Sunday, August 25, 2013

बलात्‍कार के मूल



राजधानी में एक वर्ष में हुईं दो सामूहिक बलात्‍कार की घटनाएं अगर कुछ सामाजिक बदलाव कर पाईं हैं तो वह यह कि अब बलात्‍कार से सम्‍बन्धित खबरों और पुलिस थानों में दर्ज इनकी रिपोर्टों पर लोकतन्‍त्र का कोई न कोई स्‍तम्‍भ जब-तब संज्ञान लेता ही रहता है। यह बात अलग है कि संज्ञान पूर्व की दुष्‍कर्म की घटनाओं के दोषियों को दण्‍ड देने के बारे में हो रही व्‍यवस्‍थागत उठापटक से प्रेरित होकर नहीं बल्कि बलात्‍कार की नई घटना होने पर लिया जाता है। इस बार बलत्‍कृत हुई मुम्‍बई की फोटो पत्रकार का सौभाग्‍य था कि उसका शारीरिक उत्‍पीड़न होने के बाद उसे इस तरह मारा-पीटा नहीं गया कि उसकी जान चली जाती। वह जीवित है। अस्‍पताल के कक्ष में अपने होने न होने की उस भावना में बह रही है, जिसे बलात्‍कारियों ने गहरे आहत कर दिया है।
इस विषय पर क्रोधित होनेवालों, बात करनेवालों, न्‍याय करनेवालों, लिखनेवालों के बीच फिर वही पुराना वाद-विवाद होगा कि यह सब पाश्‍चात्‍य, आधुनिकता, फैशन, खुलनेपन, सेक्‍स प्रसारकों के कारण हो रहा है या जन्‍म से विकृत मानसिकता रखनेवाले ऐसे अपराध करते हैं। इस सम्‍बन्‍ध में यदि हम सभी कारकों पर विचार करेंगे तो शायद कुछ व्‍यावहारिक सुधार हो सकें। विषयगत समस्‍या के उन्‍मूलन के लिए जीवन के कई पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए और इनमें व्‍याप्‍त विसंगतियों को चिन्हित कर, उन्‍हें रोक कर ही इस दिशा में ठोस कार्य किए जा सकते हैं।
इस हेतु सर्वप्रथम भारतीय सामाजिक ताने-बाने को देखें। आज देश में मौजूद जनसंख्‍या राष्‍ट्रीय आंकड़ों में प्रदर्शित संख्‍या से बहुत ज्‍यादा है। राजनीति के फलने-फूलने के लिए जो सबसे बड़ी खुराक है, वह है जनसंख्‍या। अब यह जनसंख्‍या भारतीय मूल की है या आयातित, इससे चुनाव जीत कर सत्‍तासीन होनेवालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। आज जो बाहरी लोग देश में घुसे हुए हैं कहने को तो कुल जनसंख्‍या में उनकी गिनती भी होती है। पर सच्‍चाई ये है कि इस देश के मूल निवासी न होने के कारण राष्‍ट्रीय रजिस्‍टर में उनका अंकन हो ही नहीं पाता। ऐसे लोग क्‍या करते हैं, कहां व कैसे रहते हैं, इनकी आय-व्‍यय का हिसाब-किताब क्‍या है, ये ऐसे प्रश्‍न हैं जिनकी पड़ताल बहुत जरुरी हो गई है। यही वे लोग हैं जो सामूहिक बलात्‍कार, चोरी-डकैती करने, दंगा-आतंक फैलाने, नकली मुद्रा बनाने, इसका प्रचार-प्रसार करने तथा हर उस अवैध गतिविधि में शामिल पाए जाते हैं जो प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रुप से देश का अहित कर रही है। ऐसे में सरकार का प्रथम दायित्‍व तो यह बनता है कि वह शरणार्थियों के रुप में आए बांग्‍लादेशियों, पाकिस्‍तानियों, नेपालियों, म्‍यामारियों को वापस इनके देशों में भेजे। ये परदेसी आते तो शरणार्थी बन कर हैं पर यहां की लचर कानून-व्‍यवस्‍था का फायदा उठा कर शीघ्र ही गोरखधन्‍धों में लिप्‍त हो जाते हैं। जिनके संस्‍कारों में देश, परिवार, सम्‍बन्‍धों का कोई मूल्‍य न हो वे हमारे देश में आकर यहां के मूल्‍य-मान्‍यताओं को सम्‍मान देंगे और यहां की व्‍यवस्‍था से चलेंगे, ऐसी उम्‍मीद करना ही बेकार है। दुर्भाग्‍य से हमारी सरकारें गद्दी पर बैठने के लालच से ऐसी उम्‍मीद हमेशा से पाले हुईं हैं। क्‍योंकि उन्‍हें शरणार्थियों में अपना नया वोट बैंक जो नजर आता है। इसलिए देश के उद्धार के लिए पहले तो अपने ही देश की जनसंख्‍या वृद्धि को रोकना होगा और यदि यह कार्य शीघ्र क्रियान्वित नहीं हो सकता तो कम से कम इतना तो करना ही होगा कि भारत स्‍वयं के शरणस्‍थल बनने पर तत्‍काल रोक लगाए।
अब उन्‍मुख होते हैं आज के राष्‍ट्रीय पथ-प्रदर्शकों की ओर। नेताओं की बात करना इसलिए जरुरी नहीं है कि अगर ये काम के होते तो न समस्‍याएं होतीं और ना कुछ लिखने की जरुरत ही पड़ती। अस्‍पताल में पैदा होनेवाले आज के बच्‍चे सांसारिक भाव-विचारों से परिचित होते ही सबसे पहले विज्ञापनों, फिल्‍मों के आभासी सम्‍पर्क में आते हैं। घोर अभावों में पल रहे किसी बच्‍चे के घर में टी.वी. तो जरुर होता है। इस पर प्रसारित होनेवाले कार्यक्रमों में ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं है, जिससे कुछ अच्‍छा ज्ञान मिले। तीव्र गति से चलते-फिरते चलचित्र, भारतीय जीवन की सच्‍चाई से कोसों दूर अमीरी और भोगवाद को परोसता टी.वी. बच्‍चों में जो कुछ भर रहा है उसे वास्‍तविक दुनिया में अनुपलब्‍ध पाकर वे विद्रोही, हठी ही बनेंगे। विज्ञापनों, फिल्‍मों, नाटकों का विषाक्‍त आभास उन्‍हें संघर्ष, श्रम से जी चुराने को दुष्‍प्रेरित करता है। चीजों को जल्‍दी और अपनी शर्तों पर प्राप्‍त करने की होड़ उन्‍हें अपराधोन्‍मुखी बनाती है।
ऐसी आभासी दुनिया को अपने अभिनय से और ज्‍यादा सजानेवाले बॉलीवुड के फिल्‍म अभिनेता, खेल जगत के प्रसिद्ध खिलाड़ी जो आज युवाओं के अनुकरणीय हैं, क्‍या उनका यह दायित्‍व नहीं कि वे अपने कार्यक्षेत्र में उन्‍हीं कार्यों को शामिल करें, उन्हीं कलाओं को अभिव्‍यक्‍त करें जो जीवन में वास्‍तविक रुप से मौजूद हों। वे बिलकुल भी वह सब न दिखाएं या बताएं जिससे देखनेवाले पथभ्रष्‍ट हों। मीडियावाले भी अपना उत्‍तरदायित्‍व समझें और उन्‍हीं समाचारों, घटनाओं, बातों का ज्‍यादा प्रसार करें जिनसे नए बच्‍चों को कुछ अच्‍छा सीखने को मिले। बलात्‍कार का दुखदायी समाचार जहां पर छपा हो उसी के बगल में सेक्‍स शक्ति बढ़ाने के विज्ञापन छापना बन्‍द होना चाहिए। इसी तरह बॉलीवुड और हॉलीवुड की अभिनेत्रियों की अधनंगी तसवीरों सहित उनकी अमीरी चोंचलों की खबरें भी नहीं छापीं जानी चाहिए। लोकतन्‍त्र के चतुर्थ स्‍तम्‍भ को यह तो तय करना ही पड़ेगा कि वह नई पीढ़ी में अच्‍छे संस्‍कार डालने के पक्ष में रह कर उसी प्रकार से अपने समाचारपत्र छापना चाहता है या इस पीढ़ी को सेक्‍स, कामुकता बढ़ाने के विज्ञापन पढ़वा कर उनसे इन्‍हें खरीदने की मौन अपील करते हुए मात्र धनलाभ अर्जित करना चाहता है। फिल्‍म निर्माण से जुड़े लोगों को भी अपनी फिल्‍मों के विषय सोच-समझ कर चुनने होंगे। 'दोस्‍ती' जैसी फिल्‍में बनेंगी तो समाज पर भी उसका अच्‍छा असर पड़ेगा।  'डर' जैसी बेहूदी फिल्‍म में अभिनेता द्वारा जबर्दस्‍ती अभिनेत्री के पीछे पड़े रह कर एकतरफा प्‍यार में उसे प्रताड़ित करने और अन्‍त में हिंसा पर उतारु हो जाने से कौन सा सार्थक संदेश समाज में फैलता है! इन्‍हीं बातों पर ध्‍यान देकर कलुषता की ओर तेजी से बढ़ते समाज को रोका जा सकेगा।
    

11 comments:

  1. न जाने किन अपसंस्कृतियाँ घुस आयी हैं, घुसपैठियों की तरह।

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  2. सबसे बडा घुसपैठिया है टेलिविजन । दूसरा अखबार । खास बात यह है कि ये दोनों ही अच्छाई कम ( न के बराबर) और बुराई का प्रसार ज्यादा कर रहे हैं । बुराई प्रसारित करने से हटती नही बढती है । आज हम लगातार इतने दुष्कर्म, रिश्वतखोरी नेताओं की काली करतूतें ,हत्या, षडयन्त्र ये सब इतनी अधिकता से पढते सुनते देखते रहते हैं कि अविश्वास बढता ही जा रहा है । किसी बडे नेता की कोई काली करतूत सुर्खियों में आती है पर उसे सजा की जगह जमानत मिल जाती है वह चुनाव भी लडता है ।
    टूटती आस्थाओं व विश्वास , भाषा साहित्य से दूरी शिक्षा में नैतिक शिक्षा,समझ दायित्त्वबोध आदि का अभाव ,भौतिकता को प्राधान्य आदि दूसरे कारण भी हैं । और कठोर सजा न होना सबसे बडा कारण है । कहते हैं कि भय से तो भूत भी भागते हैं ।

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  3. सबसे पहले तो सरकार को कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान करनी चाहिए...
    और सारी बातें इसके बाद है ...

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  4. मेरी नज़र में सबसे बड़ी समस्या है क़ानून का अनुपालन ना होना. ताकतवरों की आवाज़ सुना जाना और कमजोरों की अनसुनी करना. यहाँ पर स्त्री शोषण का कोई अपराध अगर साबित हो जाता है तो अपराधी का जीवन बर्बाद. घर के सामने सूचना लगा के रखना होता है कि मैं यौन अपराधी हूँ. आप जिस इलाके में भी रहेंगे वहाँ के काउंटी में यौन अपराधियों की सूची और उसका निवास स्थान प्रदर्शित रहता है.और नौकरी पाना तो भूल ही जाइए. इसलिए यहाँ पर इस तरह का अपराध बहुत कम है. और आवाज़ किसी की भी हो, एक बार उठ गयी तो उसपर त्वरित सुनवाई निश्चित है. अपने यहाँ तो पीड़ितजन थाने से ही जलील हो कर लौट आते हैं.

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  5. मेरी नज़र में सबसे बड़ी समस्या है क़ानून का अनुपालन ना होना,समाज में कड़ी सजा का ना मिलना या देरी से उठाया गया कदम एक गलत सन्देश देता है। सटीक लेखन विकेश जी।

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  6. बहुत सारगर्भित चिंतन...आवश्यकता है कि समाज नारी के प्रति अपनी सोच बदले और उन्हें उचित सम्मान दे....

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  7. समाज की सफाई अब एक क्रांति की तरह सबको करना होगा नहीं तो यही सब होता रहेगा..

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  8. लचर कानून के कारण इस तरह के हालात बन गए हैं.
    इसके साथ ही हमें अपने-आपको भी ठीक करना होगा...

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  9. समस्याएँ तो बहुत है और लगभग अपने सभी गिनवा भी दी है सभी का थोड़ा बहुत हल भी सबको पता है। मगर अपने अपने दायित्व को निभाना कोई नहीं चाहता और मुझे ऐसा लगता है की जब तक सभी अपने अपने दायित्व को पूरी ईमानदारी से नहीं निभाएगे तब तक किसी भी समस्या का कोई भी समाधान नहीं होगा क्यूंकि हमारे देश की समस्याएँ एक उन के गोले की तरह है जिसका एक सिरा दूसरी से जुड़ा हुआ है। इसलिए सब से पहले देश की सरकार प्रशासन और नेताओं को सुधारना होगा फिर मीडिया को उनमें बदलाव देखकर उम्मीद है जनता अपने आप सुधार जायेगी।

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  10. शायद ये बदलाव का दौर है .. बिखराव का दौर है ... गलत चीजें जल्दी असर करती हैं ... जब अलग अलग संस्कृतियाँ प्रहार करती हैं तो गलत बातें सहज ही प्रवेश कर जाती हैं ... जहां तक घुसपैठ की समस्या है ... जब तक स्वार्थी तंत्र है ये चलती रहेगी ...

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