Wednesday, June 26, 2013

मृतकों की बेकद्री



दस जून से देहरादून, कोटद्वार होते हुए सतपुली एकेश्‍वर पौड़ी गढ़वाल अपने गांव गया हुआ था। इस बीच 16 17 18 जून को जो हुआ उस पर और गढ़वाल के हालातों पर शायद मेरे पास फुर्सत में लिखने के लिए अभी कुछ नहीं है। अभी हतप्रभता हावी है। तब तक अपने मन का हाल नीचे के शब्दों के अनुसार प्रस्‍तुत है:  
स्‍तु विनिमय के माध्‍यम मुद्रा यानी रुपए को जब साधन के बजाय साध्‍य मान लिया गया हो, जीवन की क्षुद्र सच्‍चाइयों व पीड़ांतक अनुभवों से नहीं गुजरे सत्‍ताधारकों को सुख-सुविधाओं वाले अपने सिद्धांत सब से उचित लगते हों तो ऐसी जीवन परिस्थितियों में केदारनाथ मन्दिर के प्राकृतिक ध्‍वस्‍तीकरण को संवेदनशील मनुष्‍य अप्रत्‍याशित नहीं मान सकता।
हजारों लोगों, अनेक भवन व घर, होटल व सराय जब पांच मीटर वृत्‍ताकार की वर्षा जलधार की चपेट में आए होंगे, जब इतनी विस्‍तृत और अति गतिमान जलधार से बड़ेबड़े पर्वत शिलाखण्‍ड टूटटूट कर गिरे होंगे तो केदारनाथ परिसर और इसका बीस एक किलोमीटर का परिक्षेत्र कैसी साक्षात् प्रलय झेल रहा होगा! एक क्षेत्र का जीवन तो इस प्रलय से समाप्‍त ही हो गया है। अनहोनी के व्‍यतीत होने के बाद केदारनाथ और गढ़वाल की भौगोलिक और पर्यावरणीय व्‍याख्‍या सुलटा रहे सुविधाभोगियों, तथाकथित वैज्ञानिकों के लिए ईश्‍वर या कहें प्रकृति की ओर से यह एक छोटी सी चेतावनी मात्र है कि अब भी सुधर जाओ। किसी देश विशेष को चलाने के लिए आज के शासकों से पहले भी शासक हुए हैं। तो आज के ये शासक ऐसा क्‍यों समझ रहे हैं कि विकास के नाम पर जो कुछ वे कर रहे हैं सब ठीक है। ऐसा अन्‍धा, सस्‍ती लो‍कप्रियता को समर्पित विकास आखिर क्‍यों और किसके लिए हो रहा है। आज केदारखण्‍ड बर्बाद हुआ है। कल दिल्‍ली और बाद में पूरा देश बर्बाद हो जाएगा तो क्‍या विकास श्‍मशान की खामोशी के लिए किया जा रहा है। आखिर विकास को देखने के लिए कोई तो जीवित होना चाहिए। और जब कोई जीवित ही नहीं बचेगा तो किसी भी वैकासिक गतिविधि के क्‍या मायने।
जब एक छोटी चेतावनी को हमारा विवेक अनहोनी मान बैठा है तो निरन्‍तर हो रहे प्रकृति के अनादर के बड़े दण्‍ड के रुप में भगवान न जाने हमें क्‍या दिखाएगा! या फिर ऐसे दण्‍ड के घटित होने पर शायद हममें से कोई इसकी व्‍याख्‍यावर्णन करने को जीवित ही न बचे! बचपन में सोचता था कि यदि पृथ्‍वी, जल, जंगल, हवा, पानी कुछ भी नहीं होता तो क्‍या होता! खुद से पूछे गए इस गूढ़ प्रश्‍न का हल भी मेरा विवेक ही देता था कि कुछ न होता तो घोर, गहरा अन्‍धकार होता। रात में अन्‍धकार दिन में भी अन्‍धकार होता। इसकी कल्‍पना मात्र से मस्‍तक पर पसीने की बूंदें उभर आतीं थीं। काश मेरा यह विचार, अनुभव हमारे सत्‍ता प्रतिष्‍ठापक, आधुनिक विकास के लिए हमारे प्रतिष्‍ठापकों को भड़काने वाले दुनिया के चौधरी समझ पाते तो कितना अच्‍छा होता!
दूसरी ओर सेना के जवान क्‍याक्‍या झेलेंगे। प्राकृतिक आपदा में फंसे पीड़ितों को बचाने के लिए तनमनधन से समर्पित सेना नायकों की अपनी टुकड़ी पर जब श्रीनगर में आंतकी आक्रमण हुआ तो मेरा मन देश की सरकारी विडंबना पर खूनी आंसू बहाने लगा। अतिवृष्टि से लोग मर रहे हैं। सेना उन्‍हें बचा रही है। सेना आंतकियों से भी लड़ रही है। आंतकियों से उन्‍हें खुल के लड़ने नहीं दिया जा रहा है। परिणामस्‍वरुप उन्‍हें अपनी कीमती जानें गंवानी पड़ रही हैं। आंतकी संगठन और घटना के लिए उनकी जिम्‍मेदारी लेने की बात से मन में विचित्र विरोध लहराने लगता है। लोगों के मरने, जवानों के बलिदान पर झूठा रोना कब तक चलता रहेगा। मौतों पर हो रही तुच्‍छ देशी-विदेशी नीतियों पर थूकने का ही मन करता है। मृतकों की ऐसी बेकद्री की भरपाई क्‍या किसी चीज से हो सकती है।
 



20 comments:

  1. आपका दर्द और आक्रोश साफ़ नज़र आता है आपकी लेखनी में ... उतराखंड में जो हुआ और फिर उसके बाद और आज तक भी नेताओं के खेल .. सब कुछ मिला कर बेबस सी स्थिति बना रहे हैं ... कुछ भी न कर पाने की हाताश स्थिति ...

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  2. प्रकृति के साथ खिलवाड़ का अंजाम है उत्तराखंड में आई आपदा... अगर समय रहते हम नहीं सुधरे तो कोई लायक नहीं रहेंगे....आपने बढ़िया लिखा..

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  3. क्या करे, बहुत सोचते है हालात पर, और फिर क्रोध के घूँट पीकर रह जाते है। आम इंसान के पास कोई चारा ही नहीं, वो सैनिक इन राक्षसों से लड़ते शहीद हो गए और उनमे से एक की विधवा ने पश्चिम बंगाल में आज आत्महत्या कर ली।

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  4. शवदाह के लिये लकडी व सामग्री लेजाने वाला हैलीकाप्टर के दुर्घटना ग्रस्त होने का समाचार भी कम हृदय-विदारक नही है । देश के जवानों को इस तरह राजनीति की रस्साकसी में जान गँवानी पडे इससे बडी बिडम्बना क्या होगी । यह आपदा पीडादायी तो है ही विकास के नाम पर एक तमाचा है । और छेडो पहाडों को, नदियों को.भूगर्भ को ..। लेकिन सजा उन्हें मिली जो अपराधी थे ही नही ।

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  5. यह प्रकृति की एक चेतावनी ही है
    देश के जवानों को दिल से नमन
    सार्थक प्रस्तुति









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  6. विकेश जी आप का दर्द हिन्दुस्तान का दर्द बनके उभरा है .जब पञ्च भूत ,हवा ,पानी ,मिटटी ,आकाश अग्नि अपनी तात्विकता खो देते हैं तब ऐसा अनर्थ होना ही है .ये दुनिया पुरानी अब गई के तब गई .नव निर्माण होना ही होना है .चर्च के इन एजेंटों को भी अब जाना ही जाना है .लोग अभी से मोदी से डरने लगें हैं .कई तो मोदी फोबिया से ग्रस्त भी हो चुकें हैं .

    उत्तराखंड में भी मोदी को बदनाम किया जा रहा है जबकि देश पर जब भी आपदा आती है कभी गृह मंत्री नदारद (छतीसगढ़ नक्सली हमला )होता है कभी कांग्रेसी राजकुमार .एक विदेश में आँखें दिखाने जाता है दूसरा गर्ल फ्रेंड के साथ जन्म दिन मनाने .डूबता है उत्तराखंड तो डूबे .

    हम जला दूकान बैठे ,हाट की बातें न कर ,

    डूबने वाले से पगले घाट की बातें न कर .

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  7. प्रकृति के इस भयानक त्रासदी पर निशब्द हैं.. सेना के नायको को सलाम .....!!

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  8. प्रकृति के इस भयानक त्रासदी पर निशब्द हैं.. सेना के नायको को सलाम .....!!

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  9. प्रशासन की अक्षमताओं के चलते सेना और सैनिक बड़े दवाब मे हैं। सीमा पर जवाब देने का आदेश नहीं है और सीमा के अंदर का काम कभी समाप्त होने वाला नहीं है। ...

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  10. प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने वालों के लिए एक चेतावनी, अगर वे अब भी सुनें तो...हरेक मोर्चे पर अपनी जान संकट में डाल कर मुकाबला करने वाले जवानों को नमन...बहुत सार्थक आलेख...

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  11. कितना ही मन की भड़ास निकाल्लो होने जाने वाला कुछ नहीं है। क्यूंकि प्रशासान चिकना घड़ा है। लेकिन इसमें सारी गलती केवल प्रशासन कि नहीं है। इस आपदा के लिए कोई एक समहू या व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
    बल्कि इस आपदा के लिए मेरी नज़र में सम्पूर्ण मानव जाति जिम्मेदार है क्यूंकि प्रकृति के साथ खिलवाड़ सभी ने किया है। फिर चाहे वो आम इंसान हो या सरकार...ऐसे में प्रकृति का प्रकोप जाईज़ है।
    "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत"

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  12. सही कहा आपने...दिवंगत सभी आत्माओं को श्रद्धांजलि और प्रभावित लोग पुनः सामान्य जीवन जी सकें, ऐसी कामना के साथ-साथ देश के उन वीर जवानों को सैल्यूट……जिनकी वजह से आज हजारों लोग जिन्दा हैं ।

    @मानवता अब तार-तार है

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  13. समसामयिक सार्थक लेखा जोखा दिया आपने | बढ़िया मार्मिक लेख |

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  14. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन हर बार सेना के योगदान पर ही सवाल क्यों - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  15. प्राकृतिक आपदाओं पर तो किसी का बस नहीं है लेकिन जिस तरह का विनाश इस बार देखा गया वो बहुत कम हो सकता था नदी के मार्ग में इस तरह अंधाधुंध भवन निर्माण त्रासदी को चुनौती दे ही रहा था. एक ओर त्रासदी और दूसरी तरफ नेताओं का अगले साल के चुनाव को देखते हुए सियारी रूप. बढ़िया लिखा है.

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  16. ये सब देख कर बस खून खौलता रहता है ..

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  17. यह सब बेहद दुखद है | मैं मौन ही रहूँगा इस पर |

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  18. कैसे मिल पाएंगे ?जो लोग,खो गए घर से,
    मां को,समझाने में ही,उम्र गुज़र जायेंगी !

    बहुत गुमान था,नदियों को बांधते, मानव
    केदार ऐ खौफ में ही, उम्र, गुज़र जायेगी !

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  19. इसकी कल्‍पना मात्र से मस्‍तक पर पसीने की बूंदें उभर आतीं थीं।

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