Sunday, June 9, 2013

वन्‍यजीव संरक्षण के मायने



प्रैल में जब कोटद्वार, उत्‍तराखण्‍ड किसी काम से गया था तो समाचारपत्रों के स्‍थानीय संस्‍करण बाघ यानि कि गुलदार द्वारा कई पहाड़ी ग्रामीणों को मारने के समाचारों से पटे पड़े थे। इन दुर्घटनाओं पर लोगों का आक्रोश विचारणीय था। गुलदारों से पहाड़ी लोगों के जीवन पर मंडरानेवाली आशंका, भय के निवारणार्थ स्‍थानीय प्रशासन की शिथिलता विचलित करती थी। समाचार में जब पढ़ा कि एक ग्रामीण महिला को गुलदार रसोईघर से उठा के ले गया और बाद में उसका क्षत-विक्षत शरीर ग्रामीणों को कहीं दूर वन में मिला तो सरकार के प्रति गुस्‍सा दिमाग में तपने लगा। ग्रामीणों के बारम्‍बार अनुरोध पर भी स्‍थानीय प्रशासन गुलदार के आक्रमण से जीवन गंवा चुके लोगों के प्रति कोई संवेदना प्रकट करने की स्थिति में नहीं आया। औपचारिकतावश उसने कुछ शिकारियों को गुलदार के संभावित शरणस्‍थलों पर तैनात तो कर दिया पर यह तैनाती गुलदारों को मारने के लिए नहीं थी। शिकारियों को लोहे के जाल सौंपे गए थे। उन्‍हें आदेश था कि वे गुलदारों को पकड़ कर इन जालों में बन्‍द कर दें। ऐसे में प्रश्‍न यह उठता है कि जब गुलदारों को पकड़ कर जाले में बन्‍द कर रखना था तो उन्‍हें पहाड़ी जंगलों में छोड़ा ही क्‍यों गया? और जब उन्‍हें वन्‍यजीव संरक्षण कानून के अन्‍तर्गत अपना भोजन ढूंढने के लिए जंगली क्षेत्रों में छोड़ दिया गया है, और वे भी जंगली जानवरों का आखेट करने के बजाय पालतू मवेशियों एवं विशेषकर मनुष्‍य को अपना भोजन बना रहे हैं तो ऐसे में एक नैतिक प्रश्‍न चारों ओर से उठता है कि क्‍या अब वन्‍यजीवों (आदमखोर गुलदार, बाघ इत्‍यादि) का संरक्षण मनुष्‍य के जीवन मूल्‍य पर होगा! वन्‍यजीव या कोई भी कानून आसमान से नहीं टपका है। इसे मनुष्‍य ने ही बनाया है। अपनी पर्यावरणीय और जलवायु की आवश्‍यकताओं में तथाकथित सन्‍तुलन स्‍थापना के उद्देश्‍य हेतु इसे हमने ही निर्मित किया है। आज जब यह कानून वन जीवों के संरक्षण के नाम पर खूंखार जंगली जानवरों द्वारा मनुष्‍य जीवन के लिए जोखिम बन गया है तो क्‍या तब भी इसमें संशोधन की आवश्‍यकता का अनुभव नहीं हो रहा कर्ताधर्ताओं को? या पहाड़ों में कठिनता से जीवन बसर कर रहे लोगों की सुरक्षा की बात उनके लिए उतनी महत्‍वपूर्ण नहीं जितनी अंतर्राष्‍ट्रीय वन्‍यजीव प्रदर्शनी विषय पर अपने देश के वन क्षेत्रों में वन्‍यजीवों का बेहतर रिकार्ड दिखाने की। भारत जैसे देशों में जब से सत्‍ता प्रतिष्‍ठान मुद्रा व पूंजी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं, तब से उनके निर्णय जनहितैषी न हो कर अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष और पूंजीतन्‍त्र के संकेतों पर निर्भर हैं। विदेशी बिरादरी को अपने वैज्ञानिक सूत्रों, जीवन रुचियों के अनुरुप जो नियम बनवाने होते हैं, दूसरी-तीसरी दुनिया के देशों (भारत सहित) में उन्‍हीं का अंधानुकरण होता है। चूंकि पहाड़ से अत्‍यधिक लोगों का पलायन हो चुका है और वहां बहुत कम लोग स्‍थायी रुप से रह रहे हैं इसलिए वहां सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान के निर्माण हेतु आवश्‍यक जनमत का अभाव है। ऐसे में वहां के लिए सरकारी स्‍तर पर ठोस, जनानुकूल नवनीतियां बनने का प्रश्‍न ही नहीं होता। यदि वहां विशाल वोट बैंक की संभावनाएं होतीं, वहां की जनसंख्‍या ज्‍यादा होती तो निसन्‍देह उत्‍तराखण्‍ड या केन्‍द्र सरकार वन्‍यजीव संरक्षण कानून को तुरन्‍त बदल देती, इसे पहाड़ में रह रहे लोगों की जीवन-सुरक्षा के लिए तत्‍काल परिवर्तित कर देती। तब उसे गुलदारों या बाघों के संरक्षण की चिंता इतनी नहीं होती जितनी आज है। बात यदि पारिस्थितिकीय सन्‍तुलन, पर्यावरण संरक्षण की है और देशी-विदेशी पर्यावरणीय प्रतिष्‍ठान, मंत्रालय प्रकृति संरक्षा के निमित्‍त सोच कर गुलदार जैसे खूंखार जानवरों को स्‍थानीय पहाड़ी निवासियों के जीवन की कीमत पर भी नहीं मारने का कानून पारित करवाते हैं, तो उन्‍हें स्‍वयं को पहाड़ियों के स्‍थान पर रख कर अपने वन्‍यजीव संरक्षण कानून के बिन्‍दुओं पर पुनर्विचार करना होगा। उन्‍हें यह भी सोचना होगा कि जीव-जगत का सन्‍तुलन प्रकृति के अनुसार रहने दिया जाए तो ज्‍यादा सही होगा। स्‍वयं चहुंमुखी सुविधा, सुरक्षा में जीवनयापन करते हुए मात्र अपनी रुचियों के लिए धन बल के दम पर वन्‍यजीव प्रदर्शन का स्‍वांग अब बन्‍द होना चाहिए। यदि ऐसे लोगों को गरीब लोगों के जीवन मूल्‍य पर अपना यह शौक बनाए रखना है और इसके लिए प्रभावित लोगों को कानून का डर दिखा कर उन्‍हें अपनी सुरक्षा के लिए खूंखार जानवरों को नहीं मारने के राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय खोखले संदेश प्रदर्शित करते रहना है तो यह अब सहनयोग्‍य नहीं है। गुलदार द्वारा मारे गए बच्‍चों, बड़ों, मवेसियों को लेकर स्‍थानीय निवासियों की आंखों में व्‍यवस्‍था के कुप्रबन्‍धन के प्रति जो जलते अंगारे मैंने देखे हैं अगर वे आग बन गए तो बहुत कठिन स्थितियां उत्‍पन्‍न हो जाएंगी। यह तो विचारणीय है ही कि आदमी की कीमत पर गुलदार जैसे आदमखोर की चिंता निरर्थक है। इसके कोई सामाजिक, पर्यावरणीय मायने नहीं हैं।

17 comments:

  1. जंगल की सीमायें टूट रही हैं, दोनों ओर से।

    ReplyDelete
  2. मनुष्य ने इनका पर्यावास छीना -अब भुगते भी!

    ReplyDelete
  3. जिन्‍होंने छीना है, वो तो ऐश कर रहे हैं। शिकार तो निर्दोष और प्रकृति के असली पालक हो रहे हैं।

    ReplyDelete
  4. इस विषय पर मेरे पास कहने के लिए इतना कुछ है कि एक कमेंट बॉक्स में सब कह पाना संभव ही नहीं इसलिए आप मेरे कमेंट के रूप में यह पढ़िये :)
    http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/2011/09/blog-post_21.html

    ReplyDelete
  5. नमस्कार
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (10-06-2013) के :चर्चा मंच 1271 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

    ReplyDelete
  6. नमस्कार
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (10-06-2013) के :चर्चा मंच 1271 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

    ReplyDelete
  7. जिन कर्मचारियों को जागने की ज़रुरत है वो सो रहे है. वो जग जायें तो सबकी ज़िन्दगी सलामत रहे.

    ReplyDelete
  8. ये तो बहुत बुरा हो रहा है सरकार को समुचित व्यवस्था करनी चाहिए लेकिन सुनता कौन है सब सत्ता के मद्द में सोये हैं .सही कहा आदमी की जान की कीमत पर बाघ की चिंता निरर्थक है.

    ReplyDelete
  9. आलेख सुंदर है पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आदमी भी जानवर ही है। आदमी का प्रकृति में अनावश्यक हस्तक्षेप हुआ और रोज नव-नवीन समस्याएं निर्माण हुई, हो रही है। नुकसासन तो उठाना पडेगा, एक मुश्किल का सफाया किया कि दूसरी खडी। प्रकृति पर उसके हमले बहुत बूरे दिन दिखाने वाले हैं।

    ReplyDelete
  10. वन्यजीव संरक्षण के नाम पर मानव जीवन की बलि किसी तरह उचित नहीं..दोनों के बीच एक संतुलन की आवश्यकता है...

    ReplyDelete
  11. अति संवेदनशील मुद्दा है पर हम जानते हैं कि किसी के कानों तक नहीं जाने वाली जब तक कोई बड़ा आन्दोलन न हो .

    ReplyDelete
  12. इन्सान ने हर जगह अनाधिकृत प्रवेश किया है ... मूक, निरीह पेड़ पौधे जंगल सभी को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया है ...

    ReplyDelete
  13. इंसान ने जंगलों मे घुसने की ठान ली तो फिर भला जंगली जानवर कैसे पीछे रह सकते हैं। अदला बदली तो होनी ही थी। अब इंसान जंगली बनेगा और जंगली जानवर इंसान बनने की और अग्रसर होंगे :) , सार्थक लेख

    ReplyDelete
  14. वन्य जीव संरक्षण के मायने----
    इस सन्दर्भ में सार्थक और विचारपरक आलेख
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

    आग्रह है- पापा ---------

    ReplyDelete
  15. यह तो विचारणीय है ही कि आदमी की कीमत पर गुलदार जैसे आदमखोर की चिंता निरर्थक है। इसके कोई सामाजिक, पर्यावरणीय मायने नहीं हैं।
    at Sunday, June 09, 2013

    अरे भाई मानव संरक्षण भी तो होना चाहिए पर्यावरण खोरों पहले आग लगा दी जंगल को ,वन माफिया ने , बाघ को भागना ही था माफिया तंत्र में मानव भक्षी बनने .ढकोसला है यह पर्यावरण चेतना जिसके केंद्र में मनुष्य नहीं है बाघ है वह तो संसद और सदनों में ही बहुत हैं .ॐ शान्ति .ठीक हूँ भिया साहब इन दिनों कैंटन (मिशिगन )में हूँ नवम्बर २० १ ३ तक यहीं हूँ .आपका शुक्रिया आपने चिंता जतलाई हमारी सेहत के प्रति अपना पन बांटा .ॐ शान्ति .

    ReplyDelete
  16. प्रकृति में हस्तक्षेप का परिणाम ही हमें उत्तराखंड में देखने को मिल रहा है....

    ReplyDelete