Thursday, August 22, 2013

कैंसर के विरोधाभास

क समाचारपत्र का अर्द्ध-पृष्‍ठ कैंसर बचाव दिवस पर कैंसर से जीतनेवाले जाबांजों को शीर्षकीय सलाम कह रहा था। पढ़ते ही दिमाग खटका और तय हुआ कि कैंसर व जाबांजों पर विस्‍तार से लिखूंगा। युवराज सिंह, मनीषा कोइराला, लीजा रे जैसे धनसम्‍पन्‍न हस्तियों को जांबाज कहा गया। जिनके पास पैसों की भरमार है, जो अपनी मामूली बीमारी के इलाज के लिए भी महंगे देशी-विदेशी अस्‍पतालों तक आसान पहुंच रखते हैं उन्‍हें यदि अपनी किसी गम्‍भीर बीमारी का लम्‍बा, महंगा इलाज कराना पड़ा और वे इसमें सफल हो कर स्‍वस्‍थ हो गए तो इसमें इतनी बड़ी क्‍या बात है। भारतीय मध्‍यम वर्ग, नौकरीपेशा की तरह ऐसी बीमारी में सरकारी या मझौले निजी अस्‍पतालों में अगर इन्‍हें इलाज कराना होता तो अव्‍यवस्‍थाओं, असुविधाओं, अनदेखी की मार से इनका मनोबल टूट कर बुरी तरह बिखर चुका होता। इन्‍हें स्‍वयं इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि इनकी ख्‍याति इनके व्‍यक्तित्‍व से नहीं, अपितु इनके बैंक बैंलेस से है। यह भी इनके लिए विचारणीय होना चाहिए कि क्रिकेट, फिल्म  से जुड़ कर पैसे कमाना, मूल्‍यहीन ख्‍याति अर्जित करना आज भारतीय लोकतन्‍त्र की विसंगतियों का एक निम्‍न स्‍तरीय ताना-बाना है। संवेदनशील और आदर्श व्‍यक्ति की नजर में आम आदमी की जिन्‍दगी की कीमत पर फलने-फूलने वाले इन क्षेत्रों का कोई मूल्‍य नहीं है।
क्रिकेट, बालीवुड जगत के इन लोगों ने कैंसर से लड़ाई लड़ी इसलिए ये अपनी लड़ाई जीत जाने के बाद प्रेरक, आदर्श बन गए। कैंसर से पीड़ित रहते इन्‍हें हुई शारीरिक-मानसिक पीड़ा से एक व्‍यक्ति के तौर पर मैं अत्‍यन्‍त संवेदना रखता हूँ। इनकी दर्द-विभीषिका, रोग दुरुहता को मैं अपने स्‍तर पर अनुभव कर सकता हूँ। पर क्‍या इनके दुख-दर्द उन लोगों के विद्रूप शारीरिक, मानसिक संतापों से बढ़ कर हैं, जो अपने साढ़े पांच फुटा शरीर के अन्‍दर के न जाने कितने कैंसर सरीखे रोगों से कब से लड़ रहे हैं। जिनकी रोटी, घर तक का स्‍थायी ठिकाना कभी न रहा। अपनी बीमारी के इलाज के लिए जो सरकारी अस्‍पतालों की बीमार, जर्जर व्‍यवस्‍था पर निर्भर हैं। क्‍या उनकी जाबांजी का कहीं उल्‍लेख होता है? क्‍या कोई उन्‍हें नामी हस्तियों की तरह अहसास, लगाव से याद करता है? उनके लिए कहीं कोई आंहों की दुनिया बनती है? क्‍या उन पर कैंसर बचाव दिवस के नाते कोई देशी-विदेशी मदद मेहरबान होती है? जीते जी मृत्‍यु का अभ्‍यास करते लोगों, गरीबों के लिए भी क्‍या कोई ऐसा ही समाचार परिशिष्‍ट निकलेगा? जो तंत्र द्वारा थोपे गए विकराल जीवन और इसके परिणामस्‍वरुप उनके शरीर में पलने, बढ़ने, मृत्‍यु तक उससे छुटकारा नहीं मिलने वाले कैंसर से लड़नेवालों के रुप में उन्‍हें विभू‍षित करेगा? या जनसंचार स्‍टार संचार बन कर मात्र रुपए-पैसों, सुविधाओं में खेलनेवालों की पूंजी वंदना करेगा? आज संचारसाधकों, पत्रकारों के सम्‍मुख तराजू के बैठे हुए अमीर पलड़े के बजाय हवा में सुविधा-अधिकारहीन हो लहरा रहे गरीब पलड़े को भारी करने की प्रमुख जिम्‍मेदारी है। इस पेशे के हाथ में लेखन का वो चमत्‍कार है, जिससे विषधर बन कर डोल रही धरती अमृत स्‍थायित्‍व प्राप्‍त कर सकती है।
      विघ्‍न-बाधाओं को पार करते हुए अपना जीवन सहर्ष देश सेवा में समर्पित कर चुके नेताओं, खिलाड़ियों, कवि-लेखकों की असाध्‍य दुख बीमारी में अगर कोई चिकित्‍सा सुविधा सम्‍पन्‍न अस्‍पताल उनका इलाज करके उन्‍हें वापस जीवन धारा में ले आता तो ऐसी चिकित्‍सकीय व्‍यवस्‍था, सुविधा के गुणगान सहित नया जीवन पाए समाज सेवियों को लोगों के आदर्श के रुप में प्रस्‍तुत किया जाता, उन्‍हें जांबाज कहा जाता तो ऐसा करना सार्थक होता। इसके बाद निश्चित रुप से देश-दुनिया की बसावट जैसी होनी चाहिए वैसी ही होती। अच्‍छे जनसेवकों, व्‍यक्तियों को स्‍वास्‍थ्‍य लाभ दिया जाता तो जीवन का परिदृश्‍य कुछ और ही होता। जिनके लिए आम लोग, गरीब मजदूर दीर्घायु की कामना करते रहे उन्‍हें पागल घोषित कर दिया गया, गायब करवा दिया गया, असामयिक मौत दे दी गई। जिन्‍हें देश की अच्‍छाई में वृद्धि हेतु जीना चाहिए था, जो कैंसर जैसी असाध्‍य कही जानेवाली किसी बीमारी से भी पीड़ित नहीं थे, उन्‍हें मूल्‍यहीन सिद्ध कर जीवन की पृष्‍ठभूमि में पहुंचा दिया गया। और जो समाज के नैतिक-चारित्रिक पतन, धन लालच में बढ़ोतरी करते रहे वे आज प्रेरक जाबांज हैं। आज बच्‍चों के नैतिक अध्‍याय से शास्‍त्री, विवेकानंद, भगत सिंह, रवीन्‍द्र नाथ टैगोर, ध्‍यानचंद जैसे प्रेरणा स्‍तम्‍भ लगभग गायब ही हो चुके हैं। इनके स्‍थान पर वहां ऐश्‍वर्य, सचिन, अमिताभ की जीवनियां शामिल कर दी गई हैं। तन्‍त्रात्‍मक सोच को पूंजी ने ऐसा जकड़ लिया है कि पूंजीगत तामझाम को ही वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत के रुप में परोसना चाहती है। भोगवाद की आन्‍धी ने आदमी को उसी से अलग कर दिया है। आज अधिकांश मनुष्‍य न किसी अच्‍छाई से प्रेरित होते हैं और ना ही किसी बुराई को समझने का ही विवेक रखते हैं। ऐसी झूलेलाल वाली अवस्‍था में तो उन्‍हें ठगनेवालों की कमी कहां पड़नेवाली है। खाद्य सामग्री में जानलेवा रासायनिक मिश्रण करके पूंजी की ढेरियां लगवाने और लगानेवाले आज कैंसर का महंगा इलाज करने, इलाज करवा कर स्‍वस्‍थ हुए अमीरों को जाबांज कहने का नाटक करवा रहे हैं। ऐसे नाटकों पर विचार करके दीन-दुनिया की निकृष्‍टतम सच्‍चाई ही सामने आती है। इससे मन खिन्‍न और दिमाग सुन्‍न हो जाता है।

26 comments:

  1. सत्य को बड़ा सीमित कर दिखाते हैं ये विज्ञापन।

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  2. बहुत बढ़िया है विश्लेषण-
    बधाई-
    राई का करते खड़ा, ऊँचा बड़ा पहाड़ |
    हाड़-तोड़ जो श्रम करें, उनकी मुश्किल ताड़ |
    उनकी मुश्किल ताड़, बड़ा जीवन है मुश्किल |
    गर अपना बीमार, कहाँ से भरते वे बिल |
    बड़े बड़े ये लोग, बड़ी ही करें कमाई |
    उठा सके ये खर्च, रूपिया रोग हराई ||

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  4. अच्छा लिखा है ! घूम-फिरकर बस उसी निष्कर्ष पर पहुँच जाते है कि पैसे का बोलबाला है, उसी की महिमा है, उअसॆ का गुणगान है अन्यथा आम आदमी तो ५/- रूपये और १२/- तथा २७/- और ३३/- रुपये के रूपये के बीच ही झूला बना हुआ है !

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  5. विकेश भाई बहुत ही बेबाक होकर लिखा आपने। काश यह लेख तथाकथित जाबाज और उनको जाबाज बताने वाले भी पढ़ते। सामान्य आय वाले भी ऐसे जाबाज हैं जिन्हें दुनिया नतो जानती है और न जान पाएगी। क्यों कि ऐसे लोग मीडिया का मसाला नहीं बन सकते।

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  6. बात तो सही है पैसे वाले धनाढ्य लोगों का ही नाम सुनने को मिलता है
    कैंसर से लड़ कर जीतने वालों की सूची में
    ऐसे कई लोग हैं जो इस बीमारी से लड़ रहे हैं पैसे के अभाव में
    उनके लिए कुछ लिखा जाना चाहिए , उन्हें किन अभावों और मुश्किलों से गुजरना पड़ता है
    उनके सहयोग के लिए क्या कुछ किया जा सकता है, कौन से सकारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं
    ऐसे विषयों को उठाया जाना चाहिए

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  7. कैंसर से संघर्ष करने वाले व्यक्तियों के परिवार जानते हैं कि संघर्ष कितना कठिन होता है, विशेषकर आर्थिक रूप से. यह संघर्ष मैंने खुद महसूस किया है एक नज़दीकी को इस से संघर्ष करते देख कर. आम व्यक्ति के लिए तो कैंसर केवल मृत्यु का पर्याय है. सलाम है उनके संघर्ष को. लेकिन हीरो बनते हैं युवराज जैसे जो पैसे के बल पर श्रेष्ठतम इलाज़ की सुविधा तक पहुँच रखते हैं. बहुत विचारणीय आलेख..

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार, 23/08/2013 को
    जनभाषा हिंदी बने.- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः4 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  9. सटीक लेखन | सही कटाक्ष

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  10. कैंसर से संघर्ष करने वाले व्यक्तियों के परिवार जानते हैं कि संघर्ष कितना कठिन होता है, विशेषकर आर्थिक रूप से विकेश भाई बहुत ही बेबाक होकर लिखा आपने।

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  11. बहुत अच्छा लिखा है. बहुत धारदार अभिव्यक्ति है आपकी. आजकल पत्रकारिता का स्तर भी बहुत ज्यादा गिर गया है. असली जाँबाजों किस सुध कब उनको होती हैं.

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  12. जो बाजार से माल बटोरे वही है जांबाज़
    कौन सुनता है कमजोरों की आवाज़ ?

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  13. बात तो आपकी एकदम सही है यदि आज हमारे देश में सबको सम्मान अधिकार प्राप्त होता तो शायद आज हमारे देश की सूरत ही कुछ और होती। न गरीब किसान का शोषण होता न वो रासायनिक तत्वों को मिलकार ऐसी खेती करता जो स्वस्थ के लिए हानी कारक होती।
    तब न ही इस तरह के जानलेवा रोग होते। किसी ने कहा था एक बार कि यदि देश का विकास करना है, तो गाँव छोड़ो मत,बल्कि गाँव का विकास करो देश की व्यवस्था अपने आप सुधर जाएगी। मगर भ्रष्टाचार के चलते सब "अंधेर नागरी चौपट राजा" वाला हिसाब हो गया है। विचारणीय आलेख...

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  14. kyaa aap is khabar ka link de sakte hain mujhe ?

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  15. सही कहा... बेवाक प्रस्तुति !!

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  16. सही कहा... बेवाक प्रस्तुति !!

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  17. क्षमा चाहता हूँ पल्‍लवी जी। मेरे पास यह लिंक सुरक्षित नहीं रह पाया। दो महीने पहले हिन्‍दुस्‍तान हिन्‍दी के दिल्‍ली या नोएडा परिशिष्‍ट में आधे पृष्‍ठ का विज्ञापन था ये, मात्र इतना याद है।

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  18. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति.

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  19. भाई साहब ये राष्ट्रीय समाचार पात्र क्या होता है ?तीसरे पन्ने की पत्रकारिता को आ -राष्ट्रीय ही कहा जाना समीचीन रहेगा। यहाँ समाचार और विशिष्ठ लेख भी ताज़ी भाजी (सब्जी )की तरह बेचे जाते हैं।

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  20. भाई साहब ये राष्ट्रीय समाचार पत्र क्या होता है ?तीसरे पन्ने की पत्रकारिता को अ -राष्ट्रीय ही कहा जाना समीचीन रहेगा। यहाँ समाचार और विशिष्ठ लेख भी ताज़ी भाजी (सब्जी )की तरह बेचे जाते हैं। पेज थ्री की चमक दमक समाचार होती है न अग्र लेख।

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  21. Virendra Kumar Sharma ji से पूरी तरह सहमत!

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  22. मन खिन्न हो या दिमाग सुन्न...
    परिस्थितियां बदलने वाली नहीं.....बेहद अफ़सोस जनक है..

    सार्थक लेखन हेतु आभार.

    अनु

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  23. आम आदमी के जीवन का हर पल संघर्ष से सना है। उस पर जिसे दुर्भाग्य से कोई जटिल रोग हो जाये उसका तो भगवान ही मालिक है। सचमुच असली जाँबाज वे ही हैं जो जीवन में नियमित संघर्ष कर रहे हैं।

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  24. बढ़िया लिखा आपने...

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  25. मन खिन्‍न और दिमाग सुन्‍न.............बहुत विचारणीय लेख..

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