल प्रतिनिधित्‍व है तो उसका कारण मूलधर्म अर्थात् हिन्‍दू धर्म की विसंगतियां नहीं हैं। इसका एकमात्र कारण मूलधर्म से प्रस्‍फुटित होकर बने धर्म के अनेक उपधर्म हैं। मूल धार्मिक अवधारणा के प्रतिरुप हमेशा श्रेष्‍ठ नहीं हो सकते। कालान्‍तर में इनमें विसंगतियों की भरमार हो जाती है। विसंगतियों से घिरे धार्मिक क्रियाकलाप कहीं से भी उचित नहीं लगते। दुर्भाग्‍य से आज मूल धर्म को इसके उप-धर्मों के विसंगत प्रयोगों, सिद्धान्‍तों से खतरनाक चुनौतियां मिल रही हैं और शासकीय स्‍तर पर बड़े ही हास्‍यास्‍पद तरीके से इनका बचाव किया जा रहा है।

17 comments:

  1. विकेश जी ,पहले तो सौ वीं पोस्टके लिये हार्दिक बधाई । आप अपनी निष्कलंक जिज्ञासाएं , नैतिक ,हितकारी विचार और मूल्यपरक सिद्धान्त निरन्तर अभिव्यक्त कर रहे हैं । इन प्रश्नों , जिज्ञासाओं ,अनुचित के प्रति विरोधभाव, आदर्शोन्मुख विचारों का होना आशा और विश्वास जगाता है कि अभी निराश होने की जरूरत नही ।

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  2. आज की बुलेटिन हैप्पी बर्थडे कलाम चाचा में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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  3. सौवीं पोस्ट के लिए बधाई!

    [पोस्ट कल ही पढ़ सकूंगी.]

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  4. बहुत अच्छा लिखा है. यह विषय गहरे चिंतन का हैं. सारे विज्ञान वाले धर्म को खारिज भी नहीं करते और ना ही ऐसा है कि विज्ञान से बाहर के लोग नास्तिक नहीं होते हैं. ना सारे प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास है और ना ही धर्म के पास. ऐसे में दोनों के साथ ले के चलें तो वही सबसे अच्छा है. धर्म की सारी शिक्षाएं बहुत अच्छी हैं लेकिन धर्म के नाम पर डराना धमकाना ठीक नहीं.

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  5. और शतक के लिए बधाई...यूँ ही लगाते रहें और कभी रिटायर होने की ना सोचें.

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  6. बहुत बहुत बधाई
    ऐसे हि बढ़ते रहें
    आपकी यह रचना आज बुधवार (16-10-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 147 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    एक नजर मेरे अंगना में ...
    ''गुज़ारिश''
    सादर
    सरिता भाटिया

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  7. बिलकुल यही तो हो रहा है मैं तो हमेशा से यही मानती हूँ जितने आधुनिक और विकसित खुद को हम आज समझते हैं। उसे कहीं ज्यादा आधुनिक और विकसित हम पहले थे। शायद इसलिए तब हम ज्यादा सभ्य एवं धार्मिक थे। आज केवल आधुनिक हैं सभ्यता और संस्कृति धर्म जो हमारी धरोहर थी जिसकी रहा पर नियम पूर्वक चलकर हम सही ढंग से जीवनयापन करते चले आरहे थे अब तो हम कब की धता बता चुके हैं। अब केवल सो कॉल्ड विज्ञान रह गया और उन चेज़ोन का पता लगाया जा रहा है जो हामरे पूर्वज बहुत पहले ही पता कर चुके थे और जन कल्याण के लिए उसे धर्म और आयुर्वेद आदि से जोड़ चुके थे। मगर आज यह बात कोई समझने को तैयार ही नहीं है।

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  8. पहले तो 100 पोस्ट के लिये हार्दिक बधाई विकेश जी,बहुत अच्छा लिखा है, यह विषय गहरे चिंतन का हैं।

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  9. बहुत बहुत बधाई आपको.... बेहतरीन पोस्ट लिखा है आपने...

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  10. सच में आज हम धर्म के असली स्वरुप को भूल चुके हैं...बहुत ही सारगर्भित और विचारणीय आलेख..१००वीं पोस्ट की हार्दिक बधाई..

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  11. विस्तृत १०० वीं पोट ... बहुत बधाई ...
    गहरा चिंतन स्पष्ट नज़र आता है इस पोस्ट में ... धर्म ओर विज्ञानं में निरंतर चलने वाली प्रतिस्पर्धा में दोनों का ही अपना महत्त्व है ओर एक(धर्म) से ही दूसरे(विज्ञानं) की खोज की प्रवृति जीवित रहती है ... विकास की ये निरंतर खोज अंततः एक ही बिन्दु पे मिलनी है ...

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  12. 100वीं पोस्ट की बधाई.बहुत सारगर्भित आलेख.
    नई पोस्ट : लुंगगोम : रहस्यमयी तिब्बती साधना

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  13. उलझते-सुलझते चिन्तनों के बीच ही राह भी निकलती रहती है और एक अनूठा आनंद का भी सम्प्रेषण होता रहता है .. यूँ ही चलते रहे..शुभकामनाएं...

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  14. कितने ही आविष्‍कारक, वैज्ञानिक भौतिक चमत्‍कार कर इस दुनिया से चले गए। जिस दिन विज्ञान और वैज्ञानिक मनुष्‍य को अमर बना देंगे उस दिन मान लिया जाना चाहिए कि ‘ईश्‍वर’ नाम की कोई सर्वशक्ति कहीं नहीं है। ढोंगी, पाखण्‍डी सन्‍तों और इनके अनुयायियों द्वारा स्‍वयं के ऐश्‍वर्य, वैभव के लिए निर्मित सिद्धान्‍तों के दुष्‍प्रभावों से दुष्‍प्रेरित होकर नास्तिक लोगों के प्रतिनिधित्‍व में ‘ईश्‍वर’ को चुनौती नहीं दी जा सकती।

    काफी पहले मैंने भी अपनी एक पोस्ट में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किये थे..आज आपकी इस पोस्ट को पढ़ अतीव प्रसन्नता हुई..साथ ही आपकी सृजनशीलता की भी दाद देनी होगी जो बड़ी तेजी के साथ आपने ब्लॉग पे अपना शतक पूरा कर लिया..मैं तो चार साल से ब्लॉग पे हूँ और अभी भी नर्वस नाइंटी में खेल रहा हूँ...इसके साथ ही आपकी लगभग हर हिंदी ब्लॉग पे दस्तक और प्रतिक्रिया आपको एक अच्छे लेखक के साथ ही साथ एक अच्छा पाठक भी साबित करती है..एक बार पुनः बधाई।।।

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  15. बहुत अच्छा लिखा है और आप के मत से मैं भी सहमत हूँ .
    वास्तव में हम अपनी ही सभ्यता से और संस्कृति से दूर भागते रहे हैं ..हमारे पुराने ग्रंथों में लिखी बातें और उनके पीछे के तथ्यों को हम जानबूझकर या अज्ञानतावश अनदेखा ही करते आये हैं.

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  16. यत्श्रेय सा निश्चितं ब्रूहि तन्मे..

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