महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, August 4, 2013

जहां मनुष्‍य-जीवन हो, वहां रहना चाहता हूँ

ह कोहरा नहीं है जो मुझे आर-पार का परिदृश्‍य नहीं दिख रहा है। यह वर्षा की बूंदेंबूंदें नहीं, बल्कि मोटी धारें हैं। ये वर्षाजल की बूंदों का आकाश से नीचे धरती पर किसी चीज पर गिर कर टकराने और बिखर जाने तक की माला है। इसमें ध्‍वनि, नमी, ठण्‍ड का ऐसा प्रभाव है जो धरती की उर्वरा शक्ति, जीव-जगत के लिए जीवन का पर्याय होता है। बीस मिनट तक लगातार बरस कर बारिश की बूंदों ने खेत, पेड़, पौधों, पत्‍तों, मिट्टी को तरबतर कर दिया। घर की चूंतों से टपक रही जलबूंदें वर्षाॠतु का शंखनाद है। पर्वतों की घाटियों में बरस चुके जल को एकत्रित करने कोहरा बादलों के रूप में साक्षात मेरे शरीर से गुजर रहा है। जल भरकर आकाश की ओर लौटते बादलों ने मुझे स्‍पर्श किया, तो मेरा तन गीला हो गया। पानी घन के तन्‍तुओं में परिवर्तित हो गया हो जैसे। ऐसे कोहरे में मेरे घर का एक कोना दूसरे कोने से दिख नहीं रहा।
     हलकी बूंदाबांदी जारी है। चिड़ियाएं खासकर गोरैया अपने घोंसलों से निकलकर फरर-फर-फर्र करती हुई यहां-वहां उड़ने लगी हैं। रात के खाने का प्रबन्‍ध करने में जुट गईं हैं। तरह-तरह के अन्‍य पक्षियों के स्‍वरगान भी सुनाई देने लगे हैं। घुघूती विचित्र मार्मिक कूक कर रही है। दूर दाईं ओर घर के पीछे छत में एकत्रित बारिश का पानी मोटी धारा के रूप में नीचे गिरता हुआ सुनाई दे रहा है। उसकी ध्‍वनि डरावनी प्रतीत होती है। घर की ढलाननुमा टिन की छत के नीचे लकड़ी के कोठरों में गोरैया के कई घोंसले हैं। भीगे हुए पक्षियों को ठण्‍ड लगने पर दवाई कौन देता है, इस विचार के व्‍याप्‍त होते ही पशु-पक्षियों के सम्‍मुख अपनी हीनता स्‍पष्‍ट हो गई। हमें कितना कुछ चाहिए जीवन चलाने के लिए। पुराने समय में बहुत कम सामान में काम चल जाता था, पर अब तो जितना भी एकत्रित करो उसमें भी असुरक्षा का भाव बना रहता है। क्‍या हमें ज्‍यादा बुद्धि देकर प्रकृति ने गलती नहीं की? खुली आंखों से देखता इन प्रकृति उपक्रमों के समानांतर अपना जीवन चलाने का विचार मुझे एक अनोखा विवेक प्रदान करता है। अचानक मनुष्‍य के लिए दो सबसे बड़े आश्‍चर्य जीवन और मृत्‍यु पर ध्‍यान अटकता है। जीवन तो ठीक है। इसे जीनेवाले के विवेक पर अच्छे से अच्‍छा और बुरे से बुरा जिया जा सकता है। परन्‍तु मृत्‍यु पर ठिठक जाता हूँ। डरता नहीं हूँ बल्कि ये सोचता हूँ कि क्‍या होता है ना कि किसी का विशाल जीवन अचानक अवसान हो जाता है। हम मरे हुए जड़वत मनुष्‍य को सदैव की विदाई दे देते हैं। दाह-संस्‍कार के रूप में उसके शरीर का अन्तिम प्रदर्शन देखते हैं। सोचता हूँ कि हम प्रदर्शनकर्ता ही बने रहेंगे या क्‍या कभी हम जीते जी स्‍वयं को मर चुके व्‍यक्ति के स्‍थान पर रखकर गम्‍भीरता से मनन करेंगे। इसलिए नहीं कि हमें भी मरना है। इसलिए कि हमारे पास सच्‍ची खुशियों, आनंद के लिए कितना कम समय होता है। तब भी हम अधिक समय हिंसा, उत्‍पात, झगड़ों, वाद-विवादों में गुजार देते हैं।
     ……अचानक कौंधे विचार से ध्‍यान हटा तो देखा बारिश पूरी तरह से बन्‍द हो चुकी है। अपराहन के तीन-चार बजे होंगे। कोहरा सर्वत्र व्‍याप्‍त है। चूंतों से अब इक्‍का-दुक्‍का पानी की बूंदें टपक रही हैं। मालटा, अखरोट, पुलम, आड़ू, नाशपाती, केला, सेब, खुबानी आदि फलों के पेड़ वर्षा से नहाए हुए हिले-डुले बिना चुपचाप खड़े हैं। झींगुरों, कौवों और सो रहे घरवालों के खर्राटों की ध्‍वनियां आ रही हैं। शहर में रह कर सोचता हूँ कि गांव आकर कुछ नया, अच्‍छा करूंगा। अपनी नजर में बुरे लगनेवाले अपने व्‍यवहार में यहां आकर परिवर्तन करूंगा, पर यहां आकर यहां के संकीर्ण वैचारिक वातावरण को अनुभव करके पाता हूँ कि अब सामाजिक स्‍तर पर गांव-शहर में कोई भेद नहीं बचा है। असंवेदनशीलता की खाई गांव में भी गहराती जा रही है। आधुनिकता, शहरी जीवनशैली और विलासिता का प्रकोप यहां भी पड़ चुका है।
      शहर से परेशान होकर जहां जाने और बसने का लक्ष्‍य रखा था, वह गांव भी रहन-सहन में शहर जैसा ही हो गया है। ऐसे में अपने जीवन को क्‍या हमेशा घुट-घुट के ही जिऊंगा या फिर शहर और गांव के अलावा तीसरा विकल्‍प  क्‍या है मेरे पास, जहां मनुष्‍य के जीवन जैसा कुछ हो और मैं वहां रह सकूं, जी सकूं।

24 comments:

  1. यदि हम हमेशा बाहरी संसार को अपने अनुरूप बनाते रहेंगे और अपनी जिन्दगी उसी में खोजते रहेंगे तो अवसाद के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलने वाला है . इसलिए अपने आन्तरिक संसार के स्थायी आनंद में अवस्थित होने की कला सीखने की आवश्यकता है.

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  2. मूलभूत सुविधाएं हो तो गाँव फिर भी शहर के मुकाबले आज भी विकल्प है!

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  3. खर्राटों की फ़िक्र क्या, सोया सारा देश |
    इक आधा जो जगता, किसको दे सन्देश |
    किसको दे सन्देश , जागरुक नहीं दीखते |
    घर का घोडा बेंच, स्वप्न में कार सीखते |
    सारे सपने ध्वस्त, ग्राम नगरों का ढर्रा |
    साधुवाद हे मित्र, लिखा है बढ़िया खर्रा ||

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  4. एक बात तो बिलकुल सही कही आपने अब गाँव और शहरों में कोई खास फर्क नहीं बचा है रही रहने लायक जगह ढूँढने की बात तो जैसा आप सोचते हैं ऐसा शायद ही कोई स्थान हो लेकिन फिर भी यदि सुबीधाओं की दृष्टि से देखो तो थोड़ा बहुत रहने लायक मुझे विदेश लगा है अब तक :)
    बाकी तो सोच का क्या है, सोचते तो सभी बहुत कुछ है सोच के परिंदे तो जाने कहाँ -कहाँ विचरते है। लेकिन अपना तो एक ही असूल है
    "जाही विधि रखे राम ताही विधि रहिए"
    यही एक मूल मंत्र हैं शांति से जीने का...:)

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  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  7. आप ने सच कहा कि प्रकृति ने हमें अधिक बुद्धि दे कर गलती की है.

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  8. गाँव की आत्मा विकास के भाव से ग्रसित है और अपना स्वरूप भूल गयी है।

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  9. अपने अंदर ही हमें तलाशने होगी सच्ची शांति जो हम नहीं कर सकते सोचने से कोई लाभ नहीं ...

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  10. जहाँ शान्ति मिले वही हमारा घर होना चाहिए।

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  11. आधी बात रह गई, इसलिए दुबारा टिप्पणी कर रही हूँ।

    जहाँ शान्ति मिले वही हमारा घर होना चाहिए, और घर में शान्ति लाना अपने हाथ में है.…

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  12. असंवेदनशीलता अब गाँव में भी अपने पाँव पसार रही है
    गाँवों में बसे जिन विचारों पर हम मुग्ध हुआ करते हैं
    शायद वो अब लुप्त हुआ जा रहा है

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  13. सच में सुकून सबसे बढ़कर है..... संवेदनशीलता की कमी तो अब आम व्यव्हार बन गया है जो हर कहीं दिखता है ....

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  14. सुकून सबसे बढ़कर है, उत्कृष्ट प्रस्तुति विकेश जी आभार।

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  15. शांति और संतोष तो हमारे भीतर ही हैं...हाँ दबे हैं कई कई परतों के नीचे....कभी बारिश की चंद बूँदें भी गला देती हैं इन परतों को....
    सो भटकना क्यूँ....बस भीगिए यदाकदा...
    कभी मेह कभी स्नेह की बारिश में..

    अनु

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  16. इस पार प्रिये तुम हो मधु है उस पार न जाने क्या होगा (श्री हरिवंश राय बच्चन )की तरह आपके लेख में हर्ष व विषाद दोनों हैं । आपका प्रकृति चित्रण प्रकृति के प्रति गहरी संवेदना व अनुभूति प्रभावित करने वाली है ।
    घूघूती शब्द से परिचय घूघूती-बासूती ब्लाग से हुआ था पर नाम विचित्र लगा था । आज पता चला कि यह कोई चिडिया है । बासूती भी क्या कोई स्थानीय शब्दों से परिचय कराना हेगा ।

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  17. जीवन में थर्ड फ्रंट जैसा कुछ भी नहीं है भैया। राजनीति मेभी यह एक वैचारिक कोहरा ही है जो जल्दी छट जाता अलबत्ता जीवन अब एक आयामी ही रह गया है शहर और गाँव में। बढ़िया वैचारिक विमर्श मंथन। ॐ शान्ति।

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  18. हमारे देश में हमारी पीडा ही यह है कि हम इंसान और जिंदगी को ढूंढे जा रहे हैं। प्रश्न उठता है क्यों? इसीलिए कि गांव तहस-नहस हो गए,आत्मीयता खत्म हो गई। चकाचौंध के पीछे पडे भौतिकता पनपी और आदमीयत खो बैठै। इसीलिए हम मनुष्य जीवन को ढूंढने की कोशिश करते हैं। आपकी कोशिश सफलता पाए।

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  19. बहुत गहन और सारगर्भित चिंतन...आस पास के वातावरण का महत्व है पर स्थायी और सम्पूर्ण ख़ुशी तो अपने अन्दर ही तलाश करनी पड़ती है...

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  20. आज गाँव अपनी साख खो बैठे हैं !!

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  21. सुन्दर लेख. संवेदनशील ह्रदय के लिए अब गाँव हो या शहर हर जगह कदम कदम पर पत्थर ही मिलते है. गाँव में विकास ने गाँव की पहचान ही छीन ली है. पर जहाँ तक एक 'आदर्श जगह' की बात है..वो ना कभी पहले रही है, ना है, और ना ही होने वाला है. हम मनुष्य कुछ ऐसे ही हैं. लेकिन फिर भी साम्य उसी में बहाल करना होता है जहाँ इंसान को सुकून मिले. वो चाहे जहाँ मिले, जिसमे मिले. वर्ना कदम कदम पर दुःख ही है.

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  22. एक बेहतरीन लेख..

    गाँव हो या शहर , बाहर की दुनिया में हालात एक जैसे हैं और हमेशा रहेंगे। आप जो तलाश रहे हैं, वो तो आपके अन्दर ही मिलेगा।

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  23. एक बेहतरीन लेख..

    गाँव हो या शहर , बाहर की दुनिया में हालात एक जैसे हैं और हमेशा रहेंगे। आप जो तलाश रहे हैं, वो तो आपके अन्दर ही मिलेगा।

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