Friday, July 12, 2013

मौत की ठोकर मनुष्‍य जोकर


वीरवार शाम साढ़े तीन बजे मित्र का फोन आया कि दिनेश के पिताजी की हत्‍या हो गई है। कह रहा था कि तेरे कार्यालय के बगल में मॉडर्न स्कूल के मुख्‍य गेट पर रात्रि ग्‍यारह बजे उन्‍हें अपने चौपहिए में मृत पाया गया। इंदिरापुरम स्थित घर पहुंचने में देर होने पर परिवारीजनों ने उनकी खोजखबर शरु की और छोटे बेटे ने नोएडा सेक्‍टर-11 के पास स्‍कूल के सामने उन्‍हें रक्‍त से सना बेहोश पाया। उन्‍हें पास के मेट्रो अस्‍पताल ले जाया गया। जहां चिकित्‍सकों ने उन्‍हें मृत घोषित कर दिया। नोएडा सेक्‍टर-8 स्थित प्रसिद्ध चिपचाप होटल के प्रबन्‍धक मित्र के पिताजी पिछले बीस सालों से यहां काम रहे थे।
    सेक्‍टर-94 स्थित श्‍मशान घाट से जब मित्र का फोन आया कि हम सब यहीं पर हैं तो मैं कार्यालय में अकेला था। साथी की तबियत खराब थी। वह नहीं आया था। सोचा कि ये लोग पहले तो रात को, नहीं तो कम से कम सुबह तक तो मुझे बता ही सकते थे कि ऐसी दुर्घटना हुई है। लेकिन फिर  सोचा कि ये सारी मस्तिष्‍क उलझन बेकार है। इससे मृत व्‍यक्ति वापस तो नहीं आएगा।
      जिस मित्र ने मुझे फोन किया था उससे आखिरी बार उसके विवाह में ही भेंट हुई थी। वह मुझसे आधा किलोमीटर दूर ही रहता है। पर विवाहोपरान्‍त मिलना तो दूर फोन या किसी अन्‍य संचार माध्‍यम से सम्‍पर्क भी हमारे बीच नहीं है। जिस मित्र के पिताजी की हत्‍या हुई उससे तो सालों से किसी भी प्रकार का सम्‍पर्क नहीं है। नोएडा से इंदिरापुरम भी कितनी दूर है, लेकिन उससे भी मिलना नहीं हो सका। ये है इस शहर में रहते मित्रों की कहानी। जो मित्र एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे, एकदूजे को कोई बात बताए बिना पानी पीने तक की बात भी भूल जाते थे, उनसे आज गाहेबगाहे, वो भी जब कोई दुर्घटना हो, तब ही सम्‍पर्क हो पा रहा है। मैं इसके लिए स्‍वयं या अपने दोस्‍तों को दोषी नहीं मानता। यह सब इसलिए है क्‍योंकि जो भी जहां भी काम करता है या रहता है वह वहां की प्रत्‍यक्ष विसंगतियों से या स्‍वयं उनका हिस्‍सा बन कर इतना टूटाटूटा, अविवेकी हो गया है कि उसके लिए घर से कार्यालय और कार्यालय से घर का लक्ष्‍य ही शेष बचा है। घर भी उनके लिए प्रतिदिन के खानपान सहित अन्‍य भौतिक जरुरतों का अड्डा मात्र बन कर रह गया है। सम्‍बन्‍धीगणों से स्‍वाभाविक रागानुराग का निरन्‍तर क्षय हो रहा है।
     जो भी हो मुझ जैसे जीवित व्‍यक्ति को यहां-वहां दुनियाभर में जब किसी की मृत्‍यु की सूचना प्राप्‍त होती है तो मैं मौत के दर्शन में विलीन हो जाता हूँ। मेरे मन में पीड़ित की मृत्‍युपूर्व भावनाएं, उसके सम्‍बन्धियों की आगामी जीवन समस्‍याएं विचित्र पीड़ा उत्‍पन्‍न करने लगती हैं। लेकिन दूसरे ही क्षण दुनिया में मानव की तुच्‍छ स्थिति के दर्शन पर विचार करते ही मैं भी गुजर चुके व्‍यक्ति, समय को अनदेखा करता हुआ अपने आज में स्थिर हो जाता हूँ।  
          सोचा कि उत्‍तराखण्‍ड में हजारों की संख्‍या में मारे गए व पांचपांच दसदस कर रोज मर रहे, दुनिया में इधरउधर धरना-प्रदर्शन, सेनायुद्ध, आंतक, बलात्‍कार, लूटपाट, परस्‍पर विवादों के परिणामस्‍वरुप अनेक लोग मर रहे हैं तो दिनेश के पिताजी के नहीं रहने से क्‍या फर्क पड़ता है। इस दुर्घटना से पहले मेरे पास उनके जीवन का क्‍या आभास था। कुछ भी तो नहीं। मुझे तो याद भी नहीं था कि दिनेश, उसके पिताजी भी यहीं कहीं इसी शहर की दौड़ में सम्मिलित हैं। तो फिर  उनके स्‍थायी रुप से नहीं रहने के अनुभव से मैं इतनी पीड़ा क्‍यों प्राप्‍त करुं और करुं भी तो किस आधार पर। जब उनसे कोई सम्‍पर्क ही नहीं था तो उनके लिए दुखी होने का मेरे पास कोई अधिकार भी नहीं है।
         आज समझ आया कि रुपएपैसों, सामाजिक हैसियत की भूख नेताओं और अधिकारियों में क्‍यों रहती है। यह विचार भी कौंधा कि सज्‍जन आम आदमी बन कर कुत्‍तों की मौत मरने से तो लाख अच्‍छा है कि बेईमान नेता, अधिकारी बना जाए। क्‍योंकि उनके यानि कि नेताओं, अधिकारियों को इतनी सुरक्षा-सुविधा मिलती ही है कि उन्‍हें ऐसे ही कोई सड़क चलते नहीं मार सकता। सबसे बढ़ कर जो बात है वो ये कि हम अच्‍छे हैं या बुरे यह अहसास हमारे जीवित रहतेरहते ही है। अच्‍छा आदमी अच्‍छा होकर भी यदि बेमौत मर जाता है तो उससे बेहतर यह है कि बुरे बन कर जीवन में उपस्थित रहा जाए। क्‍योंकि जीवन के रहतेरहते ही तो अच्‍छेबुरे के तराने हैं। मृत्‍यु के बाद मनुष्‍य का क्‍या होता होगा, इस तक किसी की पहुंच नहीं है। लेकिन मुझे अभी तो यही लगता है कि मौत की ठोकर पर जोकर बन कर हम पता नहीं कहां जाकर गिरेंगे।  


22 comments:

  1. वहाँ तो सबको बलात जाना है, चाह कर तो कोई भी नहीं जाना चाहता है। दुर्भाग्य पर कुकर्मियों को कम ही छूता है।

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  2. अंधेर नगरी है उत्तर प्रदेश तो। मैं अपने आगे चल रहे वाहनों को अवलोकित करता रहता हूँ, दिल्ली का बोर्डर पार होते ही मानसिकता बदल जाती है उनकी। रही बात आअप्के लेख के अंतिम पैराग्राफ की तो मैंने अभी एक व्यंग्य लिखा था, लम्बी और सुखी उम्र चाहिए तो चुनाव लड़िये और नेता बनिए !

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  3. जीवन की सार्थकता का अपना अपना दृष्टिकोण होता है।

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  4. महानगर की मज़बूरियाँ हैं या महानगर की हवा में कुछ है जो हम सब को आत्मकेंद्रित कर देता है और संवेदनशीलता केवल एक शब्द बन कर रह जाती है. एक ईमानदार आम आदमी को आज कौन पूछता है?

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  5. क्या कहें ... आज कल हम सभी का जीवन ऐसा ही होता जा रहा है ... सिर्फ खुद मे मगन है हम लोग !

    इतने सब के बाद भी हम लोग समझ जाएँ तो कुछ बात है !




    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन रुस्तम ए हिन्द स्व ॰ दारा सिंह जी की पहली बरसी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें ,कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  7. आज कल की भागमभाग की जिन्दगी में सभी उलझा है किसी दुसरे के लिए समय ही नहीं है.......
    बस जीये चला जा रहा है... बढ़िया लिखा आपने

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  8. बहुत ही दुखद
    कब कैसे कौन यह जग छोड़ जाएगा कोई नहीं जानता ....

    आपके सुझाव पर मैंने अपने पोस्ट में कुछ सुधार किया है
    कृपया एक बार देख लें
    धन्यवाद
    आभार!

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  9. आपके बे -लाग पन का स्वागत .लेकिन आपकी प्रस्तावनाओं और विश्लेषण से सहमत होना मुमकिन नहीं हो पा रहा है .आज और किसी भी पल जो कुछ भी हमारे साथ हो रहा है वह तो परिणाम है हमारे कर्मों का .जो जैसा कर रहा है आगे पीछे चुकता करेगा .

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  10. बेहद दुखद.
    दुःख का अहसास जो मरे जीव को देखकर भी हो आता है.लेकिन आज के युग में अधिकतर लोग संवेदनहीन हो गए हैं.त्रासदियों में मरने वालों की गिनती ही सुनते हैं सच है कि उस गिनती के अनुपात में दुःख नहीं होता फिर भी अफ़सोस तो होता ही है.
    दुष्कर्मियों को मौत भी छूने से कतराती होगी.
    अच्छे-बुरे सब हैं .
    एक ही शाश्वत सच है धरती पर जिसे मृत्यु कहते हैं ,जब तक सांस है जीते रहना है.

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  11. लगता है आप के पेज को मेरे कमेन्ट पसंद नहीं आते..हर बार स्पैम में क्यूँ डाल देते हैं?

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  12. आज कल के असंवेदन शील समाज का यही चेहरा है यहाँ लोग किसी की मृत्यु पर दिखावे क लिए कुछ पलों का शोक व्यक्त करते हैं और फिर अपनी-अपनी ज़िंदगी में रम जाते है
    जैसे अभी अभी प्राण सहाब की मृत्यु की खबर मिली
    और facebook पर RIP लिखना जारी है। वो कहते है न The show must go own....मगर अफसोस इस बात का होता है कि इस तरह के दर्दनाक हादसे केवल आम इंसान के साथ होते हैं भ्रष्ट नेताओं के साथ नहीं।

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  13. दुखद! जीवन नश्वर है, यह जानते हुए भी कसी परिचित के देहांत में हम उस दर्द को गहराई से महसूसते हैं। गए हुए वापस नहीं आते लेकिन यह सीख तो मिलती है की जो पीछे छोटे हैं, उनका दुख-दर्द बाटा जा सके तो अच्छा हो।

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  14. विकेश जी, आपके मित्र के पिता के हत्या के बारे में जानकर दुःख हुआ. शहर आने के बाद ज़िन्दगी इतनी व्यस्त हो जाती है की आदमी के पास ना तो फुर्सत रह जाती है और ना ही चाहत. और शहर का ढांचा भी कुछ ऐसा होता है कि लोगों को अपने में ज़िन्दगी कैद कर लेना होता है.
    एक निवेदन भी. कृपया रक्त से सने इस तरह के ह्रदय विदारक चित्र ना लगायें. आपके ब्लॉग के पोस्ट बहुत मन से पढता हूँ और ऐसे में अचानक से इस तरह चित्र को देखकर मन और विचलित हो जाता है.

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  15. संवेदना के कई आयामों को एक साथ ही छूता आलेख मर्म को भेद रहा है..

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  16. जीवन की सार्थकता का अपना अपना दृष्टिकोण होता है। बहुत ही अच्छा लिखा आपने आभार विकेश जी।

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  17. मौत एक भूलभुलैया है और जीवन कैसे जीना चाहिए ये उससे भी बड़ी भूलभुलैया ...
    मौत की तो जब मर्जी होगी वो आएगी ही ...

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  18. जिन्दगी की यही व्यथा है...

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  19. खुद से प्यार करना सीखो .स्व :उन्नति के लिए वक्त निकालो सारी कायनात खूब सूरत हो उठेगी .

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  20. महानगर हो या नगर खुद को क्यों तिरस्कृत करें ज़िन्दगी से प्यार क्यों न करें ?

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  21. क्यों साधारणीकरण करें जीवन का आओ अपवादों को जीए नियम बनाए .अपवादों को .

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  22. क्यों साधारणीकरण करें जीवन का आओ अपवादों को जीए नियम बनाए .अपवादों को .

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