महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, July 3, 2013

मेरी बाट जोहता कौन…पता नहीं!


पूरे दिन वातावरण में धूप और छाया का प्रभाव था। कमरे में बैठेबैठे मैं कल्‍पनाशील बन कर देख रहा था कि दरवाजे पर हवा के सहारे धीमेधीमे हिलते परदे को कभी धूप की चमक लगती तो कभी बादलों से घिरते आसमान के बाद उत्‍पन्‍न मौसमीय छाया की उदासी उसे घेर लेती। सब कुछ कितना परिवर्तनशील बना हुआ था। मस्तिष्‍क-पटल पर स्‍मृतियों के दिव्‍यांश अत्‍यन्‍त विचलित हो कर प्रेमोन्‍माद बढ़ाने लगे। साथ बैठे परिवार के लिए अपनी शारीरिक उपस्थिति छोड़ कर हृदय से न जाने कहां, किस तक पहुँच गया। नहीं ज्ञात कि वह कौन है जिसके लिए जब तब मेरे सामान्‍य जीवन समय का विशेषीकरण हो जाता है। ऐसे में मैं स्‍वयं को एक नए व्‍यक्तित्‍व में बदला हुआ पाता हूँ। जिस भ्रमारोहण पर होता हूँ और वहां जो राह दिखाई देती है उस पर इतना चौकन्‍ना हो कर चलता हूँ कि कोई चींटी, जीव मेरे पैर से कुचला न जाए। कोई प्रकृति उपक्रम आंखों से छूट न जाए। मौसमीय राग-विराग अनसुना न रह जाए।    
एक छोटे से जीवन में हमारे पास बड़े देश के लोकतन्‍त्रीय तामझाम और इसके विरोधाभासों, विद्रूपताओं, विसंगतियों, विडम्‍बनाओं को समझने के लिए कितना कम समय होता है! जैसेजैसे समय के पैरों में आधुनिकता, मशीनों के पंख लग रहे हैं वैसेवैसे नए विचार, सामाजिक चालचलन, सत्‍ता संचालन प्रक्रियाएं अस्तित्‍व में आ रही हैं। इससे जीवन की स्‍वच्‍छंद मुसकान, सहज खुशी विलुप्‍त हो रही है। व्‍यक्तिगत उपेक्षा, तिरस्‍कार में वृद्धि हो रही है। जीवन के दो सबसे बड़े आश्‍चर्य यानि कि जीवन और मृत्‍यु सबसे सस्‍ते हो चले हैं। नवजातों के कूड़ादानों में मिलने, उन्‍हें मारने की खबरें सुनते हैं तो भी हममें हलचल नहीं होती और देश में आई आपदा में एक साथ हजारों लोगों के मरने के बाद भी हममें विशेष संवेदना नहीं उपजती। जीवित लोगों के लिए सब कुछ सामान्‍य बना रहता है।
सामान्‍य जिन्‍दगी में क्‍या रखा है। सामान्‍य जिन्‍दगी के अपने हृदय के कुत्सित विचारों से ऊब ही होती है। ऐसे विचार बवंडर का कारण मेरे जीवन समय के भूखण्‍ड यानि कि भारत के शासनाधीश हैं इन आंखोंवाले अन्‍धों की अमानवीय नीतियां, गतिविधियां हैं। इन के शासन में मैं अपनी दैनिक कार्य प्रणालियों से हार गया हूँ। सुबह उठ कर संसार में अपनी उपस्थिति कितनी बोझिल लग रही है!  निद्रा में जाने से पूर्व कितनी करवटें बदलनी पड़ती हैं! मेरे साथ कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता जिससे जीवन का सच अनुभव कर सकूँ। जीवन को जीवन से भी अधिक जी कर महसूस कर सकूँ। हरेक सांसारिक क्रियाकलाप कितना निरर्थक और ढोंग लगता है! प्रत्‍येक परिचित मनुष्‍य कितनी द्विअर्थी बातें करता है! यह देख मैं पथरायी आंखों से अपने मन में अपना विचित्र निरुपण करने लगता हूँ और संसार-समय के लिए लम्‍बीलम्‍बी अवधि तक नितान्‍त भ्रम बन जाता हूँ। केवल एक विचार मुझे अपनी भौतिक उपस्थिति, जागृति तक याद रहता है। इस विचार में किसी की स्‍मृति होती है। किसकी होती हैयह मुझे भी नहीं पता! इस समय मेरे लिए यही स्‍मृतिविहार जीवन की सुधा होती है। जिसके लिए संवेदित हूँ वह मेरे लिए चिन्‍तनशील है या निश्चिन्‍त, यहीं पर मैं धयानस्‍थ होता हूँ और अनस्तित्‍व होते स्‍वयं को संभालता हूँ।
रात घिर आने तक उसकीन जाने किसकी यादों की रहस्‍यमय यात्रा करता रहता हूँ। रात्रि का आभास हुआ तो देखा आधा चांद आसमान में उभर आया है। मैं आकाश के नीचे अपनी पलकें झपकाता हुआ चांद को देख कर आकण्‍ठ भ्रमात्‍मक हो जाता हूँ। भ्रम की यात्रा में फिर उसकान जाने किसका चिंतन चलता है और इस चिन्‍तन पथ पर वहां तक पहुँच जाता हूँ, जहां मेरी स्‍मृति में खड़े हो कर रोते हुए कोई मेरी बाट जोह रहा होता है। कौनपता नहीं! 
 




21 comments:

  1. स्मृति तो सदा ही तैयार रहती है, साथ निभाने के लिये।

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  2. सुन्दर आलेख विकेश जी,आभार।

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  3. शायद जीवन इसी को कहते हैं।

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  4. अच्छा लिखते हो ..
    शुभकामनायें !

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  5. अच्छा और सटीक लेख |
    आशा

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  6. सच ही कहा की आजकल मनुष्य की संवेदनाए ख़त्म से हो गयी है.. डेली का काम एक रूटीन जैसा है बहुत से कारणों से लेकिन पॉजिटिव सोच को बढ़ाना होगा और हमें आगे बढ़ाना होगा.....

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  7. सच ही कहा की आजकल मनुष्य की संवेदनाए ख़त्म से हो गयी है.. डेली का काम एक रूटीन जैसा है बहुत से कारणों से लेकिन पॉजिटिव सोच को बढ़ाना होगा और हमें आगे बढ़ाना होगा.....

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  8. ख्वाब मीठे और खट्टे , हर साहित्यिक और कल्पनाशील इन्सान का अकेले में वक्त गुजरने का सबसे बड़ा साधन होता है :)

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  9. हर ईमानदार व संवेदनशील व्यक्ति को ऐसी वेदनाएं आहत करतीं हैं लेकिन यह संवेदना और विरोध भाव भी एक उपलब्धि है एक रचनाकार के लिये ।

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  10. बहुत सुन्दर लिखा है. घटती संवेदना वाकई दुखद है. कभी कभी ये भी सोचता हूँ क्या ये संवेदनहीनता नयी उपज है? इतिहास के पन्ने टटोलने पर जिस तरह के नरसंहारों का उल्लेख दिखता है, लगता तो यही है की ये सर्वकालिक समस्या रही है. सिर्फ अपने-अपने स्वार्थ के लिए.

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  11. मन की संवेदनशीलता कई बार सोच को और उसकी दिशा को बदलना चाहती है ... पर फिर भौतिकता के, आधुनिकता के, इस सामाजिक राजनितिक स्थिति की सतह पे आते ही ये दूर होती जाती है ... इसी समाज के एक आम आदमी की तरह हम भी होने लगते हैं ...

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  12. जीवन में सार्थकता की तलाश निरंतर चलती रहती है..बहुत प्रभावी आलेख..

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  13. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन क्रांतिकारी विचारक और संगठनकर्ता थे भगवती भाई - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  14. SAMWEDANSEEL MAN KI WYATHA...SUNDAR LIKHA HAI AAPNE.....

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  15. सुंदर आलेख विकेशजी..कई बार कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है।

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  16. बहुत प्रभावी आलेख,बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,अभार।

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  17. बहुत बार ऐसा होता ..हम खुद भी नहीं जानते कि कौन है..मगर मन को अहसास होता है कि कोई है..एक अनजाना सा अहसास..मगर ये ख्याल भी अपने आप में बहुत खूबसूरत होते हैं.
    .............
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    [गलती से आज मुझ से एक पोस्ट छप गयी..जिसपर आप का कमेन्ट भी आया .मैं अपने गीतों की एक प्लेलिस्ट लगाने की कोशिश कर रही थी..ड्राफ्ट में सेव करने की बजाय छप गयी :)..बेख्याली में.जल्दी ही कोई पोस्ट लगती हूँ वहाँ....:)
    ...सुध लेने के लिए शुक्रिया.
    ..........

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  18. यही जीवन है ,जो इसको जान गया जिसने अपने अंतर्मन में झांक कर देखा है उसे बाहरी दुनिया एक आवरण से ढकी लगती है ....बढ़िया आलेख

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  19. बाट तो जोहता है पर रोते हुए या रुलाते हुए.. शायद वो तो हमेशा हंसता है इस भ्रम में उलझाकर..

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  20. सार्थक अभिव्यक्ति

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  21. जनसत्ता में पढ़ा... अच्छा लगा... जीवन चलने का नाम...

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