Sunday, May 12, 2013

दो कविताएं



अपना दर्द मां को बताएंगे



पना दर्द मां को बताएंगे
लोग तो उस पर नमक ही लगाएंगे
मिट्टी से महक रहा होगा
मां का आंचल
वहीं पर नींद में
परियों को निहारेंगे
अपना दर्द……….
माता के खुरदुरे हाथों से
परिश्रम का आभास होगा
उन्‍हीं के स्‍पर्श से
मन में स्‍नेह का आवास होगा
मां की ही सांसों में
उबल रहा होगा परार्थ निर्मल
उन्‍हीं में लीन होने को
नेत्र बिछाएंगे
अपना दर्द……….
                                                                  
                                                                   
स्‍वप्‍न प्रेम


प्रेरणा कहूं उसे शांति की
इस जीवन में
जो स्‍वप्‍न में
मुझ से एकसार हो गई
मेरी जैसी चेतनावाली
मेरा संसार हो गई
वे स्‍वप्‍न-घड़ियां मैं बारम्‍बार
जाग कर भी पुनर्जीवित कर रहा हूँ
वहीं पर अपने जीवन की
हारी हुई सांसों को विजय करा रहा हूँ
स्‍वप्‍न में
मेरे एक हाथ में एक निरपराध बालक
दूसरे हाथ में उसका स्‍वप्निल व्‍यक्तित्‍व है
उन दोनों को बाहों में थामे
हृदय से लगाए हुए
मैं भीड़ को चीरता हुआ
आगे बढ़ रहा हूँ
प्रेम-पथ पर दौड़ रहा हूँ
सभी के साथ मैं जैसा था
उससे अलग उस के साथ हूँ
सभी के साथ वह जैसे थी
उससे विलग वह मेरे साथ है
हम आकर्षित होने को
दो शरीर हैं, विपरीत लिंग हैं
पर प्रेम-चेतना महसूस करने के लिए
हम एक जीव हैं, संजीव हैं, प्राण हैं
अब मैं निडर
हरेक स्‍थान पर उसका साथ
विचित्र ये संयोग
हृदय की उसांसों पर मेरा हाथ
वह बन रही संत सी
मेरे अनुकूल
वह सुन्‍दर उसकी छवि बसंत सी
मैं इस मौसम का ही एक फूल
कष्‍टप्रद जीवन अनुभूति
अब सुदूर
नयनों के रास्‍ते व्‍योम पर मूर्छा
मैं प्रसन्‍नचित मदन चहुं ओर
मैं मद में चूर

22 comments:

  1. अपना दर्द मां को बताएंगे
    लोग तो उस पर नमक ही लगाएंगे

    ...बहुत सच कहा है...माँ के अलावा दर्द को कौन समझ सकता है...

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  2. माँ ही समझ सकती है वो भी बिन कहे ही ...

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  3. बेटे का दर्द माँ हमेशा महसूस करती हैं,बेहतरीन कविताये.

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  4. सच है माँ को सब पता चल जाता है उसे तो बताना भी नहीं पड़ता ... सुन्दर भाव...मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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  5. माँ से कभी कुछ नहीं छिपा भाई | माँ को पहले ही आभास हो जाता है हर मुश्किल का और वो उसके आगे खड़ी हो जाती हैं | बहुत सुन्दर रचना भाई |

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  6. ईश्वर के बाद माँ की ही स्तुति की जाती है इतनी .बढ़िया भाव उदगार .

    भाव निबन्ध हैं दोनों कवितायेँ माँ के प्रति .

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  7. माँ ही सन्तान के दर्द को गहराई से समझ सकती है । अच्छी कविता ।

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  8. बहुत बढ़िया। शुभकामनायें!

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  9. बहुत सुन्दर कवितायें. जो सुकून माँ की गोद में है वो सच में कहीं नहीं है.

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  10. भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!माँ तो बिना बोले बच्चे का दर्द समझ जाती... बहुत बढ़िया.आभार

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  11. भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!माँ तो बिना बोले बच्चे का दर्द समझ जाती... बहुत बढ़िया.आभार

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  12. माँ ही तो है जिसे सब कुछ बताया जा सकता है
    माँ जीवन का विश्वास है
    बहुत सहजता से माँ की अनुभूतियों को व्यक्त किया है
    बधाई

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  13. नमस्कार !
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (13-05-2013) के माँ के लिए गुज़ारिश :चर्चा मंच 1243 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

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  14. बहुत सुंदर.......माँ को नमन

    सच में माँ से छुप सकते हैं छुपा नहीं सकते .....

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  15. भावपूर्ण अभिव्यक्ति! माँ तो सब कुछ समझ जाती है ..

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  16. और माँ नीलकंठ -सी....
    और प्रेम स्वप्नातीत -सा...

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  17. जब कुछ करने में असमर्थ हो
    तो मां कह दो
    चोटिल हो मन से तन से
    तो मां कह दो
    सुकून की तलाश हो जब
    तो मां कह दो
    तुम्‍हें कुछ भी असंभव लगे जब
    तो मां कह दो
    भावमय करती शब्‍द रचना ...

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  18. प्रबल भाव हैं दोनों कविताओं में.
    दूसरी वाली खास पसंद आई.

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  19. बहुत अच्छी लिखी हैं दोनों ही कविताएँ...अपना दर्द माँ को बताएँगे..लोग ओत उस पर नमक ही लगायेंगे!कितना खरा सच लिखा है..

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  20. एक माँ ही है जो बिना बताए दर्द को जान लेती है
    दोनों रचनाएं बहुत ही सुन्दर
    साभार !

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