Tuesday, July 16, 2013

पांचतत्विक मुक्तिमार्ग


श्रावण आने में कुछ दिन बाकी हैं। आषाड़ का उत्‍तरार्ध कितना उर्वशी है! शनिवार को हरिद्वार जाने के लिए सुबह पौने सात बजे प्रस्‍थान किया। पिछली रात अनिद्रा में व्‍यतीत हुई। मन में था कि सुबह नींद से जगने पर लक्षित यात्रा के लिए तैयार होना कष्‍टकारी होगा। विशेषकर जब से यात्रा उद्देश्‍य मन-मस्तिष्‍क में प्रतिध्‍वनित होना शुरु हुआ तब ही से यात्रा की, उद्देश्‍य पूर्ण होने की चिंता भी वहां पसर गई थी। इसी भावनात्‍मक समीकरण में शुक्रवार की रात गुजरी कि यात्रा और इसका उद्देश्‍य कैसे पूरा होगा। लेटे-लेटे पश्चिम दिशा में विद्यमान खिड़की से आसमान के एकमात्र झिलमिलाते तारे, इसकी रश्मियां देखता रहा। तारा कितना विचित्र है, कितनी दूर है और किसी को नींद से संघर्ष करने के दौरान कितनी आत्‍मशांति प्रदान कर रहा है, ये सोचकर अनायास ही यादों की गतिमान धुन्‍ध से कितने ही जाने-अनजाने मुखचित्र झांकने लगे। हृदय बेकल हुआ, शरीर में झिरझिरी व्‍याप्‍त हुई और आंखों के पोर अश्रुबूंदों से भीग गए। कल्‍पनालीला रुकी तो स्‍वयं को पुन: जीवन की वास्‍तविकता, कठोरता में पाया। करवट बदलकर सुबह की प्रतीक्षा करने लगा।
      दिल्‍ली हरिद्वार राजमार्ग पर दौड़ते चौपहिया वाहन में बैठा मैं मार्ग के दोनों ओर की हरिभूमि, हरे वृक्षों, दूर क्षितिज पर ढलके नीलनभ और ऊंचे पेड़ों की हरियाली का समागम देखकर मोहित होता रहा। आषाड़-श्रावण के मिलन के लिए व्‍याकुल मौसम की तैयारियां देखकर हर्षातिरेक मेरे अन्‍दर कुलांचे मारने लगा। निर्मल धुले आकाश पर कहीं-कहीं श्‍वेत, रंगीन घनचित्र उभरे हुए थे। थकान मिटाने के लिए रुड़की शहर की सीमा पर स्थित एक ढाबे में कुछ देर विश्राम किया। प्रखर सूर्य प्रकाश होने के बाद भी ढाबे की छप्‍पर के नीचे कितनी शीतल मृदुल हवा चल रही थी। एक वयोवृद्ध कांवड़िया भी हमारे पास बैठकर ही भोजन कर रहा था। शायद वह प्रकृति के लिए चौकस मेरी दृष्टि भांप गया था। इसीलिए सदाशयता से अपने और अपनी यात्रा के बारे में बात करने लगा। वृद्ध होने के उपरान्‍त भी उसका हृष्टपुष्‍ट शरीर, जीवटता देखकर प्रेरणा मिली।
      दोपहर साढ़े बारह बजे हरिद्वार पहुंचे। श्री केदारनाथ की अनहोनी के बाद पर्यटकों, तीर्थयात्रियों का आवागमन बहुत कम हो गया है। इसीलिए हर की पैड़ी खाली ही दिखी। मंशा देवी और चण्‍डी देवी मन्दिरों में भी बहुत कम लोग नजर आए। गंगा नदी के तट पर स्थित भीमगौड़ा खड़खड़ी श्‍मशान घाट पहुंचे तो गांव से मृत शरीर को लानेवालों के पहुंचने की प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी ही देर में शव लेकर लोग पहुंच गए। सिर की तरफ से शव को कंधा लगाते ही रुआंसा हो गया। अपने जैसा यदि कोई दिखता तो निश्चित रुप से आसुंओं पर नियन्‍त्रण नहीं रख सकता था। लेकिन शवयात्रा में सम्मिलित सभी लोग मुझे श्‍मशान के विराग, बेगानेपन की तरह ही नजर आए। इसलिए गुजरे मनुष्‍य के लिए, उसकी भावनाओं के सम्‍मान में मन में एकत्रित लगाव आंसुओं, उदासी में परिणत होने से पूर्व ही स्थिर बन गया। अंत:करण में अपनी संवेदनाओं की प्रतिछाया देखी और उससे लिपटकर दहाड़ें मार रोने लगा।
      पांच-छह चिताएं पहले से ही जल रही थीं। उनसे हटकर किनारे बांई ओर चिता तैयार की गई। तेज हवा के कारण दूसरी चिताओं से आनेवाली तपन, जल चुके अवशेषों के कण पलभर भी वहां खड़ा नहीं होने देते थे। फिर दोपहर के एक बज चुके थे और गांव से शव लेकर आनेवालों को अन्तिम संस्‍कार करके वापस भी तो जाना था। इसलिए दूसरी चिताओं के पूरी तरह बुझने तक का इंतजार करना ठीक नहीं था। चिता को अग्नि दी गई। दो दिन पहले तक जीवन-जंजालों से विचलित मनुष्‍य प्रशांत, प्रस्थिर सा धधकती आग के बीच लेटा हुआ था। चिता की पृष्‍ठभूमि में मटियाले रंग में सरसराती, बहती गंगा नदी से मूक संवाद करने का निरर्थक प्रयत्‍न किया। वह तो जैसे मनुष्‍य नाम के प्राणी से खिन्‍न-भिन्‍न, उसकी ओर देखने तक की इच्‍छा नहीं रखती थी। नीले आसमान ने श्‍वेत बादलों के छोटे-छोटे सुन्‍दर वस्‍त्र धारण किए हुए थे।
     आकाश-वायु, पृथ्‍वी-जल के बीच अग्नि में अर्थात् पंचतत्‍व में विलीन होने का तात्‍पर्य यदि सभी समझ पाते तो कोई समस्‍या ही न होती। हमारा शरीर जिन पांच तत्‍वों से निर्मित है, जिनके प्रति हमें कृतज्ञता प्रदर्शित करनी चाहिए, हमने उनका ही तिरस्‍कार किया। धरती बिगाड़ी, जल दूषित किया। परिणामत: आकाश और हवा का स्‍वभाव बिगड़ा और मानव जीवन श्री केदारनाथ में हुई अनहोनी जैसी विनाशलीला के रुप में अपनी प्रस्‍तावना लिखवा चुका है। यदि पंचतत्‍वों के प्रति आस्‍थागत रहकर इन्‍हें प्रकृतिवत रहने दिया जाएगा तो ही विनाशलीला की कहानी रुक सकेगी। जगत जीवन का कल्‍याण हो सकेगा।
     हरिद्वार से लौटते समय दिन-रात के संगम का विहंगम दृश्‍य व्‍याप्‍त था। दांई ओर का रक्‍ताभ हुआ अम्‍बर अंश स्‍वप्‍न कल्‍पनाओं जैसा लगता रहा। उस पर अस्‍त होने से पूर्व गोल सूर्य के रंगाकर्षण परालौकिक प्रतीत होते थे। सुदूर दिखती धरती की सीमा पर खड़े लम्‍बे, ऊंचे वृक्षों से छन-छन कर आती सूर्य किरणें शायद नहीं जानती थीं कि बांई तरफ का नभ रात की कालिमा ओढ़ चुका है। बांई ओर खड़े पेड़ और हरेभरे खेत सहमे, डरे, चुप्‍पी साधे दया के पात्र बने हुए थे। तारकोल की काली सड़क जिस पर हमारा चौपहिया चल रहा था वो भी रात के सिद्धांत पर अडिग थी। जैसे कह रही थी कि डूबते सूरज और उसकी भ्रमव्‍यापी सुन्‍दरता मत देखो। मन ने दोनों में से एक को चुनने की बात पर भोलीभाली, असहाय प्‍यारी रात का चुनाव किया। विलीन होते समय सूरज कैसे दिख रहा है इस भाव को भूल मैं तब तक राजमार्ग के बांए हिस्‍से की स्‍याह सीधी सन्‍ध्‍या को निहारता रहा जब तक कि धरती पूरी तरह से निशालीन नहीं हो गई।
      अन्तिम क्षणों में दादीजी पता नहीं पिताजी के समक्ष कुछ इच्‍छा प्रकट कर पाई थी या नहीं लेकिन उनके दाहसंस्‍कार से लेकर अस्थि विसर्जन तक की प्रक्रिया में मुझे लगा जैसे पांचतत्विक हो वे कह रहीं थीं बेटा मुझे मुक्ति मिल गई है।

शुक्रवार १२.०७.२०१३ शाम को दादीजी के निधन की खबर सुनकर शुक्रवार १२.०७.२०१३ रात से लेकर शनिवार १३.०७.२०१३ दिनभर तक का संस्‍मरण।   

21 comments:


  1. दादीजी की दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजली ! लगता है यह शायद गुजरे हफ्ते का वाकया रहा होगा क्योंकि हमारे हिन्दू पंचांग के हिसाब से तो सावन आज से शुरू हो गया है।

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  2. पंचतत्‍वों के प्रति आस्‍थागत अगर सभी हो जाएँ तो सच में प्रकृति भी हमारे साथ छल नहीं करेगी.
    .........
    दादीजी को विनम्र श्रद्धांजलि.
    ........
    आप ने रक्ताभ आकाश और रात की कालिमा में से दूसरे विकल्प को देखना चुना क्योंकि वही उस रक्ताभ आकाश का भविष्य थी.यही सच भी है.

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  3. दादी जी को भावभीनी श्रद्धांजली ! भगवान उनकी आत्मा को शांति दें !!

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  4. दादीजी की दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजली !इस कठोर और असंवेधन शील दुनिया में जीवन व्यतीत करने पश्चात जब पंच तत्वों में विलीन होता है कोई तब शायद हर किसी की आत्मा को यही अनुभूति होती होगी जो आपने लिखी...

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  5. दादी जी को श्रद्धांजलि....

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  6. दादी जी को भावभीनी श्रद्धांजली।

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  7. पूरा संस्मरण काव्यमय है । उदासी भी जैसे गीत बन गई है । सुन्दर । दादी जी को विनम्र श्रद्धांजलि ।

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  8. आपके पोस्ट को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा कि मन दो दशक पीछे लौट गया. दिवंगत दादी को नमन.

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  9. आकाश-वायु, पृथ्‍वी-जल के बीच अग्नि में अर्थात् पंचतत्‍व में विलीन होने का तात्‍पर्य यदि सभी समझ पाते तो कोई समस्‍या ही न होती। हमारा शरीर जिन पांच तत्‍वों से निर्मित है, जिनके प्रति हमें कृतज्ञता प्रदर्शित करनी चाहिए, हमने उनका ही तिरस्‍कार किया। धरती बिगाड़ी, जल दूषित किया। परिणामत: आकाश और हवा का स्‍वभाव बिगड़ा और मानव जीवन श्री केदारनाथ में हुई अनहोनी जैसी विनाशलीला के रुप में अपनी प्रस्‍तावना लिखवा चुका है। यदि पंचतत्‍वों के प्रति आस्‍थागत रहकर इन्‍हें प्रकृतिवत रहने दिया जाएगा तो ही विनाशलीला की कहानी रुक सकेगी। जगत जीवन का कल्‍याण हो सकेगा।

    सब कुछ कह दिया है आपने .देह अभिमानी बन हमने इन तत्वों की तात्विकता ही नष्ट कर दी है अब हमारा भी यही हश्र होना है .मृत्यु अवश्यम्भावी है .पुराना नष्ट होना है नवनिर्माण होना ही होना है .आओ इन पञ्च तत्वों को शुभ स्पंदन दें .दादी को अंतिम प्रणाम करें .उनके आत्म स्वरूप आनंद प्रेम शान्ति को याद करें चिर स्थाई स्वभाव बनाएं अपना .ॐ शान्ति .

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  10. जानते हो विकेश भाई कबीर दास अपने आखिरी वक्त में बीमारी की ही हालत में काशी से भाग खड़े हुए थे -सोचते हुए तू यहाँ काशी में मरा तो लोग सोचेंगे :कबीर कर्म कांडी पौँगा पंडित था .

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  11. गंगा को लोग आज भी पतित पावनी मानने का भ्रम पालें हैं जब की यह अपनी बहना जमुना के साथ खुद ही कराह रही है गंध से बॉस से सड़ांध से .ॐ शान्ति .पतित पावन एक ही है निराकार शिव .हमारा ही आत्म स्वरूप ,ज्योतिर्लिन्गम शिव .

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  12. दादी जी को श्रद्धा सुमन अर्पित. उनकी आत्मा को शान्ति मिले....यही प्रार्थना है.....

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  13. पर हमारी यादें उन्हें कहाँ मुक्त कर पाती है ? वो हमारे साथ ही जीवित रहती हैं..

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  14. विकेश जी आपकी पीडा में हमारी संवेदनाएं आपके साथ है और दादी जी की आत्मा के माध्यम से आपका संस्मरणीय भावनालेख आपके जुडाव को दिखाता है। आपके दुःख में आप हमें साथ महसूस करें। एक-दूसरे के सामने होते तो हमारी प्रतिक्रिया अलग होती।

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  15. दादी जी को मेरी विनम्र श्रधांजलि ... अनितिम यात्रा हर किसी को ये एहसास करा देती है की शक्ति तो बस एक ही के पास है ... जिसको हम भूल जाते हैं अक्सर ...

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  16. दादी जी को विनम्र श्रद्धांजलि---पंचतत्व में विलीन हुई हैं
    ह्रदय में सदैव उनकी स्मृतियाँ जीवित रहेंगी

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  17. दादीजी को श्रद्धांजलि, देहकारा में देह की सुननी पड़ती है।

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  18. शुक्रिया आपकी निरंतर टिप्पणियों का .ॐ शान्ति

    नए चोले और वस्त्रों में एक बार फिर आत्मा अपने मूल स्वभाव में आयेगी .शांत स्वरूप आनंद और प्रेम स्वरूप .अपने आत्म स्वरूप में स्थिर रहे दादी जी की पुण्य सनातन आत्मा .ॐ शान्ति

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  19. शुक्रिया आपकी निरंतर टिप्पणियों का .ॐ शान्ति

    नए चोले और वस्त्रों में एक बार फिर आत्मा अपने मूल स्वभाव में आयेगी .शांत स्वरूप आनंद और प्रेम स्वरूप .अपने आत्म स्वरूप में स्थिर रहे दादी जी की पुण्य सनातन आत्मा .ॐ शान्ति

    नष्टो मोहा बनो दृष्टा और ट्रस्टी बनो जो आया है सो जाएगा .ॐ शान्ति .अपने निज स्वरूप को नहीं छोड़ना है .सम रहना है मिलन और विछोह में .

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  20. बहुत दुखद समाचार | दादाजी को मेरी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि | आपको यह दुःख सहन करने की शक्ति मिले यही प्रार्थना है प्रभु से | आपके दुःख के इन पलों में मैं आपके साथ हूँ |

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