Saturday, July 27, 2013

व्‍यक्तित्‍व आधार कार्य, पूजा शैलियां


प्रा: हमें हमारे व्‍यक्तित्‍व की पहचान हमारे कार्यों से होने के संकेतक वाक्‍य-युग्‍म यहां-वहां लगे दिखाई देते हैं। ये हमें बताते हैं कि हमारा व्‍यक्तित्‍व शरीर-सज्‍जा से नहीं अपितु कार्य निष्‍पादन की हमारी निष्‍ठा एवं शैली से प्रदर्शित होता है। हालांकि इधर-उधर लगी ये पहचान उक्तियां साधारण व्‍यक्ति द्वारा उद्धृत नहीं होतीं। ये आदि सन्‍त महात्‍माओं के जीवन के गूढ़ ज्ञान की धारणाओं से प्रस्‍फुटित हो हो कर युग-विचरण करती हुईं हमारे जीवनकाल का भी मार्गदर्शन कर रही हैं। धन्‍य हैं वे लोग, संत, महात्‍माएं जो मानव जीवनकाल के लिए ऐसे संस्‍कार प्रसारित कर गए। जिनका अनुसरण न हो तो जग-जीवन निरर्थक प्रतीत होता है।
      अकसर हम कोई भी कार्य करते हैं तो कार्य-निष्‍पादन के दो अनुभवों से गुजरते हैं। या तो हमारी ये लालसा होती है कि हमें कार्य करते हुए कुछ सहकर्मी देखें। साथ ही वे हमारी कर्मगति पर कोई सकारात्‍मक टिप्‍पणी करें। या हम अपने कार्य में इतने तल्‍लीन हो जाएं कि अपने चहुंओर का आभास ही न रहे। कार्य-निष्‍पादन के ये दो प्रकार हमारे कार्यों की दो अलग व्‍यवस्‍था बनाते हैं। प्रथम मार्ग हमें कार्य-दायित्‍व के बनिस्‍पत कार्याभिनय हेतु उकसाता है। द्वितीय कार्य प्रकार कार्य-दायित्‍व के साथ-साथ कार्य के इष्‍टतम निष्‍पादन में भी सहायक होता है। इस प्रकार कार्य करते समय जो दो नकारात्‍मक और सकारात्‍मक स्थितियां कार्यकर्ता द्वारा उत्‍पन्‍न की जाती हैं, वे दो विपरीत व्‍यक्तियों को उनके कार्यों के माध्‍यम से परिभाषित करती हैं।
      पूजा-अर्चना, ईशभक्ति कार्य के भी दो अनुभवों से भी हमारा प्राय: साक्षात्‍कार होता है। एक व्‍यक्ति ईश्‍वर-उपासना अपने जीवन की सुरक्षा, मृत्‍यु-भय के वशीभूत हो करता है तो दूसरा ईश भक्ति में इतना रहस्‍यंभावी, एकाकार होता है मानो वह ईश्‍वरीय प्रत्‍युत्‍तर, प्रतिलाभ, प्रतिमान का आशय ही नहीं समझता। निश्चित रुप से भगवान के प्रति ऐसी आस्‍था से एक ऐसा भाव घनीभूत होता है, जिसमें चमत्‍कृत भगवतानुभव व्‍यावहारिकता धारण करने लगता है। निस्‍वार्थ रहस्‍यात्‍मक लगन से परमात्‍मा पूजन के विरोधाभास, नास्तिक अवरोध भी स्‍वत: हट जाते हैं। यह दशा-दिशा संसार के लिए अत्‍यन्‍त कल्‍याणकारी सिद्ध होती है। अर्थात् प्रभु भक्ति की निष्‍कपट शैली से भी किसी के व्‍यक्तित्‍व का एक दैवसम आरुप प्रकट हो सकता है। 




10 comments:

  1. बेहद शानदार लेख विकेश जी।

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  2. अपने कार्य में इतने तल्‍लीन हो जाएं कि अपने चहुंओर का आभास ही न रहे।

    यह विचार बहुत ही प्रभावी और सारगर्भित है ...

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  3. अपने कर्मों में निस्वार्थ संलग्नता चाहे वह दैनिक कार्य जगत में हो या ईश पूजन में निश्चय ही श्रेयस्कर है..बहुत सारगर्भित आलेख..

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  4. सुन्दर लेख विकेश भाई | बेहद प्रभावी |

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  5. निस्‍वार्थ रहस्‍यात्‍मक लगन से परमात्‍मा पूजन के विरोधाभास, नास्तिक अवरोध भी स्‍वत: हट जाते हैं।
    ---सहमत!
    बहुत अच्छे विचार हैं.

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  6. सारगर्भित एवं सार्थक भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  7. विचार सही है ... और सतत प्रयास से शायद ऐसा हो जाए ... पर फिर भी लोभ रहता है जो इन्सान को हमेशा पहली बात (जीवन की सुरक्षा, मृत्‍यु-भय के वशीभूत)से ही प्रेरित हो के कर्म को मजबूर करता है .... सारगर्भित लेख ....

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  8. कोई भी कार्य सर्वप्रथम आत्म संतुष्टि के लिए किया जाना चाहिए और पल - प्रतिपल अपने इष्ट को समर्पित होना ही पूजा है फिर विधि अथवा प्रतिलाभ का हिसाब कौन रख पाता है .

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  9. "अकसर हम कोई भी कार्य करते हैं तो कार्य-निष्‍पादन के दो अनुभवों से गुजरते हैं। या तो हमारी ये लालसा होती है कि हमें कार्य करते हुए कुछ सहकर्मी देखें। साथ ही वे हमारी कर्मगति पर कोई सकारात्‍मक टिप्‍पणी करें। या हम अपने कार्य में इतने तल्‍लीन हो जाएं कि अपने चहुंओर का आभास ही न रहे। कार्य-निष्‍पादन के ये दो प्रकार हमारे कार्यों की दो अलग व्‍यवस्‍था बनाते हैं। प्रथम मार्ग हमें कार्य-दायित्‍व के बनिस्‍पत कार्याभिनय हेतु उकसाता है। द्वितीय कार्य प्रकार कार्य-दायित्‍व के साथ-साथ कार्य के इष्‍टतम निष्‍पादन में भी सहायक होता है।"

    विकेश जी, मैं भी दुसरे नंबर की शैली का अनुशरणकर्ता हूँ , किन्तु यह भी कहूँगा कि अफ़सोस आज के युग में पहली शैली ही ज्यादा सफल हो रही है !

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  10. मानसिक रूप से किसी को जीवन का अधिकार सौंप देने का भाव है पूजा मे।

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