Monday, July 29, 2013

भ्रष्‍टाचार के बीच ईमान की कीमत


दिल्‍ली और राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आजकल दो घटनाएं ऐसी हुईं, जिनके घटने के बाद लोक सेवकों अर्थात् पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उचित काम किए जाने पर भी शासन-प्रशासन और इनके प्रतिनिधि घटनाओं के लिए इन्‍हें ही उत्‍तरदायी ठहरा रहे हैं। एक ओर तो देश का एक-एक आदमी सरकारी अकर्मण्‍यता, भ्रष्‍टाचार पर आंख मूंद कर रोष प्रकट कर रहा है तो दूसरी तरफ सरकारी स्‍तर का कोई जनकल्‍याणकारी कार्य होता भी है तो उसे राजनीतिक परिभाषाओं के अन्‍तर्गत ऐसे सिद्ध किया जा रहा है कि जैसे इस तरह का कार्य समाज विरोधी है। इन्‍हीं विडम्‍बनाओं का ही तो अभिशाप है कि आज भारतभूमि का सिर बुरी तरह कुचला, धंसा हुआ है।
     पिछले कई दिनों से दिल्‍ली के संभ्रान्‍त क्षेत्रों में रात को डेढ़ दो बजे बाइकर्स गैंग गैर-कानूनी स्‍टंटबाजी दिखा रहे हैं। इस दौरान वे यातायात कानून की धज्जियां तो उड़ाते ही हैं इसके अलावा हर आने-जानेवाले से दुर्व्‍यवहार भी करते हैं। इनसे तंग आकर पुलिसवालों ने 150 के करीब रहे बाइकर्स को नियन्त्रित करने के लिए उनमें से एक की बाइक के टायर पर गोली चलाई। टायर के बजाय गोली बाइक के पीछे बैठे लड़के पर लगी और वह अस्‍पताल में इलाज के दौरान मर गया। ऐसे में पुलिस पर आरोप लगाना कि उसने गोली क्‍यों चलाई बड़ा ही अजीब प्रश्‍न है। और इसके लिए पुलिस के विरुद्ध जिलाधिकारी को जांच के आदेश देना यह भी उतनी ही अजीब बात है। इस ऊहापोह में सरकारी सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व का पूर्णाभाव साफ दिखाई देता है। जब पिछले कई दिनों से दिल्‍ली प्रशासन, पुलिस और जनता बाइकर्स के आधी रात को किए जानेवाले आतंक से परेशान हैं और इन हालातों में बाइक गैंग को घेरकर उनके खिलाफ कार्रवाई करने में किसी बाइकर्स की मौत हो भी जाती है तो इसमें बजाय पुलिस को उनके काम के लिए प्रोत्‍साहित करने के मीडिया, सरकार, प्रशासन उलटे पुलिस को ही कोसने लगते हैं। क्‍या ऐसे में समाज के जिम्‍मेदार वर्ग द्वारा दिल्‍ली सरकार और बाइकर्स गिरोह के घरवालों से प्रश्‍न नहीं किए जाने चाहिए कि आधी रात के बाद जवान लड़के बाइक लेके कहां और किस काम के लिए घूम रहे हैं? क्‍या जवान लड़कों का आधी रात के बाद सड़कों पर ऐसी गुंडागर्दी करना किसी सभ्‍य समाज, परिवार, समाज के लक्षण हैं? क्‍या यही वह भारत निर्माण है, जिसके नारे कांग्रेस उछाल रही है? और सबसे बड़ा प्रश्‍न यह है कि देश की राजधानी के संभ्रान्‍त क्षेत्रों में जब ये विकराल अव्‍यवस्‍था है तो दूर-दराज के इलाकों की व्‍यवस्‍था क्‍या होगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होगा।
     दूसरी घटना में ग्रेटर नोएडा, सदर की एसडीएम दुर्गाशक्ति नागपाल को उत्‍तर प्रदेश शासन ने सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया कि उन्‍होंने सरकारी भूमि पर अवैध तरीके से हो रहे धार्मिक स्‍थल निर्माण को तुड़वा दिया। यमुना खादर और हिंडन नदी के तटों से अवैध रुप से रेत के खनन के विरुद्ध भी दुर्गाशक्ति ने कानूनी प्रक्रिया से र्कारवाई की थी। परिणामस्‍वरुप नेताओं के रिश्‍तेदार, खनन माफियाओं को उनके रहते-रहते अवैध कारगुजारियों को करने में दिक्‍कत हो रही थी। उन्‍हें सज्‍जनता और निष्‍ठा से सरकारी सेवा करने का फल अपने सेवा निलंबन के रुप में प्राप्‍त हुआ। 
     ऐसे में प्रश्‍न उठता है कि देश का कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि ईमानदारी, निष्‍ठा से अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह करता है तो क्‍या सर्वोच्‍च शासन व्‍यवस्‍था उसे इसके लिए प्रोत्‍साहित करेगी या उलटे उसके विरुद्ध ही दण्‍डात्‍मक कार्यवाही करेगी! और ऐसे में कोई भी राजकीय सेवक अपने कार्य को ईमानदारी से करने के लिए कैसे प्रेरित होगा जब उसे अच्‍छे, सच्‍चे बने रहने के दुष्‍परिणाम झेलने पड़ें! 
     अन्‍ना हजारे, अरविंद केजरीवाल जैसे अनेक समाज सेवी इस समय कहां हैं? इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन के बैनर तले जिस मुहिम को वे आगे बढ़ा रहे थे यानि कि सरकारी क्षेत्र के भ्रष्‍टाचार को मिटाने के लिए जिस तैयारी के साथ उनका आंदोलन चला था, देश-विदेश भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कुछ समय के लिए एकजुट हो गया था और उस एकजुटता की आंच में उन्‍होंने आंदोलन में शामिल सभी लोगों को कसम दिलवाई थी कि भ्रष्‍टाचार का साथ नहीं देंगे, तो अब इस समय जब कुछ सरकारी सेवक अपनी ईमानदारी के कारण और भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने के चलते शासकीय तौर पर गुनाहगार ठहराए जा रहे हैं, सेवा निलंबन झेल रहे हैं तो ऐसे में इंडिया अंगेस्‍ट करप्‍शन के कार्यकर्ताओं को उनके साथ खड़े रहना चाहिए। लेकिन अभी तक तो ऐसा न कुछ सुनाई दे रहा है और ना ही इस पर कहीं कोई सुगबुगाहट ही हो रही है।


19 comments:

  1. आपके सवाल जायज हैं
    सार्थक और विचारणीय पोस्ट

    आभार

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  2. विचारणीय सार्थक लेख
    लेकिन एक कोशिश हमेशा होनी चाहिए कि कुछ अच्छा करने के चक्कर में किसी की जान ना जाए

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  3. कुछ नहीं हो सकता हमारे देश का...भ्रष्टाचार के चलते न नेता कम है और न जनता सरकरकार और प्रशासन यदि वोटों के लालच में ही सही यदि कभी कोई अच्छा काम कर भी दे तो भी जनता को बात हजम नहीं होती और हम उस किए हुए अच्छे काम का बेढ़ागर्क करके ही दम लेते हैं और नाम यह की लोकतंत्र है भाई...

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  4. बिलकुल सही प्रश्न उठाया है आपने।
    हैरानी हो रही है, सही काम करनेवालों को सज़ा दी जा रही है.… दुर्गाशक्ति सही मायने में दुर्गा हैं, उनको मेरा सलाम !

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  5. कहाँ हैं सब देश के समाजसेवी ?
    बढ़िया पोस्ट...

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  6. दोनों खबरें जब मिडिया में चल रही थी तब मिडिया का पक्ष और रूख पुलिस के विरोध में देख पीडा हो रही थी। जो काम प्रशंसा के लायक था उसमें उनके ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न खडे करना अन्याकारक है। बच्चे की मौत पर अफसोस है पर जब बच्चे हुडदंग कर रहे हैं तो उनको नहीं रोके तो प्रश्नचिह्न रोके तो प्रश्न चिह्न। पुलिस तो दो पाटों के बीच फंस चुकी हैं। पर ईमानदार आदमी पुलिस के साथ है।
    मीडिया की खबरों पर आश्चर्य होता है। सूखे के दिनों में सूखे की की खबरें और उसी प्रदेश में बारिश के दिनों में बाढ दिखा रहे हैं और आज जहां बाढ की खबरें दिखा रहे हैं वहां सौ फिसदी गर्मी में सूखा दिखाएंगे। मीडिया में दिखाए हवामान के अंदाज कभी भी सही नहीं होते हैं। क्या यह उनकी ईमानदारी सच्चाई पर प्रश्नचिह्न नहीं। अपना रिटिंग बढाने के लिए पता नहीं ये कितना गिर जाएंगे। खैर हम केवल अफसोस जता सकते हैं। ईमानदारी और बेईमानी प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच है... मीडिया भी फिलहाल एक पक्षपाती व्यक्ति बन गई है।

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  7. यह सब देखकर काम कर रहे कर्मचारियों का उत्साह ढेर हो जाता है।

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  8. सत्ता पर काबिज गिरगिटों ने व्यवस्था को इस कदर पंगु बना दिया है कि वह लडखडा रही है ! सिर्फ समाज सेवकों को भी दोष नहीं दिया जा सकता! पब्लिक स्वार्थी है सिर्फ अपने तक सोचती है , हर कोई एक ही मन्त्र जपता फिर रहा है , मेरा काम निकल जाए बाकी गया भाड में !

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  9. बहुत सही लिखा आपने कही घरवाले दोषी तो कही सरकार कही पुलिस और आजकल कहाँ है समाज सेबी लोग... अच्छी और विचारनीय पोस्ट...

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  10. बहुत सही लिखा आपने कही घरवाले दोषी तो कही सरकार कही पुलिस और आजकल कहाँ है समाज सेबी लोग... अच्छी और विचारनीय पोस्ट...

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  11. उम्दा पंक्तियाँ

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  12. वोट की राजनीति करने वाले ईमानदार अधिकारियों का दर्द और व्यथा कहाँ समझते हैं...बहुत विचारणीय आलेख...

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  13. सच यही सामने आता है कि आज के समय में सीधे-सीधे कुछ काम नहीं हो सकता है..जो ईमानदारी और कर्तव्य निभाते हुए काम करें उन्हीं को दोषी करार दिया जाता है..
    व्यवस्था में परिवर्तन लाना है तो हर व्यक्ति को खुद में परिवर्तन करना होगा जो इस भौतिकतावादी युग में लगभग असंभव सा है.
    बीते दिनों जो कुछ हुआ बेहद दुखद और हतोत्साहित करने वाला प्रकरण है.

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  14. कई बार मीडिया अपना काम करके आगे बढ़ जाता है ... फालो अप नहीं रखता ... पूरे समाज के माहोल से वो अछूते तो नहीं रह सकते ... खास कर के जब वो निष्पक्ष ही नहीं होते ...

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  15. sahi prshnon ki trf dhyanakrshn kiya hai apne.
    is desh me ydi koyee kuchh aachchha krta hai to bhi uska virodh hota hai .
    abhi kisi filmi hero ki baat ho to sab aankh moond kr kood pdenge pr jahan sport chahiye vahan virodh krenge aur kary men badha paida krenge.

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  16. विचारणीय सार्थक लेखन | सवाल अभी और भी हैं परन्तु जवाब नदारत है |

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  17. एक ईमानदार अधिकारी का इस तरह निलम्बन दुर्भाग्यपूर्ण है । आस्था व विश्वास डगमगा उठता है यह सब देख सुन कर । सत्ताधारी भ्रषटाचार का कचरा फैलाए जारहे हैं और मीडिया हवा की तरह उसे गली-गली और घर-घर तक पहुँचाकर अपना कर्त्तव्य निभा रहा है लेकिन वे लोग कहाँ जाएं जो सचमुच कुछ अच्छा करना चाहते हैं ईमानदारी से । जिनका विश्वास अभी कायम है । क्या उसे ध्वस्त करके ही दम लेंगे ये लोग ।

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  18. अब तो हर घटना को राजनीति का रंग देने का चलन हो गया है..

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