Thursday, May 2, 2013

यह यात्रा!



अप्रैल का दूसरा दिन है। चैत्र मास का यह मंगलवार नोएडा से कोटद्वार की बस यात्रा में सुफल हुआ। सामान्‍य दिनों की यात्रा में परिवहन अव्‍यवस्‍था, लोक-समाज की अव्‍यावहारिकताओं, ध्‍वनि प्रदूषण जैसी समस्‍याओं से पीड़ित मैं और मेरा मन किसी तरह सफर पूरा हो और लक्ष्‍य तक पहुंचेंवाली विचारधारा का अनुसरण करता है। लेकिन यह यात्रा! शायद मेरे पास उचित शब्‍दों का अभाव है इसका वर्णन करने के लिए। सुबह साढ़े सात बजे नोएडा से चली उत्‍तर प्रदेश रोडवेज की बस दोपहर होते-होते और कोटद्वार पहुंचते-पहुंचते मुझे मौसम के प्रभाव में सतयुगी पुष्‍पक विमान प्रतीत हो रही थी। सात घण्‍टे का सफर उन अल्‍प हर्षित क्षणों के समान बन गया, जिनमें चांद देखने, टूटे गिरते तारा देख प्रार्थना करना सम्‍भव हो पाता है।
   फाल्‍गुन यदि मौसम का सर्वोत्‍तम आकर्षण है तो चैत्र इस आकर्षण की गम्‍भीर परिणति। बासंती प्रभाव, होली रंगायन के तरुण जीवन अनुभव के बाद यह प्रकृति छटा सुन्‍दरता की प्रौढ़ अनुभूति होती है। इसमें जग-जीवन, वन-उपवन, प्रकृति-पवन के अद्वितीय आकर्षण को अनुभूत करनेवाला केवल स्‍वानन्‍द में ही नहीं होता। उसकी दृष्टि विसंगतियों, विकृतियों, कष्‍टकारी विडम्‍बनाओं और विपरीत परिस्थितियों को भी सहर्ष स्‍वीकार करने लगती है। ये दृष्टि प्रत्‍येक मानव को प्राप्‍त हो तो जीवन कितना सहज, सुगम और समुचित बन जाए!
     तेज चलती बस की खिड़की से लगी मेरी आंखें राष्‍ट्रीय राजमार्ग 119 के प्रकृति और ग्राम जीवन पर अपलक टिकी हुईं थीं। होली के बाद हुई बारिश ने जैसे समूचे पर्यावरण को जीवंत कर दिया था। सम्‍पूर्ण उत्‍तर भारत स्‍वप्निल आभा बिखेर रहा था। सूर्य की किरणों का प्रताप हरित वसुन्‍धरा और नीलांबर से मिल कर जीवन ध्‍येय पूर्ण होने की अनुभूति कराता लगा। झक नीले आसमान से प्रस्फुटित प्रचण्‍ड दिनकर रश्मियों से कौन जूझ सकता है यदि ठण्‍डी शीतल हवा न चल रही हो। गेंहूं की बालियों पर सूर्य प्रकाश फैला हुआ था। हवा उन्‍हें हरी भूरी सरसराहटों से झुमा रही थी। गन्‍ने की कटाई, छंटाई, लदाई करते किसान सच्‍चे मनुष्‍य लग रहे थे। जुते हुए खेतों पर पसरी हुईं आम, जमौया, पापुलर की छायाएं देव वरदान लगती थीं। पगड़ीधारी धोती कुर्ता पहने किसान के रुप में अपना मनभावन निरुपण करने से पूर्व बस के अन्‍दर एक नजर घुमाई। अधिकांश यात्री ऊंघ रहे थे। बाहर स्‍वर्ग बरस रहा है और यात्रीगण सो रहे हैं, धत है इन पर। सोच कर मैं वापस खिड़की से बाहर के प्रकृति रत्‍न को अंत:स्‍थल में एकत्रित करने लगा।
          गेंहूं और गन्‍नों से लदे खेतों के किनारों पर पंक्तिबद्ध पापुलर की गोलाकार पत्तियों को प्‍यार से हिलाती हवा जैसे साक्षात दिखने लगी थी। हरियाली से घनीभूत शीशम, जमौया और तरह-तरह के पेड़ अपने में विलीन होने का आमंत्रण दे रहे थे। सात दिन पहले की वर्षा से खेत, खलिहान, घरों के निकट बने छोटे-छोटे तालाब, पोखरों में एकत्रित पानी अपने आसपास की हरिभूमि के लिए दिव्‍य दर्पण बना हुआ था।
 भोजन करने के लिए चालक ने मीरापुर के एक ढाबे पर बस रोकी। इस यात्रा से पहले की यात्राओं पर कभी यदि बस कहीं रुकती थी और देर तक रुकी रहती थी तो चालक-परिचालक पर झुंझलाहट और क्रोध उभरता था। लगता था बस चले और शीघ्र अपने गन्‍तव्‍य पहुंचे। पर आज तो मन कह रहा था कि एक दो घण्‍टे बस यहीं रुकी रहती तो मैं गेंहूं और गन्‍ने के खेतों का एक चक्‍कर लगा के आ जाता। मैंने कुछ नहीं खाया। मेरी भूख को तो जैसे मौसमीय प्रभाव ने हर लिया था। मन की मानी और गेंहूं के खेत में घुस कर तन-मन को विशुद्ध किया।
शहरों महानगरों की हीन भागदौड़, निर्जीव वातावरण से दूर राष्‍ट्रीय राजमार्ग के किनारों पर बसे गांव और इनका परिवेश कितनी सार्थक स्थिरता लिए हुए है। खेती-किसानी के सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य को करते हुए ग्रामीण सचमुच ईश्‍वर का दूसरा रुप हैं। गेंहूं कटने से पहले मन्दिरों में इसको प्रसाद स्‍वरुप चढ़ाने की परंपरा रही है। भारतीय ग्रामीण जगत में हिन्‍दू नववर्ष के साथ-साथ गेंहूं कटाई के उपलक्ष में मेलों का आयोजन होता है। मैंने देखा जहां बस रुकी हुई थी वहीं से कुछ दूर किसी सिद्ध मन्दिर में मेला लगा हुआ था। सादगी से सजे-धजे लोग मेले में जा रहे थे, वहां से आ रहे थे। कोई ट्रैक्‍टर ट्राले तो कोई भैंसाबुग्‍गी, साइकिल पर परिवार सहित बैठा हुआ था। साइकल सवार व्‍यक्ति, पीछे बैठी उसकी पत्‍नी, पत्‍नी की गोद में बैठा बच्‍चा मेले से आ रहे थे। उन्‍हें देख कर कोई भी संवेदनशील व्‍यक्ति आदर्श परिवार की सीख ले सकता था। विशालकाय ट्रक, ट्रेलर, बस, कारें जिस राजमार्ग को रौंदते हुए दौड़ रहीं थीं, उस के किनारे-किनारे परिवार के साथ साइकिल पर बैठ यात्रा कर रहे व्‍यक्ति के लिए सुरक्षित घर पहुंचने की प्रार्थना के अतिरिक्‍त मैं क्‍या कर सकता था।
आज भी गांव के लोगों के पास राजदूत और यज्‍दी जैसी मोटरसाइकिलें हैं, यह देख कर आश्‍चर्यमिश्रित खुशी हुई। इन्‍हें देख याद आया कि कुछ दिनों पहले आई अक्षय कुमार की स्‍पेशल 26 फिल्म  में तोतिया रंग की मैटाडोर दिखाई दी थी। ये अनुभव इतिहास के सुनहरे दिनों में जाने का रास्‍ता बनते हैं।
बिजनौर से 11 किलोमीटर पहले मध्‍य गंगा बैराज का जेसोप कंपनी द्वारा 1984 में अभिकल्पित और निर्मित तीन सौ मीटर लंबा सेतु है। इस तक पहुंचने से पूर्व राजमार्ग के बांई ओर आधा किलोमीटर लंबा ऊसर है, जिसमें दो पहाड़नुमा कटानों के बीचोंबीच बरसाती नाला है। उसी के बांई तरफ पानी से लबालब नदी है। सूखे बरसाती नाले के किनारे गडरिया गाय-भैंसों को चरा रहा था। दोपहर का दूत यह व्‍यक्ति एकांत में बैठ कर जानवरों को चरते हुए देख रहा था। सर पर पगड़ी हाथ में डंडा लिए हुए उसने ऊपर मार्ग में दौड़ते वाहनों पर दृष्टि डाली तो मैंने उसका अभिवादन किया। उसने भी दोपहरी सूखी हंसी और खाली हाथ हवा में लहरा कर मेरा स्‍वागत किया। बस से गांव के गांव पीछे भागते हुए दिखे। उपलों के टीले, घरों के दालान, चारपाई पर बैठ हुक्‍का गुड़गुड़ाते वृद्धजन दोपहर का विचित्र श्रृंगार करते लगे। नीम, आम और शीशम की घनी छांव सदाशयता से बुला रही थी। मन तो मेरा इनमें प्रवेश कर चुका था। लेकिन मैं था कि इन्‍हें देख सुषुप्‍त, स्थिर पड़ा हुआ था। जैसे आश्‍चर्य से शरीरविहीन।
प्राथमिक विद्यालयों के बच्‍चे छुट्टी पा कर कितने प्रसन्‍न हो घरों को लौट रहे थे! आसमानी रंग की कमीज गहरे नीले रंग की पतलून पहने कन्‍धों पर थैले टांग बच्‍चे राजमार्ग के किनारे चल रहे थे। बड़ी बहन के साथ छोटा भाई सुरक्षा के घेरे में चल रहा था। मित्र लड़कियां और लड़के एक-दूसरे के कन्‍धे पर हाथ रखे हुए हंसी-खुशी चल रहे थे। तो कोई बच्‍चा अत्‍यन्‍त संवेदनशील होने के कारण वातावरण का दृष्‍टांकन करता हुआ एकांत में सबसे पीछे धीमे-धीमे पग बढ़ा रहा था। ईंट भट्टों के कामगार, खेतों के किसान दिन के एक बजे पेड़ों की छाया तले बैठ खाना खा रहे थे। शहर की गांव से और अपनी ग्रामीणों से तुलना करने पर महसूस हुआ कि मैं नर्कवासी हूँ। नर्क से आ रहा हूँ और स्‍वर्ग में विचरण कर रहा हूँ।
दूर क्षितिज पर फैले, लम्‍बे, हरयाते, चमकते, हवा से मटकते एकसमान वृक्ष मेरी आत्‍मा को इस दोपहर से रंगने पर तुले हुए थे। इस यात्रा अनुभूति के गहनतम वर्णन के लिए शब्‍द हमेशा अधूरे रहेंगे, वर्णनकर्ता असक्षम रहेगा। यदि यात्रा के मेरे ये अनुभव व्‍यवहार बन सकते तो मैं मित्रों, अभावग्रस्‍त लोगों, सज्‍जनों को वही आभास उपहार में देता!

17 comments:

  1. भारत की आत्मा गावों में बस्ती है.......... आपने बहुत सुंदर ढंग से सचित्र वर्णन किया है.. बहुत बढियां प्रस्तुति!!

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  2. भारत की आत्मा गावों में बस्ती है.......... आपने बहुत सुंदर ढंग से सचित्र वर्णन किया है.. बहुत बढियां प्रस्तुति!!

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  3. जीवंत वर्णन, सरल भाषा में सचित्र आपका ये यात्रा वृत्तांत बहुत अच्छा लगा.

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  4. कुछ तो है जो हठात रोक लेता है हमें , हम मुँह फेरे तो भी बोल-बतिया लेता है ..जिसे आपने उपहार में हमें दिया है ..स्वीकार है..

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  5. बहुत ही सुन्दर और जीवंत वर्णन.

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  6. सुन्दर वर्णन!

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  7. बहुत खूब | ग्राम जीवन का सजीव चित्रण | लाजवाब |

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  8. खूब जीवंत चित्रण किया है आप ने ..
    सच में गाँवों में अभी भी भोलापन ,अपनी संस्कृति और आदर्श परिवार बाकी हैं.

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  9. गेहूँ की बालियाँ स्वर्णिम आभा सी दीखती हैं।

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  10. जीवंत व नायब चित्रण
    अद्भुत उपहार का आभास हो रहा है हमें ......

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  11. सहज और सुंदर यात्रा वर्णन। हमारे आस-पास बहुत सुंदर दृष्य होते है पर दुर्भाग्य कि आंखें बंद कर बैठते है या यंत्रों के आधार से बदसूरत करना चाहते हैं।

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  12. यात्रा वृत्तांत और प्रकृति के सौंदर्य को कैद करने का आपको वरदान मिला हुआ है .बढ़िया सम्मोहक वर्रण .बधाई इस प्रवाह पूर्ण लेखन के लिए .शब्दों के अर्थ गर्भित सन्दर्भ से जुड़े प्रयोग पोस्ट को और भी आकर्षक बना गए हैं .

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  13. आज की ब्लॉग बुलेटिन तुम मानो न मानो ... सरबजीत शहीद हुआ है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  14. आपने चैत्र मास की इस यात्रा को बहुत ही सरस और सहज बना दिया...यात्रा का आनंद मंजिल में नहीं रास्ते में है...

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  15. चैत्र मास की यात्रा को कितनी सहजता और सार्थकता से
    लिखा है आपने
    हिन्दुओं का यह महत्वपूर्ण नये साल का प्रारंभ है
    आपको बधाई


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  16. यात्रा तो कई बार होती है ऐसे पर इतना दृश्य नज़र नहीं आता ... जो आपकी पैनी दृष्टि ने देख लिया ... सचित्र लाजवाब संस्मरण ...

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  17. ऐसा सुंदर ग्राम जीवन का चित्रण केवल वही व्यक्ति कर कर सकता है जिसने ऐसे जीवन को स्वयं भोगा हो या स्वयं जिया हो। यूं भी अपने देश की आत्मा तो गाँव में ही बस्ती है। प्राकृतिक सुंदरता से सजे ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण कराता बेहतरीन संस्मरण...

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