Sunday, April 7, 2013

सीजीएचएस और निजी चिकित्‍सालयों का संघर्ष




सीजीएचएस और 
निजी चिकित्‍सालयों का संघर्ष



राष्‍ट्रीय समाचारपत्र के अन्‍दर के पृष्‍ठ पर लघु समाचारलापरवाही के चलते सीजीएचएस पैनल से हटे अस्‍पताल। सीजीएचएस (सेन्‍ट्रल गवर्नमेंट हेल्‍थ स्‍कीम) अर्थात् केन्‍द्र सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य योजना। सरकारी सेवा में कार्यक्षमता से पूर्ण समयकाल, युवा शरीर, मस्तिष्‍क लगाने के बाद प्रत्‍येक कर्मचारी की इच्‍छा होती है कि वह अपना बुढ़ापा पेंशन, स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं के भरोसे काटे। पेंशन तो चलो सेवामुक्‍त कर्मचारियों को मिल रही है और यह आवश्‍यक भी है। अन्‍यथा ऐसे युग में जब अधिकांश बच्‍चे चाहे-अनचाहे अपने मां-बाप से अलग रहने को विवश हैं और कुछ तो बच्‍चों की अनदेखी से अनाथालयों में दिन काट रहे हैं, पेंशन का अत्‍यधिक सहारा है। कहा भी जाता है कि ये पेंशन नहीं प्राण है। निश्चित रुप से आज के समय में नौकरी से मुक्‍त लोगों के लिए पेंशन प्राण समान ही है। परन्‍तु भविष्‍य में सीजीएचएस के अन्‍तर्गत निजी चिकित्‍सालयों में नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य उपचार कराना सेवानिवृत्‍त वृद्धजनों के लिए कठिन होता जाएगा। बीमारियों की उपचार दरों को न्‍यायसंगत बनाने और भुगतान में विलंब जैसे कारणों से कुछ शीर्ष निजी चिकित्‍सालय सीजीएचएस चिकित्‍सालयों की सूची से हट गए हैं।
इस कारणवश सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों के हजारों कर्मचारी सीजीएचएस योजना के अन्‍तर्गत शीर्ष निजी चिकित्‍सा संस्‍थानों में चिकित्‍सा सेवा प्राप्‍त नहीं कर सकेंगे। शुक्रवार को केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने दिल्‍ली स्थित श्री बालाजी एक्‍शन मेडिकल इंस्‍टीट्यूट को  सीजीएचएस में सम्मिलित चिकित्‍सालयों की सूची से हटा दिया है। इस वर्ष कम से कम अन्‍य पांच शीर्ष निजी चिकित्‍सालयों को भी सीजीएचएस की सूची से हटाया गया है। इनमें एस्‍कार्टस हार्ट इंस्टिट्यूट एंड रिसर्च सेंटर, मैक्‍स सुपर स्‍पेशलिटी हॉस्पिटल, मैक्‍स देवकी हार्ट एंड वस्‍कुलर इंस्टिट्यूट और गर्ग हास्पिटल्‍स सम्मिलित हैं।
सीजीएचएस का लाभार्थी बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से निजी चिकित्‍सालय में भर्ती हो कर अपनी चिकित्‍सा कराता है। चूंकि उसे इस हेतु एक पाई नहीं देनी पड़ती इसलिए वह अपनी पूर्ण शारीरिक जांच करवा लेता है। जांच के दौरान पाए गए रोगों का निदान होने के उपरांत जांच, रोग निदान और इसमें प्रयुक्‍त हुए चिकित्‍सा यंत्रों व दवाईयों का बिल जब सीजीएचएस पैनल को भेजा जाता है तो वह इसका समुचित मिलान करने में ही अधिक समय लेता है। सम्‍बन्धित चिकित्‍सालय द्वारा पैनल को भेजे गए लाभार्थी रोगियों के बिलों से पैनल के डॉक्‍टर कभी भी संतुष्‍ट नहीं होते। उनका आरोप होता है कि चिकित्‍सालय ने प्रत्‍येक चिकित्‍सा सेवा मद के निर्धारित मूल्‍य में अतिशय वृदि्ध करके बिल बनाया है। जबकि निजी चिकित्‍सालयों का मत होता है कि उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय मानदण्‍डों के अनुसार रोग निदान, चिकित्‍सा सुविधाएं प्रदान की हैं। उनके अनुसार स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय सरकारी चिकित्‍सालय में प्रदान की जानेवाली चिकित्‍सा सेवाओं के खर्चे के अनुरुप निजी चिकित्‍सालयों के बिलों पर विचार करते हैं। जबकि सभी को ज्ञात है कि निजी व सरकारी चिकित्‍सा सेवाओं और सुविधाओं में क्‍या अन्‍तर है। फलस्‍वरुप सीजीएचएस पैनल व निजी चिकित्‍सालयों के मध्‍य विवाद बढ़ते हैं और विवादों को उपभोक्‍ता फोरम एवं न्‍यायालयों के द्वारा सुलझाने की प्रक्रिया में सेवानिवृत्‍त लोगों की नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल का सीजीएचएस का मुख्‍य उद्देश्‍य नेपथ्‍य में पहुंच जाता है। अब इसे सरकारी कमी कहें या निजी चिकित्‍सालयों की मनमर्जी यह इतना विचारणीय नहीं है, जितना कि लाभार्थियों के सम्‍मुख आ खड़ा हुआ नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य सेवा प्राप्‍त करने का संकट।
सेवानिवृत्ति के बाद यह कोई अकेला संकट नहीं है, जिसे सरकारी कर्मचारी झेलेंगे। चार वर्ष पूर्व सेना की (एक रैंक एक पेंशन) जैसी समस्‍या के बाबत सेना से सेवानिवृत्‍त होनवाले सिपाहियों, अधिकारियों और जनता को व्‍यवस्‍था की प्रशासनिक कमी का भान हुआ था। यह सामान्‍य बात बिलकुल नहीं थी। क्‍योंकि सैन्‍य प्रतिष्‍ठान सरकार से सम्‍बद्ध है। और सरकारी ढील के कारण ही ऐसे प्रतिष्‍ठान के सेवामुक्‍त कर्मचारियों को भी पद व पेंशन जैसी समस्‍या झेलनी पड़ी।
      समस्‍या का दूसरा पहलू देखें तो यहां वे छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी दिखाई देंगे, जिन्‍हें प्रथम दृष्‍टया हम समस्‍याओं का कारण मानते हैं। जबकि ऐसा भी नहीं है कि सरकारी कर्मचारी कार्य नहीं करना चाहते। पर उन्‍हें कार्य करने के लिए शासन से स्‍पष्‍ट दिशानिर्देश तो मिले। सामान्‍यत: बाबू और छोटे सरकारी अधिकारियों द्वारा किए जानेवाले कार्य तब ही सुचारु हो सकते हैं जब उनसे बड़े अधिकारियों के किसी विशिष्‍ट कार्य संबंधी सभी निर्णय, नीतियां, दिशानिर्देश सही समय और दृष्टिकोण से हों। बड़े अधिकारियों की भी निर्णय लेने की क्षमता, नीतियां बनाने की इच्‍छाशक्ति, दिशानिर्देश पारित करने के अधिकार उनके ऊपर के अधिकारीगणों, विधायिका और कार्यपालिका की कार्यप्रणाली से नियत होते हैं। और जब शीर्षस्‍थ स्‍तर पर घोर अकर्मण्‍यता व्‍याप्‍त हो, सोचे-विचारे बगैर विसंगत नीतियां बनाई जाती हों और दबाव में उनका पालन करवाया जाता हो तो निचले स्‍तर के सरकारी कर्मचारियों को उनकी हरामखोरी, बदमाशी, भ्रष्‍टाचार के लिए अकेले दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहने का तात्‍पर्य यह है कि सरकारी सेवाओं में बरती जा रही ढील और कार्यों में होनेवाले भ्रष्‍टाचार के लिए केवल उन कारकों को जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, जो पीड़ितों को प्रत्‍यक्ष दिखाई देते हैं, अनुभव होते हैं। 
       एक ओर सरकार अधिकांश सरकारी प्रतिष्‍ठानों का निजीकरण, अर्द्ध-सरकारीकरण कर रही है तो दूसरी ओर उनके और अपने बीच कार्य-समन्‍वय को ठीक करने के प्रतिमान भी नहीं निर्धारित कर पा रही है। ऐसे में समस्‍याओं का प्रत्‍यक्ष बोझ तो साधारण जन पर ही पड़ता है। सीजीएचएस पैनल और निजी चिकित्‍सालयों के प्रशासनिक मतैक्‍य और विवादों से उत्‍पन्‍न होनेवाली समस्‍याओं का सामना इनके कर्ताधर्ताओं को नहीं करना पड़ेगा। इनके निरर्थक अधिकारों की लड़ाई में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्‍त आम लोग ही पिसेंगे।

9 comments:

  1. आपने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पे कलम चलाई है अलावा इसके निजी अस्पतालों तक पहुँचने से पहले स्पेशलिस्ट की परमिशन ,CGHS DISPENSARY KAA APPROVAL समय जाया करता है इस बीच रोग पेचीला भी बन सकता है .एमत्जेंसी हो तो आप सीधे निजी अस्पताल जा सकते हैं CGHS PENSINER CARD लेकर .सरकार को खैराती अस्पतालों (सरकारी )के लिए भी मानक तय करने चाहिए .मानकीकरण के अभाव की वजह से यह झमेला खडा हुआ है निजी अस्पताल ठीक कह रहें हैं .

    मेडिकल कोलिज रोहतक (जहां से मुझे मुफ्त सेवा मिल सकती है ,सेवा निवृत्त क्लास वन गज़े टिड अफसर हरियाणा सरकार का होने के नाते )और एस्कोर्ट्स अस्पताल का अंतर मैंने देखा है .पहले में मेरी सर्जरी PROLAPSE DISC के बाद हुई दूसरे CABG(CORONARY ARTERY BYPASS GRAFTING) ,बोले तो ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी है .पहले में प्रोसीज़र में लटको परमिशन लो ,फिर कोई रिस्क लेने को राजी नहीं है .मेरी जब प्रोलेप्स डिस्क के लिए सर्जरी हुई(२ ० ० ४ ) मुझे ANGINA था ,बस कभी एनसथीजीया का माहिर लटकाए कभी हार्ट स्पेशलिस्ट ,ये हो जाएगा वह हो जाएगा डराए ,लिखकर दिया सबने हमें ओपरेशन टेबिल पे मरना मंज़ूर है वेजिटेबिल की तरह पड़े रहना दर्द में छटपटाते रहना नहीं .

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  2. आपने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पे कलम चलाई है अलावा इसके निजी अस्पतालों तक पहुँचने से पहले स्पेशलिस्ट की परमिशन ,CGHS DISPENSARY KAA APPROVAL समय जाया करता है इस बीच रोग पेचीला भी बन सकता है .एमत्जेंसी हो तो आप सीधे निजी अस्पताल जा सकते हैं CGHS PENSINER CARD लेकर .सरकार को खैराती अस्पतालों (सरकारी )के लिए भी मानक तय करने चाहिए .मानकीकरण के अभाव की वजह से यह झमेला खडा हुआ है निजी अस्पताल ठीक कह रहें हैं .

    मेडिकल कोलिज रोहतक (जहां से मुझे मुफ्त सेवा मिल सकती है ,सेवा निवृत्त क्लास वन गज़े टिड अफसर हरियाणा सरकार का होने के नाते )और एस्कोर्ट्स अस्पताल का अंतर मैंने देखा है .पहले में मेरी सर्जरी PROLAPSE DISC के बाद हुई दूसरे CABG(CORONARY ARTERY BYPASS GRAFTING) ,बोले तो ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी है .पहले में प्रोसीज़र में लटको परमिशन लो ,फिर कोई रिस्क लेने को राजी नहीं है .मेरी जब प्रोलेप्स डिस्क के लिए सर्जरी हुई(२ ० ० ४ ) मुझे ANGINA था ,बस कभी एनसथीजीया का माहिर लटकाए कभी हार्ट स्पेशलिस्ट ,ये हो जाएगा वह हो जाएगा डराए ,लिखकर दिया सबने हमें ओपरेशन टेबिल पे मरना मंज़ूर है वेजिटेबिल की तरह पड़े रहना दर्द में छटपटाते रहना नहीं .

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  3. जीवन से जुडे एक सार्थक मुद्दे को उठाया है आपने
    यह पहल निरंतर सभी को करना चाहिये
    रपट की बधाई

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  4. कहीं कोई भी पेंच फंसता है तो बलि तो आम जनता की ही चढ़ जाती है .

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  5. बहुत डिटेल में लिखा है आपने ...
    आप इंसान, गरीब इंसान क्या कर सकता है यही सोच के परीशान हूं ... कितनी मुश्किल है उन्हें ... जान की कोई कीमत नहीं ..

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  6. बेहद ही चिंतनीय विषय है यह
    सार्थक लेख
    साभार !

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  7. कायदे क़ानून की डोर में फंसा मुलाजिम कब परमिशन जुटाते जुटाते उपराम हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं जय लाल फीता शाही .जय अफसर शाही ,जय घिसे पिटे क़ानून ,जबकि इलाज़ और दवाओं और जांच की कोस्ट लगातार बढ़ रही है .

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  8. व्यवस्थायें बढ़ें, सिकुड़ें नहीं।

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