Wednesday, August 7, 2013

अपना अस्तित्‍व

सुबह बिस्‍तर पर अर्द्ध-निद्रा में दाएं-बाएं पलटते हुए ही सुनाई दिया, दीदी आज अमावस्‍या है दीदी। ये आवाज पड़ोसी के घर के दरवाजे पर खड़ी मांगनेवाली की थी। हर शनिवार, अमावस्‍या के दिन वह मांगने के लिए आती है तो यही वाक्‍य बोलती है। इसके अलावा मैंने उसे कुछ और कहते हुए कभी नहीं सुना। तीसरी मंजिल पर स्थित घर के दरवाजे पर रबर से बंधे समाचारपत्र टकराए तो फट की तेज ध्‍वनि से अर्द्ध-निद्रा भी उचट गई। उठ कर बिस्‍तर पर बैठ जाता हूँ। आंखों के सामने खिड़की से बाहर सुन्‍दर, सुवासित बेलवृक्ष लहरा रहा है। आज लगता है सुबह से ही आकाश बरसाती बादलों से घिरा हुआ है। धूप नदारद है। बिलकुल बेकार मौसम है। मेरे लिए यह वातावरण घुटन का कारण बनता है। हालांकि गर्मी से बचने के क्रम में यह मौसम, इस शहर के लिए ठीक है, परन्‍तु मुझे इस ठंडक से वह गर्म मौसम अधिक सुहावना लगता है, जिसमें साफ आसमान और सूर्यप्रकाश की किरणें होती हैं। दो दिन पहले तक ऐसा ही मनहर मौसम था। जब तक नीला आकाश न दिखाई दे, पीली धूप न खिले और धीमी-धीमी हवा न चल रही हो, मुझे जैसे मूड-खराबी का डंक लग जाता है। स्‍वयं को प्रसन्‍न रखने के अनेक मनोवैज्ञानिक प्रयास विफल हुए। अप्रसन्‍नता में घर के अन्‍दर के सभी कार्य निपटा कर बाहर चल पड़ता हूँ। असामाजिक, अव्‍यवस्थित शहर की परिस्थितियां, गतिविधियां इस मौसम में मुझे अधिक प्रताड़ित करने लगती हैं।
सड़क बूंदाबांदी से भीगी हुई है। गुटखा, चिप्‍स, टॉफी, कई अन्‍य चीजों के खाली, फटे और गन्‍दे प्‍लास्टिक पैकेट यहां-वहां बिखरे हुए हैं। कॉलोनी की नालियां अव्‍यवस्थित तरीके से ढकी हुई हैं। मेरे जैसा ही कोई होगा जिसके पास अपना घर, कार, किराएदार, अच्‍छा बैंक बैलेंस नहीं हो। अधिकांश कॉलोनीवासी सम्‍पन्‍न हैं। सबके बच्‍चे तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा थोप रहे पब्लिक स्‍कूलों में पढ़ रहे हैं। तब भी क्‍या पढ़ाई में बच्‍चों को यह नहीं बताया जाता कि घर और कॉलोनी की साफ-सफाई होनी चाहिए। कोई भी बच्‍चा या उसके अभिभावक कॉलोनी में गन्‍दे तरीके से फैले कूड़े के प्रति कभी चिंतित नहीं दिखते। गंदगी और अव्‍यवस्‍था के बारे में बात करते हुए मैंने कभी किसी को नहीं सुना।
कॉलोनी के बाहर निकला। उप-मार्गों पर अनावश्‍यक रूप से वाहन दौड़ रहे हैं। जरूरत के बिना ही तेज हॉर्न बजाते हुए, अनियन्त्रित तरीके से आवागमन करते वाहन और इनके चालकों का व्‍यवहार ही ऐसा होता है मानो वे पैदल चलनेवालों को रौंद देना चाहते हों। सूखी टांगोंवाले, भौंडे, भद्दे लड़के चुस्‍त जींस, गन्‍दे फैशनवाली कमीज पहने मोटरसाइकिल पर बैठकर कहां जा रहे हैं, समझ से परे है। ठीकठाक कपड़े पहने हुए वाहन चालक भी यातायात नियमों का पालन नहीं करते। ट्रक जैसे चौपहिया वाहन मात्र पन्‍द्रह-बीस फुट चौड़ी सड़क पर ऐसे चलते हैं जैसे एक्‍सप्रेस-वे पर चल रहे हों। चौपहिया वाहनों पर साइकिल, हाथ, हाथी के चिन्‍होंवाली राजनीतिक पार्टियों के छोटे-छोटे झण्‍डे होते हैं। मार्गों के किनारे तम्‍बाकू, बीड़ी, सिगरेट के खाली प्‍लास्टिक पैकेट, गुटखा-खैणी खाकर थूके हुए लाल-भूरे-काले थक्‍के पसरे हुए हैं। कूड़ेदान बनाकर प्राधिकरण ने जनता पर उपकार किया है, पर कूड़ादानों के द्वार नहीं होने से उनमें फेंका गया कूड़ा आवारा पशुओं, कुत्‍तों, सूअरों द्वारा जब-तब सड़कों पर फैला दिया जाता है। कूड़े का त्‍वरित निस्‍तारण और प्रसंस्‍करण अभी इस शहर का प्रारम्भिक सपना है न जाने यह सपना कब पूरा होगा। कूड़े की बात पर याद आया कि यहां से गाजीपुर डेरी फॉर्म के पीछे का कूड़ा डम्पिंग ग्राउंड स्‍पष्‍ट दिखने लगा है। दिल्‍ली-एनसीआर से इकट्ठा कर सालों से यहां कूड़ा फेंका जा रहा है। कूड़े के ढेर बड़ी ऊंची पहाड़ियों जैसे नजर आने लगे हैं।
सड़कों के गड्ढों में बारिश का पानी भरा हुआ है। मेरे पीछे से तेज गति में आते चौपहिया के चारों पहिए गड्ढों में पड़े और गंदले पानी के छींटे मेरे कपड़ों को भिगोते हुए मेरे मुंह पर भी गिर गए। लम्‍बी सांसें खींचकर तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों के उन शुरुआती कदमों को कोसने लगा जो बारी-बारी से भारत की पवित्र वसुन्‍धरा पर पड़े। भारतवर्ष के नागरिकों को परतन्‍त्रता के अभिशाप ने क्‍या बना कर छोड़ दिया है! इस देश की राजनीति, शासन, नियम-कानून केवल धर्मनिरपेक्ष जैसे एकदम बेकार हवा-हवाई विषय के लिए ही स‍मर्पित होंगे? क्‍या कभी इनका क्रियान्‍वयन आम भारतीय के लिए आवश्‍यक आधारभूत सुविधाओं, सेवाओं के लिए भी होगा?
अब एक मित्र के घर पहुंच गया हूँ। वो टीवी पर जम्‍मू में बिहार रेजिमेंट के पांच जवानों को पाकिस्‍तानी सेना द्वारा मारे जाने का समाचार सुन कर विचलित हो रहा है। उसको दुखी देख देहरादून से आए उसके साथी ने उसे डांटा और टीवी बन्‍द करने के लिए कहा। अस्‍सी वर्ष के दो बुजुर्गों को भारतीय व्‍यवस्‍था के बाबत विमर्श करते हुए सुनता रहा। हताशा, निराशा का वातावरण उत्‍पन्‍न हो गया। मन में आया कि हाथ को काट कर कहीं दूर फेंक आऊं।
घर पहुंचते-पहुंचते नभ की कुरूपता चरम पर थी। छींटाछांटी करते बादल न ढंग से बरस रहे थे और ना ही आकाश से हट रहे थे। बिजली चमक रही भी। बादलों की गड़गड़ाहट घर को हिलाती प्रतीत हुई। मुझ जैसे कमजोर दिलवाले के लिए यह कड़कड़ाती आवाज असहनीय बनी हुई थी। तीव्र कड़कड़ाहट की अन्तिम ध्‍वनियां इतनी तेज होतीं कि जहां खड़ा या बैठा था वहीं दोनों कानों पर हाथ रख लेता। दिल तेज-तेज धड़कने लगता। लगता जैसे यह बिजली मेरे सिर पर ही आकर गिरेगी।
रात घिर आने तक थोड़ा-थोड़ा पानी बरसता रहा। बाहर कपड़े सुखानेवाली तारों पर नीचे की ओर पंक्तिबद्ध हो विद्यमान पानी की बूंदों को देख रहा हूँ। वर्तमान सांसारिक और प्राकृतिक परिस्थितियों में अपना अस्तित्‍व भी इन्‍हीं जैसा लगता है। एक झटका लगा नहीं कि सब समाप्‍त।  
मंगलवार 6-8-2013 का संस्‍मरण।

14 comments:

  1. डायरी के अंदाज में लिखा है और डायरी लिखना भी एक अच्छी बात है. मंबह्लाऊ और सम्सम्यीक घटनाओं को कैद कर लिया जाता है , बहुत सालों बाद पढो तो बड़ा मजा आता है!

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  2. आम जिंदगी में जैसे दिन बीतते हैं और निरंतर बदवाल आता रहता है ... वैसे ही एक आम दिन की दास्तां लिख दी आपने ... अच्छा लगा समय के साथ यूं गुज़ारना ...

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  3. इस प्रकृति और दुनिया में बिखरे पड़े तमाम व्यवस्थित-अव्यवस्थित संसाधनों में इंसान बड़ा अदना सा नज़र आता है...किंतु फिर भी न जाने किस बात का गुरूर अपने सिर पे लिये इंसान ताउम्र एक मिथ्या अहंकार में जीवन यापन करता रहता है...दुनिया में अपने अस्तित्व की सच्ची पहचान जब हमारा ध्येय हो तो बस यही जीवन की सच्ची सार्थकता है..आपने अपने आसपास की वस्तुओं में ये दिखाने का प्रयास किया..बेहद सार्थक अभीव्यक्ति।

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  4. अति सुन्दर शब्द एवं भाव प्रवाह..इतर जाने ही नहीं देता है.

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  5. हर दृश्य शब्दों से सुस्पष्ट दीखता है, उस पर मन के भावों का अधिरोपण, अत्यन्त सुन्दर शैली।

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  6. आसपास के माहौल की अव्यवस्था और अराजकता के बीच एकाकी मन अपना अस्तित्व भूल जाता है और तलाश करता है सुकून के कुछ पल... अंतस को छूता बहुत बहुत प्रभावी आलेख...

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  7. डायरी के पन्नो में मानो जिन्दगी की तस्वीर उभर आई हो .... प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सामाजिक अवस्था पर गहरी चिंता और प्रहार किया इस संस्मरण द्वारा ..... आम आदमी का मौसम के बदलाव पर बदलता स्वभाव ....उसका देश की समस्याओं से तुलनात्मक दृष्टिकोण .... सभी कुछ हृदय को भीतर कहीं छू जाता है .....और यह विश्वास कि 'हाथ'को कहीं दूर काट कर फेंक दिया जाए ......और पुख्ता हो जाता है ......
    ......... पहली बार पढ़ा अच्छा लगा .... लिखते रहिये ........साधुवाद आपको

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  8. हल्का फुल्का लेखन बहुत अच्छा है

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  9. लगता है आप इस दुनिया के है नहीं गलत दुनिया में आगए हैं आप :) खैर यहाँ तो अधिकतर ऐसा बादलों से परिपूर्ण मौसम ही रहता है। जिसके कारण बहुत से लोग अवसाद का शिकार हो जाते है। बहुतों का यही हाल है यहाँ, साफ सफाई के मामले में तो
    मेरा भारत महान" वहाँ इसकी चिंता न सरकार को है न प्रशासन को और ना ही वहाँ के नागरिकों को ही इस सब से कोई फर्क पड़ता है। सब मस्त हैं अपनी-अपनी ज़िंदगी में "मॉरल साइन्स" नाम का तो विषय ही खत्म हो गया है। तो बच्चों में भी इस से संबन्धित जानकारी आने से रही। और क्या कहूँ जय हो...

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  10. मन के भावों का सुंदर चित्रण... बढ़ियाआलेख!!!

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  11. मन के भावों का सुंदर चित्रण... बढ़ियाआलेख!!!

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  12. कई समस्यायों की जड़ शायद हम खुद है. एक बार व्यवस्था बहाल कर भी दी जाती है तो हम कहाँ पालन कर पाते है. सुन्दर संस्मरण.

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  13. बहुत प्रभावी आलेख विकेश जी,बेहद सार्थक अंतस को छूता बहुत बहुत प्रभावी आलेख।

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