Friday, June 28, 2013

मेरा प्रियमित्र बेलवृक्ष



(३० मई, २०१३ का संस्‍मरण)
पिछले सोलह दिनों से लगातार कार्यालय जा रहा था। साथी छु‍टिट्यों में अपने गांव गया हुआ था इसलिए मुझे अपने दो साप्‍ताहिक अवकाशों पर भी कार्यालय जाना पड़ा। इतने दिनों तक अपने निवास के आसपास की प्रकृति, खासकर दोपहरी परिवेश से मिलने, उससे वार्ता करने का मौका नहीं मिल पाया। आज 30 मई, 2013 बृहस्‍पतिवार के दिन मैं अपने तृतीय तल के कमरे से दोपहर बारह बजे से सायं पांच बजे के क्षणों को इकट्ठा कर लिख रहा हूँ। भारतीय भूखण्‍ड की पर्वतमालाओं में विगत एक-दो दिन में जितनी भी वर्षा हुई, उसके प्रताप से यह शहर भी चमक उठा है। बेशक गर्मी है, लोग घरों में कैद हैं लेकिन मैं तो जैसे अपने घर के सामने खड़े बेलवृक्ष की बांहों में पड़ा हुआ हूँ। कमरे की खिड़की से पांच हाथ की दूरी पर धीमे-धीमे हिलता, हरियाली से पूर्ण बेलवृक्ष इन दिनों मेरा सबसे अच्‍छा मित्र बना हुआ है। मैं इसी के साथ अपने मन की बात करता हूँ। सुबह उठ कर अपनी हथेलियों को देखने के बाद इसी के दर्शन, दोनों हाथ जोड़ कर इसे प्रणाम करता हूँ। इसमें शिवत्‍व ढूंढता हुआ स्‍वयं को शक्तिशाली बनाने की कामना करता हूँ। बेल की भूरी ट‍हनियां, इन पर खिले घने हरे पत्‍ते, पत्‍तों के झुरमुट में अंकुरित छोटे-छोटे दाने देख कर मन में उत्‍पन्‍न नए भाव-विचार मेरे अस्तित्‍व का ननिर्माण करते हैं। मैं बेलवृक्ष की ओर जितना एकाग्र होता हूँ यह उतनी ही तेजी से झूमने लगता है। …….सर सर सर सरासर सरसराहट जैसी ध्‍वनियां मेरे कानों में प्रवेश करती हैं तो लगता है कि जीवन में जो कुछ, जैसा सुनना चाहता हूँ वही सुन रहा हूँ। तेज हवा से हिलता पूरा बेलवृक्ष जैसे मेरा आलिंगन पाने को व्‍यग्र हो उठता है।
अभी कुछ दिन पहले की बात है। वृक्ष के बीच से गुजरनेवाली बिजली, केबल, टेलीफोन की तारों के खराब होने के कारण किसी ने उद्यान विभाग में इसकी शिकायत कर दी। विभाग का कर्मचारी बेल के पेड़ की उन शाखाओं को काट कर अलग कर गया जिनमें तारें फंस रही थीं। उसके ऐसा करने से पहले मैंने उसे मना किया। उसे पेड़ के एक भी पत्‍ते को हाथ लगाने से रोका। उस निर्दयी ने अपने साहब की ओर उंगली से इशारा किया और पेड़ के पत्‍तों, तनों, शाखाओं पर भारी दराती से निर्मम प्रहार करने लगा। लगा जैसे यह मेरे शरीर को ही काट रहा है। खाना छोड़ इस सारे उपक्रम में शामिल देख पत्‍नी ने मुझे डांट पिला दी। पेड़ काट रहा आदमी और कटते हुए पेड़ को देखने एकत्रित लोग मुझे जल्‍लाद नजर आने लगे। उन्‍होंने मेरी मन:स्थिति का तनिक भी सम्‍मान नहीं किया। मैं अपने मित्र बेलवृक्ष के लिए कुछ कर पाता, इससे पहले ही इसकी उत्‍तर दिशा की पांच-छह बड़ी शाखाएं कट कर सड़क पर बिछ चुकी थीं। उनमें लगे हुए पवित्र, पके बेलों का भी तिरस्‍कार हुआ। वे पच्‍चीस-तीस फुट की ऊंचाई से गिर कर फट के बिखर गए। मनुष्‍य के हाथों मनुष्‍य के लिए अमृत समान पदार्थ की ऐसी दुर्गति देख कर मन रो पड़ा, मुंह सूख गया। यह सोच कर खुद को तसल्‍ली दी कि जिनका पेड़ है वही तो इसको कटवा रहे हैं। मेरे स्‍वामित्‍व में यह है नहीं, मैं किस आधार पर इसको कटने से बचाऊं।
आज वह दिन याद करता हूँ तो डर जाता हूँ। सोचता हूँ काश इस पेड़ को कोई छेड़ता भी नहीं तो कितना अच्‍छा होता! आज इसके हरे पत्‍तों की झुरमुटों से स्‍वच्‍छ नीले आसमान को देखने पर जीवन नई शक्ति, ऊर्जा, तरुणाई से आच्‍छादित हो जाता हैबेलवृक्ष के अनुभव से प्रभावित जेठ की चटक, पीली धूप भी सहज, सुखद व जीवंत लगने लगती है। पड़ोस के बन्‍द घर के दरवाजे पर ऊपर की ओर टंगी आम के सूखे पत्‍तों की माला बेलवृक्ष की हवा से नई, ताजा प्रतीत होती है। यह समय मुझे फाल्गुन का अनुभव करा रहा है। धन्‍य है यह बेलवृक्ष, प्रजाति जिसने मुझे जीवन का एक नवीन अनुसार, विपुल विचार दिया। यहां-वहां, सड़क, घरों पर फैली इसकी झूमती परछाइयां केवल परछाइयां ही नहीं हैं। ये वृक्ष का आर्शीवाद, प्रसाद हैंजहां ये फैल रही हैं वो स्‍थान कितना पवित्र बन जाता! जिको ये प्राप्‍त हो रही हैं, वे प्राणी बहुत बड़े धन्‍यभागी बन रहे हैं। तितलियां, मधुमक्खियां, चिड़ियों के झुण्‍ड इस पर मंडराने के लिए जैसे आरक्षण प‍द्वति से होकर आते हैं। क्‍योंकि किसी दिन तो मैं इस पर कीट-पतंगों, पक्षियों की बहुत भीड़ देखता हूँ और कभी इसे बिलकुल पक्षी, पखेरु विहीन। एक दिन इस पर श्‍वेत तितलियों का बसेरा होता है तो दूसरी सुबह छोटी काली मधुमक्खियां इसके चारों ओर घूमती नजर आती हैं।
बहुत इच्‍छा होती है कि रोज ही बेल का जूस पियूं, मुरब्‍बा खाऊं। पत्‍नी को कहता हूँ कि कोई बेल बेचनेवाला आए तो दस-बारह किलो एक साथ ले कर रख दो। पत्‍नी कहती है, जब से हमने इकट्ठे इतने बेल खरीदने का विचार बनाया है तब से कोई बेलवाला नजर ही नहीं आया। मण्‍डी में बेल के दाम सुन कर कान झड़ जाते हैं। सौ-सवा सौ रुपए किलो के बेल कौन खरीदेगा। बस इसी तरह समय गुजर जाएगा और मन-शरीर बिना बेल का जूस, मुरब्‍बा के ऐसे ही मायूस पड़े रहेंगे। पत्‍नी से बच कर सोचता हूँ कि मुझे नजर तो आए कार्यालय आते-जाते समय कहीं कोई बेलवाला, हजार रुपए किलो ही क्‍यों न बेच रहा हो तब भी ले लूंगा। पर बात वही है ना कि पहले नजर तो आए कोई कहीं।

22 comments:

  1. मैंने महसूस किया है यदि आप प्रकृति को अपना मानो तो वह भी आपको अपना बनाकर चलने लगती है और पेड़ पौधे भी आपसे बाते करने लगते हैं इन दिनों मेरी भी दोस्ती मेरी घर के आँगन में लगे गुलाब के एक पौधे से चल रही है मैंने उस पर आधारित एक कविता भी लिखी थी आप भी पढ़ें।
    http://aapki-pasand.blogspot.co.uk/2013/06/blog-post_11.html

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  2. बेलवृक्ष पर आपकी संवेदनापूर्ण सुंदर रचना !!

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  3. एक वृक्ष के लिये ऐसा ममत्त्व एक संवेदनामय उज्ज्वल हदय का परिचायक है । काश वृक्षों के प्रति ऐसा मोह सबको होता । बेल वृक्ष के प्रति लोगों का झुाव तो होता है पर उसे नोंचन-खसूट कर भगवान शिव को रिझाने के लिये ही । सावन के महीने में और महाशिवरात्रि पर बेचारे पेड की हालत खराब होजाती है और मन्दिरों में गाडी भर-भर कर बेल के पत्ते फेंके जाते हैं । पेडों को धार्मिकता से जोडने का उद्देश्य उनकी रक्षा करना था उन्हें उजाडना नही ।सुन्दर संस्मरण ।
    विकेश जी जब तक आप घर में तैयार नही करवा पा रहे तब तक बेल का मुरब्बा बना बनाया भी लिया जासकता है । मुझे तो पतंजलि का काफी अच्छा लगा ।

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  4. आपका लिखा हुआ अच्छा लगा पढ़कर लेकिन दुःख हुआ ये जानकर आपके प्रिय बेल वृक्ष के साथ ऐसा हुआ.बेल से बचपन की यादें जुड़ी हैं. कई बार हाथ छलनी हुए थे मेरे. लगता है आपको मेरे गाँव आना होगा. मेरे खेत के इर्द-गिर्द के कई सारे बेल वृक्ष हैं. बचपन में पूरी गर्मियों के दौरान हर रोज बेल उत्सव जैसा ही होता था हमारे घर. बाबूजी को बेल से विशेष लगाव है.

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  5. प्राकृतिक संसाधनों का स्वामित्व किसका हो..प्रकृति का। किसी का व्यक्तिगत अधिकार कैसे हो सकता है भला?

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  6. यही तो बात है, इस धरा का इंसान सिर्फ अपने जीने के लिए किसी की भी कुर्बानी लेने से नहीं हिचकता।

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  7. ...गाँव का रहना,खाना सब अच्छा है और दुर्लभ भी !

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  8. विकेश जी इंसान मूलतः प्रकृति की उपज है और उसका झुकाव भी उसकी ओर होता है। जहां पकृति पर अत्याचार के दृश्य दिखाई देते हैं वहां अपनी आत्मा पर हजारों खरोचे उठने लगती है। आपका चिंतित होना बेल के माध्यम से पेड-पौधों के बारे में सहृदयता को दिखाता है।

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  9. प्राकृति से जुड़ाव सहज है इन्सान का ... पर फिर भी इन्सान की भूख उसे जीवित नहीं रहने देती ... बहुत संवेदनशील पोस्ट है ...

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  10. काश हर किसी को प्रकृति से ऐसा ही लगाव होता...

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  11. काश प्रकृति के प्रति यह संवेदनशीलता सभी के मन में होती...अंतस को छूती बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..

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  12. बहुत सुन्दर लेखन .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (01.07.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी. कृपया पधारें .

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  13. मैं बेलवृक्ष की ओर जितना एकाग्र होता हूँ यह उतनी ही तेजी से झूमने लगता है। …….सर सर सर सरासर सरसराहट जैसी ध्‍वनियां मेरे कानों में प्रवेश करती हैं तो लगता है कि जीवन में जो कुछ, जैसा सुनना चाहता हूँ वही सुन रहा हूँ। तेज हवा से हिलता पूरा बेलवृक्ष जैसे मेरा आलिंगन पाने को व्‍यग्र हो उठता है।


    मानवीकरण किया है वृक्ष का बिल्व में और इसी के मार्फ़त उत्तराखंड क्यों घटा चुपके से आपने बता दिया है .

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  14. प्रकृति और हम एक दुसरे से जुड़े हुए हैं, बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुती।

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  15. हमारे परिवेश से लेकर पहाड़ों तक यही किया है हमने ..... प्रकृति ने चेताया भी है कई बार पर हम असंवेदनशील हो चले हैं

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  16. नहीं लगता कि हम अपने विरासत में ये मित्रता छोड़ पायेंगे..

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  17. बहुत सुन्दर | बेलवृक्ष आज धन्य हो गया होता यदि यह रचना स्वयं पढ़ लेता |

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  18. बहुत सुन्दर | बेलवृक्ष आज धन्य हो गया होता यदि यह रचना स्वयं पढ़ लेता |

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  19. बेल और हरसिंगार मेरे घर में भी सदा रहे.कहीं भी देखूँ दोनों बड़े अपने-से लगते हैं.
    पता नहीं लोग वृक्षों की कदर क्यों नहीं करते!

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  20. वाह दोस्त बिल्व (बेल पत्र/वृक्ष )की आड़ लेके सब कह गए ,

    बेशुमार उनको लताड़ दे गए .

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  21. हमारे संस्कारों में बेल वृक्ष आध्यात्म का प्रतीक है
    सावन में तो बेल पत्री शंकर जी को ढांक देती है
    स्वास्थ लाभ भी देता है बेल, गर्मी में शरबत
    बहुत संवेदना के साथ लिखा है भाई जी
    सार्थक और सुंदर
    सादर

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  22. माई बिग गाइड पर सज गयी 100 वीं पोस्‍ट, बिना आपके सहयोग के सम्‍भव नहीं थी, मै आपके सहयोग, आपके समर्थन, आपके साइट आगमन, आपके द्वारा की गयी उत्‍साह वर्धक टिप्‍पणीयों, तथा मेरी साधारण पोस्‍टों व टिप्‍पणियों को अपने असाधारण ब्‍लाग पर स्‍थान देने के लिये आपका हार्दिक अभिनन्‍दन करता हॅू और आशा करता हॅू कि आपका सहयोग इसी प्रकार मुझे मिलता रहेगा, एक बार फिर ब्‍लाग पर आपके पुन आगमन की प्रतीक्षा में - माइ बिग गाइड और मैं

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