Saturday, April 6, 2013

राह चलते लोगों की सुरक्षा का प्रश्‍न



भारतीय यातायात की दुर्दशा

आजकल छोटे शहरों से लेकर बड़े महानगरों में मोटरसाइकिल चलानेवालों का आतंक दिनोंदिन बढ़ रहा है। बाइक चालक नवयुवक यातायात के नियमों को ताक पर रखकर सड़कों को सर्कस का मैदान बनाने पर तुले हुए हैं। उन्हें अपने करतबों से राहगीरों को होनेवाली समस्या से कोई मतलब नहीं रहता। इस दौरान लड़कियों से छेड़छाड़ करने, उनके गले से सोने की चेन छीनने, सड़क के किनारे पैदल चले रहे व्यक्तियों को जानबूझकर टक्कर मारने, धमका कर या हथियार दिखा कर लूटपाट करने और विरोध करनेवाले को जख्मी करने व चोट पहुंचाने या जान से मारने में उन्हें कोई संकोच, पश्चाताप महसूस नहीं होता। तेज हार्न बजाते तीव्र गति से मोटरसाइकिल दौड़ाते लड़के, समाज में सेंध लगा चुकी असभ्यता, राक्षसी वृत्ति की पराकाष्ठा तय करते प्रतीत होते हैं। उनकी दृष्टि में पुलिस कानून कुछ नहीं है। उन्हें कानूनी कार्यवाही की कोई चिंता नहीं होती। वैसे भी जब वे राह चलते किसी सज्जन व्यक्ति को जानमाल का नुकसान पहुंचा चुके होते हैं, तो उसके बाद होनेवाली कानूनी कार्यवाही का औचित्य ही क्या रह जाता है!

            दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में तो बाइकर्स के बाकायदा गैंग तैयार हो गए हैं। ये लूटे गए धन और आभूषण तथा अन्य जरूरी सामान अपने आकाओं के पास ले जाते हैं। वहां पर इनकी कीमत तय की जाती है और उसके बाद लूटनेवालों को मासिक वेतन दिया जाता है। कह सकते हैं कि बाइकर्स जो लूटपाट करते हैं वो मासिक वेतन अर्जित करने का उनका व्यवसाय बन गया है। पुलिस-प्रशासन की उदासीनता या कहें कि राजनीति की विसंगतियों से जूझता प्रशासनिक तन्त्र बाइकर्स के विरूद्ध कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर पा रहा है। फिर लूटपाट में एक खास वर्ग के लोगों की अतिसंलिप्तता के कारण यदि उनको पकड़ कर उनके विरूद्ध कोई पुलिसिया कार्रवाई की भी जाती है तो राजनीति के ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण के कारण कार्रवाई पूर्ण होने से पूर्व ही रोक देने की बाध्यता भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में ईमानदारी से अपना कर्तव्‍य निर्वाह कर रहे पुलिस के जवानों को हतोत्साहन में हाथ मलते रह जाना पड़ता है।

लोगों को आधुनिकता का स्वप्न दिखाकर तरह-तरह की विदेशी नीतियों का पालन करनेवाली सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि आम जनता को सुरक्षा का वातावरण उपलब्ध कराए बगैर उनका सच्चा समर्थन प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है।

इस देश की कानूनी व्यवस्था की सच्चाई है कि जब तक किसी को किसी प्रकार की हानि नहीं हो जाती है तब तक उसे कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती। हानि होने के बाद पुलिस और न्यायालयी प्रक्रियाओं का क्या लाभ? क्योंकि अपराधी को कठोर दण्ड देने की बजाय यह व्यवस्था उसे सुधारने के अवसर उपलब्ध कराती है। ऐसी स्थिति में भविष्य में अपराध में जड़ जमानेवालों को हतोत्साहित कैसे किया जा सकता है? व्यवस्था द्वारा पुनरूद्धार की कार्यवाहियां अपराध से जानमाल की हानि उठा चुके लोगों के लिए होनी चाहिए ना कि अपराध करनेवालों के लिए। जिसको अपराधों से हानि होनी होती है, वह लुटापिटा और ठगा सा अपने होने न होने की विडंबना के विचार में खो जाता है। उसे लगता है कि भारतीय भूखण्ड के दिखावटी लोकतन्त्र के क्या कहने....यह लोकतन्त्र है कि गुंडातन्त्र? लोकतन्त्र तब ही फलीभूत और साकार होगा जब जनसाधारण और सज्जन मनुष्यों को दाना पानी के साथ-साथ शक्तिशाली सुरक्षा परिवेश भी उपलब्ध कराया जाएगा।

16 comments:

  1. क्या करें विकेश जी लोग असुरक्षित है बात तो सही है पर दिनों दिन बढ रही आबादी नव-नवीन समस्याएं निर्माण कर रही है। भारत में अब कोई मजाक-मजाक में पत्थर भी उठा कर फेंक दें तो किसी के मरने का डर है। रास्तों पर तो भीड ही भीड है और वह बेपरवाह। किसी को कोई मतलब नहीं। सुरक्षा का प्रश्न सच में भयानक है।
    drvtshinde.blogspot.com

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  2. बेहद चिंतनीय विषय है.
    वर्तमान सरकार के राज में असुरक्षा बढ़ी ही है.
    आधुनिकता और लोकतंत्र के नाम पर दिखावेबाजी ही है ..दुखद स्थिति.

    एक इंसानी जान की कीमत ही नहीं है ..जनसंख्या विस्फोट भी के कारण है तो कानून और व्यवस्था पर भी प्रश्न उठते हैं..समय है कानून में /व्यवस्था में समयानुसार परिवर्तन की .

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  3. सरकार, नौकरशाही,विधि-विधान का पहाड़ बहुत बड़ा है लेकिन जब व्यवस्था की बात आती है तो खोदने पर चूहे बराबर काम भी नहीं निकलता। छीनछपटी, चोरी, डकैती, यौनअपराध, रिश्वतख़ोरी से लेकर आतंकवाद जैसे दानव इसीलिए मुंहबाए खड़े रहते हैं क्योंकि सबको पता है की इस देश में उन्हें कोई डर नहीं है

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  4. सुरक्षित रहने का अधिकार तो हर नागरिक का है | व्यवस्था की कमियों का फ़ायदा उठाते हैं ऐसे असामाजिक तत्व

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  5. सरकार सुरक्षा के नाम पर बहुत कुछ खर्च कर रही है परन्तु इसे पूर्ण रूप से अमल में नही ले आ पाती है.अपराधियों के दिलो से डर जाता रहा है.

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  6. प्रिवेंटिव क्राइम का कोई कोन्सेप्त कोई अवधारणा हमारे यहाँ नहीं है यहाँ तो क़ानून मंत्री ही क़ानून की खामियों का फायदा उठाके विकलांगों की बैसाखियाँ भी खा जाता है और तरक्की पाके क़ानून से विदेश मंत्री बन जाता है ऐसी है यह राजनीतिक धंधे बाज़ी प्रजा तंत्र के लिबास में .

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  7. सच कहो तो देश में जंगल तंत्र तो है ही ...
    ताकत वाले के ताकत के आगे हर क़ानून मजाक बन के रह जाता है ..

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  8. kisi vishay pe likhne keliye sab se pehle shukriya.

    aap ka blog bhut acha hai,ise ese he rakhiyega.

    post -***

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  9. सीजीएचएस और निजी चिकित्‍सालयों का संघर्ष »
    सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्‍थ स्‍कीम राष्‍ट्रीय समाचारपत्र के अन्‍दर के पृष्‍ठ पर लघु समाचार—लापरवाही के चलते सीजीएचएस पैनल से हटे अस्‍पताल। सीजीएचएस (सेन्‍ट्रल गवर्नमेंट हेल्‍थ स्‍कीम) अर्थात् केन्‍द्र स...

    ये पोस्ट भाई साहब खुली नहीं है .

    प्रोएक्टिव एक्शन की अवधारणा से भारत वाकिफ ही नहीं है .पुलिस नेताओं की चौकसी में लगी हुई है .लास वेगास में मैं ने देखा पुलिस बाकायदा वीडिओकमरा लिए रहती है सबूत की ज़रुरत ही नहीं पड़ती .तुरत दान महाकल्याण .ईराक पर हमला प्रोएक्तिव एक्शन था और ओसामा बिन लादेन को उसकी मांद में जाके मारना भी .

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  10. लोग भी राजा हो गये हैं जहाँ मर्जी वही खड़े हो जाते हैं
    युवा गाड़ी से उतरना पसंद नहीं करते बीच सड़क पर गपियाते हैं
    भाई जी पहले हम सुधरेंगे
    बहुत सही रपट है

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  11. एक सजग और कठोर निगरानी तथा प्रशासनिक तंत्र की आवश्यकता है -आपने सही स्थिति बयान की है!

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  12. चिंतनीय विषय को बखूबी उठाया है
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (08 -04-2013) के चर्चा मंच 1208 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है | सूचनार्थ

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  13. यहाँ तो प्रशासन यदि अंकुश लगाती भी रहे तो भी लहरिया रेस रुकने का नाम नहीं ले रहा है.

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  14. मोनिका जी की बात से पूर्णतः सहमत हूँ।

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  15. आज सभी असुरक्षा के बीच जी रहे हैं...विचारणीय आलेख...

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  16. बेहद चिंतनीय विषय है....बेहतरीन प्रस्तुति !!
    पधारें "आँसुओं के मोती"

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