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गुरुवार, 5 सितंबर 2013

कानून के विद्रूप


जिसके लिए देश-दुनिया पूरे दो महीने तक एक नई अवस्‍था में पहुंच गए थे। अनेक लोग अपना रोजगार, पढ़ाई, नागरिक सेवाएं छोड़ कर इसके समर्थन में कूद पड़े थे। प्रशासन और पुलिस की त्‍वरित सेवाएं ली गईं थीं। आवाज उठाने के लिए तैनात लोगों को रोकने के लिए पुलिस बल के अनेक कर्मियों की दिनचर्या अस्‍त-व्‍यस्‍त हो गई थी। एक पुलिसकर्मी को हृदयाघात लगा और उसकी मृत्‍यु हो गई। अनेक सरकारी, गैर-सरकारी संगठन जिस हेतु अपने-अपने स्‍तर की कसरत करते रहे। एक आम नागरिक से लेकर राष्‍ट्रपति और सबसे बढ़ कर लोकतन्‍त्र साठ दिनों की अवधि में जिसके लिए अपने तरह की अपूर्व संवेदनशीलता, आक्रामकता, परस्‍पर-ढांढस में उतरता चढ़ता रहा, उसे कार्यपालिका विधायिका न्‍यायपालिका से होते हुए किशोर न्‍याय बोर्ड के माध्‍यम से यूं ऐसे तिरोहित कर दिया गया। 
गहराई से यदि आकलन करेंगे तो पाएंगे कि सोलह दिसंबर 2012 केवल पीड़िता के पक्ष में उभरीं जनसंवेदनाओं और अपराधियों के विरुद्ध उठे जनाक्रोश के बूते केवल एकपक्षीय घटना नहीं थी। इस घृणित काण्‍ड ने पीड़ित लड़की, उसके परिवार, मित्रों, समाज, सरकार, देश-विदेश को केवल यह सोचने के लिए ही विवश नहीं किया कि समाज किस ओर जा रहा है और इसके रक्षक इस दिशा में क्‍या कर रहे हैं बल्कि इसने मनीषियों, विद्वानों, विचारकों द्वारा लोकतन्‍त्र के बाबत कहे गए उस तथ्‍य को भी अभिपुष्‍ट किया कि लोकतन्‍त्र वास्‍तव में कुछ नहीं है। लोकतान्त्रिक वास्‍तविकता बड़ी कड़वी है। इसकी कार्यप्रणालियों को संचालित करनेवाले सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान यथा कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका और प्रेस ने देश की संवैधानिक व्‍यवस्‍था को जनता के हित में लचीला बनाने के लिए आज तक कितने काम किए हैं। सतसठ वर्ष पूर्व तैयार संविधान, कानून एक अलग परिस्थिति में बनाए गए थे। तब से लेकर आज तक वर्ष दर वर्ष देशकाल और इसका संचालन अलग-अलग परिस्थितियों में होता हुआ आ रहा है। तो क्‍या संविधान, कानून का ढांचा भी वर्ष दर वर्ष उत्‍पन्‍न होनेवाली सर्वथा भिन्‍न परिस्थितियों के अनुसार बदला नहीं जाना चाहिए। तब का कानून यदि वयस्‍कता के लिए किसी व्‍यक्ति की आयु अट्ठारह वर्ष निर्धारित करता है तो इसका आधार उस समय-विशेष की परिस्थितियां थीं। कृषि बहुलता के कारण देश की अधिकांश जनसंख्‍या ग्रामों में रहती थी। प्रत्‍येक व्‍यक्ति संयुक्‍त परिवार से जुड़ा हुआ था। संयुक्‍त परिवार के संस्‍कार व्‍यक्ति को मर्यादा सिखाते थे। शील-संकोच की अधिकता थी। अमर्यादित व्‍यवहार यदि होता भी था तो उसका स्‍तर इतना घिनौना नहीं था कि सारे देश का एक निर्धारित समय उस पर थू-थू करने या उसके विरुद्ध खड़े होने में व्‍यतीत हो जाए। 
आज जब देश में भ्रष्‍टाचार जीवन और व्‍यक्तित्‍व का एक अहम अंग बन चुका है और प्रत्‍येक कार्य इसका प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष प्रमाणपत्र दिखाने पर पूरा होता हो तो यह कैसे सम्‍भव नहीं हो सकता कि चेहरे-मोहरे से तीस से ऊपर दिखनेवाला व्‍यक्ति विद्यालयी प्रमाणपत्र में स्‍वयं को अट्ठारह से कम सिद्ध कर ले। बलात्‍कार, चोरी, हत्‍या करे और न्‍यायपालिका में अपने नाबालिग होने का प्रमाणपत्र प्रस्‍तुत कर दे तो उसे किशोर समझा जाता है और उसके क्रूरतम अपराध के दण्‍डस्‍वरुप उसके टुकड़े-टुकड़े करने के बजाय तथाकथित कानून उसे केवल तीन वर्ष की सजा सुनाता है। 
दूसरी ओर कानून के रक्षक अपने भ्रष्‍टाचार, अवैध गतिविधियों के लिए इसे अपने मनमाफिक बनाते हैं और संशोधित करते हैं। उदाहरणस्‍वरुप सूचना का अधिकार कानून के दायरे से छह राष्‍ट्रीय राजनीतिक दलों ने खुद को यह कह कर बाहर रखने का विधेयक पारित कर लिया कि उन्‍हें केन्‍द्र से पार्टी गतिविधियों के लिए अनुदान मिलता है। इसलिए वे अपनी गतिविधियों का हिसाब-किताब नहीं बता सकते। इसी प्रकार दागी सांसदों, विधायकों के चुनाव में खड़े न होने, वोट न देने के लिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय के निर्देश को विधायिका इसके विरुद्ध विधेयक लाकर इसे निरस्‍त कराने के लिए आमादा है।
समय के अनुरुप कानून के लचीले नहीं होने के कारण बलात्‍कार के बाद लड़की की नृशंस पिटाई करके उसे मौत तक पहुंचाने का दोषी अपने अपराध के लिए यदि समुचित दण्‍ड नहीं पाता है तो इससे केवल समाज और संवेदनशील लोगों की भावनाएं ही आहत नहीं होतीं। इससे एक समय-विशेष की सम्‍पूर्ण समाजार्थिक व्‍यवस्‍था भी चरमराती है। कानून को यह भी विचार करना चाहिए कि पीड़ित लड़की के समर्थन में सड़कों पर आए लोगों और उन्‍हें रोकने में शासन-प्रशासन को जितनी भी प्रशासनिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक कसरत करनी पड़ी उसमें देश का कितना समय और धन बर्बाद हुआ। किसी बड़े देश की समय और धन की ऐसी बर्बादी से उबरना अधिक महत्‍वपूर्ण है या ऐसी बर्बादी के सिद्धदोषी को बचाने के लिए कानून की अव्‍यावहारिक अवधारणाएं, प्रावधान, धाराएं गिनाना और उन पर चलने को न्‍याय की महानता सिद्ध करना।




17 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति -
    आभार आदरणीय -

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  2. क्या कहें विकेश जी ...मुझे नहीं लगता कानून बदलने की जरूरत है बल्कि मेरे हिसाब से तो जब तक अपने देश की राजनीतिक व्यवस्था नहीं सुधार जाती, तब तक कुछ नहीं हो सकता क्यूंकि कानून तो बहुत हैं हमारे देश में और ऐसा भी नहीं है कि उसके अंतर्गत काम करने वाले सभी अधिकारी ईमानदार नहीं है। मगर गंदी राजनीति का दबाव हर इंसान के हाथ बांद देते है। और नतीजा आपके सामने है...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार -6/09/2013 को
    धर्म गुरुओं का अधर्म की ओर कदम ..... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः13 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  4. वयस्क अपराध करता है लेकिन फिर भी वयस्क नहीं. नियमों में बदलाव हो इस तरह के मामलों के लिए ताकि निस्संदेह ऐसे दानवों के बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहे. सुन्दर पोस्ट.

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  5. विचारणीय लेखन.... अच्छी प्रस्तुति

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  6. विचारणीय आलेख...समय के अनुसार क़ानून में परिवर्तन न हो तो न्याय की आशा करना व्यर्थ है..

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  7. इनसब पर कितना क्षोभ या अफ़सोस जाहिर किया जाए.. इसलिए तो हिटलर की याद आती है..काश!

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  8. भ्रष्टाचार मिटाने आये , आग सभी ने, उगली है !
    हमने हाथ लगाकर देखा , ठंडक है , अंगारों में !

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  9. सच है,समय के साथ नैतिक विकास होने के बजाय, राष्ट्रीय स्टार पर नैतिक पाटन ही हुआ है और इस पर आमजन की चिंता और आक्रोश स्वाभाविक है।

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  10. अभी कुछ दिन पहले आयरलैंड में भी भारतीय युवती की मौत अबोर्शन क़ानून के चलते हुई थी ... वहां की सरकार ने क़ानून में न सिर्फ बदलाव किया बल्कि वहां अबोर्शन की शुरुआत भी हो गई ...
    कहने का मतलब है की अगर सरकार चाहे, वो संवेदनशील हो तो अच्छे क़ानून लाये जा सकते हैं ... जो इंसानियत की तरफ ले जाए जा सकते हैं ...

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  11. समय और परिस्थित के अनुसार कानून में आवश्यक परिवर्तन लाना बेहद ज़रूरी है.
    बहुत ही अच्छा लेख है ,शायद शासन में बैठे किसी समझदार को समझ आ जाये.
    पहली बात यह समझ नहीं आती कि जो व्यक्ति बलात्कार कर सकता है उसे नाबालिग या बालिग़ के आधार पर नहीं बल्कि उसके घिनौने कृत्य के अनुसार सज़ा मिलनी चाहिए.
    अंग्रेजों के समय से चलते आ रहे कई कानून वर्तमान समय में आवश्यक परिवर्तन चाहते हैं .
    बेहद दुखद और निराशाजनक हालात हैं.

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  12. कानून की पूरी किताब भूखे सफेद हाथी चर गऐ ----
    और कानून के रखवाले तराजू में बैठ गऐ
    विचारपूर्ण,प्रभावपूर्ण आलेख
    उत्कृष्ट प्रस्तुति ------


    सादर
    ज्योति





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