Saturday, May 18, 2013

मार्गदर्शन के खोखले आधार


यात्रा, समारोह की कार्यव्‍यस्‍तता के चलते दिनचर्या बदल गई। शारीरिक थकान यदि कष्‍ट ना भी देती पर नित नए प्रकार से विदूषित होते सामाजिक और पारिवारिक वातावरण ने मानसिक स्थिति को विक्षिप्‍त कर दिया है। स्‍वयं के अस्थिर व्‍यक्तित्‍व, क्षण में परिवर्तित होते मनोभावों से व्‍यावहारिक जीवन क्रम में बाधा उत्‍पन्‍न हो रही है। मन नहीं-नहीं कहता रह जाता है और मैं वे कार्य कर देता हूँ, जिनके अपराध-बोध से दिनों तक छुटकारा नहीं मिलता।
मुझे पता है कि प्राइवेट स्‍कूल पढ़ाई के नाम पर व्‍याव‍सायिक उपक्रम हैं। ये भी जानता हूँ कि किसी बच्‍चे को आदर्श व्‍यक्ति, सज्‍जन नागरिक बनाना इनके वश में नहीं। बालपन को समुचित प्रकार से ढालने में ये असक्षम हैं। तब भी पत्‍नी की महत्‍वाकांक्षा के अनुकूल साढ़े चार वर्षीय पुत्री के स्‍कूली प्रदर्शन में बढ़ोतरी नहीं होने पर मैं उसे डांट-डपट देता हूँ। यहां तक कि थप्‍पड़ भी मार देता हूँ और आंखों में परिवेश से मिली हुई असभ्‍यता, हिंसा उतार कर उसे उस सीमा तक डरा देता हूँ कि वह मासूम आंखें साधे, पलकों को तीव्रता से झपकाते हुए साक्षात पत्‍थर बने पिता को विचित्र अनुभव से देखती रहती है। पर उस बेचारी को क्‍या पता कि उसे डपटने के बाद पिता के अन्‍दर दया का ऐसा जलजला फूट पड़ा है कि वह उसमें बह ही जाए। ऐसे में उसके अत्‍यन्‍त मृदुलभावी मुख को अधिक समय तक देखने का साहस नहीं हो पाता। मैं ही अपनी दृष्टि इधर-उधर घुमा देता हूँ। और इस दौरान यदि वो क्षमा याचना करती है तो मैं और दूर हो जाता हूँ उसकी दृष्टि से। क्‍योंकि इसके बाद मुझे अपनी कठोरता पर विश्‍वास नहीं रहता। इसके उपरान्‍त मेरे टूट कर रोने की संभावनाएं अधिक होती हैं। हालांकि अभी तक ऐसे रोया तो नहीं हूँ और शायद तब ही मुझे बात-बात पर क्रोध भी आता है। क्‍योंकि खुली हंसी और खुल कर रोना हमेशा दबा ही रहा मेरा।
कई बार पत्‍नी को समझाया कि बच्‍ची पर इस आधुनिक खोखली पढ़ाई-लिखाई का दबाव मत डालो। उसे जो ग्राह्य होगा अपना लेगी। ध्‍यान इतना रखना है कि वह सांस्‍कारिक, सामाजिक और नैतिकता के पाठ से वंचित न रहे। आजकल के विद्यालय ये ज्ञान नहीं दे सकते। इस ज्ञान का संचार तो केवल बच्‍चे के अभिभावक ही कर सकते हैं। इसलिए उसके विसंगतियों में उलझने से पूर्व ही उसे सामाजिक व्‍यावहारिकता का पाठ, जितना शीघ्र हो सके पढ़ा दिया जाना चाहिए। इन सब परिस्थितियों में मेरे मस्तिष्‍क में बोर्डिंग विद्यालयों के चित्र भी उभरने लगते हैं। विचार उत्‍पन्न होता है कि पुत्री को वहां भेज दिया जाए। लेकिन तभी अन्‍य विचार उभरता है कि समाज और राष्‍ट्र के लिए क्‍या किया है इन आधुनिक शिक्षा प्राप्‍त, सत्‍ता प्रतिष्‍ठान में बैठे तथाकथितों ने। बड़े और कान्‍वेंट विद्यालयों से पढ़ लिख कर सर्वोच्‍च लोकतान्त्रिक संस्‍था एवं विभिन्‍न राजकीय संस्‍थाओं में शीर्षस्‍थ पदों पर विराजमान व्‍यक्तियों ने समाज को कौन सी दिशा दी है। आधुनिकता के पैरवी इन स्‍वार्थी तत्‍वों ने स्‍वाभाविक मनुष्‍य जीवन को इतना विकृत कर दिया है कि सज्‍जन व्‍यक्ति जीवन से छुटकारा पाने की मौन स्‍वीकृति दे चुके हैं। क्‍या मैं, मेरी पत्‍नी ऐसे आधुनिक परिवेश में वृद्धि करने के लिए ही अपनी पुत्री को विद्यालयी अध्‍ययन सही से करने के लिए डांटे-डपटें? क्‍या इसी ऊपरी चमक और भीतरी खोखलाहट के लिए हम उसे ए बी सी और क ख ग रटाएं? या उसे वह समझने व विचार करने योग्‍य बनाएं, जिस मिथ्‍या और विश्‍वासघात के आधार पर इस सदी की बुनावट की जा रही है।
प्रतिदिन हो रही आत्‍महत्‍याएं, हत्‍याएं, राह चलते होनेवाली लूट की घटनाएं, छोटी-बड़ी चोरियां, राजकीय स्‍तर पर होनेवाले अवैध मुद्रा लेनेदेन-ये सब क्‍या है। क्‍या ऐसे होने का सबसे बड़ा कारण सत्‍ताधारी और उनकी नीतियां नहीं हैं। जब लोकतन्‍त्र का आहवान करते हुए वे केवल बोलने के लिए एक-एक व्‍यक्ति को राष्‍ट्र का महत्‍वपूर्ण सदस्‍य बताते हैं तो मर रहे, मारे जा रहे, जीते जी मृत्‍यु का अभ्‍यास कर रहे लोग क्‍या उनके ऐसे बताने से ही महत्‍वपूर्ण हो जाएंगे। या उनके लिए कुछ किया भी जाएगा। जब एक व्‍यक्ति दुखी होता है, अकारण मारा जाता है तो ऐसे में सत्‍ताधारियों को यह सोचना चाहिए कि एक सामान्‍य व्‍यक्ति के रुप में उस व्‍यक्ति के स्‍थान पर वे भी हो सकते थे। वे इसलिए सुरक्षित हैं क्‍योंकि वे सुरक्षा चक्र में हैं। एक दिन अपना भेष बदल कर वे आम जनता के बीच घूमें। आम जन बन कर सरकारी सुविधाओं का आकलन करें। उन्‍हें पता चल जाएगा कि सुरक्षा घेरे में बनाई गईं उनकी नीतियां धरातल पर कैसे काम कर रही हैं।
     ऐसे सत्‍ता-प्रतिष्‍ठानों के अधीन रह कर हमारे सामने जीवन जीने, बच्‍चों का भविष्‍य बनाने जैसे जितने काम हैं सब के सब दोहरे सरकारी, सामाजिक मानदण्‍ड से प्रचालित हैं। इन परिस्थितियों में हम बच्‍चों के सम्‍मुख कौन से शासकीय, समाजार्थिक उदाहरण प्रस्‍तुत करें, जिनका गुणगान करते समय हमें लग सके कि ये ठीक हैं और इनके बारे में बच्‍चों को बताया जाना चाहिए। लेकिन वास्‍तव में जब हमारी दृष्टि में अधिकांश मानवीय गतिविधियां चाहे वह सरकारी हों या व्‍यक्तिगत, अनैतिक और अमानवीय बन चुकी हों तो हम अपनी भावी पीढ़ी का सही मार्गदर्शन किस आधार पर करें। उनके लिए समय की अग्रराहें चुनौतियों से भरी हुईं हैं। उन्‍हें कहां-कहां अमानवीय समझौते करने पड़ेंगे, ये सोच कर दुखपूर्ण विस्‍मय होता है।

18 comments:

  1. बिटिया पर हाथ उठाना अच्छा नहीं लगा ..
    शुभकामनायें आपको !

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  2. ये अनुभव तो विकेश जी थोडा बहुत अन्तर के साथ
    लगभग सभी के साथ बीतता होगा और उसकी प्रतिक्रया भी मिलती जुलती ही होगी...
    पर नन्हे मासूमों पर हाथ उठा कर बड़ी गलती
    करते हैं हम ....ऐसा न हो कोशिश तो
    होनी चाहिए....शुभकामनाएं....



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  3. इस कठिन परिस्थिति में ही कुछ न कुछ हल तो खोजना ही पडेगा ... और मिलेगा भी ... क्योंकि हर कठिनाइ नई संभावना भी साथ लाती है ...

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  4. आपकी भावनाओं को समझ सकता हूँ और जो अपराधबोध आपने खुद में महसूस किया वह भी समझ सकता हूँ। दो बाते कहूंगा एक उपदेशात्मक और एक व्यवाहारिक। उपदेशात्मक यह कि आप बच्ची पर वक्त से पहले ही जुल्म ढा रहे है, अभी उसकी उम्र क्या है ? अभी से उससे ऐसी अपेक्षाए कि वह आपके मापदंडो पर खरी उतरेगी , आपकी भूल है। उसे अभी सिर्फ और सिर्फ माँ-बाप का असीम प्यार चाहिए कोई उपदेश नहीं। वासी भी लडकिया लडको की अपेक्षा ज्यादा समझदार होती है आगे चलकर आपकी अपेक्षाओं से भी आगे बढ़कर निकलेगी। और अब एक व्यावहारिक बात सबी पैरेंट्स के लिए जोकि कहीं से चुराकर लिख रहा हूँ ; यह काफी महत्त्व रखता है कि अपने बच्चे को नैतिक और सम्मानित नागरिक बनाने के लिए हम किस तरह की भूमिका अपनाते हैं। लेकिन इन सबसे पहले यह भी जरूरी है कि हम अपने आचरण से उन्हें कितना प्रेरित कर पाते हैं। यहां पर आपके लिए एक सूत्र वाक्य काम का साबित हो सकता है कि वीणा के तार को इतना न ढीला छोड़ दो कि उससे आवाज ही न निकले या फिर उसे इतना न कस दो कि टूट ही जाए।

    नोट: और हाँ, आपके ही जैसी परिस्थितियों से मैं भी कई बार गुजरा हूँ !

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  5. ऐसा नहीं कि हमारी राह भी आसान थी फिर भी अपनी ग्राह्यता के अनुरूप अपने को हमने ढाल लिया . उसी प्रकार बच्चे को भी मानसिक स्वतंत्रता दे कर और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करके काफी हद तक मार्गदर्शन किया जा सकता है.

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  6. आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह सब हो रहा है पहले भी बच्चे पढ़ते थे फिर भी अपना जीवन जीते थे उन पर किसी प्रकार का तनाव नहीं रहता था |
    आशा

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  7. आपने सही कहा आज के इस तनाव भरे माहौल में मुश्किल है अच्छी शिक्षा देना पर हम अपने बच्चे को अच्छे संस्कार सही मार्गदर्शन एक सही वातावरण जो हम दे सकते हैं वो तो जरुर दें साथ ही भरपूर प्यार जिसकी सबसे ज्यादा जरुरत है उसे.घर से ही हम उसके लिए एक सही राह तैयार कर सकते हैं

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  8. आदर्शों का आकाल पड़ा हो तो बच्चे क्या सीख जायें, क्या पता?

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  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन संभालिए महा ज्ञान - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. प्राइवेट स्‍कूल पढ़ाई के नाम पर केवल व्यवसाय ही कर रहें हैं,इनके भरोसे बच्चों का नैतिक विकास नही हो सकता.बेहतरीन आलेख.

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  11. मन को उद्वेलित कर गया आपका लेख. आधुनिकता के नाम पर क्या क्या परोसा जा रहा है अपने यहाँ आजकल. सिवाय दुःख के और कुछ नहीं मिलता. और ये प्राइवेट स्कूल तो बस धन दोहन के संस्थान बने पड़े हैं. संचार क्रान्ति से पश्चिमी रंग बहुत तेजी से पसर रहा है अपने यहाँ. पर जो पसर रहा है वो पश्चिमी सभ्यता की अच्छी चीजें नहीं है. पश्चिमी सभ्यता में अनुसरण करने लायक और भी बहुत सारी अच्छी चीजें है पर उसे अपने यहाँ नक़ल करने वाले नहीं देखते.

    रही बात शिक्षा की. जैसा आपने लिखा है नैतिक शिक्षा घर स्कूल वाले दे नहीं रहे और उसके बिना समग्र शिक्षा कभी हासिल हो नहीं सकती. आजकल के माता खुद को आधुनिकता के होड़ ने इतना व्यस्त कर दिया है कि वो बच्चों सुविधाएं तो दे देते हैं पर समय नहीं. नतीजा क्या होता है वो यहाँ पर मैंने देख लिया. अब भय है की वही सारी बातें अपने यहाँ भी घटित होने वाली है.

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  12. आपकी बात सही है...पर आज ये भी देखना होगा कि बच्चों का मार्गदर्शन समय के मुताबिक़ और संतुलित तरीके से हो रहा है नहीं.. समय न तो पहले आसान था और न अब है....

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  13. आपकी चिंता वाजिब .आदमी का सबसे बड़ा शत्रु क्रोध है जो उम्र भर साधना पड़ता है .खुद को व्यवस्थित करें .विश्लेषण की क्षमता है मन को दिशा दें बच्चे अनुगामी बन पीछे आयेंगे .

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  14. हमारे अपने आचरण की शुद्धता ही बच्चों के लिए अनुकरणीय मानक बनेगी .ॐ शान्ति .

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  15. बच्चों को हर माँ बाप शिखर पर ले जाना चाहते हैं,
    पर इसके लिये प्रताड़ना नहीं,स्नेह,समझ के साथ व्यवहार करना
    पड़ता है--
    बच्चों के भविष्य को लेकर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

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  16. वाह! बहुत खूब लिखा भाई | अनुभवों के ताने बाने को बुन कर वास्तविकता को प्रस्तुत कर दिया | विचारणीय |

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  17. ये कलियुगी झूठ खंड है इसीलिए सच खंड का परिचय देना भी ज़रूरी है यह दुनिया सदैव ही माया रावण के अधीन थी ,पूर्ण तय : पवित्र भी थी तब जब आचरण की शुचिता ,ईश्वर एक था सबको उसका परिचय था आज तो खुद को भी नहीं जाते ,देह माने घुमते हैं देह ताकते ......सजते संवारते .

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