Wednesday, September 25, 2013

मनमोहनोवाच



राष्‍ट्रीय एकता परिषद की बैठक में एक बार फिर प्रधानमन्‍त्री ने यूपीए की अकर्मण्‍यता का ठीकरा पूरे देश पर फोड़ा। पता नहीं यह वार्षिक बैठक थी यह परिस्थितिजन्‍य। लेकिन जो भी है सार्वजनिक मंचों से प्रधानमन्‍त्री द्वारा जताई गईं देशव्‍यापी चिंताओं का उद्देश्‍य आखिर है क्‍या। वे चिंताओं, समस्‍याओं को ठीक करने के लिए आखिर किसका आहवान करते हैं। दंगें हों या महिलाओं की असुरक्षा का विषय इनका नियंत्रण आहवान करनेवालों को करना है या उन्‍हें जिनसे आहवान किया जा रहा है। समाज या सार्वजनिक रुप में ऐसा कोई संगठन नहीं है जिसके पास इन समस्‍याओं को रोकने और इनका निवारण करने के संसाधन हैं। एक नागरिक मतदाता के रुप में जिस नेतृत्‍व को लोकतन्‍त्र का संचालन सौंपता है, यह उसका कर्तव्‍य है कि वह देश को सही से चलाए। ना कि नेतृत्‍वकर्ता उलटा जनता से आहवान करे कि दंगों व महिला असुरक्षा पर हमें शर्म आनी चाहिए। जनता उलट आप से ही पूछती है कि आखिर आप क्‍या कर रहे हैं? आप सत्‍तासीन क्‍यों हैं? क्‍या पूंजी का ऐसा कुचक्र चलाने के लिए ही आप सत्‍ताधारक बने हुए हैं, जिससे सच्‍चे कृषकों और उद्यमियों का जीवन दिन-प्रतिदिन कठिन होता जाए? वास्‍तविक श्रमिकों, उद्यमियों के लोकतान्त्रिक, नागरिक और संवैधानिक हितों को खाद्य सुरक्षा इत्‍यादि जैसे भीखदान में बदलने से आप ने वास्‍तविक लोकतान्त्रिक मूल्‍यों की परिभाषा ही बदल कर रख दी है। एक तरह से सच्‍चे लोकतन्‍त्र के समानान्‍तर आपकी बेतुकी अर्थनीतियों से चलनेवाली अर्थव्‍यवस्‍था आज इस देश पर जबरदस्‍ती थोपी जा रही है। इसमें आपके गुरु अमेरिका जैसों का बड़ा हाथ है। राष्‍ट्रीय एकता परिषद की बैठक में आपने जिन मुद्दों पर अपनी चिंताएं जताईं एक प्रकार से उनका निर्माण इन्‍हीं नीतियों का परिणाम है।
     बात जब समाज और देश में सुख शान्ति की होती है तो इसके लिए जो सबसे जरुरी काम है उसकी अनदेखी कब तक होती रहेगी। और यह काम है जनसंख्‍या नियंत्रण की ठोस नीति बनाना। आज जनसंख्‍या नीति पर बोलने को सत्‍ताधारी बिलकुल तैयार नहीं हैं। ज्‍यादा जनसंख्‍या क्‍या कभी किसी देश या समाज का भला कर सकती है? तो फिर अपने प्रधानमन्‍त्री सार्वजनिक मंचों से इस समस्‍या पर बात क्‍यों नहीं करते हैं? राष्‍ट्रीय एकता परिषद में जिन चिंताओं के लिए प्रधानमन्‍त्री ने तीखे तेवर दिखाए हैं क्‍या उनका विवेक कभी चिंताओं के मूल में जाकर देखेगा कि इनका प्रमुख कारण अधिक जनसंख्‍या है। ऐसे जनसमूह हैं जो सीमांत राष्‍ट्रों से भारत में घुस आते हैं। यहीं रह-बस जाते हैं। अपने लिए नागरिक प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं। क्‍या राष्‍ट्रीय एकता परिषद में सभी समस्‍याओं के इस प्रमुख कारण पर भी कभी कोई राष्‍ट्रीय आहवान होगा? या ऐसे लोगों को राष्‍ट्र पर, राष्‍ट्र के मूल नागरिकों पर केवल वोट बैंक के लिए बोझ बना कर लादा जाता रहेगा?


15 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (26-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 128" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  2. देश की समस्यायें देश उत्पन्न करता है, हम तो उसे सम्हाले खड़े हैं, रास्ते से बचाने के लिये।

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  3. ज्वलंत मुद्दा-
    अकर्मण्य सरकार-
    भाई जी आभार-

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  4. कुछ नहीं होगा न केवल इस समस्या पर बल्कि ऐसी अनगिनत समस्याओं पर भी कोई रोक नहीं लगने वाली, सब कुछ एक ऊन के उलझे हुए गोले के समान है जिसका हर एक सिरा किसी दूसरी समस्या से जुड़ा है।
    काश यह सरकार और प्रशासन को जनता वोट बैंक के अलावा मुसीबत और लाचारी में फसे एक आम इंसान के रूप में दिखाई देती।

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  5. अवैध शरणार्थियों/घुसपैठियों के अलावा अपने देश की जनसँख्या दर को नियत्रित करना भी एक बड़ी चुनौती है. अभी तो यही और तेज होनी है.

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  6. सुन्दर अभिव्यक्ति .खुबसूरत रचना
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  7. baat parisat ki baithak ki hi nahi hai sarkaar ki har baithak me esa kuch nahi hota hai ki jiski srahana ho

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  8. बस कुछ महीने और झेलना है श्रीमान MMS को..फिर इनसे और इनकी अकर्मण्यता दोनों से निश्चित ही निजात मिलेगी।। सुंदर प्रस्तुति।।।

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  9. हमारा सर बहुत मजबूत है हर ठीकरा को उठाने के लिए . साथ ही नक्कारों को भी उठाने के लिए..

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  10. हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन है इसका भरौसा हमें हैं नहीं। उनके ठीकरों से शायद उनकी पगडी थोडी हिली तो बहुत हो गया। जिसके हाथों में सबकुछ है वह कुछ नहीं करता और जनता का आवाहन करने से क्या होगा? सार्थक विश्लेषण।

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  11. सामायिक प्रस्तुति

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  12. जनसँख्या नियंत्रण तो अब बहुत पुरानी बातें हो गयीं ... गद्दी के आगे आज तो असल समास्या को भी कोई नहीं देखना चाहता ...

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  13. एक यक्ष प्रश्न जिसका उत्तर कोई नेता नहीं देना चाहता...

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