महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Monday, July 8, 2013

जो मैं न बन सका


न् 2000 की बरसात का समय। कई सालों से शरीर को वज्र बनाने की इच्‍छा के चलते इस वक्‍त दण्‍डबैठक कर रहा हूँ। बारिश से गीले गांव के मैदान में दण्‍डबैठक करने की गिनती जब 350 तक पहुंची तो आधी भुजाएं मैदान के अन्‍दर धंस चुकी हैं। मन के अन्‍दर धधकते सामाजिक विसंगति प्रभाव में शरीर कठिनतम व्‍यायाम द्वारा अच्‍छी तरह तप जाना चाहता है। पसीने और वर्षा की रिमझिम बूंदों से तरबतर पूरे तन में बल प्रवाह हो रहा है। अपने से छोटे लड़कों से कह कर अब अपनी जांघों और भुजाओं पर लठ्ठ मार करवा रहा हूँ। उनको सतर्क करता हूँ कि लाठियों का प्रहार कहीं गर्दन, मुँह पर न हो इसका ध्‍यान रखना। व्‍यायाम करते हुए जब ढाई घण्‍टे व्‍यतीत हो गए तो मां ने आवाज लगाई, खाना ठण्डा हो रहा है। पिताजी गुस्‍सा हो रहे हैं। क्‍या जिन्‍दगी भर यही करेगा। हाथ से गुस्‍से का इजहार करते हुए मां को लौट जाने को कह दिया। उस समय खण्‍ड के दौरान अपनी बाजुओं में इतनी शक्ति महसूस होती थी कि शेर की छाती भी फाड़ सकता था। पूरे एक साल घर में रहने के दौरान बीएसआरबी, सिविल सर्विसेज इत्‍यादि परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए पिताजी मेरे पीछे पड़े रहे। मुझे न जाने क्‍यूं लगता था कि जब पूरे देश में अनाचार, अनैतिकता व्‍याप्‍त है तो तब ऐसी किसी शासन सेवा में जाने का क्‍या फायदा, जो ऐसे अनाचार अनैतिकता का पोषण कर रही है। मुझे सरकारी सेवा या प्राइवेट नौकरी करने के नाम पे बहुत चिड़ मचती थी। मेरा सपना था गांव में रह कर खेती किसानी करुँ। जीवन को सच्‍चे अर्थों में जिऊं। किन्‍तु मेरे कसरती व्‍यवहार की तारीफ मेरी मां और दादाजी के अलावा किसी ने नहीं की। क्‍या पता वो कसरती कोशिश आज तक बरकरार रहती तो मैं अपने स्‍वस्‍थ और मजबूत शरीर के साथ कुछ समाज कल्‍याण के कार्य कर रहा होता। अपने अनुसार अपना कायाकल्‍प करता, बनता। जहां तक खाने-रहने की बात है तो वह तो आवारा कुत्‍ते को भी नसीब हो जाता है। फिर मैं तो अपने मां-बाप की औलाद था मुझे घर के बचे-खुचे खाने के टुकड़े डालने में उनका क्‍या बिगड़ जाता! वे मुझे कुत्‍ता समझ के भी खिलाते तो भी मैं उनकी भगवान सरीखी सेवा करता। अच्‍छे सहायक पुत्र के रुप में सदैव उनके चरणों में पड़ा रह कर उनके भावी आदेश की प्रतीक्षा करता। लेकिन नहीं उन्‍हें अपनी, अपने परिवार, मेरी इतनी चिन्‍ता नहीं थी जितनी कि समाज की। कि समाज क्‍या कहेगा। जवान लड़का घर पर क्‍या कर रहा है। पहलवानी के सारे करतब करते हुए, भारी से भारी बोझा ढोते हुए मैं कामना करता कि पिताजी मुझे बधाई देंगे। कहेंगे कि शाबाश बेटे तेरी ताकत देख कर मैं आश्‍चर्यचकित हूँ। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिताजी की मुझे देख कर चिढ़ने और दुश्‍मन जैसा बर्ताव करने की आदत ने मुझे अंतत: इस फैसले पर टिका दिया कि बेटे शरीर सौष्‍ठव के तेरे अरमान चुक चुके हैं। अब दिल्‍ली नोएडा जैसे शहरों की ओर कूच करो और नौकरी करके अपने जीवन की ऐसी तैसी करो।
इसलिए अपने वज्र जैसे शरीर को नकली जीवन, खानपान के हवाले करने के लिए मैं बहुत बुझे मन से शहर की ओर चल पड़ा। आज शरीर इतना क्षीण हो चुका है कि कोई तेज आवाज में बात भी करता है तो दिल कांप उठता है। रातें अनिद्रा में व्‍यतीत हो रही हैं। विडंबनापूर्ण नौकरी और नौकरी प्रबन्‍धकों के बचकाने व्‍यवहार पर दिल किलोमीटर तक पछताता है। सोचता है किनके साथ रह कर दिनचर्या गुजार हो रही है।
यह देश, इसके लोग पेशेवर बनने और परंपरा को भी अपनाए रखने के चक्‍कर में कुछ भी प्राप्‍त नहीं कर सके हैं। आज की स्थितियां अत्‍यन्‍त जटिल हैं। जो काम चुटकी बजाते हो सकते हैं उसके लिए भी पूरी फौजदारी की जा रही है। जो चर्चा के विषय नहीं हो सकते वे संसद के पटल पर सालों पड़े रह कर सांसदों की जिज्ञासा बने हुए हैं। खाद्यान, खनिज सम्‍पन्‍न देश चाहता तो अच्छे शासकों के नेतृत्‍व में निश्चित स्‍वर्ग बन चुका होता। लेकिन नहीं जहां आरक्षण पद्धति से ऐसे लोगों को शासकीय पदों पर विराजमान किया जाता हो, जो पद पर बने रह कर आजीवन इसी खुशी में निकाल देते हैं कि हम पदासीन हैं, अधिकार सम्‍पन्‍न हैं तो उनसे उम्‍मीद करना कि वे बहुत कुछ करेंगे वो भी कुछ खास काम करेंगे, बिलकुल बचकाना है। ऐसे लोग बचकानी हरकतों के तानेबाने में ही सारा समय निकाले दे रहे हैं। अच्छे लोग पगलाए से, कुण्ठित होकर घूम रहे हैं। उनसे समाज ऐसे बर्ताव करता है जैसे वे जीवन की अआइई भी नहीं जानते।
     शिक्षा व्‍यवस्‍था पूर्ण रुप से चौपट हो गई है। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में स्‍नातक को चार साला पाठ्यक्रम बनाने का सरकारी कदम क्‍या मूर्खता की बड़ी मिसाल नहीं है। जिन मुद्दों को बिलकुल भी छेड़े जाने की जरुरत नहीं है, उन्‍हें शासन अपनी अकर्मण्‍यता के ढकाव के लिए जबरन छेड़ रहा है। और जो विषय विचारणीय हैं उन्‍हें या तो उठाया ही नहीं जा रहा है और यदि किसी जनवादी पार्टी द्वारा उनका जिक्र किया भी जाता है तो उन्‍हें किसी न किसी कारण टरकाया जा रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की बुरी स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सरकारी का हाल कहने की आवश्‍यकता नहीं है और प्राइवेट मरीज को मुद्रा की मशीन समझ कर इलाज करते हैं। इस पर भी उनका ध्‍यान मरीज को स्‍वस्‍थ करने के लिए नहीं अपितु अपने ज्‍यादा बिल बनाने पर लगा रहता है। ऐसे यूरोपीय ढांचे की नकल करके हथेली सरकार क्‍या सिद्ध करना चाहती है, समझ से परे है।
बहुत कुछ है भड़ास निकालने के लिए लेकिन अब लग रहा है कि पढ़ने वाले कहीं मुझसे ईर्ष्‍या न करने लगें कि यह बकवास बन्‍द क्‍यों नहीं हो रही। इस विषय पर आपकी सच्‍ची, निष्‍पक्ष राय मेरे लिए मेरी भड़ास से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होगी।  

21 comments:

  1. देश और समाज की वर्तमान अवस्था का बहुत सटीक चित्रण..सरकार को आम जनता की भलाई की जगह अपनी कुर्सी बनी रहे इसकी चिंता सताए हुए है और सभी निर्णय इस जुगाड़ को सफल बनाने के लिए हैं. नौकरशाही अपने हित पूरा कर रही है और जो ईमानदार कर्मचारी हैं उन्हें कोई पूछता नहीं और कुछ न कर पाने का दर्द उन्हें निराशा की और ढकेल देता है.बहुत ही शोचनीय स्तिथि...

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  2. आपकी बातों से शतप्रतिशत सहमत हूँ विकेश जी, एक विवेकशील इंसान के पास सिवाए कूढने के कुछ नहीं रहता। लोग कहते है सिस्टम को सुधारने का प्रयास तुम क्यों नहीं करते।भाई, हम तो कर ही रहे है किन्तु एक खामी हो तो उसे दूर करे यहाँ तो पूरे ही व्यवस्था घुन लगी हुई है।

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  3. लगभग सबकी यही कहानी है.. अन्दर तक व्यथित कर रही है . बस एक ही राह है स्वयं से ईमानदार होना जो सुकून तो देती ही है..

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  4. बहुत बढ़िया लिखा आपने..मुझे ये भी लगता है कि आज की पतनशील व अराजक ताने-वाने में अपने आपको जिन्दा रखना काफी कठिन है.. पर उम्मीदें कभी भी ख़त्म नहीं होती....

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  5. बहुत सटीक लेखन
    आज तो सामान्य मुद्दे विशेष बन गए और विशेष मुद्दे कहीं छुपा दिए जाते हैं
    भौतिकवादी मानसिकता ने समाज को जकड़ रखा है
    देश के विकास की कौन सोचता है ....

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  6. आप और हम आम जनता है इसलिए सिवाए भड़ास निकालने के हमारे पास और कोई विकल्प भी नहीं है।
    कुछ नहीं हो सकता हमारे समाज का क्यूंकि यहाँ सबकी अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग है। जिसके चलते ही शायद हमारे देश और समाज की प्रशासान व्यवस्था का यह हाल है।

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  7. विकेश जी आपने सही कहा पुरे सिस्टम में खामियां हैं लेकिन क्या किया जाय इसी के साथ रहना है
    तो हम अपने काम को ईमानदारीपूर्वक और काम को पॉजिटिव सोच के साथ करते हुए आगे बढ़े......

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  8. सिस्टम की खामियाँ जानते हुए भी इसे सिस्टम में रहना पड़ता है.गाँव में रहने वाले अपने बच्चों को शहर की नौकरी करते देखना चाहते हैं.आप सिस्टम से बचकर इस समाज में जी नहीं सकते ,सामना करना ही पड़ेगा.बाकी शहर बुरा हो सकता है मगर इतना भी नहीं कि आप पल्यान करने की सोचें बाकि मासूमियत अब गाँवों से भी खोने लगी है.अब तो वहाँ भी लडकियाँ जींस और ऊँची कमीज़ /टॉप पहने नज़र आती हैं.खुद से और खुद में व्यक्ति ईमानदार है यही उस के लिए संतोष की बात है.वैसे २००० से २०१३ तक में बहुत परिवर्तन हुआ होगा.

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  9. @त्रुटि सुधार -पल्यान को पलायन पढ़ें '

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  10. मेरी टिप्पणी स्पैम बॉक्स में गयी!

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  11. Sorry, I know Hindi very well but can not type. I am learning.
    Dear Vikesh, I agreed with you. There are many person like you. We should have take first step towards cleaning these problems. Now the question is that can I change the system? Is it possible? Yes it is possible.
    "AAO CHALEN SATH-SATH, SAFALTA KE KUCHH KADAM"
    Regards

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  12. ॐ शान्ति .

    शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का .

    मुझे न जाने क्‍यूं लगता था कि जब पूरे देश में अनाचार, अनैतिकता व्‍याप्‍त है तो तब ऐसी किसी शासन सेवा में जाने का क्‍या फायदा, जो ऐसे अनाचार अनैतिकता का पोषण कर रही है। मुझे सरकारी सेवा या प्राइवेट नौकरी करने के नाम पे बहुत चिड़ मचती थी।

    विसंगतियों को निशाने पे लेती बढ़िया पोस्ट .

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  13. विसंगतियों को निशाने पे लेती बढ़िया पोस्ट .

    क्या खूब लिखते हो लोग संसद से शिक्षा तक की विरूपता पर चोट करती पोस्ट .मुद्दों से भटकना कोई हथेली सरकार से सीखे .बे -असर सरदार से सीखे .

    ॐ शान्ति .

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  14. ओह विकेश जी आप भी हम जैसे ही लोगों में से हैं जो करना बहुत कुछ चाहते हैं पर कर नही पाते । लेकिन यकीन रखिये कि आप जैसे विचारशील लोग जहाँ होंगे कुछ तो अच्छा करेंगे ही । यह क्या कम है ।

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  15. बहुत खूब | उम्दा अभिव्यक्ति लाजवाब |

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  16. अपना तजुर्बा तो बस यही है कि गाँव से जितनी दूर कदम बढ़ते गए उतनी ही खोखली ज़िन्दगी नज़र आने लगी. लेकिन हर परिवेश में कुछ अच्छी और बुरी चीजें दिखीं. फलतः इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अच्छी चीजें आत्मसात की जाएँ और बुरी चीजों का त्याग. शान्ति ना तो पूर्णतः गाँव के अन्दर मिली ना ही गाँव के बाहर. शायद दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं जहां सब कुछ ठीक है.

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  17. बहुत सटीक लेखन बहुत बढ़िया लिखा आपने विकेश जी,देश और समाज की वर्तमान अवस्था का बहुत सटीक चित्रण आभार।

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  18. ये बात सच है की घुन पूरी व्यवस्था पे लग चुका है ... और जब पूरी व्यवस्था खराब हो तो किसी एक के परिवर्तन से आत्मसंतुष्टि जो जल्दी की कुंठा में बदल जाती है के सिवा कुछ होना मुश्किल होता है ... इसलिए व्यवस्था के बदलाव की बात होनी चाहिए सबसे पहले ...

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  19. जीवनशैली की समग्रता सदा ही मन की चाह रही है, जगह जगह से टूटी अवश्य है पर उसे जोड़ने के प्रयास में लगे रहें। जितनी बच सके, उतनी बचा लें, हाँ, ईर्ष्या तो पूर्वजों से होती है।

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  20. पूरे परिवेश में हमारे पास (भारत के सन्दर्भ में )एक खीझ भरी हुई है .सबको छूट जितना चाहे खीझो ......

    हो गई हर घाट पे पूरी व्यवस्था शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ....



    ॐ शान्ति

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  21. शिक्षा व्यवस्था पर की आपकी टिप्पणी सार्थक और बेकाबू स्थिति का परिचय देती है सुंदर और सोचनीय आलेख। हमारे देश में हम जो सोचते हैं वह होता नहीं। जिसकी तलाश में निकले हैं वह मिलता नहीं कोई दूसरी चीज ही मिल जाती है और उसी में हम खुशी मनाते हैं। विकेश जी आपकी मंशाएं कुछ अलग थी कुछ अलग बने कोई बात नहीं पर दुःख इस बात का है कि बहुत बडी संख्या में युवकों को मौके ही नहीं मिल रहै हैं।
    चलो हम आप कम से कम कुछ बन तो पाए। उसको लगन और मेहनत से किया जा सकता है।

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