Thursday, August 1, 2013

आभासी विकास का अनर्गल प्रलाप


सा पहली बार हुआ कि छुट्टी के दिन मैं सोकर गुजार सका। यह मेरे लिए किसी सुखद आश्‍चर्य से कम नहीं था। दिमाग में किसी प्रकार की चिंता नहीं थी। खूब सोकर और निश्चिंत रह कर अब शाम को अक्षरों में दिल का हाल डाल रहा हूँ।
जहां मैं रहता हूँ वहां से तीन सौ मीटर दूर राष्‍ट्रीय राजमार्ग 24 का दो लेन उपमार्ग है। आने-जानेवाली इस सड़क पर पहले एकाध फुट ऊंचा डिवाइडर था। अब डिवाइडर को सीमेंट टाइट कर साढ़े चार फुट ऊंचा कर दिया गया है। कॉलोनी तक जाने के लिए डिवाइडर पर मौजूद एकमात्र कट को भी पहले डिवाइडर बनाने की योजना थी। लेकिन फिर पता नहीं किसने समझदारी दिखाई और कट पर डिवाइडर नहीं बनाया गया। बस से उतर कर सड़क पार कर इसी कट से होते हुए घर पहुंचता हूँ। यदि यह बन्‍द हो जाता तो मुझे दो सौ मीटर घूम कर दूसरे रास्‍ते से घर आना-जाना पड़ता।
लगभग यही हाल पूरे शहर का है। अथाह, अनियन्त्रित, असंवेदनशील वाहन चालक पैदल सड़क पार करनेवालों के प्रति निष्‍ठुर बने रहते हैं। यदि कोई वाहन चालक देख ले कि पैदलयात्री सड़क पार कर रहा है तो वह वाहन की गति नियन्त्रित करने के बजाय यह सोचकर और तेज कर देता है कि पैदलयात्री मेरे जाने के बाद आगे बढ़े। सैकड़ों-हजारों की संख्‍या में लगातार चल रहे वाहन चालक यदि ऐसे ही सोचेंगे तो कोई भी पैदलयात्री सड़क पार नहीं कर सकता। रात के दस-ग्‍यारह बजे भी सड़क के आरपार पैदल आने-जाने के लिए कभी-कभी पन्‍द्रह-बीस मिनट लग जाते हैं।
इसलिए हर चौराहे, मार्गों, उपमार्गों के समीप उपरिपुल यानि कि ओवरब्रिज अथवा भूमिगत पैदल मार्ग अवश्‍य बनने चाहिए। बड़े शहरों के प्राधिकरणों को हरेक ऐसे स्‍थान पर जहां अधिसंख्‍य लोगों को लगातार पैदल ही सड़कें पार करनी पड़ती हैं, उपरिपुल या भूमिगत रास्‍ते बनाने चाहिए। यहां तक कि ज्‍यादातर स्‍कूल शहरों के मुख्‍यमार्गों पर ही होते हैं। अधिकांश विद्यार्थी पैदल ही स्‍कूल आते-जाते हैं। छोटे स्‍कूली बच्‍चों को अभिभावक स्‍कूल छोड़ आते हैं और वहां से ले आते हैं। परन्‍तु अनियन्त्रित यातायात से पार पाने में उनके भी होश उड़ जाते हैं। सड़क पार करते समय जान का जोखिम हमेशा बना रहता है। घंटों यातायात के थमने का इंतजार करते हुए समय की बर्बादी भी होती है। कई बार वाहन चालकों का दुर्व्‍यवहार भी झेलना पड़ता है। ध्‍वनि प्रदूषण आदि समस्‍याएं भी बच्‍चों और उनके अभिभावकों को प्रतिदिन ही तंग करती हैं।
दुर्भाग्‍य से हाइटेक कहे जानेवाले मेरे शहर में अभी इस दिशा में अपेक्षित काम नहीं हुआ है। क्‍या शासन-प्रशासन को अवैध धर्मस्‍थलों के निर्माण पर होनेवाले खर्चे को रोक कर इसे उपरिपुलों, भूमिगत मार्गों और अन्‍य सार्वजनिक महत्‍ती सुविधाओं के निर्माण पर नहीं लगाया जाना चाहिए?
ये कहानी नोएडा की है। जिस देश के एक प्रदेश में सज्‍जन लोकसेवक दुर्गाशक्ति नागपाल को अनुत्‍पादक विषय पर सही कार्रवाई करने पर नियमों के विपरीत पद से निलम्बित कर दिया जाता हो, वोटों के लिए धर्मस्‍थल निर्माण जैसे अनावश्‍यक विषय पर एकाध राजनीतिक पार्टियों को छोड़ कर बाकी सभी प्रमुख राष्‍ट्रीय पार्टियां उपजिलाधिकारी के विरुद्ध की गई शासकीय कार्रवाई को उचित ठहरा रही हों, वहां की भावी तसवीर बहुत कष्‍टकारी प्रतीत होती है।
छुट्टी के दिन फुर्सत में ऑल इंडिया रेडियो पर पुराने हिन्‍दी फिल्मी  गीतों को सुनने की गहरी इच्‍छा होती है। यदि किसी जरुरी व्‍यक्तिगत काम से कहीं आना-जाना नहीं होता है तो फुर्सत के ये पल बड़े आरामदायक होते हैं और गीतों को सुनना, पुराने संगीत की धुनों को सुनते हुए एक अनोखे जीवन-दर्शन से परिचित होते जाना नया, संग्रहणीय अनुभव होता है। लेकिन यह अनुभव ज्‍यादा देर नहीं ठहरता। क्‍योंकि गीतों के आधे-अधूरे प्रसारण के फौरन बाद आम आदमी के पैसे से सृजित सरकारी वन्‍दना के खोखले विज्ञापन रेडियो पर गूंजने लगते हैं। सोच-शौचालय, दिल्‍ली सरकार की बल्‍ले-बल्‍ले, भारत निर्माण जैसे विज्ञापनों को सुन कर हाथ बिजली की फुर्ती से उठता है और एफएम चैनल को बदल देता है। लोगों के पैसे से अपनी जबरन तारीफ करवाने का जो सिलसिला सरकारों ने कुछ वर्षों से अपनाया है वह बड़ा ही दुखदायी है। दुर्घटनाओं, मौतों, व्‍यभिचारों, भ्रष्‍टाचार की मण्‍डी में पूर्णत: परिवर्तित हो चुके देश की राजधानी की सरकार रेडियो के जिंगल्‍स से यदि अपनी और लोगों की बल्‍ले-बल्‍ले करवाती है तो इस कालखण्‍ड के भारतीय मानव-जीवन को पशु-जीवन और इसके मनुष्‍य शासकों को पत्‍थर कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। सस्‍ती लोकप्रियता पाने के ये तरीके हमें और देश को पता नहीं अभी और कहां-कहां ले जाएंगे! उम्‍मीद करता हूँ कि इस आभासी यात्रा में शामिल राजनेताओं और देशवासियों की बेहोशी खत्‍म हो और वे वास्‍तविक भारत को देख कर भावी काम करें।


 





15 comments:

  1. पैदल चलाने वालों को देखकर गाडी धीमी कर देनी चाहिए यह जहाँ मैं रहती हूँ इस देश में होता है पैदल चलने वालों को देखकर लोग गाड़ी रोक देते हैं और जाने देते हैं.
    जबकि यहाँ ८०/ किलोमीटर औसत गति होती है.
    हाँ ,मुख्य सड़क या व्यस्त मार्गों पर पुल या भूमिगत रास्ता बनाया जाना चाहिए.और पैदल चलाने वालों को भी उनके लिए तय किये क्रोस्सिंग से ही पार करना चाहिए.न कि कहीं से भी :)
    .................
    उतर प्रदेश का तो ईश्वर ही मालिक है...यहाँ व्यवस्था के नाम पर सब -कुछ बिखर चुका है..बेतरतीब...अखिलेश से थोड़ी उम्मीद थी कि मेनेजमेंट का नया स्नातक है कुछ बदलाव लाएगा ...लेकिन
    वह तो अपने पिता की छाया से बाहर ही नहीं निकला सका..
    ...............
    मुझे तो रेडियो सुने अरसा हो गया,,पुराने गीत मुझे भी पसंद हैं ..रेडियो के भरोसे क्यूँ रहते हैं ...नेट से डाउनलोड करें [साईट मैं बता दूँगी]और उन्हें आई पोड में या फ़ोन में डालें ..
    अलग -अलग अल्बम बना कर रख लें ,...और सुनें..थोडा समय ज़रूर लगेगा लेकिन देर तक मिलने वाला फायदा है न...क्योंकि संगीत तनाव मुक्त करता है .
    सरकारी टीवी..रेडियो चेनल सुनने का संयम अब किस में है ?जब इतने एफ एम् मौजूद हैं.

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  2. शायद बस ऐसी ही छोटी-छोटी जरूरतें हैं जो यहाँ (लंदन)में बहुत ही सुविधा जनक है। इसलिए आज की तारीख़ में हर कोई बस विदेश जाना चाहता है। जाने कब हमारे यहाँ भी आम आदमी की जरूरतों को ध्यान में रखकर उसे एक अच्छी ज़िंदगी मिलेगी इस बात की तो केवल सपने में ही उम्मीद की जा सकती है। किन्तु वर्तमान हालातों को देखते हुए तो ऐसा कुछ होने की कल्पना भी व्यर्थ ही लगती है।

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  4. मैं तो अक्सर नोट करता हूँ कि चालाक ने इधर से कालिंदी पुल या डी एन डी और उधर से गाजीपुर बॉर्डर कार्स नही किया की उसकी चाल ढाल ही बदल जाती है !

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  5. विश्व गुरू हिंदुस्तान मे मानवीय मूल्यो का क्षरण अपने चरम पर है । अगर फ़्लाइ ओवर या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था हो भी जाएगी तो भी अधिकतर लोग शॉर्ट कट अपनाएँगे और वहाँ चालक भी वैसा ही करेंगे जैसा आपने लिखा है ।
    मै कुछ माह पहले मकाउ मे था । जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियो के लिए भी वहाँ सिग्नल है और उसी से ट्राफिक व्यवस्थित होता है । मै जेब्रा क्रोससिंग पर पहुंचा देखा पैदल यात्री सिग्नल रेड है लेकिन सड़क पर दूर दूर कहीं कोई ट्राफिक नहीं है । विशुद्ध भारतीय मानसिकता से मै और मेरी पत्नी सड़क पार करने लगे। हमने सड़क पर कदम रखा ही था कि तभी बहुत तीव्र गति से आती हुयी एक कार दिखाई दी । हम लोग ठिठक कर वापस फूटपाथ आ गए । किन्तु आश्चर्य हुआ कि कार के लिए सिग्नल होते हुये भी कार जेब्रा क्रासिंग पर रुक गई और हाथ से चालक ने हमलोगो को पहले निकाल जाने का इशारा किया । मै आज भी सोचता हूँ कि क्या हिंदुस्तान मे ऐसा हो सकता है ?

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  6. सच कहा आपने जनता के पैसों का कितना बढ़िया उपयोग हो रहा है
    अपना गुणगान करवाने में ...
    और ज्यादा आशा भी नहीं रख सकते इनसे

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  7. ये कहानी नोएडा की है। जिस देश के एक प्रदेश में सज्‍जन लोकसेवक दुर्गाशक्ति नागपाल को अनुत्‍पादक विषय पर सही कार्रवाई करने पर नियमों के विपरीत पद से निलम्बित कर दिया जाता हो, वोटों के लिए धर्मस्‍थल निर्माण जैसे अनावश्‍यक विषय पर एकाध राजनीतिक पार्टियों को छोड़ कर बाकी सभी प्रमुख राष्‍ट्रीय पार्टियां उपजिलाधिकारी के विरुद्ध की गई शासकीय कार्रवाई को उचित ठहरा रही हों, वहां की भावी तसवीर बहुत कष्‍टकारी प्रतीत होती है।

    बुनियादी जन समस्याओं नौनिहालों की संभाल पर तवज्जो मांगती पोस्ट इस हथेली सरकार से।

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  8. चलने वाले को देखकर गाड़ी रोकना या धीमी करना तो उनके शान के खिलाफ हो जाता है
    सो चलने वाले को ही अपनी सेफ्टी सोचनी होगी
    रेडियो पर पुराने गाने सुनना तो मुझे तो काफी पसंद है
    चाहे कितना ऐड क्यों न दे रेडियो सुनने में जो मजा है वो... और... नहीं
    नागपाल को सस्पैंड करना बिलकुल नाजायज हुआ है ये तो साबित हो ही रहा है देखिये आगे क्या होता है.

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  9. हमारे देश में तो पैदल चलने वाला भगवान के भरोसे सड़क पार करता है...विदेशों में पैदल व्यक्ति को सड़क पार करता देख कर वाहन चालक स्वयं वाहन रोक या धीमा कर लेते हैं लेकिन हमारे यहाँ तो बिल्कुल उलटा होता है...सरकार ने आजकल सभी प्रसार माध्यमों को जनता के पैसे से अपने आभासी उपलब्धियों का प्रचार माध्यम बना रखा है...बहुत सटीक आलेख..

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  10. सच कहा आपने जनता के पैसों का कितना बढ़िया उपयोग हो रहा है? उतर प्रदेश का तो ईश्वर ही मालिक है। यहाँ व्यवस्था के नाम पर सब -कुछ बिखर चुका है,विकेश जी सुन्दर लेखन।

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  11. वास्तविकता को कौन देखना चाहता है ... आज का युवा वर्ग जिसको रीड कहा जाता है किसी भी समाज की ... वो स्वयं इस आभासी दुनिया में जिस तेज़ी से जा रहा है उसका असर सभी चीज़ों पे होना निश्चित है ....

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  12. पूरे पैसे के एक तिहाई से बनी और सदा उपेक्षित एक बेचारी सड़क कहाँ तक भार सहे, वह अपना उत्तर दे देती है।

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  13. एक बात तो है कि ईमानदार आवाज़ हो क्रिया, वो जब जब सामने आती है सारे दल उस मामले में एक जैसा व्यवहार करते है. वो अभी केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी हो या विपक्ष(कुमार बादल की कहानी याद कीजिये)सब एक जैसे हैं. बहुत दुखद है. ऐसे ही हमारे यहाँ चारा घोटाले में भी हुआ था.

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