Saturday, June 1, 2013

इस समय जो दिमाग में आया, वो बाहर निकाला


र्तमान को पकड़नेवाले कहते हैं बीती बातों-घटनाओं को थाम कर क्‍या करना। कब तक उन्‍हें याद रखें, उन पर बात करें, उन्‍हें रोने-धोने का विषय बनाएं। आज मैं आप लोगों को अगस्‍त २०११ के अन्‍ना आंदोलन, रामलीला मैदान दिल्‍ली का नजारा याद कराऊं। मैं स्‍वयं यहां एक दो दिन उपस्थित था। लोगों के नारे, आक्रोश, राष्‍ट्र भावना देख कर सहसा किसी को भी यकीन नहीं हो सकता था कि इससे पहले भी कुछ इस तरह रहा होगा या इसके बाद भी कुछ ऐसा होगा। बदलाव की तैयारी में भिंची मुटि्ठयां हवा में लहरा रही थीं। राष्‍ट्रभक्ति से ओतप्रोत नारों-गीतों-भजनों की आवाज कानों में पड़ती तो मानो हर नौजवान खुद को शहीद भगत सिंह, चन्‍द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्‍द्र बोस समझने लगता और हरेक नवयुवती स्‍वयं को रानी लक्ष्‍मी बाई मानने लगती। हजारों-लाखों की भीड़ के हाथों में लहराते तिरंगे झण्‍डे जब आसमान की ओर हवा में एक साथ उड़ते थे तो स्‍वतन्‍त्रता संग्राम के दौर का अनुभव जैसे सभी एकत्रित देशभक्‍तों में जोर मारने लगता। उस समय निश्चित रुप से कोई भी महसूस कर सकता था कि अब देश में परिवर्तन होकर रहेगा। इसके बाद एक वर्ष बीता। आंदोलन, देशभक्ति, राष्‍ट्रीय एकता को लकवा मार गया। मुंबई में अनशन करने बैठे अन्‍ना के साथ बहुत कम लोग एकत्रित हुए और अनशन को बीच में छोड़ने का निर्णय कर लिया गया। बीते दिसंबर में बसंत विहार दिल्‍ली की घटना ने जिस तरह से युवाओं को व्‍यवस्‍था की अकर्मण्‍यता के प्रति एकत्रित किया और इस एकता ने जिस नए स्‍वत:स्‍फूर्त कहे जानेवाले आंदोलन के रुप में अपनी पहचान बनाई, वह भी धीरे-धीरे समय की गर्द में मिलने के लिए मुड़ गया। गांधी नगर दिल्‍ली में बच्‍ची के साथ हुई दुर्घटना ने एक बार फिर उम्‍मीद जगाई कि लोग समाज के गलत कार्यों और इनकी सरकारी अनदेखी से परेशान हो कर सड़कों पर उतरने लगे हैं।
     लेकिन वही हुआ, उन्‍हीं के मन का हुआ जो कहते हैं कि बीती बिसार दे, आगे देख। कुछ दिन अपने मीडिया ने दिल्‍ली के अपराधियों पर हो रही अदालती कार्रवाईयों की सूचना दी। बन्‍द कमरों में हो रही सुनवाई की भी कवरेज की। पर अब सब कुछ शांत है। आईपीएल में साल के डेढ़ महीने झोंकने के बाद लोगों, मीडिया, सरकार को शायद अब फुर्सत मिलेगी और अधर में अटके पड़े उन कामों पर ध्‍यान लगाएंगे, जिनके बारे में पिछले दो-तीन साल से देश में धरने-प्रदर्शन-आंदोलन हो रहे हैं। नक्‍सल गतिविधियां जब तक जवानों, लोगों, नक्‍सलियों की जानें ले रही थीं तब तक यह सामान्‍य बात थी। कांग्रेसी नेताओं पर हुए नक्‍सली हमले ने इसे प्रमुख मुद्दा बना दिया। तथाकथित इसे देश की संप्रुभता पर खतरा, लोकतन्‍त्र की आस्‍था पर कलंक कहते हुए थक नहीं रहे हैं। शायद कुछ दिन बाद इसे भी भुला दिया जाएगा। क्‍योंकि आनेवाले बरसात के मौसम में मीडिया जल-प्‍लावन से होनेवाली जनसमस्‍याओं पर केन्द्रित होगा। बरसाती कहर से उत्‍पन्‍न समस्‍याओं पर सरकारी अव्‍यवस्‍थाओं का रोना रोया जाएगा। क्‍या पता इस बीच देश में कहीं किसी कोने में एकाध बम विस्‍फोट हो जाएंफिर लोगों का ध्‍यान उधर भटक जाए। नकली खाने, संस्‍कृति, जीवन ने हमारी स्‍मृतियों को इतना कुन्‍द कर दिया है कि हमें आस पास की जरुरतों के सिवाय अन्‍य अनुभव, विचार या काम गहरे नहीं लगता। इसी का परिणाम है कि एक के बाद एक हो रही सामाजिक विसंगतियों, विभीषिकाओं पर दिन गुजर जाने पर हमारा ध्‍यान-प्रभाव जाता रहता है और राज करनेवाले, तंत्र चालक कुछ भी नया और ठोस करे बिना समय काट रहे हैं। सही कहते हैं कहनेवाले बीती बिसार, आज में जी। अपने को देख और भरपूर जी। धन्‍य है मेरे कलियुगी मानव तू। तेरे स्‍वार्थ को प्रणाम।

13 comments:

  1. लोग सब भूल जाते हैं, यह बात जितनी हम समझते हैं, उतनी ही राजनेता भी समझते हैं।

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  2. विकेश जी ,आपने फिर एक गंभीर विषय पर चिन्ता व्यक्त की है । छोडो, जाने दो, ज्यादा मत सोचो, पॅाजिटिव थिंकिंग रखो ..जैसे जुमलों ने ,तमाम तथाकथित आध्यात्मवादी सुधारकों ने क्रान्ति का जज्बा ही खत्म कर दिया है । धारा के साथ बहने की और सुविधा भोगी प्रवृत्ति ने सुधार व परिवर्तन के रास्ते ही बन्द कर दिये हैं । मनोरंजन ने अखबार और टीवी पर जबरदस्त अधिकार जमा रखा है । दर्दनिवारक गोली के रूप में प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करते रहते हैं । अखबार केवल सुर्खियों पर नजर रखते हैं और टीवी पर कार,बँगला और सोफा संस्कृति का ही राज है । सही मायनों में जो राष्ट्र निर्माता हैं वे पार्श्व में चले गए हैं ऐसे में जो देश के लिये सोचते हैं उनकी पीडा कौन सुनता है । बहुत ही सार्थक पठनीय आलेख ।

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  3. हमेशा तो यही होता है.... अन्ना आन्दोलन के समय और भी कितने बार लगा अब तो परिवर्तन हो के रहेगा.. लेकिन कुछ भी नहीं हुआ सब बेकार अच्छी आलेख...

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  4. हमेशा तो यही होता है.... अन्ना आन्दोलन के समय और भी कितने बार लगा अब तो परिवर्तन हो के रहेगा.. लेकिन कुछ भी नहीं हुआ सब बेकार अच्छी आलेख...

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  5. होता तो यही आया है इस देश के आंदोलनों की यही परिणिति है
    सार्थक और सटीक बात कही है
    आप तो कमाल की खोज बीन करते हैं
    बधाई

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  6. बहुत खूब सटीक लेख लिखा विकेश भाई | आभार

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  7. Sahee baat kahee aapne . Ham Hindustaniyon ko yah beemaari kuchh jyaadaa hee lagee hui hai.

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  8. परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है.... आज की अराजक स्थिति के लिए हम सब भी जिम्मेवार हैं .. हम इससे बच नहीं सकते...अन्ना के आन्दोलन का ये मतलब कतई नहीं है कि आन्दोलन खत्म होते ही राम राज्य आ जाएगा...

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  9. जानते सभी हैं हम भी और राजनेता भी, मगर जानकर अंजान बन जाने के सिवा और आम इंसान के पास चारा ही किया है। विचारणीय आलेख

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  10. बहुत बढ़िया लिखा है आपने विकेश जी. जो बदलाव लाना भी चाहते है उनकी कोई सुनता नहीं. सब अपने में इतने मशगूल हैं.

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  11. सब और स्वार्थ का राज्य है...कुछ दिन आक्रोश उफनता है और फिर सब इतिहास बनकर रह जाता है...राजनीतिज्ञ इसी बात का फायदा उठा रहे हैं...

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  12. आपसे पूर्णत: सहमत .. हम सब हवा में जीतें है तो कोई भी जमीनी बदलाव कैसे होगा ?

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  13. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कभी तो आदमी बन जाओ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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