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Friday, July 26, 2013

सूचना का आरक्षण


क्‍टूबर 2012 में केन्‍द्रीय सूचना आयुक्‍तों के सम्‍मेलन में प्रधानमन्‍त्री ने निजता हनन न होने देने की शर्त पर सूचना का अधिकार कानून का परिसीमन करने पर जोर दिया था। तमाम विरोधों के बाद सरकार का यह विचार अकार्यान्वित ही रहा। इस प्रकार एक जन हथियार को अपने हाथ का खिलौना बनाने को आतुर सरकार ने सोचा होगा कि चलो इसके तहत मिलने वाली जानकारियां खासकर घोटालों के विवरण ही तो लोग जान पाएंगे। उनका कुछ बिगड़ेगा थोड़े ही। क्‍योंकि सूचना अधिकार में सूचना प्राप्‍त करनेवाला उसके बाद कुछ नहीं कर सकता। जन लोकपाल इसमें कुछ कर सकता था। लेकिन भारतीय मानसपटल से उसे ऐसे भुलवा दिया गया है, जैसे उसके बाबत देश में कुछ हुआ ही नहीं।
सूचना के अधिकार का परिसीमन नहीं कर पाई सरकार को इस कानून से परेशानी ये हो रही है कि उसके द्वारा किए गए, किए जा रहे घोटालों के साक्ष्‍य सहित विवरण उघड़-उघड़ के सामने आ रहे हैं। हालांकि सूचना के अधिकार से मात्र घोटालों के विवरण, उनको करनेवालों के नाम ही तो सामने आते हैं। घोटालेबाजों को कोई सजा या दण्‍ड कहां मिल रहा है। लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए सरकारी चिंता अपनी छवि चमकाने पर केन्द्रित हो गई है। इस‍के लिए वह चाहती है कि उसके शासन में किए गए और अभी तक ढके हुए घोटाले अब जनता के सामने न आएं। और जिस कारण ये प्रकट हो रहे हैं उस कानून के परिसीमन करने का उनका विचार विशेषज्ञों द्वारा समझाए जाने पर उन्‍हें यथोचित नहीं लगता। इसलिए अब इस कानून को किसी और माध्‍यम से ऐसे कुन्‍द कर दिया जाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे कहावत की तर्ज पर इसे लागू भी रहने दिया जाए तथा इसमें एक ऐसा प्रावधान जोड़ दिया जाए कि सरकार अपने को इसके परिसीमन से ही हटा दे।
परिणामस्‍वरुप राजनीतिक दल अपने को सूचना के अधिकार से बाहर रखने की छूट की मांग कर रहे हैं। मतलब लोकतन्‍त्र के नाम पर दलाली, ठगी की जिन सरकारी कारगुजारियों को जनता के सामने लाने के लिए सूचना का अधिकार कानून अस्तित्‍व में आया, अब सरकारी लोग ही खुद इससे बाहर रहने की मांग कर रहे हैं। सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब राजनीतिक दल केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उस आदेश पर आपत्ति जता रहे हैं जिसमें उन्‍हें सार्वजनिक प्राधिकार परिभाषित कर आरटीआई के तहत उत्‍तरदायी बनाया गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब व्‍यक्त्‍िा से लेकर अलग-अलग तरह के सरकारी और गैर-सरकारी संगठन आरटीआई अधिनियम की विभिन्‍न धाराओं के अन्‍तर्गत आ सकते हैं तो इन सब पर शासन करनेवाली कार्यपालिका में शामिल राजनीतिक दल इसमें शामिल क्‍यों न हों। आखिर वे भी तो उन लोगों, संगठनों का ही प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं जो आरटीआई के तहत आते हैं। तो क्‍या प्रतिनिधियों को देश के प्रति उन दायित्‍वों का निर्वाह नहीं करना चाहिए जो आम जनता करती है।
इससे बड़ी बिडंबना क्‍या होगी कि आज लोगों के लिए स्‍थापित तन्‍त्र अपने लिए ही समर्पित, केन्द्रित हो चुका है। लोगों के पास संविधान, विभिन्‍न सरकारी अधिनियमों को समझने के लिए हजारों साल का जीवन होना चाहिए। तब ही वे इन्‍हें समझ पाएंगे। विधायिका, न्‍यायपालिका में अधिनियमों के जो नित नए अध्‍याय लिखे, बनाए जा रहे हैं उनकी व्‍यावहारिकता कितनी उपयोगी है यह खुद उन्‍हीं से पूछा जाए तो वे भी बगलें झांकने लगेंगे। तब क्‍यूं इन उलझाऊ नियमों-विनियमों का सृजन किया जा रहा है और जिनके लिए जिन गरीबों, मध्‍यमवर्गीय लोगों के लिए इन्‍हें बनाया जा रहा है, वे कब अपनी शोषित दिनचर्या से फुर्सत पाते हैं, जो इन्‍हें समझ सकें। सरकार को इन जनविरोधी नियमों नीतियों के लिए लताड़ सकें। लोकतन्‍त्र की सैद्धांतिक व्‍याख्‍या से गरीब का जीवन नहीं सुधरेगा। इसे व्‍यवहार में ऐसे फलित करना होगा कि जो सुविधाएं तन्‍त्रचालक भोग रहे हैं, वे सबसे पहले जनता को मुहैया हों। लेकिन यहां सुविधाएं मिलने की बात तो बहुत दूर है, राजनीतिज्ञ तो इस कुप्रयास में लगे हैं कि जनता को उनके घपले-घोटालों, अवैध लेनदेनों की कोई जानकारी ही न मिल सके। इसीलिए अब उन्‍होंने सूचना का अधिकार को पंगु बनाने का नया दांव खेला है। इसलिए एक तरह से वे खुद को सूचना के आरक्षण में रखना चाहते हैं।
सोमवार 19 अगस्‍त 2013 को जनसत्‍ता में 

19 comments:

  1. अभी आपने देखा नहीं कैसे सब मिलकर १ रूपये , ५ रूपये और १२ रूपये का नमक जले पर छिड़क रहे है ! इनकी क्या औकात थी अगर जनता जागरूक होती और सिर्फ धर्म ,जाति के आधार पर आँखें मूँद वोट न दे !

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  2. सरकार जो भी करती है अपने फायदे के लिए करती जो भी घोटाले घपला हो किसी को कोई जानकारी न हो... सही कहा इन कारणों से सूचना का आरक्षण का कानून लाना चाहते हो ...

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  3. सरकार जो भी करती है अपने फायदे के लिए करती जो भी घोटाले घपला हो किसी को कोई जानकारी न हो... सही कहा इन कारणों से सूचना का आरक्षण का कानून लाना चाहते हो ...

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन १४ वें कारगिल विजय दिवस पर अमर शहीदों को नमन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. आरक्षण तो रोग बनता जा रहा है !

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  6. लगता है कि आरक्षण पर ही देश की साँसें भी चलती है..

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  7. बढ़िया पोस्ट..

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  8. पारदर्शी अपारदर्शिता..

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  9. अधिकतर क़ानून औत तंत्र व्यवस्था अंग्रेजों के समय की चली आ रही है जो उन्होंने खुद राज करने के लिए बनाई थी ... बार राजा बदले हैं जनतंत्र के नाम पे ... चमड़ी बदली है और कुछ नहीं हुआ ... इसके आगे कुछ एक्सपेक्ट भी नहीं है इन नेताओं से ...

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  10. लगता है कि आरक्षण पर ही देश की साँसें भी चलती है,बहुत खूब कटाक्ष।

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  11. सटीक... बढ़िया कटाक्ष

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  12. बहुत सार्थक आलेख...

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  13. इसे व्‍यवहार में ऐसे फलित करना होगा कि जो सुविधाएं तन्‍त्रचालक भोग रहे हैं, वे सबसे पहले जनता को मुहैया हों। लेकिन यहां सुविधाएं मिलने की बात तो बहुत दूर है, राजनीतिज्ञ तो इस कुप्रयास में लगे हैं कि जनता को उनके घपले-घोटालों, अवैध लेनदेनों की कोई जानकारी ही न मिल सके। इसीलिए अब उसने सूचना का अधिकार को पंगु बनाने का नया दांव खेला है। इसलिए एक तरह से वे खुद को सूचना के आरक्षण में रखना चाहते हैं।
    यही तो प्रोब्लेम है की होना तो ऐसा ही चाहिए मगर ऐसा होता है नहीं। जो थोड़े बहुत लोग कुछ करना चाहते हैं तो भ्रष्टाचार की फैली हुई जंडे उनके पऔं बांध देती है लोकपाल के लिए एक समय इतना हंगामा हुआ मगर आज सब भूल गए कि ऐसा भी कोई आंदोलन शुरू हुआ था। सारी गलती सरकार और प्रशासन की ही नहीं है कहीं न कहीं जनता भी उनके हथकंडो की आदि हो चुकी है सबको अपने जीवन यापन से ही फुर्सत कहाँ हैं जो कोई किसी और विषय में सोच भी सके। अफसोस इसी बात का होता है कि जब देश गुलाम था तब सब सारी जनता और नेता एक थे मगर अब जब देश आज़ाद है तो सब सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं देश जाये भद में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता सब अपने-अपने जीवन कि व्यस्तताओं में व्यस्त हैं या आपसी मतभेद में ही मरे जा रहे हैं।

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  14. http://epaper.jansatta.com/149254/Jansatta.com/19-August-2013#page/6/1

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  15. आपका लेख प्रकाशित है जनसत्ता में... इस लिंक्ज पर जाएँ..
    http://epaper.jansatta.com/149254/Jansatta.com/19-August-2013#page/6/1

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