Monday, April 8, 2013

सम्‍मेलनों का औचित्‍य




विवार को नई दिल्‍ली स्थित विज्ञान भवन में मुख्‍यमन्त्रियों एवं मुख्‍य न्‍यायाधीशों के सम्‍मेलन के उदघाटन के बाद दिए गए अपने व्‍याख्‍यान में प्रधानमन्‍त्री ने स्‍वीकारा कि दिल्‍ली सामूहिक बलात्‍कार दुर्घटना ने सरकार को कानून बदलने हेतु बाध्‍य किया। उनके अनुसार अभी भी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से लड़ने के लिए बहुत कार्य किया जाना बाकी है। न्‍यायिक सुधारों एवं विधि प्रक्रियाओं में परिवर्तन की मांग के महत्‍व में वृद्धि के बाबत समझाते हुए उन्‍होंने कहा कि ऐसे में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विवेक और तर्क की आवाज क्षणिक आवेश में झूठी गवाही में न बदले। प्राकृतिक न्‍याय के मूल तत्‍व और समय के साथ परखे गए सिद्धांतों का उन तीखे स्‍वरों को संतुष्ट करने हेतु समझौता नहीं होना चाहिए जो प्राय: हमारे राजनीतिक संवाद को परिभाषित करते हैं और कई बार न्‍याय तथा तर्क की अपीलों को गिराने में सफल होते हैं।   

            प्रधानमन्‍त्री के उपरोक्‍त वक्‍तव्‍य में महिला सुरक्षा और न्‍याय व्‍यवस्‍था हेतु किसी समुचित नवीन कानून तथा उसके त्‍वरित कार्यान्‍वयन की इच्‍छाशक्ति का सर्वथा अभाव है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि और इसके लिए कानून की सक्रियता के बाबत उनका सम्‍बोधन श्रृंगारिक शब्‍द-विन्‍यास भर है। क्‍या इससे वास्‍तविकता में कोई अन्‍तर पड़ेगा? श्रीमान प्रधानमन्‍त्री जी जब राष्‍ट्र के सम्‍बन्‍ध में सभी लोक निर्माण कार्य करने के शीर्ष अधिकार लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत आपके पास विद्यमान हैं तो फिर आप किससे कह रहे हैं कि ये करना चाहिए वो होना चाहिए। और जब ऐसे अधिकार कांग्रेस दल के पास पिछले छह दशकों से हैं तो क्‍या तब भी न्‍यायिक अकर्मण्‍यता, अव्‍यवस्‍था, अस्थिरता के लिए आप सार्वजनिक मंचों से विवशता का रोना रोते रहेंगे।

      कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका के बीच समन्‍वयकारी भावना का सच कानून मन्‍त्री की उपस्थिति में मुख्‍य न्‍यायाधीश ने स्‍वयं ही स्‍वीकार किया है। उनके अनुसार भारतीय प्रशासनिक सेवा की तरह अखिल भारतीय न्‍यायिक सेवा का सृजन करने पर राज्‍यों में कोई सहमति नहीं है। एक हां कहता है तो दूसरा नहीं। यह विषय पिछले चार वर्ष से अटका हुआ है। दूसरी ओर उच्‍च न्‍यायालय में वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया के स्‍थान पर न्‍यायिक नियुक्ति आयोग बनाने के सरकार के प्रस्‍ताव का मुख्‍य न्‍यायाधीश विरोध करते हैं। उनके अनुसार वर्तमान प्रक्रिया पूर्णत: पारदर्शी है। इसमें परिवर्तन की आवश्‍यकता नहीं है। सरकार और न्‍यायपालिका के इन परस्‍पर विरोधाभासों के चलते समुचित सामाजिक विकास मात्र एक कोरा सपना बन कर रह गया है।

      ऐसे अदूरदर्शी वक्‍तव्‍यों से तो यही लगता है कि दिल्‍ली बलात्‍कार घटना पर यदि युवा आंदोलन नहीं होता तो सरकार अपराध कानून में परिवर्तन नहीं करती। यह देख आभास होता है कि भविष्‍य में भी ऐसी ही विडंबनाएं बनी रहेंगी। अर्थात् जब तक किसी दुर्घटना पर सामाजिक दबाव नहीं बनेगा सरकार उस के निराकरण हेतु कोई पहल नहीं करेगी। यदि सरकार सकारात्‍मक सामाजिक परिवर्तन के लिए हर बार जनता का ही मुंह ताके कि जब किसी दुर्घटना पर जन आंदोलन होगा तब ही वे कुछ कदम उठाएंगे तो फिर उनका अपना विवेक, नीति और निर्णय क्‍या हैं और किस लिए हैं।

 सरकार को राष्‍ट्र की बिगड़ती स्थितियां स्‍वीकार करने में हिचक नहीं हो रही है। पर बिगड़ती स्थितियों के लिए वह स्‍वयं को समाज के समुचित प्रतिरोध पर भी एक सुरक्षित स्थिति में रखने का प्रयत्‍न कर रही है लोगों की भलाई के लिए लोकतंत्रात्‍मक अधिकारों का प्रयोग करने में सरकारी विफलता का दोष लोगों पर नहीं लगाया जा सकता। मात्र दीप-प्रज्‍वलन, व्‍याख्‍यान, जलपान, मनोरंजन तक सीमित रह जानेवाले ऐसे सम्‍मेलनों का औचित्‍य क्‍या रह जाता है यदि इनके आयोजन के बाद भी राष्‍ट्रीय स्थितियां पूर्ववत ही बनी रहें।


10 comments:

  1. शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया .आपके टिपियाने का बेबसी का यथास्थितिवाद से बंद रास्तों का सुन्दर बयान है यह रचना क्या होना चाहिए ये कौन नहीं जानता आज .सूचना सबके पास है सूचना का इस्तेमाल हो तो बात बने .ये होना चाहिए का रिकार्ड गत ६ ५ सालों से बज रहा है .पूछा जा सकता है करते क्यों नहीं आप जबकि बकौल जनार्दन द्विवेदी आपका रिमोट बने रहना एक अप्रतिम राजनीतिक प्रबंधन है जो अन्यत्र दुर्लभ है श्री मान

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  2. आदरणीय सम्मेलनों का ओचित्य क्या होता है सभी जानते हैं
    आप जिस तरह से इसे विश्लेतित करते हैं वह कमाल का है
    आपकी लगन का आभार

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  3. आपने अपने आलकेह की अंतिम पंक्तियों में ही अपने सवाल का जवाब दे दिया है क्यूंकि शायद आज़ादी के बाद से लगभग सभी सम्मेलनों का औचित्य केवल यही रह गया है जो आपने लिखा है।

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  4. मानसिक रूप से विकलांग व अपाहिज इन नेताओं का शर्मनाक बयान काफी अफसोसजनक और दुखद है....

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  5. प्रक्रिया तो इतनी पारदर्शी है कि सबों का अन्दर तक दिख रहा है पर कुछ भी बदल नहीं रहा है..

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  6. बहुत सुन्दर और सार्थक विश्लेषण...शासक वर्ग में इच्छा शक्ति की कमी स्पष्ट दिखाई देती है..

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  7. सम्मलेन बस आउटिंग की तरह होते हैं .. जाओ .. खाओ पियो ... मीडिया में आ जाओ ... चिंतन करो ... मातहतों को काम दो ... जनता को पागल बनाओ ...

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  8. गत ६ ५ सालों से यही सुन रहे हैं इन राजनीति के धंधे बाजों से -यह होना चाहिए ,वह होना चाहिए .करते क्यों नहीं हो भाई ,जो वांच्छित है ?शुक्रिया आपकी द्रुत टिप्पणी के लिए .

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  9. जनता के स्वर सोचने को विवश करते हैं।

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