Thursday, August 29, 2013

मानवीयता छोड़ कहां जा रहे हम


गर ज्‍यादार लोग समझदार होते तो दुनिया के किसी भी देश को कानून की जरुरत ही नहीं होती। लोगों की मूर्खता, बेवकूफी के कारण मूर्खों में से आगे आ कुछ ने इतनी समझदारी दिखाई कि उन्‍होंने लोक और समाज नियन्‍त्रण की बात उठाकर शासन की अवधारणा प्रस्‍तुत की। जब ये अवधारणा बनी होगी उस समय की वस्‍तुस्थिति का तो पता नहीं लेकिन आज ये लोक शासन की अवधारणा अनेक अन्‍तर्जटिलताओं से ग्रस्‍त है। एक आदमी क्‍या कुछ सोच सकता है इसकी कोई सीमा नहीं। कितने अच्‍छे और बुरे कार्य कर सकता है इस पर भी किसी का नियन्‍त्रण नहीं है। शासन अपने हाथों में लिए हुए लोगों को इतना तो सोचना ही चाहिए कि संसार की सर्वोच्‍च साध्‍यता तब ही है जब प्रत्‍येक सामाजिक गतिविधि नैतिकता के सर्वश्रेष्‍ठ मानदण्‍डों पर खरी उतरे। ऐसा करने के लिए इन मानदण्‍डों को सार्वभौमिक, सर्वस्‍वीकार्य बनाने के लिए शासनाधीशों को सर्वप्रथम स्‍वयं को इस हेतु प्रस्‍तुत करना होगा। लेकिन राह दिखानेवाले ही जब राह बिगाड़नेवाले बन जाएं तो विशाल जनसंख्‍या के अनेक भाव-विचारों से समाज का परिचालन होने लगता है। यदि ये भाव-विचार अच्छे होते तो निश्चित रुप से समाज की दशा-दिशा उचित होती। दुर्भाग्‍य से अधिकांश जनसंख्‍या के भाव-विचार इतने असामाजिक हैं कि उन्‍हें कठोर शासन के अन्‍तर्गत रखना ही पड़ेगा। परन्‍तु एक बार पुन: वही प्रश्‍न उभरता है कि जब शासन ही अनियन्त्रित हो तो सामाजिक नियन्त्रण का सुचारु नियम कैसे बने।
जो अनुभव हमारा मानवीय हो सकने को तत्‍पर होता है उसमें हमेशा आधुनिक रीतियों के आकर्षण व्‍यवधान उत्‍पन्‍न कर देते हैं। हम पुन: मानव-अमानव अस्तित्‍व के मध्‍य सन्‍तुलन स्‍थापित करने में महत्‍तवपूर्ण जीवन समय व्‍यतीत कर देते हैं। ऐसा होते रहने से सामाजिकता का ह्रास तीव्र गति से हो रहा है। देशकाल के लिए मौलिक चिन्‍ताओं और सम्‍भावनाओं की रुपरेखा अनुभव एवं प्रतिष्‍ठा तक सिमट कर रह गई है। इसे कार्यरुप में बदलने के लिए जो कठोर निर्णय लिए जाने चाहिए, दुर्भाग्‍य से शासन-प्रशासन उनके पक्ष में नहीं है। और इस दिशा में यदि कोई योग्‍य जननायक कार्य भी करता है तो उसे 'धर्मनिरपेक्ष', 'साम्‍प्रदायिक' कहकर हतोत्‍साहित किया जाता है।
आज यदि कोई व्‍यक्ति सरकार, समाज के निकृष्‍ट ताने-बाने से परेशान होकर साधु-सन्‍त बनने की सोचे तो यह भी सम्‍भव नहीं। क्‍योंकि आजकल समाज के बड़े से बड़े ठग, लुटूरे, दुर्जन गेरुए वस्‍त्र पहन और लम्‍बी-लम्‍बी दाढ़ी मून्‍छ बढ़ा कर साधु-सन्‍त बने हुए हैं। ऐसे में यदि दुर्जन दुनिया के प्रत्‍यक्ष घनचक्‍कर से बचने के लिए सज्‍जन व्‍यक्ति सन्‍यासी बनना चाहे तो उसके लिए यह रास्‍ता भी सुरक्षित नहीं बचा। इस दुरुहता में मन बरबस यही प्रार्थना करता है कि हे भगवान! मशीनी होते मानव के घमण्‍ड को चूर करने के लिए अब धरती पर आ जाओ। नहीं तो आपकी भक्ति का अर्थ खत्‍म हो जाएगा। धरती का पावन भूखण्‍ड अनन्‍तकाल से मानवीय दुर्बुद्धि का शिकार होता रहा है। आज भी हो रहा है। एक सीधे रास्‍ते पर चलते हुए सज्‍जनता से जीवनयापन करना कितना कठिन होता जा रहा है! दुर्जनता अपने को सही और न्‍यायसंगत ठहरा रही है। इसके लिए संवैधानिक प्रणाली तैयार हो रही है। दुर्जन लोग अपने कहे-अनकहे को कानूनी जामा पहना कर समाज पर थोपने की जिद कर रहे हैं। संवेदनशील, विचारवान, बुद्धिमान और सज्‍जन लोग दुर्जनता के कानून तले दब कर मरने को विवश हैं।
 दशकों-दशक गुजरते गए और समय के प्रवाह में पिछला भूला-बिसरा हो जाता है। काल के गर्त में समा जाता है। फिर भी समय के वर्तमान काल के जीवन और इसमें हिल-डुल रहे मनुष्‍य को अपनी उपस्थिति न जाने क्‍या ज्ञात होती है कि वह मानवीयता छोड़ कर धोखा और लूट में लिप्‍त है। मनुष्‍य अपनी आत्‍मा से इतना बेपरवाह है कि वह अच्‍छे-बुरे व्‍यावहारिक घटनाक्रम को अपनी हार-जीत का पैमाना मान चुका है। अपने अन्‍तर्मन के निर्णय उसे बोझिल लगने लगे हैं। अपने मानवीय पहलू से जुड़ना अब हरेक के लिए शर्म की बात है। उधारी, मक्‍कारी, पराधीनता के जीवन को विज्ञापनों के द्वारा महिमामण्डित किया जा रहा है। यन्‍त्रों की बदौलत जीवन ढोने का आदी हो चुका आज का आदमी जीवन में मेहनत, संघर्ष, धैर्य, सादगी और आत्मिक सोच की अहम जरूरत भूल चुका है। न जाने चार पहियों के वाहन, दुपहिए वाहन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज में इधर से उधर और उधर से इधर करने में क्‍या रखा हुआ है, जो हमें स्‍वयं को समझने का मौका भी नहीं मिल पा रहा है कि हम क्‍यूं हैं, क्‍या हैं, किसलिए हैं, कब तक हैं और नहीं रहने पर कहां होंगे?
संसार के व्‍यवस्‍थापकों को रुक कर सोचने की आवश्‍यकता है कि मानव-जीवन की शान्ति उनका सबसे बड़ा लक्ष्‍य हो। एक-दूसरे पर पैर रख कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति से राष्‍ट्रों को और राष्‍ट्रों के अन्‍दर विभाजित राज्‍यों को बचना ही होगा। हम सब अपने भाव-विचारों को निरन्‍तर नवजात शिशु जैसी निश्‍छलता और मृत्‍यु पूर्व की गम्‍भीरता से संचित करेंगे तो निश्चित रुप से जीवन का सच्‍चा रस बरसेगा। मानव हर्ष में झूमेगा।  



13 comments:

  1. वे लोग जो भीड़ बन जाते हैं उनकी चेतना शून्यता बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देती है . किस बेहोशी में वे जीते हैं ? पहले उन्हें ही जागने की आवश्यकता है..

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार 30/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः9 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  3. न जाने इन सब समस्याओं का हल क्या है। मैं तो बस इतना जानती हूँ कि जब तक हम एक नहीं हो जाते तब तक ऐसी किसी भी समस्या पर नियंत्रण पाना नामुमकिन सी बात है।

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  4. हल है गीता वाचन पठन पाठन।

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  5. हल है गीता वाचन पठन पाठन।

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  6. बेहद विचारणीय आलेख विकेश जी,लगता है आगे का रास्ता ही बंद है। लेकिन जहां चाह होती है राह भी निकलती ही है।

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  7. सबसे पहले शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा पर जोर देने होंगे..............
    राष्ट्रीयता की भावना गुनने होंगे.......... ऐसी बहुत सी बातें है जिससे हम देश को सही दिशा दे सकते हैं....

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  8. पीड़ा से ही पथ निकलेगा

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  9. काश आपकी व्यक्त आकांक्षाएं पूरी होती! दुर्भाग्य तो यही है किस शांति के बड़े-बड़े चोलेदार ठेकेदार भी निर्मम ढंग से कमजोरों को पददलित करना नहीं चूकते. सब स्वार्थवश ही.

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  10. सभी को ये एहसास करने की जरुरत है कि आखिर हमें किधर जाना है ? मुश्किल हालातों की चुनौतियां मानवीयता को बेदम किये जा रही है... नतीजा भी दिख रहा है..
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    मेरा नया ब्लॉग अब ये है .....
    rahulkmukul.blogspot.in

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  11. नैतिकता घर से ही सिखाई जाती है,फिर व्यक्ति के आस-पास के माहौल से वह सीखता है.
    सब सुख- सुविधाएँ जल्दी से जल्दी पा लेने और भोग -विलास को ही प्रमुखता दिया जाना भी अमानवीय होते जाने का एक बड़ा कारण है.

    नैतिक मूल्यों का गिरना एक गंभीर विषय है .

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  12. आवश्यकता है आत्म मंथन की..बहुत सारगर्भित प्रस्तुति...

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  13. मनुष्‍य अपनी आत्‍मा से इतना बेपरवाह है कि वह अच्‍छे-बुरे व्‍यावहारिक घटनाक्रम को अपनी हार-जीत का पैमाना मान चुका है। अपने अन्‍तर्मन के निर्णय उसे बोझिल लगने लगे हैं।

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