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Sunday, September 1, 2013

आपको….प्रेम संस्‍मरण


पकी ओर से अपना ध्‍यान हटाता हूँ तो अपनी ही हानि करता हूँ। यदि मैं आपके लिए स्थिर नहीं रहता हूँ तो मेरा जीवन मृत्‍यु समान हो जाता है। मेरे बच्‍चे आपको भूल कर मैं अपना जीवन नर्क बनाता हूँ। लेकिन ऐसा केवल एक छोटी अवधि के लिए होता है। वह भी इसलिए कि निर्मल मन का यह मानव-प्राण रणनीतिक दुनिया और इसके समाज में झूठा, गलत नहीं होता। अर्थात् अपनी सच्‍चाई, सज्‍जनता का मूल्‍य चुका कर भी मैं अपनी ही हानि करता हूं कि आपको अल्‍प समय के लिए भूल जाता हूँ। पर फिर आपको याद करके ही शोला बना गुस्‍से से फुफकारता मैं शांत-प्रशांत हो जाता हूँ। बुरा सोचने, करने से पहले मैं आपको याद करता हूँ तो सारी बुराई समाप्‍त हो जाती है। इसलिए आप मेरे जीवन का वह प्रेमिल आधार बनते जा रहे हो जिसकी छत्रछाया में मैं खूब जिन्‍दगी जी रहा हूँ।

मैं अहसास में प्रेम के
ये मैंने हाथ फैलाया
मेरी हथेली को आपके
गुलाबी हाथ की हथेली ने पकड़ लिया है
मैं अवाक आपको सम्‍मुख पाकर
बेसुध अन्‍तर्मन तक हर्षा कर
विश्‍वास नहीं बनता
कि आप की सुन्‍दर पैरों की उंगलियां
मेरे नयनों से दिखती हैं
धीरे-धीरे प्रेमाकर्षण में
मेरी ओर बढ़ती हैं
मैं आभास में आपके
ये मैंने बाहें फैलाईं
आपने मुझे
अपने अन्‍क में भर लिया है
मैं इन घड़ियों के लिए
जीवन काटता था
हे ईश्‍वर! यहीं पर प्राण हर ले
मेरे प्रेमभाव को स्थिर कर दे
हमेशा के लिए

नीले नभ में श्‍वेत अर्धचन्‍द्र, सन्‍तरी गोल अस्‍त होता हुआ सूर्य और इसकी अस्‍तावस्‍था से उत्‍पन्‍न संतरी क्षितिज का रंगायन जीवन का सार्थक आभास कराता है। मनुष्‍यजनित रॉकेट का पंक्तिबद्ध धुआं दूर कहीं आकाश के दूसरे कोने में कुछ पलों के लिए विदित होता है और अन्‍त में अदृश्‍य हो जाता है। आज की यह गुलाबी सांझ, मधुर मौसमीय अहसास सब कुछ भुला गया सिवाय आपके। सन्‍ध्‍या का श्‍वेत अर्द्धचन्‍द्र अपने अकल्पित, अपरिभाषित सम्‍मोहन सहित चमक रहा है। अलसायी सांझ के बाद अब यह रात कितनी साफ सुथरी है। दूर-दूर तक सब कुछ स्‍पष्‍ट नजर आ रहा है। पृथ्‍वी पर चन्‍द्र प्रकाश की छाया कितनी निश्‍छल, भोलेपन से पसरी हुई है। मेरे मन में यह दिव्‍य प्रकृति अवस्‍था एक बेचैनी बढ़ाती है। जिससे प्रेम है उसकी स्‍मृतियां बरसने लगती हैं।
     धरती पर बिखरे चन्‍द्रप्रकाश में घरों, दीवारों, पेड़ों और पत्‍तों की छायाकृतियां कितनी रहस्‍यमय सुन्‍दरता से भरी हैं! मन में विचित्र हलचल है। आप मेरे मन में ऐसे ही हैं जैसे इस चन्‍द्र रोशनी में धरती की ये सब चीजें। आधी रात बीत जाने पर भी नींद नहीं आई। बाहर आया तो चांद अपनी मस्‍ती से लुभाने लगा। आकाश का स्‍वप्‍नदर्शी आभास और इसमें विचरण करता, अद्भुत अवर्णित आकर्षक रंग से दमकता गोल इन्‍दु का स्‍पन्‍दन बहका रहा है। मध्‍य आकाश में यह संसार के लिए एक आश्‍चर्य-पुन्‍ज बन कर चमक रहा है। मैं इसको देखते हुए मन्‍द रिमकती वायु के बहाव में प्रेम विह्वल हूँ।

मेरे सनम को सच्‍ची मोहब्‍बत से डर लगता है
मेरा इस मोहब्‍बत में जल जाने का जी करता है
बेफिक्र अपने मातम से आपकी यादों में दिन गुजरता है
आलम-ए-दीवानगी की हकीकत में आपका रुठना झूठ लगता है
आंखें बन्‍द करना सो जाना औ ख्‍वाब देखना आपको मुसीबत लगता है
क्‍यूंकि आपकी इस दुनिया में हर पल एक शख्‍स भटकता है
यूं कब तक बिन मुहब्‍बत के एक कमजोर जिन्‍दगी जियेंगे आप
बताओ तो आपके दिल की इजाजत को जुंबा पे आने से कौन रोकता है
मेरे सनम को सच्‍ची मोहब्‍बत औ इसके अहसास से डर लगता है
मेरा हंस-हंस के इस मोहब्‍बत में जल जाने का जी करता है
आखिर में हुआ कि शातिर सनम हमसफर न बन कर दगा दे गया
मेरे दिल के अरमानों से खुद की खूबसूरती को चुरा ले गया
उसकी आंखों का सुलूक मुझे जन्‍मों का अजनबी बता गया
जमीन पर यह आदमी और इसका दिल भर-भर आता है
मोहब्बत में मिली धोखेदारी को भी मोहब्‍बत से ही सजाता है




16 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [02.09.2013]
    चर्चामंच 1356 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  2. बहुत खूबसूरत लेखन |
    मैं तो बस इतना कहूँगा -
    फ़कत निगाह से . होता है फैसला दिल का ;
    न हो निगाह में शोखी , तो दिलबरी क्या है
    {इकबाल की रचना }

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  3. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  4. प्रेममय हृदय ईश्वर के अधिक निकट होता है.
    प्रकृति की हर वस्तु सुन्दर दिखाई देती है.वह प्रेम माँ का बच्चे के प्रति हो या मानव का ईश्वर के प्रति या प्रेम का कोई अन्य रूप.वह तो हर रूप में हर्षित करता है,

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  5. हमसुखन था, हमराज था, हमसफ़र भी था वह, मगर सीने में जो रहता था, वह अक्स नहीं था..

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  6. सूफियाना पोस्ट.

    आखिर में हुआ कि शातिर सनम हमसफर न बन कर दगा दे गया
    मेरे दिल के अरमानों से खुद की खूबसूरती को चुरा ले गया

    इन पंक्तियों को पढ़कर साहिर के "खूबसूरत मोड़" की याद आयी जिसमे इसका शायद समसे समुचित उत्तर है.

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  7. आलोकिक एहसास से भर गई ये पोस्ट ... प्रेम में एकाकार हो जाना ईश्वर से .. या किसी से भी ... आलोकिक हो जाना ही तो है ...

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  8. क्या बात है बहुत बढ़िया...

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  9. बहुत भावमयी प्रस्तुति...भावों का प्रवाह आकंठ डुबो गया...

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  10. प्रेम के भावरस में भीगा भावयुक्त रचना!!

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  11. पढ़ते हुए जगता है एक ऐसा स्पंदन जो बहका -बहका कर भी संभाल लेता है.. अपने भोलेपन में..

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  12. हे ईश्‍वर! यहीं पर प्राण हर ले
    मेरे प्रेमभाव को स्थिर कर दे
    हमेशा के लिए...

    मोहब्बत से मिली धोखेदारी को भी मोहब्बत सजाता है..
    दोनों ही बड़ी प्रेक्टिकल सी कविता है..

    असल में प्रेमानुभूति ऐसी ही होती है..
    बेहतरीन प्रस्तुति।।

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  13. सूफी साहित्य की झलक है भाई ..

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